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वयस्क जेलों में रखे गए देश के हजारों बच्चे, ऐसा होने पर क्या अधिकार हैं?

जनवरी 2016 और दिसंबर 2021 के बीच 18 साल से कम उम्र के कम से कम 9,681 बच्चों को वयस्कों की जेलों में बंद रखा गया था. हर साल औसतन 1,600 से ज़्यादा बच्चे.

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जेल की सांकेतिक तस्वीर.

‘दस गुनाहगार छूट जाएं, मगर एक भी बेक़ुसूर को सज़ा न हो’ – न्याय की परिभाषा स्थापित करने के लिए अक्सर अंग्रेज़ी न्यायविद् और जज विलियम ब्लैकस्टोन का ये वाक्य कोट किया जाता है. नाटकीयता हटा दें, तो तथ्य कितना? एक आंकड़ा देखिए. जनवरी 2016 और दिसंबर 2021 के बीच 18 साल से कम उम्र के कम से कम 9,681 बच्चों को वयस्कों की जेलों में बंद रखा गया था. हर साल औसतन 1,600 से ज़्यादा बच्चे. भारत के क़ानून के तहत ये अवैध है.

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इस स्टडी की हेड गीतांजलि प्रसाद के मुताबिक़, उनका उद्देश्य राज्य की जवाबदेही तय करना है. इसलिए अप्रैल, 2022 से मार्च, 2023 के बीच 28 राज्यों और दो केंद्र शासित प्रदेशों के जेल मुख्यालयों को RTI इंक्वायरी भेजी गई. टाइम्स ऑफ़ इंडिया ने छापा है कि देश की कुल 570 जेलों में से केवल 285 का डेटा आया है. यानी आधे के क़रीब. मध्य प्रदेश, पश्चिम बंगाल, नगालैंड से कोई डेटा नहीं. उनका कहना है कि इस रिस्पॉन्स से पता चलता है कि राज्यों की जेल कार्रवाई में भारी ख़ामियां हैं.

रिपोर्ट में बालसुधार गृह के आंकड़ों को भी जोड़ा गया है, ताकि जांचा जा सके कि जेल से वहां कितने बच्चों को भेजा गया है.

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  • उत्तर प्रदेश जैसे बड़ी आबादी वाले राज्य में 2,914 बच्चों को वयस्कों की जेलों में भेजा गया था. 
  • बिहार में केवल 34% जेलों ने RTI का जवाब दिया. उन्होंने बताआ कि कुल 1,518 बच्चों को ट्रांसफ़र किया गया.
  • हरियाणा में 90% जेलों ने जवाब दिया. बताया कि ट्रांसफ़र किए जाने वाले बच्चों की संख्या 1,621 थी.
  • देश की राजधानी दिल्ली के केवल 38% जेलों ने जवाब दिया और जानकारी दी कि 767 बच्चों को ट्रांसफ़र किया गया है. 
  • जम्मू और कश्मीर में केवल एक बच्चे को स्थानांतरित किए जाने की सूचना मिली है.
  • ओडिशा ने जवाब दिया कि किसी भी बच्चे को स्थानांतरित नहीं किया गया है. 
  • वहीं, गोवा की दो जेलों में से एक ने जवाब दिया कि उन्होंने मांगी गई जानकारी का रिकॉर्ड नहीं रखा है.
क़ानून क्या कहता है?

भारतीय क़ानून के मुताबिक़, जिस बच्चे पर आरोप हों या दोषी पाया गया हो, उसे पर्यवेक्षण गृह या विशेष गृह में ही रखा जाना चाहिए. उसे वयस्क जेल में नहीं भेजा जा सकता है.

फ़र्ज़ कीजिए: आप समय-परिस्थिति के चक्कर में ग़लत फंस गए. आप सही हैं, मगर पुलिस को इस बात पर भरोसा नहीं. वो आपको जांच पूरी होने तक अपनी हिरासत में रखे. जब तक पुलिस और कोर्ट इस नतीजे पर आए कि आप निर्दोष हैं, कई साल गुज़र गए. आपके बच्चे बड़े हो गए, उनकी शादी हो गई, माता-पिता गुज़र गए, भाइयों ने बंटवारा कर लिया, पत्नी की तबियत बिगड़ गई. अब जो आप इतने साल जेल में रहे, इसका मुआवज़ा कौन देगा? ये क्षण, जो बीत गए, जिनमें आपको होना था, उन्हें कौन लौटाएगा? यही मूल सवाल है.

इसके जवाब के लिए दी लल्लनटॉप ने बात की संवैधानिक क़ानून के वकील विराग गुप्ता से. उन्होंने बताया,

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संविधान या क़ानून में ऐसा कोई सीधा प्रावधान नहीं है. व्यक्ति को मुआवज़े के लिए वापस कोर्ट का ही दरवाज़ा खटखटाना होगा. तीन तरह के मामले हो सकते हैं, जहां मुआवज़ा मांगा जाए:

- अगर आपको किसी ऐसे आरोप में जेल में रखा गया है, जिसकी सज़ा की मियाद ही तीन साल है और आप पांच-छह साल से जेल में ही हैं. तो इस केस में आप कोर्ट जा सकते हैं. सैद्धांतिक रूप से तो कोई क़ानूनी प्रावधान नहीं है, लेकिन नए सिरे से केस फ़ाइल कर सकते हैं.

- अगर लोअर कोर्ट आपको दोषी घोषित कर दे, लेकिन अपर कोर्ट आपको निर्दोष क़रार दे, तो आप क्षतिपूर्ति मांग सकते हैं. क्योंकि कहा जा सकता है कि आपको ग़लत तरीक़े से गिरफ़्तार किया गया है.

- अगर पुलिस के स्तर पर ही ग़लत गिरफ़्तारी हुई हो, तो हर्ज़ाना मांगा जा सकता है. 

नाबालिग को वयस्कों की जेल में रखने वाले केस के लिए भी कोई अलग से प्रावधान नहीं है. फिर से नया केस करना होगा.

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नागरिक और राजनीतिक अधिकारों पर अंतर्राष्ट्रीय अनुबंध 1966 (ICCPR) का अनुच्छेद 14(6) भी विराग की इस बात की तस्दीक़ करता है. इसके मुताबिक़, अगर एक व्यक्ति को किसी अपराध के लिए दोषी ठहराया गया हो और बाद में केस के एक नए तथ्य से ये साबित हो जाए कि वो दोषी नहीं है, तो उसे क़ानूनन मुआवज़ा दिया जाएगा.

सुप्रीम कोर्ट के पूर्व न्यायाधीश जस्टिस एस रवींद्र भट ने हाल ही में इन ख़ामियों की बात की थी. कहा था कि ऐसे मामलों में सख़्त मौद्रिक जुर्माने लगाने चाहिए.

जुर्माने का एक प्रावधान CrPC में मिलता है. CrPC की धारा-358 के तहत ग़लत गिरफ़्तार हुआ व्यक्ति 100 रुपये का सांकेतिक मुआवज़ा मांग सकता है. लेकिन ये भी अनुग्रह दायित्व है, राज्य का कोई वैधानिक दायित्व नहीं. ‘एस.नांबी नारायणन बनाम कर्नाटक राज्य’ और ‘रुदुल साह बनाम बिहार राज्य’ जैसे केसों के वक़्त ये विमर्श उठता ज़रूर है. मगर ये कोर्ट के विवेक पर निर्भर करता है कि वो इस बात को तरजीह दे या न दे.

ये स्टोरी हमारे साथ इंटर्नशिप कर रहे नवनीत के इनपुट्स के साथ लिखी गई है.

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