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क्यों पाकिस्तान की लाल मस्जिद वहां की राजनीति में इतनी अहम है?

ज़िया उल-हक़ की सरकार का लाल मस्जिद से क्या नाता था?

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ज़िया उल-हक़ की सरकार का लाल मस्जिद से क्या नाता था? (फोटो साभार विकिपीडिया)
साल 1967. पाकिस्तान ने अपनी राजधानी बदल ली. वो सरकार का सारा साजो-सामान उठाकर इस्लामाबाद ले आए थे. नई राजधानी में एक नई मस्जिद भी बनाई गई. सरकार के नियंत्रण वाली. लाल दीवारों और लाल इंटीरियर वाली इस इमारत को ‘लाल मस्जिद’ का नाम मिला. लाल मस्जिद पाकिस्तानी खुफिया एजेंसी ISI के हेडक़्वार्टर और पाकिस्तानी सत्ता-प्रतिष्ठान के बेहद क़रीब थी. लोकेशन के साथ-साथ रिश्तों के लिहाज से भी. 1979 में सोवियत-अफ़ग़ान वॉर शुरू हुआ. सोवियत संघ के हमले का जवाब देने के लिए मुजाहिदीनों की फौज जमा हुई. इन्हें अमेरिका और ब्रिटेन का सपोर्ट मिला. पश्चिमी देश ISI के ज़रिए मुजाहिदीनों को मदद देते थे. ISI हथियार बांटने के साथ-साथ नए लड़ाकों को रिक्रूट करने और उन्हें ट्रेनिंग देने का काम भी करती थी. पाकिस्तान के कबाइली इलाकों से भी लोग सोवियत संघ के ख़िलाफ़ लड़ने के लिए तैयार थे. लाल मस्जिद उनके लिए लॉन्च पैड का काम करती थी. ऐसे लोगों का माइंडवॉश करके अफ़ग़ानिस्तान और कश्मीर में जिहाद के लिए भेजा जाता था. अफ़ग़ान वॉर में सोवियत संघ हार गया. मुजाहिदीनों की जीत में लाल मस्जिद का भी बड़ा योगदान था. इस उपलब्धि के बदले उन्हें अप्रेज़ल मिलने वाला था. लाल मस्जिद के पहले इमाम थे, मौलाना मोहम्मद अब्दुल्ला. जनरल ज़िया उल-हक़ की सरकार में उन्हें संसद में जगह दी गई. लाल मस्जिद और ISI की करीबियां भी बढ़तीं रही. कुल ज़मा बात ये कि धर्म और सरकार एकाकार हो चुके थे. फिर आया साल 2007. जुलाई का महीना था. राजधानी इस्लामाबाद का तापमान अचानक से बढ़ गया. वजह, लाल मस्जिद. पाक आर्मी की स्पेशल यूनिट टैंक और दूसरे अत्याधुनिक हथियारों के साथ मस्जिद के बाहर तैनात थी. वे बस एक आदेश के इंतज़ार में खड़े थे. हरी झंडी मिलते ही वे लाल मस्जिद पर टैंक के गोले दागने वाले थे. आगे क्या हुआ? कभी एक थाली में खाना खाने वाले दो पक्ष एक-दूसरे की जान लेने पर क्यों उतारु थे? इस घटना का परिणाम क्या निकला? और, आज के दिन हम इसकी चर्चा क्यों कर रहे हैं? सब विस्तार से बताएंगे. लेकिन लाल मस्जिद वाली घटना से पहले एक मुलाक़ात की बात जान लेते हैं पाकिस्तानी अख़बार ‘द डॉन’ में ज़ाहिद हुसैन की एक रिपोर्ट है. The Legacy of Lal Masjid. इसमें वो एक कहानी बयां करते हैं. सितंबर 1996 में तालिबान ने अफ़ग़ानिस्तान पर क़ब्ज़ा कर लिया. मुल्ला ओमर इसका सुप्रीम लीडर बना. दो बरस बाद मौलाना मोहम्मद अब्दुल्ला उससे मिलने कंधार पहुंचे. इमाम साहब साथ में अपने छोटे बेटे अब्दुल राशिद को भी लेकर गए थे. दोनों बाप-बेटे कंधार में एक और ख़ास शख़्सियत से मिले. वो था, अल-क़ायदा का संस्थापक - ओसामा बिन लादेन. अब्दुल राशिद और लादेन एक घंटे तक साथ रहे. जब उनकी बातचीत ख़त्म हुई, तब राशिद ने लादेन की जूठी गिलास उठाई और उसमें रखा पानी गटागट पी गया. लादेन ये देखकर चौंक गया. उसने ऐसा करने की वजह पूछी. राशिद ने कहा,
‘मेरा सपना है कि अल्लाह मुझे भी आपके जैसा योद्धा बनाए.’
मुलाक़ात के बाद वे वापस लौटे. कुछ दिनों के बाद मौलाना अब्दुल्ला पर गोलीबारी हुई. इस हमले में उनकी मौत हो गई. तब उनके बड़े बेटे अब्दुल अज़ीज़ को लाल मस्जिद का नया इमाम बनाया गया. अभी तक उसका छोटा भाई अब्दुल राशिद मस्जिद से नहीं जुड़ा था. वो जुड़ा एक साल बाद. उसके बाद मस्जिद का चाल और चरित्र हमेशा के लिए बदल गया. इसके पीछे भी एक कहानी है, वो आगे बताएंगे. 1999 में दोनों भाईयों ने मिलकर लाल मस्जिद की कमान संभाल ली. नवंबर 2001 में अमेरिका ने वॉर ऑन टेरर शुरू किया. उस समय जनरल परवेज़ मुशर्रफ़ पाकिस्तान में सरकार चला रहे थे. उन्होंने तालिबान की बजाय अमेरिका का दामन थाम लिया. लाल मस्जिद इसके ख़िलाफ़ थी. उन्हें लगा कि ये जिहाद की अवधारणा का अपमान हैं. दोनों भाईयों ने प्रतिबंधित आतंकी संगठनों के साथ हाथ मिला लिया. वे राजधानी में बैठकर पाकिस्तान सरकार और अमेरिका के ख़िलाफ़ योजनाएं बनाने लगे. लाल मस्जिद से जुड़े मदरसों में पढ़ने वाले नौजवान अमेरिका के ख़िलाफ़ लड़ने भी गए. 2004 में पाकिस्तान सेना ने वज़ीरिस्तान में ऑपरेशन शुरू किया. लाल मस्जिद के इमाम ने फतवा जारी कर लोगों से लड़ने के लिए कहा. फतवे में ये भी कहा गया कि लड़ाई में मरने वाले लोगों को शहीद का दर्ज़ा दिया जाएगा. जैसे-जैसे समय बीत रहा था, लाल मस्जिद की कट्टरता बढ़ती जा रही थी. पहले तो सरकार इसे नज़रअंदाज़ करती रही. इसके दो कारण बताए जाते हैं. पहला, लाल मस्जिद की धमकी. धमकी कुछ यूं कि अगर सरकार ने कार्रवाई की तो सुसाइड बॉम्बिंग की जाएगी. दूसरा कारण था, पुराने संबंध. शासन-तंत्र लाल मस्जिद के साथ झगड़ा कर अपनी फ़जीहत नहीं कराना चाहता था. लेकिन 2007 आते-आते हालात काबू से बाहर हो गए. साल की शुरुआत में लाल मस्जिद की तरफ़ से एक चार्टर जारी हुआ. इसमें मुशर्रफ़ सरकार के ख़िलाफ़ क्रांति की अपील की गई थी. साथ ही, ये मांग भी रखी गई कि पाकिस्तान शरिया लॉ के हिसाब से चले. इमाम ने रेवॉल्युशनरी कमिटी की स्थापना का प्रस्ताव भी रखा. इसके अलावा, लाल मस्जिद मोरल पुलिसिंग का अड्डा भी बन गई. मस्जिद से जुड़े लोग किसी के भी घर पर हमला कर देते. वे लोगों को शरिया कानून के हिसाब से न चलने के लिए सज़ा भी देने लगे. वे किसी को भी किडनैप कर अंदर ले आते. इनमें पुलिसवाले भी शामिल थे. मामला तब बिगड़ गया, जब इन लोगों ने कुछ चीनी नागरिकों को बंधक बना लिया. इन्हें बाद में छोड़ दिया गया. लेकिन चीन ने पाकिस्तान को खूब खरी-खोटी सुनाई. तब मुशर्रफ़ ने आदेश दिया कि चीनी नागरिकों की रक्षा पाकिस्तानी रेंज़र्स करेंगे. रेंज़र्स ने लाल मस्जिद के आस-पास बैरिकेडिंग लगा दी. इसी दौरान मदरसे के कुछ स्टूडेंट्स के साथ उनकी मुठभेड़ हो गई. इस मुठभेड़ में एक सैनिक समेत 21 लोग मारे गए. अब सेना को बुलाना ज़रूरी हो चुका था. तीन जुलाई 2007 को स्पेशल फ़ोर्सेंज़ को बुला लिया गया. स्पेशल फ़ोर्स पूरे साजो-सामान के साथ आई थी. सरकार ने अंतिम समय तक बातचीत के ज़रिए मसले को सुलझाने की कोशिश की. लेकिन बातचीत फ़ेल हो गई. आठ जुलाई को ऑपरेशन साइलेंस को हेड कर रहे लेफ़्टिनेंट-कर्नल हारून इस्लाम की हत्या कर दी गई. इसके बाद तो सब्र का बांध टूट गया. सेना को हमले का आदेश दे दिया गया. 10 जुलाई को सेना की कार्रवाई शुरू हुई. इस कार्रवाई में सौ से अधिक लोगों की मौत हुई. इसमें एक नाम अब्दुल राशिद का भी था. उसके बड़े भाई अब्दुल अज़ीज़ को पुलिस ने हिरासत में ले लिया. वो बुर्क़ा पहनकर भागने की फ़िराक़ में था. ऑपरेशन के बाद सेना का बयान आया कि अब्दुल राशिद को उसके ही साथियों ने गोली मार दी. असल में वो सरेंडर करना चाहता था. यहां पर एक विरोधाभास सामने आता है. एक पक्ष ये कहता है कि अब्दुल राशिद हमेशा से कट्टर था. जिहाद वाली मानसिकता उसमें कूट-कूट कर भरी थी. जबकि दूसरे पक्ष का कहना है कि वो एक समय तक यूनिवर्सिटी का आम स्टूडेंट था. सिनेमा और संगीत में उसकी दिलचस्पी थी. इंटरनैशनल रिलेशंस में उसने मास्टर्स की किया था. डिग्री पूरी करने के बाद उसे एजुकेशन मिनिस्ट्री में नौकरी भी मिल गई. उसका सपना था पिता की मौत के बाद बड़े भाई ने उसको इमोशनली ब्लैकमेल किया. बड़े भाई ने कहा कि तुम्हारी वजह से अब्बाजान की आत्मा कभी खुश नहीं रहेगी. ये ताना सुनकर अब्दुल राशिद डिप्रेशन में चला गया. जब वो उबरा, तब उसने अपनी दाढ़ी बढ़ा ली. वो अचानक से कट्टर हो गया. बड़ा भाई अपने पिता की हत्या की FIR दर्ज़ नहीं करा रहा था. तब अब्दुल राशिद ने सरकार पर कार्रवाई करने का दबाव बनाया. कहा जाता है कि सरकारी अमले ने उल्टा उसे धमका दिया. उससे कहा गया कि चुप हो जाओ या तुम्हारा हाल भी तुम्हारे अब्बा जैसा ही होगा. इसके बाद ही उसका मन उचट गया. और, उसने अपने भाई के साथ मिलकर सरकार का हिंसक विरोध शुरू किया. सच जो भी हो, लेकिन लाल मस्जिद पर सैन्य आक्रमण ने मामला सुलटाने की बजाय बैकफ़ायर कर दिया. अब्दुल राशिद को नायक की तरह पूजा जाने लगा. दुनियाभर के आतंकी संगठनों ने उसे आदर्श मान लिया था. लादेन ने एक ऑडियो टेप जारी किया. इसमें उसने राशिद को ‘इस्लाम का हीरो’ बताया और पाकिस्तान सेना के ख़िलाफ़ युद्ध छेड़ने का ऐलान कर दिया. अल-क़ायदा का नंबर दो अल-ज़वाहिरी अपने बॉस से कई कदम आगे निकल गया. उसने अपने ऑडियो टेप में कहा,
‘मुशर्रफ़ और उसके शिकारी कुत्तों ने यहूदियों के लिए तुम्हारा मान ख़त्म कर दिया. अगर तुमने विद्रोह नहीं किया तो मुशर्रफ़ तुम लोगों को मिटा देगा. वो तब तक नहीं रुकेगा जब तक कि पाकिस्तान से इस्लाम ख़त्म नहीं हो जाता.’
ये क़बाइली नेताओं को भड़काने के लिए काफ़ी था. इसके बाद पाकिस्तान में हमलों की संख्या बढ़ती गई. अगले एक साल में पाकिस्तान के अंदर 88 बम धमाके हुए. इनमें लगभग 12 सौ लोगों की मौत हुई, जबकि तीन हज़ार से अधिक लोग घायल हुए. सेना हमला करती, सरकार कार्रवाई करती. अभी तक क़बाइली नेता अलग-अलग होकर सरकार से लड़ रहे थे. उन्हें लगा कि ऐसे में मुक़ाबला करना मुश्किल है. 14 दिसंबर 2007 को वज़ीरिस्तान में 40 चरमपंथी नेता ज़मा हुए. उन्होंने पाकिस्तान की सरकार और सेना के ख़िलाफ़ मिलकर जंग छेड़ने का ऐलान किया. इन सभी गुटों का समूह कहलाया, तहरीक-ए-तालिबान पाकिस्तान (TTP). इसका फ़ाउंडर था, बैतुल्लाह महसूद. TTP ने अब्दुल राशिद की मौत का बदला लेने की शपथ भी खाई. लाल मस्जिद के इमामों के साथ इनके संबंध प्रगाढ़ बने रहे. अब्दुल राशिद ने लाल मस्जिद की कार्रवाई में मारे जाने से पहले मीडिया से बात की थी. इसमें उसने कहा था कि अगर मैं मारा गया तो पाकिस्तान में भूचाल आ जाएगा. वही हुआ भी. TTP ने पाकिस्तान में हिंसा का जो खेल शुरू किया था, वो आज तक कायम है. किन बड़े हमलों में TTP का नाम आया? दिसंबर 2007 में पूर्व प्रधानमंत्री बेनज़ीर भुट्टो की हत्या कर दी गई. उन्हें आत्मघाती हमले में उड़ा दिया गया था. TTP को इसके लिए ज़िम्मेदार बताया गया. हालांकि, इस दावे की कभी पुष्टि नहीं हो पाई. - मार्च 2009 में लाहौर में श्रीलंका की क्रिकेट टीम के बस पर हमला हुआ था. इसमें भी TTP का हाथ था. - अक्टूबर 2012 में TTP ने मलाला युसुफ़ज़ई पर गोलीबारी की. हालांकि, इसमें मलाला की जान बच गई. - दिसंबर 2014 में TTP के छह आतंकियों ने पेशावर में एक आर्मी स्कूल पर हमला किया. इस हमले में 140 से अधिक लोग मारे गए थे. इनमें 132 नाबालिग स्कूली बच्चे थे. TTP के हमलों की फेहरिस्त बहुत लंबी है. इस लिस्ट में सैन्य मुख्यालय, ISI ऑफ़िस, नेवल बेस, आर्मी चेक पोस्ट, पुलिस स्टेशन, स्कूल, पोलियो वर्कर्स आदि शामिल हैं. पाकिस्तान सरकार ने अगस्त 2008 में TTP को आतंकी संगठन घोषित कर दिया था. सरकार ने उनके बैंक अकाउंट्स और संपत्तियों को फ़्रीज़ कर दिया. अमेरिका, कनाडा और ब्रिटेन भी इसी लीक पर चले. 2009 में एक ड्रोन हमले में TTP का संस्थापक बैतुल्लाह महसूद भी मारा गया. बाद में ग्रुप के भीतर बंटवारा भी हुआ. एक समय ये लग रहा था कि TTP ख़त्म होने की कगार पर है. लेकिन ऐसा था नहीं. 2020 में TTP की वापसी हुई. उस साल उसने कुल 126 हमले किए. 2021 में इनकी संख्या एक बार फिर से बढ़ रही है. आज हम ये कहानी क्यों सुना रहे हैं? ख़बर है कि पाकिस्तान सरकार ने TLP के साथ संघर्षविराम पर समझौता कर लिया है. ये संघर्षविराम पूर्ण नहीं है. इसका दायरा एक महीने तक सीमित है. इस दौरान दोनों पक्षों ने एक-दूसरे के ख़िलाफ़ हथियार नहीं उठाएंगे. अगर सब ठीक चला तो संघर्षविराम का दायरा और बढ़ाया जाएगा. आठ नवंबर को पाकिस्तान के सूचना मंत्री फ़वाद चौधरी ने इसका ऐलान किया. उन्होंने कहा कि पूरा समझौता संविधान के दायरे में रहकर हुआ है. पाकिस्तान और TTP के बीच बातचीत की मध्यस्थता अफ़ग़ान तालिबान ने की. उसकी तरफ़ से हक़्क़ानी नेटवर्क के मुखिया और तालिबान सरकार में गृह मंत्री सिराज़ुद्दीन हक़्क़ानी ने हिस्सा लिया. सिराज़ुद्दीन यूएन द्वारा घोषित आतंकी है. जानकारों का कहना है कि पाकिस्तान वाला तालिबान हक़्कानी नेटवर्क के इशारे पर ही काम करता है. हक़्क़ानी नेटवर्क अफ़ग़ान तालिबान का अभिन्न हिस्सा है. मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, ये समझौता अफ़ग़ानिस्तान के खोश्त प्रांत में हुआ. दोनों पक्षों के बीच अक्टूबर 2021 से बातचीत चल रही थी. प्रधानमंत्री इमरान ख़ान ने पिछले महीने टर्किश चैनल TRT को दिए एक इंटरव्यू में इसका हिंट भी दिया था. हालांकि, उन्होंने खुलकर बात नहीं की थी. इसी को लेकर विपक्ष नाराज़ है. विपक्ष का कहना है कि सरकार ने संसद को भरोसे में लिए बिना ही इतना बड़ा फ़ैसला कर लिया. अभी तक समझौते की सभी शर्तें बाहर नहीं आईं है. मीडिया रिपोर्ट्स में दावा किया जा रहा है कि TTP ने 102 लोगों की लिस्ट सौंपी है. ये लोग उसके काडर हैं और पाकिस्तान की जेलों में बंद हैं. TTP उन्हें रिहा करने के लिए कह रही है. तो क्या इस समझौते से TTP का हृदय-परिवर्तन हो जाएगा? क्या इससे हिंसा रुक जाएगी? ये कहना जल्दबाजी होगी. TTP और पाकिस्तान सरकार के बीच छह और मौकों पर शांति समझौते हो चुके हैं. इनमें से एक भी सफ़ल नहीं रहा. TTP और पाकिस्तान सरकार के बीच बुनियादी अंतर है. TTP चाहती है कि पाकिस्तान शरिया लॉ के हिसाब से चले. इसकी व्याख्या उसके उलेमा करेंगे. जबकि पाकिस्तान सरकार कहती है कि TTP संविधान और कानून का पालन करे. TTP इसी को ख़त्म करने के मकसद से काम कर रही है. जानकारों का सवाल है कि क्या ऐसी स्थिति में दोनों पक्ष कैसे एकमत हो सकते हैं? पाकिस्तान की सरकार का एक तर्क ये है कि पूरी बातचीत अफ़ग़ान तालिबान की सरपरस्ती में हुई. TTP भी अमीर-उल-मोमिनीन की सत्ता को मानती है. पाकिस्तान को लगता है कि अगर TTP अपने वादे से मुकरी तो अफ़ग़ान तालिबान उनके ख़िलाफ़ ऐक्शन ले सकता है. जानकारों का मानना है कि अफ़ग़ान तालिबान पहले से ही ISKP और घरेलू समस्या से परेशान चल रहा है. वो क्यों ही पाकिस्तान के घरेलू मामले में टांग अड़ाने आएगा. TTP से पहले पाकिस्तान ने तहरीक-ए-लब्बैक (TLP) पर अपना रुख नरम कर लिया था. TLP अपने लीडर साद रिज़वी की रिहाई, पार्टी पर लगे प्रतिबंधों को हटाने और फ़्रेंच दूतावास को बंद करने जैसी मांगों को लेकर सड़क पर थी. TLP के प्रदर्शनों में कई लोगों की मौत भी हुई. फिर सरकार ने कहा कि अब बर्दाश्त की सीमा खत्म हो गई है. अब वो TLP पर ऐक्शन लेगी. इस ऐलान के एक दिन बाद ही सरकार अपने कहे से पलट गई. उसने TLP पर लगा प्रतिबंध हटाने और गिरफ़्तार हुए कार्यकर्ताओं को छोड़ने का वादा किया. सरकार साद रिज़वी को रिहा करने के लिए भी तैयार है. हालांकि, उन्हें अभी छोड़ा नहीं गया है. TTP और TLP, दोनों का मसला ताज़ा ही है. ऐसे में सवाल उठता है कि क्या इमरान ख़ान सरकार चरमपंथियों और आतंकवादियों के सामने घुटने टेक रहे हैं? इस मसले पर हमारी नज़र बनी रहेगी. आप बने रहिए लल्लनटॉप के साथ.

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