‘हम विरोध प्रदर्शन का नाम लेंगे. तुम जंतर-मंतर समझना.’ दो-दो शब्दों के ये दोनों जोड़े 30 साल से ज्यादा समय से एक दूसरे के पर्यायवाची बने थे. लेकिन अब इनके अर्थ अलगा दिए गए हैं. जंतर-मंतर से ‘डेजिग्नेटेड प्रोटेस्ट’ साइट का दर्जा वापस ले लिया गया है. यानी अखबारों में ‘जंतर-मंतर पर फलां संगठन का प्रदर्शन’ जैसी हेडलाइन्स अब इतिहास हो जाएंगी. दिल्ली में विरोध प्रदर्शनों की नई ‘राजधानी’ अब रामलीला मैदान, बुराड़ी ग्राउंड और सीबीडी ग्राउंड होगी. कॉकरोच जनता पार्टी के जंतर-मंतर पर बैक-टू बैक दो विराट प्रदर्शनों के बाद सरकार ने ये फैसला लिया है.
जब बीजेपी के आंदोलन के बाद जंतर-मंतर प्रोटेस्ट का 'नया पता' बना
तीन दशक से ज्यादा समय तक जंतर-मंतर दिल्ली में विरोध प्रदर्शनों की पहचान बना रहा. लेकिन अब यहां से डेजिग्नेटेड प्रोटेस्ट साइट का दर्जा वापस ले लिया गया है और प्रदर्शनों के लिए रामलीला मैदान, बुराड़ी ग्राउंड और सीबीडी ग्राउंड जैसे विकल्प तय किए गए हैं. इसकी कहानी 1988 के टिकैत किसान आंदोलन और 1993 के बीजेपी मार्च से जुड़ी है.

एक वक्त था जब जंतर-मंतर को ‘बोट क्लब का रामलीला मैदान’ बनाया गया था. तब सत्ता को चुनौती देने वाले सारे प्रदर्शन दिल्ली स्थित बोट क्लब के मैदान में होते थे. बोट क्लब संसद और नॉर्थ ब्लॉक-साउथ ब्लॉक के बेहद करीब है. राष्ट्रपति भवन, प्रधानमंत्री आवास और संसद भवन सब कुछ बोट क्लब से सटे हुए हैं. यहीं सत्ता की नाक के नीचे विरोध प्रदर्शनों का मेला लगता था. लेकिन साल 1988 में कुछ ऐसा हुआ कि बोट क्लब के ‘विरोधवादी मंच’ की दावेदारी को पहला बड़ा झटका लगा.
फिर 1993 के एक प्रदर्शन ने इससे ये दर्जा छीन ही लिया. इससे पहले तक बोट क्लब ही उन दिनों का ‘जंतर-मंतर’ था, जहां जब चाहे सत्ता से सवाल करते लोग आ धमकते और चार कदम की दूरी पर मौजूद संसद भवन की दीवारें कांप उठती थीं.
तारीख थी 25 अक्टूबर 1988. गन्ने के दाम बढ़ाने और पानी-बिजली के बिल कम कराने की मांग को लेकर पश्चिमी यूपी के 5 लाख किसान बोट क्लब में हुक्का लेकर जम गए. वो खाली हाथ नहीं आए थे. सरकार से लंबी जंग का संकल्प लेकर आए थे. विजय चौक से लेकर इंडिया गेट तक सादगी भरे किसानी भेष में महेंद्र सिंह टिकैत के पीछे लाखों किसानों के जमावड़े ने सरकार हिला दी थी. एक दिन का आंदोलन था. लेकिन हफ्ते भर खिंच गया. किसानों की तैयारी पूरी थी. वो अपने साथ चारपाई, खाना बनाने का सामान और अपनी भैंसें भी लेकर आए थे. हफ्ते भर अलाव जलाकर चौपड़ खेलते और हुक्का पीते अपनी मांगों पर सरकार के जवाब का इंतजार करते रहे.
तब राजीव गांधी की सरकार थी. प्रधानमंत्री इस आंदोलन को नजरअंदाज नहीं कर पा रहे थे. इतनी बड़ी संख्या में लोगों के संसद के एकदम पास में जमा होने से सरकार का दिल भी धुकधुकाने लगा था. इतनी बड़ी भीड़ को मैनेज करने में पुलिस की भी हालत खराब हो गई थी. हालांकि, बोट क्लब के मैदान में प्रदर्शनकारियों और पुलिस के जुटने के लिए काफी जगह थी. फिर भी टिकैत आंदोलन ने सत्ता केंद्रों के इतने पास इतने भारी जमावड़े को लेकर आशंका के जो बीज सरकार के दिमाग में बोए, वो फिर नष्ट नहीं हुए.
हालांकि, राजीव सरकार ने विरोध प्रदर्शनों के लिए तय जगह के रूप में बोट क्लब के इस्तेमाल पर तुरंत रोक नहीं लगाई. लेकिन, टिकैत प्रदर्शन से उपजी चिंताओ से लोकतांत्रिक विरोध के इस बड़े और मजबूत मंच पर पहला धक्का लगा था.
अब 1993 में आइए. अयोध्या में बाबरी मस्जिद गिराए जाने के कुछ महीने बाद की बात. भारतीय जनता पार्टी के नेता तत्कालीन प्रधानमंत्री पीवी नरसिम्हा राव का इस्तीफा मांग रहे थे. राव सरकार ने बाबरी विध्वंस के बाद राजस्थान, मध्य प्रदेश और हिमाचल प्रदेश में निर्वाचित बीजेपी सरकारों को बर्खास्त कर दिया था. इसी के विरोध में बीजेपी के बड़े नेताओं ने दिल्ली में मार्च का ऐलान कर दिया. बीजेपी के मार्च घोषित करते ही राव सरकार के मंत्री राजेश पायलट ने तत्कालीन दिल्ली पुलिस कमिश्नर एमबी कौशल से संसद के आसपास के इलाकों की सख्त घेराबंदी करने को कह दिया. फिर क्या था. राजधानी को छावनी बना दिया गया. लाखों की संख्या में सुरक्षाकर्मियों की तैनाती हुई.
न्यूयॉर्क टाइम्स ने रिपोर्ट छापी कि रैली से पहले प्रदर्शनकारियों को बोट क्लब तक पहुंचने से रोकने के लिए 1 लाख से ज्यादा सैनिकों, पुलिसकर्मियों और अर्धसैनिक बलों को तैनात किया गया था. अमेरिकी अखबार के पहले पन्ने की खबर में एक बीजेपी कार्यकर्ता पर लाठी बजाते पुलिस की तस्वीर छपी थी. मार्च को रोकने की जुगत में पुलिस ने बोट क्लब के चारों ओर ‘मानव दीवार’ बनाई थी. इतने बड़े जमावड़े से सरकार भी सकपका गई. टिकैत आंदोलन को अभी ज्यादा समय भी नहीं हुआ था. बीजेपी के इस बड़े आंदोलन के बाद सरकार ने मन बना लिया कि बोट क्लब को विरोध प्रदर्शनों के लिए खुला नहीं छोड़ा जा सकता. इसके बदले कोई और जगह खोजनी होगी.
इंडिया टुडे के लिए अविनाश कतील लिखते हैं कि इसी वक्त जंतर-मंतर एक विकल्प के रूप में उभरा.
18वीं शताब्दी की खगोलीय वेधशाला की ओर जाने वाली एक सड़क जो भारत के संसद भवन से सिर्फ 1.5–2 किलोमीटर की दूरी पर है. सत्ता के केंद्र नॉर्थ ब्लॉक, साउथ ब्लॉक, प्रमुख मंत्रालय और सरकारी कार्यालय भी पास में ही हैं. प्रधानमंत्री का घर भी यहां से बहुत दूर नहीं है. लुटियंस दिल्ली इलाके के किनारे पर होने की वजह से इसे सत्ता का एक तरह से दरवाजा माना जाता था. विरोध के लिए यही दहलीज प्रदर्शनकारियों के लिए निर्धारित की गई.
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हालांकि, उस समय के प्रधानमंत्री नरसिम्हा राव ने जंतर-मंतर को विरोध का स्थल घोषित करने के लिए कोई औपचारिक आदेश या अध्यादेश जारी नहीं किया. आंदोलन का केंद्र यहां शिफ्ट हुआ पुलिस और प्रशासनिक कार्रवाइयों के जरिए. 1993 से बड़ी सभाओं या प्रदर्शनों को पुलिस प्रशासन जंतर-मंतर की ओर हांक देती थी. इसके बाद से दिल्ली का ये इलाका प्रदर्शनों के लिए सबसे मुफीद जगह बन गया. किसान, जवान, छात्र, खिलाड़ी सरकार से असहमति रखने वाला हर तबका जंतर-मंतर पर एक उम्मीद लेकर आने लगा.
तीन दशक तक जंतर-मंतर को ‘लोकजंतर का मंतर’ बने रहने के बाद अब सरकार ने फिर से दिल्ली के विरोध प्रदर्शनों का मानचित्र बदला है. सत्ता विरोधी प्रदर्शनों की जगह को जंतर-मंतर से सरका कर मध्य दिल्ली में रामलीला मैदान, उत्तरी दिल्ली में बुराड़ी ग्राउंड और पूर्वी दिल्ली में सीबीडी ग्राउंड में कर दिया गया है.
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