क्रिकेट के मैदान में बल्ला लेकर भतेरे उतरे हैं. एक और ऐसा ही था. मैच के बीच में बॉलर को रोककर मैदान में गिरती पतंग उड़ाने लगा था. काम्बली. कहां है, सबको मालूम है. कैसा है, ये भी. समय बदल चुका है इसलिए कोहली का वो हश्र नहीं होगा. लेकिन मुझे नहीं लगता है कि ऐसा ही रहा तो कोहली का नाम उस सम्मान के साथ लिया जाएगा जिस सम्मान के साथ दुनिया की तमाम टीमों के प्लेयर्स धोनी, सचिन, द्रविड़, लक्ष्मण, कुंबले, इंज़माम, अकरम, लारा, ली, जयवर्धने, संगक्कारा का नाम लेते हैं. ये वो लोग हैं जिन्होंने क्रिकेट को सेमी-बोरिंग से अग्रेसिव होते हुए देखा. जिन्होंने (इनमें से कुछ ने) सफ़ेद कमीज़ के क्रिकेट से उसे रंगीन होते देखा. इन्होने अग्रेसिव क्रिकेट की परिभाषा गढ़ी. सचिन का ये हाल था कि बॉल टेम्परिंग करने के बावजूद (जो कि मैं मानता हूं कि उन्होंने की) देश में लोगों ने ये मानने से ही इन्कार कर दिया कि सचिन ऐसा कर सकते हैं. आज कोहली को बीच मैच में अम्पायर आकर चेताते हैं कि वो सीमाएं लांघ रहे हैं और उन्हें खुद को संभालने की ज़रुरत है.
कोहली को कितनी भी बेहतरीन बल्लेबाजी आती हो, उसे अभी ये सीखना है कि जीतना कैसे है. जीत महज़ एक निश्चित रनों की संख्या पार कर लेना नहीं होता. सचिन तेंदुलकर उस दिन भी जीते थे जब वो लगातार अपने चरम पर गेंदबाजी कर रहे डेल स्टेन को खेल रहे थे क्यूंकि दूसरे छोर पर खड़े गंभीर को स्टेन की बजाय मोर्ल्केल को खेलने में आसानी हो रही थी. (साल 2011. केप टाउन. तीसरे टेस्ट का तीसरा दिन.) डेल स्टेन, जिसके बारे में कहते हैं कि वो आग उगलता है, लगातार सचिन को तेज़ गति से बाहर जाती हुई गेंदें फेंक रहा था. मोर्केल को गंभीर संभाल रहे थे. 56 मिनट तक स्ट्राइक नहीं बदली गई. सचिन ने अपने करियर की 51वीं टेस्ट सेंचुरी मारी और स्टेन ने कुल 5 विकेट लिए. मैच ड्रॉ हुआ. सचिन उस दिन भी जीते थे जिस दिन उन्होंने 241 रन की इनिंग्स के दौरान एक भी कवर ड्राइव नहीं मारी थी क्यूंकि वो बार-बार ड्राइव मारने के ही चक्कर में आउट हो रहे थे. (सिडनी टेस्ट. 2004.) वो मैच भी ड्रॉ ही हुआ.
साउथ अफ़्रीका से मैच जीतने के बाद कोहली ने गुस्से में मैदान के एक हिस्से की ओर झुक कर वो किया जिसे अंग्रेजी में 'took a bow' कहते हैं. ये 20 मैचों में तीसरी जीत की अकड़ थी. उस कप्तान की जिसे अभी ये सीखना बाकी है कि टीम में किसे ले और किसे बाहर रखे. वो सेकंड की दर से गालियां बकता है. जीतने के बाद. हारने पर उसका मुंह यूं लटकता है जैसे अंग्रेजों के देश पर दोबारा कब्ज़ा कर लेने जैसी कोई खबर सुन ली हो. मुझे इसमें और उन बांग्लादेशी फैन्स में कोई अंतर नहीं दिखाई देता जिन्होंने एक मैच इंडिया को हराकर तस्कीन अहमद के हाथ में धोनी का कटा सर पकड़ा दिया था.

क्रिकेट का खेल ऐसे कितने ही किस्सों से भरा हुआ है. और अंत में उन्हीं किस्सों का ज़िक्र होता है जो क्रिकेट के खेल को बड़ा करता है. जो उसकी एक बेहतर तस्वीर गढ़ता है.
टीम इंडिया टेस्ट क्रिकेट में पहली रैंकिंग पर पहुंच गई है. इस बात की ख़ुशी है. लेकिन तीसरे टेस्ट की जीत के बाद मुझे कोहली सबसे ज़्यादा हारा हुआ खिलाड़ी दिखाई दिया. और इस बात का बेहद दुख है. कोहली अपनी बैटिंग के दम पर सचिन का उत्तराधिकारी कहलाता है. लेकिन अपनी हरकतों की वजह से वो सचिन के जूते में लगी नेल्स मेंफंसी गीली घास निकालने के काबिल भी नहीं दिखाई पड़ रहा है.














