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टीम इंडिया की कप्तानी एक नकचिढ़े बंदर के हाथ में है

मैदान पर जिस तरह से बर्ताव कर रहे हैं, शर्मनाक है.

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फोटो - thelallantop
2-1 ये था सीरीज़ का हासिल. दो हारे, एक जीता. हमने साउथ अफ़्रीका में कुल जमा टेस्ट ही इतने जीते हैं जितने इस सीरीज़ में कुल होने थे. 20 टेस्ट मैचों में 3 जीत. रैंकिंग के हिसाब से हम दुनिया में सबसे ऊपर हैं. वो इसलिए क्यूंकि हमने इससे ठीक पहले अपने घर में साल भर खेला. हम वो टीम हैं, जिसका कप्तान बंदर बन चुका है. वो बंदर जिसे एंटीना हिला लेने में बहुत मज़ा आता है. उसे ऐसा लगता है कि वो बहुत बड़ा कलाकार है और वो इंसानों को सबक सिखा रहा है. हाथ में बल्ला आ जाने पर वो बेशक एक बेहतरीन बल्लेबाज होगा जिसके स्किल-सेट का किसी के पास कोई जवाब नहीं है. उसने खुद को ऐसा बनाया है और इसपर इतराने का उसे पूरा हक है. मगर इतराने के क्रम में वो किस कदर बदतमीज़ी पर उतर आया है, उसे बताये जाने की ज़रुरत है.
क्रिकेट के मैदान में बल्ला लेकर भतेरे उतरे हैं. एक और ऐसा ही था. मैच के बीच में बॉलर को रोककर मैदान में गिरती पतंग उड़ाने लगा था. काम्बली. कहां है, सबको मालूम है. कैसा है, ये भी. समय बदल चुका है इसलिए कोहली का वो हश्र नहीं होगा. लेकिन मुझे नहीं लगता है कि ऐसा ही रहा तो कोहली का नाम उस सम्मान के साथ लिया जाएगा जिस सम्मान के साथ दुनिया की तमाम टीमों के प्लेयर्स धोनी, सचिन, द्रविड़, लक्ष्मण, कुंबले, इंज़माम, अकरम, लारा, ली, जयवर्धने, संगक्कारा का नाम लेते हैं. ये वो लोग हैं जिन्होंने क्रिकेट को सेमी-बोरिंग से अग्रेसिव होते हुए देखा. जिन्होंने (इनमें से कुछ ने) सफ़ेद कमीज़ के क्रिकेट से उसे रंगीन होते देखा. इन्होने अग्रेसिव क्रिकेट की परिभाषा गढ़ी. सचिन का ये हाल था कि बॉल टेम्परिंग करने के बावजूद (जो कि मैं मानता हूं कि उन्होंने की) देश में लोगों ने ये मानने से ही इन्कार कर दिया कि सचिन ऐसा कर सकते हैं. आज कोहली को बीच मैच में अम्पायर आकर चेताते हैं कि वो सीमाएं लांघ रहे हैं और उन्हें खुद को संभालने की ज़रुरत है.


साउथ अफ़्रीका से मैच जीतने के बाद कोहली ने गुस्से में मैदान के एक हिस्से की ओर झुक कर वो किया जिसे अंग्रेजी में 'took a bow' कहते हैं. ये 20 मैचों में तीसरी जीत की अकड़ थी. उस कप्तान की जिसे अभी ये सीखना बाकी है कि टीम में किसे ले और किसे बाहर रखे. वो सेकंड की दर से गालियां बकता है. जीतने के बाद. हारने पर उसका मुंह यूं लटकता है जैसे अंग्रेजों के देश पर दोबारा कब्ज़ा कर लेने जैसी कोई खबर सुन ली हो. मुझे इसमें और उन बांग्लादेशी फैन्स में कोई अंतर नहीं दिखाई देता जिन्होंने एक मैच इंडिया को हराकर तस्कीन अहमद के हाथ में धोनी का कटा सर पकड़ा दिया था.




कोहली को कितनी भी बेहतरीन बल्लेबाजी आती हो, उसे अभी ये सीखना है कि जीतना कैसे है. जीत महज़ एक निश्चित रनों की संख्या पार कर लेना नहीं होता. सचिन तेंदुलकर उस दिन भी जीते थे जब वो लगातार अपने चरम पर गेंदबाजी कर रहे डेल स्टेन को खेल रहे थे क्यूंकि दूसरे छोर पर खड़े गंभीर को स्टेन की बजाय मोर्ल्केल को खेलने में आसानी हो रही थी. (साल 2011. केप टाउन. तीसरे टेस्ट का तीसरा दिन.) डेल स्टेन, जिसके बारे में कहते हैं कि वो आग उगलता है, लगातार सचिन को तेज़ गति से बाहर जाती हुई गेंदें फेंक रहा था. मोर्केल को गंभीर संभाल रहे थे. 56 मिनट तक स्ट्राइक नहीं बदली गई. सचिन ने अपने करियर की 51वीं टेस्ट सेंचुरी मारी और स्टेन ने कुल 5 विकेट लिए. मैच ड्रॉ हुआ. सचिन उस दिन भी जीते थे जिस दिन उन्होंने 241 रन की इनिंग्स के दौरान एक भी कवर ड्राइव नहीं मारी थी क्यूंकि वो बार-बार ड्राइव मारने के ही चक्कर में आउट हो रहे थे. (सिडनी टेस्ट. 2004.) वो मैच भी ड्रॉ ही हुआ.


राहुल द्रविड़ के लिए सबसे शर्मिंदगी भरी बात वो है जब उन्होंने आईपीएल में राजस्थान रॉयल्स के मुंबई से एक लगभग जीते हुआ मैच हारने के बाद अपनी टोपी नीचे फेंक दी थी. उन्होंने तुरंत ही वो टोपी उठाई और किसी से बिना कुछ कहे वहां से चले गए. साल 2004. वही मैच जिसमें सचिन ने 241 रन बनाए थे. इंडिया की दूसरी इनिंग्स. राहुल द्रविड़ को ब्रेट ली ने एक बाउंसर मारी. द्रविड़ के कान से खून बह रहा था. उनका सर भन्ना गया था. ब्रेट ली भागकर द्रविड़ के पास पहुंचा. उनका हाल पूछा. कप्तान स्टीव वॉ भी वहीं थे. गांगुली ने तुरंत ही इनिंग्स डिक्लेयर कर दी. तब तक लगभग हर प्लेयर राहुल के पास आकर उनका हाल पूछ रहा था. सभी खिलाड़ी वापस जा रहे थे. रास्ते भर राहुल के साथ ब्रेट ली चले. क्यूंकि वो खिलाड़ी राहुल द्रविड़ था. टीम इंडिया का सबसे कीमती विकेट. लेकिन उससे भी बड़ी बात ये थी कि वो कहीं बेहतर इंसान था. और ये बात ऑस्ट्रेलिया के ही नहीं दुनिया के हर खिलाड़ी को मालूम था. सालों बाद ब्रेट ली ने कहा कि अगर आप राहुल द्रविड़ के साथ सामंजस्य नहीं बिठा पा रहे हैं तो आपमें काफ़ी कमियां हैं.
Royal Challengers Bangalore's Virat Kohli (front) reacts with Rahul Dravid looking on after losing their Twenty20 cricket match against the Mumbai Indians at Kingsmead Stadium in Durban, September 19, 2010. REUTERS/Rogan Ward (SOUTH AFRICA - Tags: SPORT CRICKET)


क्रिकेट का खेल ऐसे कितने ही किस्सों से भरा हुआ है. और अंत में उन्हीं किस्सों का ज़िक्र होता है जो क्रिकेट के खेल को बड़ा करता है. जो उसकी एक बेहतर तस्वीर गढ़ता है.
टीम इंडिया टेस्ट क्रिकेट में पहली रैंकिंग पर पहुंच गई है. इस बात की ख़ुशी है. लेकिन तीसरे टेस्ट की जीत के बाद मुझे कोहली सबसे ज़्यादा हारा हुआ खिलाड़ी दिखाई दिया. और इस बात का बेहद दुख है. कोहली अपनी बैटिंग के दम पर सचिन का उत्तराधिकारी कहलाता है. लेकिन अपनी हरकतों की वजह से वो सचिन के जूते में लगी नेल्स मेंफंसी गीली घास निकालने के काबिल भी नहीं दिखाई पड़ रहा है.


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