
ये सारी चीजें हो सकती हैं कि नहीं हो सकती हैं, नहीं पता. पर एक चीज पता है कि अगर ट्रिपल तलाक कायम रहा तो इन सारी चीजों के होने के बाद भी मुस्लिम समाज में औरतों की स्थिति नहीं बदलेगी. शादी और तलाक से जुड़े मामलों में. उनकी अपनी कोई मर्जी नहीं होगी. जाहिर सी बात है कि मुस्लिम समाज कहने का ये मतलब नहीं है कि हर मुस्लिम के घर में यही होता है. बहुत कोर्ट का सहारा भी लेते हैं. शिया मुस्लिम तो तीन तलाक को मानते भी नहीं हैं. बहुत ऐसी लड़कियां भी हैं जो सामर्थ्यवान हैं, पैसे से भी और बल से भी. उनको तीन तलाक बोलने से पहले जबान लड़खड़ा जायेगी. क्योंकि उनको ये फर्क नहीं पड़ता कि कौन भरण-पोषण करेगा. हां, अपमान जरूर होगा. पर तीन तलाक कहने वाले इंसान के साथ रहने से बेहतर ही रहेगा अकेले रहना. वो लड़कियां समझ जायेंगी कि आगे से किसके साथ रहना है. फंसती हैं वो लड़कियां जिनके मां-बाप उनको घर से विदा करते हैं. हमेशा के लिये. अपने घर में प्रॉपर्टी देते नहीं. नये घर में मिलता नहीं. पढ़ाई होती नहीं. मन में डर बना रहता है कि अगर खाने में नमक ज्यादा पड़ गया तो तीन तलाक सुन बाहर होना पड़ेगा. किसी बात पर बहस हो गई तो घर छोड़कर जाना पड़ेगा. फिर हसबैंड का मन बदल गया और वो वापस बुला रहा है तो पहले किसी और से शादी करनी पड़ेगी. उसके साथ सोना पड़ेगा. फिर उसे छोड़ना पड़ेगा. और तब जाकर पति के साथ रहना शुरू होगा. ऐसा लंठ पति किस काम का. जिसे ना तो खुद कोई आत्मसम्मान है, ना किसी दूसरे का रखना चाहता है.
इसी चक्कर में 70 साल की शाह बानो के लिये देश खड़ा ना हो पाया था
इस बात को लेकर पहले भी बहस हुई है. 1986 में एक बेहद चर्चित मामला हुआ था. जिसमें सुप्रीम कोर्ट ने ऐतिहासिक फैसला दिया था. शाह बानो के मामले में. 70 साल की औरत को उसके वकील पति ने तीन तलाक कह घर से निकाल दिया. और शरियत, हदीस का हवाला देकर तीन महीने तक उसका खर्च उठाने को तैयार हुआ. जबकि खुद इंडियन कोर्ट में वकालत कर पैसे कमाता था. और उसी कोर्ट के कानून को इस्लाम के खिलाफ बता बच रहा था. सुप्रीम कोर्ट ने आदेश दिया कि CrPC सेक्शन 125 भारत के हर नागरिक पर लागू होता है. और इसके मुताबिक शाह बानो के पति को उसका भरण-पोषण करना ही होगा. इसमें मुस्लिम कानून के तहत फैसला नहीं होगा. इंडिया में मुसलमानों के शादी, तलाक में हदीस के मुताबिक फैसले होते हैं. मुसलमानों के कई नेताओं ने इसके खिलाफ प्रदर्शन शुरू कर दिया. हालांकि बहुत सारे ऐसे भी थे जिन्होंने इसका समर्थन किया था. उस वक्त के प्रधानमंत्री राजीव गांधी के पास संसद में 415 सीटें थीं. पर वो प्रदर्शन के खिलाफ झुक गये. और संविधान में संशोधन कर कानून ही बदल दिया. उसके बाद तो ये मामला ही दब गया. फिर धीरे-धीरे मांग शुरू हुई. 2007-08 में मुस्लिम औरतों ने एक संगठन Bharatiya Muslim Mahila Andolan बनाया और अपने अधिकारों के लिये लड़ने लगीं. पर बहुत विशेष फायदा नहीं हुआ.

इस मामले में कोई भी सुधार होने पर सबसे बड़ी आपत्ति ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड को है. यही लोग मुस्लिम समाज पर शरिया के मुताबिक कानून लगाते हैं. पर ये बोर्ड जो स्टैंड ले रहा है, वो बड़ा ही अजीब है. क्योंकि पाकिस्तान और बांग्लादेश समेत 22 मुस्लिम देशों में ट्रिपल तलाक खत्म किया जा चुका है. टर्की में तो सबके लिये एक ही कानून है. ईरान शिया देश है तो वहां लगने का सवाल ही नहीं उठता. श्रीलंका में 10 मुस्लिम हैं. माइनॉरिटी हैं. पर वहां भी ट्रिपल तलाक ऐसे एक मिनट में नहीं फरिया जाता. इंडिया में जरूर ये दलील दी जाती है कि मुस्लिम माइनॉरिटी हैं इसलिये कोई भी सुधार उनके धर्म पर हमला होगा. जो कि निहायत ही बचकाना है. लोग ये भी कह रहे हैे कि मुस्लिम समाज में इस प्रथा से बहुत ज्यादा दिक्कत नहीं है. बहुत खोजने पर मिलता है. पर लोग अपने ही आस-पास देख रहे हैं. इसका जवाब यही है कि ये हर घर में थोड़ी होता है. पर जिसके साथ होता है, वो तो असहाय हो जाता है. फिर जब ये चीज दिक्कत नहीं कर रही तो क्यों लादा जाये इसको? क्यों नहीं कानून ही इसे खत्म कर दे? क्या कानून का काम करना इस्लाम के खिलाफ हो जायेगा? इस्लाम तो निजी विश्वास से जुड़ा है. हम इसका सहारा लेकर किसी की जिंदगी तो तबाह नहीं करेंगे. अगर तीन सौ कानून भी बनाने पड़ें तो बनाकर ट्रिपल तलाक को खत्म कर दिया जाना चाहिये.
(ये स्टोरी ऋषभ ने लिखी है.) Also Read:
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