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CR पार्क: शरणार्थियों के संघर्ष से कैसे बना यह इलाका दिल्ली का ‘मिनी बंगाल’?

Delhi Mini Bengal CR Park: CR पार्क का पूर्व नाम 'ईस्ट पाकिस्तान डिस्प्लेस्ड पर्सन्स कॉलोनी' (EPDP) है. 1980 के दशक में EPDP का नाम बदलकर 'चित्तरंजन पार्क' रखा गया. दिल्ली के इस इलाके को मिनी बंगाल भी कहते हैं.

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दिल्ली के CR पार्क में पहला दुर्गा पूजा पंडाल 1970 के दशक में लगा था. (courtesy: Tiasa Bhowal)

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  • 1964 में पूर्वी पाकिस्तान से आए शरणार्थियों को बसाने के लिए दिल्ली के CR पार्क में जमीन आवंटित की गई, जिसे बाद में स्वतंत्रता सेनानी चित्तरंजन दास के नाम पर नामांकित किया गया।
  • CR पार्क की स्थापना शरणार्थियों की पुनर्वास योजना के तहत हुई, जिसमें बंगाली समुदाय के लोगों को आवास और भूमि प्रदान कर उनकी संस्कृति को संरक्षित किया गया।
  • आज CR पार्क दिल्ली में बंगाली संस्कृति का केंद्र है, दुर्गापूजा जैसे त्योहार यहां भव्य रूप से मनाए जाते हैं और यह क्षेत्र सामाजिक व आर्थिक रूप से विकसित हो चुका है।

अक्टूबर महीने में ठंड की सुगबुगाहट होने लगती है. सर्दी के कपड़े बक्से से बाहर निकाले जाते हैं. यह त्योहारों और मौसम बदलने के दिन होते हैं. सितंबर-अक्टूबर में हर साल दुर्गा मां का आगमन होता है. बंगालियों की भाषा में कहें तो ‘मां आशछे’. दुर्गा पूजा या नवरात्रि की चकाचौंध यूं तो पूरे देश में नजर आती है. बंगाल में तो इसकी धूम अलग ही होती है. दिल्ली में CR पार्क को ‘मिनी बंगाल’ कहते हैं.  

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दिल्ली का CR पार्क भी इन दिनों रौशन और गुलज़ार रहता है. CR पार्क वो जगह है जहां ज्यादातर बंगाली रहते हैं. यूं तो दिल्ली के कई हिस्सों में दुर्गा पूजा पंडाल लगते हैं. मगर यहां की रौनक और एनर्जी बिल्कुल अलग होती है. यहां दुर्गा मां की पूजा पूरे बंगाली रीति-रिवाजों से होती है. ढाक बजते हैं, धुनुची डांस होता है, मां की प्रतिमा सजती है, पुष्पांजलि देते हैं, खिचुरी का भोग लगता है और विदाई के दिन ‘सिंदूर खेला’ खेला जाता है. 

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CR पार्क के मेला ग्राउंड में पंडाल की तैयारी. 

CR पार्क दिल्ली के शरीर में बंगाल की धड़कन को ज़िंदा रखने वाली जगह है. आज इसी जगह की बात करेंगे जहां कभी रौनक नहीं केवल जंगल हुआ करता था. बताएंगे कि शरणार्थियों को दी गई जगह कैसे बना दिल्ली का ‘मिनी बंगाल’. 

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शरणार्थियों को मिली थी यहां जगह

CR पार्क की कहानी 1960 के दशक से शुरू होती है. 1964 में इस इलाके में शरणार्थियों को बसाया गया था. ये शरणार्थी बंटवारे के समय पूर्वी पाकिस्तान (अब बांग्लादेश) से दिल्ली आए थे. शुरू में इसे 'ईस्ट पाकिस्तान डिस्प्लेस्ड पर्सन्स कॉलोनी' (EPDP) के नाम से जाना जाता था.

सबसे पहले प्लॉट पूर्वी बंगाल से आए उन प्रवासियों को दिए गए जो पहले से ही दिल्ली में रह रहे थे और काम कर रहे थे. A से K तक के ग्यारह ब्लॉक में 2,000 से ज़्यादा परिवारों को ज़मीन दी गई. समय के साथ, M, N, O और P जैसे और ब्लॉक भी जोड़े गए. इसमें उन परिवारों को जगह दी गई जिन्हें शुरुआती आवंटन में प्लॉट नहीं मिल पाए थे.

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पंडाल की तैयारी जोर-शोर से. (courtesy: ITG)

इंडियन एक्सप्रेस की एक रिपोर्ट बताती है कि 1960 के दशक तक दिल्ली में पहले से ही काफी बंगाली आबादी बस चुकी थी. लेकिन पुनर्वास विभाग के फैसले के बाद दिल्ली में पहले से रह रही बंगाली आबादी का एक बड़ा हिस्सा भी वहां ज़मीन पाने के लिए योग्य पाया गया. धीरे-धीरे बंगाली कम्युनिटी से और भी लोग यहां बसते गए. 

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‘CR पार्क’ नाम कैसे मिला?

1980 के दशक में EPDP का नाम बदला गया. भारतीय स्वतंत्रता सेनानी चित्तरंजन दास के सम्मान में इस कॉलोनी का नाम ‘चित्तरंजन पार्क’ कर दिया गया. मगर नाम रखने के पीछे की भी एक कहानी है. जो अद्रिजा रॉयचौधरी अपनी किताब ‘दिल्ली- इन द नेम’ में बताती हैं. लाइव वायर ने उनकी किताब का एक अंश छापा है जिसमें वो EPDP के नामकरण का किस्सा सुनाती हैं.

किताब के मुताबिक, EPDP का नाम दो लोगों में से किसी एक के नाम पर रखा जाना था - ‘रबीन्द्रनाथ टैगोर’ और ‘सुभाष चंद्र बोस’. मगर 1970 में इन दोनों ही नाम को ख़ारिज कर दिया गया क्योंकि दिल्ली में पहले ही टैगोर पार्क और नेताजी नगर नाम से जगहें थीं. फिर एक नाम सुझाया गया, ‘पूर्बांचल’ जिसका मतलब होता है ‘पूर्व की पर्वत-श्रृंखला’. ये नाम इस बात की याद दिलाने के लिए था कि EPDP कॉलोनी के निवासी कहां से आए थे. 

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CR पार्क के बोनेदी बारी में दुर्गा मां की प्रतिमा. 

वे आगे लिखती हैं कि, मगर इस नाम में एक दिक्कत थी. उन दिनों दक्षिणी असम की बराक घाटी में रहने वाले बंगाली भाषी लोगों ने एक नए राज्य के लिए 'पूर्वांचल' नाम का प्रस्ताव रखा था. बंटवारे के बाद इस इलाके में पूर्वी पाकिस्तान से बड़ी संख्या में प्रवासी आए थे. इस प्रस्ताव का हिंसक विरोध हुआ. जिसके बाद बराक घाटी और असम के बाकी हिस्सों के बीच एक गहरी दरार पैदा हो गई. इसलिए दिल्ली में भी इस नाम को ड्रॉप कर दिया गया. अंत में चित्तरंजन दास के नाम पर नाम रखा गया, जिन्हें प्यार से ‘देशबंधु’ भी कहा जाता है. 

दुर्गा पूजा पंडाल की शुरुआत 

चित्तरंजन पार्क काली मंदिर सोसाइटी ने यहां दुर्गा पूजा पंडाल की नींव रखी. एक रिपोर्ट में सोसाइटी के उपाध्यक्ष प्रदीप गांगुली बताते हैं कि 1970 के दशक में वहां सब जंगल था. एक छोटे से पार्क में कुछ लोगों ने मिलकर पूजा की थी. आज ये पार्क मार्केट नंबर 1 के सामने है. उन्होंने एक बातचीत में कहा, 

‘यहां लूटपाट और दूसरी कई तरह की वारदातें होती रहती थीं. लोगों को ट्रांसपोर्ट और ज़रूरी सामान जुटाने में मुश्किलों का सामना करना पड़ता था. सड़कें भी ठीक नहीं थीं. एक समय ऐसा भी आया जब ज़मीन खोदने पर लोगों को कंकाल मिले. आखिरकार, लोग एक मकसद के लिए एकजुट हुए, जिससे दुर्गा पूजा का जश्न और बड़ा होता गया.’

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CR पार्क में दुर्गा पूजा पंडाल. (courtesy: India Today)

आज इस सोसाइटी को 50 साल से ज़्यादा हो चुके हैं. ऐसी ही एक और कमिटी दुर्गा पूजा समिति (मेला ग्राउंड) की भी स्थापना की गई जो अब अपने विशाल पंडाल के लिए जाना जाता है. अब आखिर में, GK-2 दुर्गोत्सव या ‘बोनेदी बारी दुर्गा पूजा’. ये एक पारंपरिक पारिवारिक पूजा है जो घर में ही मनाई जाती है. एक ही परिवार की कई पीढ़ियां इस उत्सव का आयोजन करती आ रही हैं. ये सभी श्रद्धालुओं के लिए खुला होता है. 

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बंगाल को दिल्ली में रखा जिंदा

द वायर में छपी सौरव कुमार राय के एक लेख के मुताबिक, शरणार्थियों ने इस इलाके को बंगाली संस्कृति के बेहतरीन नमूने के तौर पर विकसित किया है. अखबार (आजकाल) से लेकर शाम के नाश्ते (जैसे घुघनी और झाल मुरी) और मुख्य खाने ('शोरशे इलिश') तक, C.R. पार्क में बंगाली सांस्कृतिक विरासत की झलक पेश करता है. अब, दुर्गा पूजा – जिसे बंगाली 'पुजो' कहते हैं बंगाल की संस्कृति को बनाए रखने, मनाने और दिखाने का एक मुख्य मौका बन गई है. 

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बंगाल का फेमस झाल मुरी. (courtesy: shapnoekhon/FB)

इस वक़्त तक CR पार्क में दुर्गा मां की प्रतिमाएं स्थापित हो जाती हैं. लंबी आंखों वाली मां दुर्गा की पारंपरिक मूर्ति, देवी को समर्पित बंगाली मंत्र, शिउली के फूलों (रात की रानी) की खुशबू, ढाक की मनमोहक आवाज़ के साथ धुनुची डांस और बंगाली खाने-पीने की चीज़ों के कई स्टॉल बंगाल की नब्ज़ को ज़िंदा रखते हैं.

कभी दूर-दराज़ इलाकों में शुमार चित्तरंजन पार्क अब दक्षिण दिल्ली की सबसे पसंदीदा जगहों में से एक बन गया है. यहां प्रॉपर्टी की कीमतें बहुत बढ़ गई हैं. इंफ्रास्ट्रक्चर का विकास हुआ है और पुराने घरों के बगल में अब आलीशान अपार्टमेंट बन गए हैं. इसकी गिनती अब पॉश इलाकों में होती है. मगर फिर भी यहां की सांस्कृतिक पहचान अब भी ज़िंदा है. शायद इसलिए लोग इसे दिल्ली का ‘मिनी बंगाल’ कहते हैं.  

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