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तो इस तरह मिलेगा सहारा में फंसा पैसा?

कहा जा रहा है कि सुब्रत राय के बाद उनके दोनों बेटे उनकी 2 लाख 60 हजार करोड़ से ज्यादा की संपत्ति को संभालेंगे. हालांकि सहारा समूह को कौन संभालेगा, इसके बारे में आधिकारिक रूप से कोई जानकारी सामने नहीं आई है.

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सुब्रत राय के दोनों बेटों में से एक भी उनके अंतिम संस्कार में शामिल नहीं हुआ.

सुब्रत रॉय का जन्म बिहार के अररिया में हुआ था. लेकिन उनके ऊरुज की कहानी शुरू होती है यूपी के गोरखपुर शहर से. यहां अपने लैंब्रेटा स्कूटर पर सुब्रत रॉय नमकीन स्नैक्स बेचा करते थे. मूल रूप से बिहार के रहने वाले सुब्रत रॉय ने 1978 में 2,000 रुपये की रकम लगाकर कारोबार शुरू किया था. उन्होंने लोगों से पैसा जमा करने की एक स्कीम से शुरुआत की. इस पर 1979-80 में पाबंदी लग गई और तुरंत पैसा वापस करना पड़ा. फिर उन्होंने हाउसिंग फाइनेंस कंपनी शुरू की, जिसके लिए बाजार से पैसा उगाहने की कोई सीमा नहीं थी. उनका यह काम चल निकला. बढ़ते-बढ़ते सहारा देश की टॉप की कंपनियों में शामिल हो गई. इसके बाद उनके अख़बार निकले, टीवी चैनल खुला, एयरलाइंस, होटल हर जगह सहारा का कारोबार फैलने लगा. भारतीय क्रिकेट टीम सहारा की जर्सी पहनती थी. सुब्रत रॉय का जलवा उस वक्त भी दुनिया ने देखा जब साल 2004 में उनके बेटों की शादी हुई थी. इस शादी में सियासत, खेल, कारोबार, फिल्म...हर क्षेत्र की दिग्गज हस्तियां शरीक हुई थीं. उनके खिलाफ चल रहे मामलों को आगे समझेंगे. लेकिन जब 14 नवंबर 2023 को उनका निधन हुआ, तो सवाल उठे कि वो अपने पीछे कितनी प्रॉपर्टी छोड़कर गए हैं. हम बताते हैं  -  

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- साल 2015 में Forbes ने बताया था कि सहारा समूह की कुल संपत्ति करीब 83 हजार करोड़ रुपये थी

- वर्तमान में ये संपत्ति 2 लाख 60 हजार करोड़ से अधिक बताई जाती है

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- उनके पास करीब 30 हजार 970 एकड़ का लैंडबैंक है

- देशभर में 5000 से ऑफिस यूनिट्स हैं

-  इसके अलावा उनके पास लखनऊ का सहारा शहर, सहारा के ऑफिस, सहारा मॉल जैसी संपत्तियां है

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- कंपनी की वेबसाइट के मुताबिक सहारा ग्रुप के पास 9 करोड़ निवेशक हैं.

अब सवाल ये कि इतने हैवी एंपायर को संभालेगा कौन? वैसे तो ये सवाल सुब्रत रॉय के देहांत के बाद से पूछा-गाछा जा रहा है. लेकिन इस प्रश्न के साथ शंकाएं तब गहराने लगीं जब 16 नवंबर को सहारा ग्रुप के प्रमुख सुब्रत रॉय का अंतिम संस्कार हुआ. आमतौर पर सुब्रत रॉय को मुखाग्नि उनके बेटों के जरिए दी जानी चाहिए. लेकिन ये संस्कार उनके पोते के जरिए संपन्न हुआ. क्योंकि उनके दोनों बेटे सीमांतो और सुशांतो अंतिम संस्कार में मौजूद ही नहीं थे.

सुब्रत रॉय की पत्नी और बेटे मेसेडोनिया में रहते हैं. उनके पास इस देश की नागरिकता है. सुब्रत रॉय के अंतिम संस्कार में उनकी पत्नी स्वप्ना रॉय अपने पोते के साथ भारत आई थीं. मीडिया की दुनिया में चर्चा ये चल रही है कि सेबी और अन्य वित्तीय एजेंसियों की नजर उनके बेटों पर हैं इसलिए वो भारत नहीं आए. माना जा रहा है कि सहाराश्री के निधन के बाद उनका कारोबार उनके दोनों बेटे संभालेंगे. हालांकि सुब्रत रॉय सहारा ने अपना कोई उत्तराधिकारी घोषित नहीं किया. वहीं सहारा ग्रुप की ओर से भी इस पर कोई आधिकारिक बयान नहीं आया है. सुब्रत राय के परिवार के कई अन्य सदस्य भी बिजनेस में शामिल हैं तो ऐसे में इतनी बड़ी विरासत किसके खाते में आएगी?

अब बात सुब्रत रॉय के जीवन के उस पड़ाव की जिसमें उनके पतन की नींव पड़ी. शुरुआत होती है साल 2009 से जब सहारा ग्रुप की एक कंपनी सहारा प्राइम सिटी ने अपने आईपीओ के लिए मार्केट रेगुलेटर सेबी के पास DRHP यानी Draft Red Herring Prospectus भेजा. इस टर्म को सरल शब्दों में बयां करें तो कहा जा सकता है कि सहारा ने मार्केट से पैसा उगाहने के लिए अपना बायोडाटा SEBI के पास भेजा. सेबी कंपनी का बायोडाटा जांच रही थी. इसी दौरान सहारा की दो कंपनियां- सहारा इंडिया रियल इस्टेट कॉरपोरेशन लिमिटेड (SIRECL)और सहारा हाउसिंग इंवेस्टमेंट कॉरपोरेशन लिमिटेड (SHICL) कटघरे में आ गईं. SEBI को लगा कि इन्होंने गलत तरीके से जनता से पैसे उगाहे हैं.

यह सब चल रहा था, तभी SEBI को इन कंपनियों के बारे में एक शिकायत मिली. इसमें कहा गया कि ये कंपनियां गलत तरीके से OFCD जारी कर रही हैं. सेबी ने जांच शुरू की तो सामने आया कि SIRECL और SHICL ने 2-2.5 करोड़ लोगों से 24,000 करोड़ रुपये इकट्ठे किए. 2 साल तक यह सिलसिला चलता रहा. ये पैसे कैसे लिए जाते थे? सहारा ने तमाम शहरों में अपने ऑफिस खोले हुए थे. वहां उन्होंने स्थानीय लोगों को अपना एजेंट बनाया हुआ था. इनके एजेंट लोगों से मिलते. उनसे सहारा में पैसा लगाने को कहते. और कुछ दिनों में अच्छा रिटर्न का वादा करते. इसके लिए लोगों को सहारा की नीले रंग की पासबुक दी जाती. निवेश की ये धनराशि कितनी भी छोटी हो सकती थी. लिहाजा भारत का एक मध्य वर्ग इस स्कीम की तरफ आकर्षित हुआ. लेकिन हमारे देश में ऐसा कारोबार करने के लिए आपको SEBI और कुछ केसों में RBI की अनुमति लेनी होती है. क्योंकि आप लोगों से पैसा लेकर उन्हें अपने यहां इन्वेस्ट करवा रहे हैं. सहारा की गड़बड़ी यहीं से सामने आई. सहारा ने लोगों से पैसा इकट्ठा करने के लिए कोई अनुमति नहीं ली थी.

सेबी के तत्कालीन बोर्ड मेंबर डॉ. केएम अब्राहम ने पूरी जांच की. उन्हें पता चला कि सहारा के कई निवेशक फर्जी थे और बाकियों का कंपनी से दूर-दूर तक रिश्ता नहीं था. आसान भाषा में कहें, तो सहारा ने इन दो कंपनियों के जरिए लोगों से पैसे लिए. साथ ही कहा कि वह इस पैसे से देश के अलग-अलग शहरों में टाउनशिप बनाएगा. लेकिन सहारा ने न तो टाउनशिप बनाई, न लोगों के पैसे वापस किए.

ये गड़बड़ियां सामने आते ही सेबी ने सहारा के नए OFCD जारी करने पर रोक लगा दी. लोगों के पैसे 15 प्रतिशत ब्याज के साथ लौटाने का आदेश दिया. सहारा इस आदेश पर भड़क गया. वह इलाहाबाद हाईकोर्ट गया और सेबी पर केस कर दिया. दिसंबर, 2010 में कोर्ट ने सेबी के आदेश पर रोक लगा दी. लेकिन 4 महीने बाद सेबी को सही पाया और सहारा को भुगतान करने को कहा.

सहारा फैसले के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट गया. यहां से उसे सिक्योरिटीज अपीलेट ट्रिब्यूनल जाने को कहा गया. यह ट्रिब्यूनल कंपनियों के मामलों को सुलझाती है. यहां भी सहारा को राहत नहीं मिली और सेबी के आदेश को सही करार दिया. सहारा ने गलती नहीं मानी. मामला सुप्रीम कोर्ट में गया.

आसान भाषा में समझिए. सहारा ने लोगों से पैसा लौटाने की शर्त पर पैसे लिए. पैसा लौटाया नहीं. जब लौटाने की बारी आई, तो सहारा ने केस कर दिया. फिर पचड़े में फंसे रहे.

शीर्ष अदालत ने SEBI के आदेश का समर्थन करते हुए सहारा के खिलाफ आदेश दिया. कहा कि लाखों छोटे निवेशकों से जमा हुई करीब 24 हजार करोड़ रुपये की रकम लौटाई जाए. सहारा का आखिरी कानूनी तीर भी चूक गया. अब वो भरमाने की कंडीशन में आ गए.

कोर्ट के आदेश के बाद भुगतान को लेकर सहारा की टालमटोल शुरू हुई. इसे देखते हुए अदालत ने कंपनी को तीन किश्तों में SEBI के यहां रकम जमाने कराने को कहा. इसके लिए एक डेडीकेटेड फंड बनाया गया, जिसे SAHARA-SEBI FUND कहते हैं. सहारा ने 5210 करोड़ रुपये SEBI के खाते में डाल दिए. लेकिन आगे के भुगतान को लेकर बहाना बनाया. दावा किया कि बाक़ी का पैसा निवेशकों को सीधे ही दे दिया गया. इस पर सुप्रीम कोर्ट ने कंपनी को लपेट दिया. उसने सहारा के बैंक खाते और संपत्ति को सील करने का आदेश जारी कर दिया. फरवरी, 2014 में सुब्रत रॉय गिरफ्तार कर लिए गए. दो साल बाद उन्हें परोल मिल पाई. तब से वो जेल से बाहर ही थे. लेकिन सभी निवेशकों को उनके पैसे अभी तक नहीं मिले.

अब बड़ा सवाल. पैसे मिलेंगे कैसे?

ये सवाल और भी गाढ़ा तब हो गया, जब मार्च 2023 में सहारा ग्रुप की मल्टी-स्टेट को-ऑपरेटिव सोसायटीज (MSCS) में पैसा लगाने वाले निवेशकों के लिए एक अच्छी ख़बर आई - सहारा-SEBI में कुल 24 हजार करोड़ रुपये का फंड है. 1 करोड़ 10 लाख से भी ज़्यादा लोगों ने पैसा जमा करवाया था. केंद्र सरकार ने आला अदालत में याचिका लगाई थी कि इसमें से 5 हज़ार करोड़ रुपये निवेशकों को लौटाए जाएं. सुप्रीम कोर्ट ने सरकार को लोगों का पैसा लौटाने की अनुमति दे दी.  

अब सहाराश्री तो गुज़र गए. लेकिन सहारा में जिन लोगों ने अपनी जीवन भर की कमाई झोंक दी, क्या उनको उनका पैसा वापस मिलता रहेगा?

ये सुनिश्चित करने के लिए दो अलग-अलग प्रोसेस हैं. पहला, सेबी का तरीक़ा. इसमें सहारा की रियल-एस्टेट कंपनी (SIREL) और हाउसिंग कॉर्पोरेशन लिमिटेड (SHICL) Optionally Fully Convertible Bonds (OFCB) स्कीम के तहत जुटाए गया धन लौटाएंगी. सेबी की 2022-23 की रिपोर्ट के मुताबिक़, बीते 11 सालो में इन दोनों कंपनियों ने निवेशकों को 138.07 करोड़ रुपयों का रिफंड जारी करवा दिया है. 31 मार्च 2023 तक सहारा को 19,650 ऐप्लिकेशन मिली थी. इनमें से 17,526 आवेदनों से संबंधित रिफंड किए गए हैं. ब्याज़ समेत. बचे हुए आवेदनों को बंद करना पड़ा, क्योंकि कंपनी ने जो डेटा उपलब्ध कराया था, उसमें इनका रिकॉर्ड मिला नहीं.

दूसरा तरीक़ा है, सहकारिता मंत्रालय का वेब पोर्टल. इसी साल के 18 जुलाई को सहकारिता मंत्री अमित शाह ने CRCS-सहारा रिफंड पोर्टल लॉन्च किया था. कहा गया कि मात्र 45 दिनों में इसी पोर्टल के ज़रिए जमाकर्ताओं का पैसा वापस आ जाएगा.  

अमित शाह ने जानकारी दी कि 10 हज़ार रुपये तक का पहला भुगतान उन एक करोड़ निवेशकों को किया जाएगा, जिन्होंने दस हज़ार या ज़्यादा जमा किए हैं. सुप्रीम कोर्ट के आदेश के मुताबिक़, 5 हज़ार करोड़ रुपये के भुगतान के बाद, सहारा सहकारी समितियों में अन्य जमाकर्ताओं को इसे वापस करने के लिए एक और अपील की जाएगी.

कौन एलिजिबल है?

22 मार्च, 2022 से पहले सहारा क्रेडिट कोऑपरेटिव सोसाइटी लिमिटेड, सहारायन यूनिवर्सल मल्टीपर्पज सोसाइटी लिमिटेड और हमारा इंडिया क्रेडिट कोऑपरेटिव सोसाइटी लिमिटेड में जिन्ने भी पैसा लगाया, वो रिफंड के लिए पात्र हैं. इसके अलावा, 29 मार्च, 2023 से पहले स्टार्स मल्टी-पर्पज़ को-ऑपरेटिव सोसाइटी लिमिटेड के जमाकर्ता भी रिफ़ंड के पात्र हैं. ऑनलाइन पोर्टल पर साफ़ लिखा है कि केवल पोर्टल के ज़रिए जो ऑनलाइन ऐप्लिकेशन दायर किए गए हैं, उन्हीं पर ही विचार किया जाएगा.

एक बड़ा साम्राज्य पतन का शिकार हो गया. लेकिन हजारों लोगों के करोड़ों रुपये अंधेरे में चले गए. बात पैसे की नहीं है. बात मध्यम वर्ग के भरोसे की है. वो 100 रुपये लगाकर भी बड़े सपने देखता है, और ये उसका हक है. उम्मीद है कि उसके हक की लड़ाई न्याय की सुखद नियति के साथ संपन्न हो. 

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