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साउथ के सुपरस्टार 'पावर सेंटर' में करते हैं कमाल, नॉर्थ में क्यों नहीं चलता फिल्मी सितारों का जादू?

दक्षिण के सितारे क्यों बन जाते हैं मुख्यमंत्री और बॉलीवुड वाले सिर्फ सांसद? आखिर उत्तर भारत में क्यों नहीं चलता फिल्मी सितारों को 'वैसा वाला' जादू, जो दक्षिण भारत में आम है? समझिए राजनीति और सिनेमा के इस गहरे कनेक्शन की पूरी कहानी.

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नॉर्थ में क्यों नहीं चलता हीरो-हीरोइन का जादू?

तमिलनाडु विधानसभा चुनावों के एग्जिट पोल अनुमान जब से आए हैं, साउथ इंडियन सिनेमा के सुपर स्टार विजय चर्चा में हैं. ऐसा माना जा रहा है कि तमिलनाडु की अगली विधानसभा में उनकी ताकत सबको हैरान कर सकती है. इससे पहले सोशल मीडिया पर एक वीडियो बड़ा वायरल हुआ था. ये वीडियो आंध्र प्रदेश में पवन कल्याण की सभा था. जहां लाखों की भीड़ ऐसी पागल थी जैसे कोई भगवान उतर आया हो. लोग अपनी शर्ट फाड़ रहे थे, उनकी एक झलक के लिए दीवारों पर चढ़े हुए थे. यह सिर्फ फिल्मी दीवानगी नहीं है, यह वोट की ताकत है जो अब सत्ता की कुर्सी तक पहुंच चुकी है. 

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वहीं दूसरी तरफ उत्तर भारत पर नजर डालिए. यहां भी बड़े सितारे हैं. अमिताभ बच्चन से लेकर सनी देओल और कंगना रनौत तक. लोकप्रियता में कोई कमी नहीं, लेकिन जब बात मुख्यमंत्री की कुर्सी या अपनी अलग पार्टी बनाकर सत्ता पलटने की आती है, तो बॉलीवुड के दिग्गज यहां दक्षिण के सितारों के मुकाबले 'सपोर्टिंग एक्टर' बनकर रह जाते हैं.

आखिर ऐसा क्या है जो साउथ के सिनेमा हॉल की तालियों को सीधे विधानसभा की कुर्सी में बदल देता है, जबकि नॉर्थ में सुपरस्टार्स सिर्फ किसी बड़ी पार्टी के स्टार कैंपेनर या सांसद बनकर रह जाते हैं. क्या उत्तर भारत के लोगों को अपने हीरोज पर यकीन नहीं है? या दक्षिण की राजनीति का ताना-बाना कुछ अलग ही मिट्टी से बना है. आज के इस मेगा एक्सप्लेनर में हम इसी पहेली को सुलझाएंगे. हम बात करेंगे एमजीआर के उस दौर की जब राजनीति बदली थी, जयललिता के 'अम्मा' बनने की कहानी और अब विजय और पवन कल्याण के उस 'पावर गेम' की, जिसने दिल्ली के सियासी गलियारों में हलचल मचा दी है.

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साउथ का वो 'करिश्मा' जो नॉर्थ नहीं समझ पाता

दक्षिण भारत में सिनेमा सिर्फ मनोरंजन नहीं है, वह एक धर्म की तरह है. जब हम एमजी रामचंद्रन यानी एमजीआर की बात करते हैं, तो उन्होंने सिर्फ फिल्में नहीं कीं, उन्होंने खुद को गरीबों के मसीहा के तौर पर स्थापित किया. उन्होंने तमिलनाडु में मिड-डे मील जैसी योजनाएं शुरू कीं, जिसने उन्हें 'मक्कल थिलागम' यानी लोगों का लाडला बना दिया. दक्षिण में एक्टर और जनता के बीच का रिश्ता 'वन-वे' नहीं है. वहां एक्टर अपनी फिल्मों के जरिए एक खास विचारधारा को प्रमोट करते हैं. द्रविड़ आंदोलन के समय से ही फिल्मों का इस्तेमाल अपनी पहचान और भाषा के सम्मान के लिए किया गया.

उत्तर भारत में स्थिति बिल्कुल उलट रही है. यहां बॉलीवुड हमेशा से एक 'कॉस्मोपॉलिटन' या कहें कि शहरी इमेज के साथ रहा है. अमिताभ बच्चन राजनीति में आए जरूर, लेकिन वह बहुत जल्द उसे 'कूड़ादान' बोलकर वापस चले गए. नॉर्थ में जनता एक्टर को पर्दे पर देखना पसंद करती है, उसके साथ फोटो खिंचवाना चाहती है, लेकिन जब वोट देने की बात आती है, तो वह जाति, धर्म और क्षेत्रीय समीकरणों को ज्यादा तवज्जो देती है. यहां हीरो सिर्फ एक ग्लैमरस चेहरा बनकर रह जाता है, जबकि साउथ में हीरो एक 'पॉलिटिकल आइडियोलॉजी' का चेहरा होता है.

एमजीआर से जयललिता और अब विजय: विरासत की वो लंबी लकीर

तमिलनाडु की राजनीति को अगर आप देखें तो वहां द्रविड़ मुनेत्र कड़गम (DMK) और अन्ना द्रविड़ मुनेत्र कड़गम (AIADMK) के बीच की लड़ाई सालों से चल रही है. एमजीआर ने जब अपनी पार्टी बनाई, तो उन्होंने फिल्मी लोकप्रियता को संगठन की ताकत में बदला. उनके बाद जयललिता ने उस विरासत को संभाला. उन्होंने दिखाया कि एक महिला सुपरस्टार कैसे पुरुष प्रधान राजनीति में अपना लोहा मनवा सकती है. जयललिता ने खुद को 'अम्मा' के रूप में पेश किया, जो अपनी जनता का ख्याल रखती है. मुफ्त चावल, लैपटॉप और अम्मा कैंटीन जैसी योजनाओं ने उनकी पकड़ इतनी मजबूत कर दी कि सिनेमा पीछे छूट गया और वह एक बड़ी नेता बन गईं.

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अब इसी कड़ी में नया नाम जुड़ा है थलपति विजय का. उन्होंने अपनी पार्टी 'तमिलगा वेत्री कड़गम' (TVK) का ऐलान कर दिया है. उनकी रैलियों में उमड़ रही भीड़ ने स्थापित पार्टियों की नींद उड़ा दी है. विजय ने बहुत चालाकी से पिछले 10 सालों में अपनी फिल्मों के जरिए सामाजिक संदेश देना शुरू किया था. वह जानते थे कि सीधे राजनीति में आने से काम नहीं चलेगा, पहले जनता के दिमाग में अपनी 'मसीहा' वाली छवि बनानी होगी. आंध्र प्रदेश में पवन कल्याण ने भी यही किया. उनकी 'जनसेना' पार्टी ने इस बार एनडीए के साथ मिलकर जो प्रदर्शन किया, उसने साबित कर दिया कि साउथ में 'मेगास्टार' का टैग बेकार नहीं जाता.

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साउथ स्टार्स और सियासत 

बॉलीवुड के सितारे क्यों बन जाते हैं सिर्फ 'नाम के सांसद'

अब जरा नजर डालिए बॉलीवुड के उन चेहरों पर जिन्होंने संसद का रुख किया. हेमा मालिनी, सनी देओल, जया बच्चन, गोविंदा, या हाल ही में कंगना रनौत. ये सब बड़े नाम हैं, लेकिन इनमें से कोई भी अपनी खुद की राजनीतिक जमीन नहीं बना पाया. ये सभी या तो बीजेपी या कांग्रेस या सपा जैसी बड़ी पार्टियों के सिंबल पर चुनाव लड़े. इनकी अपनी कोई स्वतंत्र राजनीतिक विचारधारा नहीं थी जो जनता को जोड़ सके.

उत्तर भारत में वोटिंग पैटर्न बहुत हद तक 'हाईकमान' के इर्द-गिर्द घूमता है. यहां के सुपरस्टार्स को लगता है कि सिर्फ हाथ हिलाकर और कुछ डायलॉग बोलकर वोट मिल जाएंगे. लेकिन नॉर्थ की जनता अब बहुत सजग है. वह देखती है कि क्या यह सितारा चुनाव के बाद भी उनके बीच रहेगा या मुंबई के अपने बंगले में वापस चला जाएगा. सनी देओल के संसदीय क्षेत्र गुरदासपुर में उनके 'गायब' होने के पोस्टर लगे थे. यह अंतर दक्षिण में नहीं दिखता. वहां के सितारे राजनीति में आने के बाद अपनी फिल्मी करियर को लगभग किनारे कर देते हैं और पूरी तरह से जमीन पर उतरते हैं. बॉलीवुड के पास मास अपील तो है, लेकिन 'ग्राउंड कनेक्टिविटी' और 'पॉलिटिकल विजन' की भारी कमी है.

कमल हासन और रजनीकांत: जब जादू काम नहीं आया

ऐसा नहीं है कि साउथ में हर कोई सफल ही रहा. कमल हासन इसका सबसे बड़ा उदाहरण हैं. उनकी पार्टी 'मक्कल निधि मय्यम' (MNM) ने चुनाव लड़ा, लेकिन उन्हें वो सफलता नहीं मिली जिसकी उम्मीद थी. इसका कारण था उनका बहुत ज्यादा 'इंटेलेक्चुअल' होना. उन्होंने शहरी मुद्दों और विकास की बात की, लेकिन गांव के उस वोटर तक नहीं पहुंच पाए जिसे इमोशनल कनेक्ट चाहिए था. वहीं रजनीकांत ने सालों तक फैंस को इंतजार कराया और अंत में खराब सेहत का हवाला देकर पीछे हट गए.

इससे यह समझ आता है कि जनता सिर्फ चेहरा नहीं देखती, वह 'कमिटमेंट' देखती है. साउथ की जनता को लगा कि कमल हासन शायद पार्ट-टाइम पॉलिटिशियन हैं. वहीं दूसरी ओर, एनटी रामा राव (NTR) ने आंध्र प्रदेश में महज 9 महीने में सरकार बना ली थी क्योंकि उन्होंने अपनी पूरी ताकत झोंक दी थी. उत्तर भारत में भी यही समस्या है. यहां के एक्टर्स को राजनीति एक 'सेकंड इनिंग' या 'रिटायरमेंट प्लान' की तरह लगती है, जबकि राजनीति 24 घंटे का काम है.

पर्दे का हीरो जब भगवान बन जाए

साउथ और नॉर्थ के फैंस के व्यवहार में एक बहुत बड़ा मनोवैज्ञानिक अंतर है. दक्षिण भारत में एक्टर्स के मंदिर तक बनाए जाते हैं. वहां 'फैन क्लब्स' सिर्फ फिल्म प्रमोट नहीं करते, वे सामाजिक काम भी करते हैं. खून दान करना, बाढ़ में मदद पहुंचाना या गरीबों को खाना खिलाना. ये फैन क्लब्स दरअसल एक छोटे राजनीतिक संगठन की तरह काम करते हैं. जब वो एक्टर राजनीति में उतरता है, तो उसे बना-बनाया कैडर मिल जाता है.

नॉर्थ में फैन कल्चर अलग है. यहां लोग शाहरुख खान के 'मन्नत' के बाहर खड़े तो होते हैं, लेकिन उनका कोई संगठित ढांचा नहीं है जो जमीन पर काम करे. उत्तर भारत की राजनीति का आधार धर्म और जाति की गहरी जड़ों में है. यहां एक ब्राह्मण या दलित वोटर अपने पसंदीदा हीरो से ज्यादा अपनी जाति के नेता पर भरोसा करता है. दक्षिण में 'द्रविड़ पहचान' ने जातिगत दीवारों को कुछ हद तक सिनेमाई लोकप्रियता के जरिए ढीला किया है, लेकिन नॉर्थ में वह दीवारें आज भी बहुत ऊंची हैं.

डेटा की नजर में फिल्म और राजनीति का कनेक्शन

अगर हम पिछले 30 सालों का डेटा देखें, तो दक्षिण भारत में कम से कम 5 मुख्यमंत्री ऐसे रहे हैं जिनका सीधा संबंध सिनेमा से रहा है. वहीं उत्तर भारत में एक भी ऐसा नाम नहीं है जो सिर्फ अपनी फिल्मी पहचान के दम पर मुख्यमंत्री बना हो. मुलायम सिंह यादव, लालू प्रसाद यादव या मायावती जैसे नेता जमीन से संघर्ष करके आए. उत्तर प्रदेश और बिहार की राजनीति में 'सिनेमा' एक तड़के की तरह इस्तेमाल होता है, लेकिन वह मुख्य भोजन नहीं है.

साउथ में क्षेत्रीय पार्टियों का दबदबा है. ये पार्टियां स्थानीय भावनाओं को उभारती हैं. सुपरस्टार्स इन भावनाओं को अपनी आवाज देते हैं. नेशनल पार्टियों के लिए वहां पैठ बनाना मुश्किल होता है क्योंकि वहां के सुपरस्टार्स खुद को 'क्षेत्रीय गौरव' का प्रतीक बना लेते हैं. नॉर्थ में बॉलीवुड के सितारे 'इंडियन' या 'ग्लोबल' इमेज बनाने के चक्कर में अपनी 'रीजनल रूट' खो देते हैं. इसी वजह से वे किसी खास क्षेत्र के लोगों के दिल में वो जगह नहीं बना पाते जो एक नेता को चाहिए होती है.

क्या बदलेगी उत्तर भारत की तस्वीर?

आने वाले समय में क्या हम किसी बॉलीवुड स्टार को यूपी या बिहार का मुख्यमंत्री बनते देख सकते हैं? फिलहाल तो इसकी संभावना बहुत कम दिखती है. इसकी एक बड़ी वजह यह भी है कि अब ओटीटी और ग्लोबल कंटेंट के दौर में सितारों का वो 'मिस्टिक' यानी रहस्यमयी अंदाज खत्म हो गया है. अब वे हर वक्त इंस्टाग्राम पर उपलब्ध हैं, जिससे उनकी 'लार्जर दैन लाइफ' छवि कमजोर हुई है. राजनीति के लिए आपको एक 'भगवान' वाली छवि चाहिए होती है जो अब मुश्किल है.

वहीं दक्षिण में विजय जैसे सितारे इस बदलाव को समझ रहे हैं. वे सोशल मीडिया का इस्तेमाल सिर्फ ब्रांड एंडोर्समेंट के लिए नहीं, बल्कि अपनी राजनीतिक जमीन तैयार करने के लिए कर रहे हैं. आने वाले 2026 के तमिलनाडु चुनाव और आंध्र की बदलती राजनीति यह तय करेगी कि क्या सुपरस्टार्स का यह जादू आगे भी बरकरार रहेगा. नॉर्थ के लिए सबक यही है कि जब तक सितारे जमीन पर उतरकर लोगों के दुख-सुख का हिस्सा नहीं बनेंगे, वे सिर्फ वोट बटोरने वाली 'मशीन' ही बने रहेंगे.

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पर्दे की चमक और जमीन की धूल का मेल

कुल मिलाकर बात यह है कि दक्षिण में सिनेमा और राजनीति एक ही सिक्के के दो पहलू हैं. वहां का कलाकार पहले दिन से ही राजनीति की तैयारी करता है. वह अपनी फिल्मों में ऐसे डायलॉग डालता है, ऐसे किरदार चुनता है जो उसे मसीहा दिखाएं. उत्तर भारत के सितारे 'आर्ट' और 'कमर्शियल' के चक्कर में अपनी राजनीतिक अपील खो देते हैं. जब तक उत्तर भारत में कोई ऐसा सितारा नहीं आता जो अपनी लग्जरी लाइफ छोड़ धूल-मिट्टी में बैठने को तैयार हो, तब तक यहां 'पावर सेंटर' में साउथ का ही बोलबाला रहेगा.

दक्षिण के सुपरस्टार्स ने यह साबित किया है कि लोकप्रियता को जिम्मेदारी में कैसे बदलना है. उन्होंने दिखाया है कि स्क्रीन का हीरो अगर असली जिंदगी में भी लोगों के काम आए, तो उसे सिर-आंखों पर बिठाया जाता है. नॉर्थ के लिए यह एक लंबा रास्ता है. यहां के एक्टर्स को यह समझना होगा कि राजनीति सिर्फ एक 'टैग' नहीं है, यह एक 'तपस्या' है जिसमें चमक से ज्यादा पसीने की जरूरत होती है.

वीडियो: तमिलनाडु विधानसभा चुनाव में क्या कुछ बड़ा होने वाला है?

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