हिंदी में एक कवि हुए, केशवदास. उनको 'कठिन काव्य का प्रेत' कहा जाता है. क्योंकि उनकी भाषा बड़ी कठिन थी. प्यास लगती तो 'पानी' नहीं मांगते. सीधा 'तोय' की डिमांड कर देते. कविता कुछ ऐसे लिखते,
लैंग्वेज भाईसाहब आपकी बहुत गंदी है!
सबकी अपनी अभिव्यक्ति है. सबकी अपनी भाषा है. हर भाषा की अपनी मौलिकता है, लेकिन भाषा ही सबसे अहम है. हर रस की अपनी एक भाषा है. संवाद के लिए अलग भाषा. प्रेम के लिए अलग भाषा. गुस्से के लिए अलग, कर्ज मांगने के लिए अलग और किसी को छलने के लिए अलग. वशीकरण के लिए अलग भाषा और उच्चाटन के लिए अलग.


सब जाति फटी दु:ख की दुपटी कपटी न रहै जहँ एक घटी।
निघटी रुचि मीचु घटी हूँ घटी जगजीव जतीन को छूटी तटी।
फिर आया 90 का दशक. एक महान गीतकार हुए समीर अंजान. उनके लिखे हजारों महान गीतों में कुछ अद्भुत गाने ऐसे भी हैं,
अ आ ई उ उ ओ
मेरा दिल न तोड़ो
सबकी अपनी अभिव्यक्ति है. सबकी अपनी भाषा है. हर भाषा की अपनी मौलिकता है, लेकिन भाषा ही सबसे अहम है. हर रस की अपनी एक भाषा है. संवाद के लिए अलग भाषा. प्रेम के लिए अलग भाषा. गुस्से के लिए अलग, कर्ज मांगने के लिए अलग और किसी को छलने के लिए अलग. वशीकरण के लिए अलग भाषा और उच्चाटन के लिए अलग.
किसी के व्यक्तित्व का आकलन करना हो, विवाद को सुलझाना हो या विवाद पैदा करना हो, गीत लिखना हो या उपमा खोजनी हो, खाना हो या सोना, भाषा हमारे बड़े काम आती है. पशुओं की अपनी भाषा है. चींटियों की अपनी. और पेड़ों की अपनी भाषा है. हर ध्वनि एक भाषा है. बाज़ मौकों पर सन्नाटा भी एक तरह की भाषा का काम करता है. जब देश-दुनिया में रोस्ट कल्चर नहीं था तब अपने समय के सबसे बड़े 'रोस्टर' कबीरदास ने लिखा,
ऐसी वाणी बोलिए, मन का आपा खोए
औरन को शीतल करे, आपहुं शीतल होए
किसी की भाषा अच्छी है या बुरी इस बहस के लिए भी भाषा अनिवार्य है. इन दिनों भाषा को लेकर देश में कई बहसें चल रही हैं. इन बहसों की भाषा पर भी एक बहस होनी चाहिए. एक स्टैंडअप कमेडियन की भाषा पर लोगों को आपत्ति है. कुछ महीनों पहले जब ये आपत्ति सार्वजनिक रूप से सामने आई तब इसका प्रतिनिधित्व किया एक राज्य के मुख्यमंत्री ने. ऐसे मुख्यमंत्री जो इन दिनों अपनी भाषा को लेकर लोगों के निशाने पर हैं. यूं तो निशाने पर कई चीजें हैं, लेकिन उनमें एक भाषा भी है. इस निराधार आलोचना में कितना दम है? हर आलोचना की नींव में होती हैं कई अपेक्षाएं और ढेर सारी उम्मीदें.
गैर-हिंदी भाषी प्रदेश से आने वाले लोगों से हम उम्मीद करते हैं कि वो हमारी भाषा में हमसे संवाद करें. हमारी भाषा में सवालों के जवाब दें और अपनी भाषा में गाली दें ताकि हमें समझ ही ना आए. किसी भी व्यक्ति के लिए रातोरात यह संभव नहीं है. वो जिस भाषा में अपना और अपनी मां का नाम लिखना सीखता है, उसी भाषा में गाली देते वक्त दूसरों की मां को याद करता है. अब दिक्कत कहां आती है?
कोई भी दूसरी भाषा या बोली सीखने के क्रम में हम 'Hi', 'Hello' या 'Thankyou', 'Sorry' तो सीख सकते हैं. लोग बता भी देते हैं और इंटरनेट पर भी यह सेवा बड़ी आसानी से उपलब्ध है. लेकिन गालियां हमें कोई सिखाता ही नहीं है. कितना भी कहो, कोई कभी किसी को औपचारिक संबंधों में गाली नहीं सिखाता. तो फिर गालियां पीढ़ी दर पीढ़ी आगे कैसे बढ़ती हैं?
मेरे गांव में जो बालक बचपन में सबसे ज्यादा उद्दंड थे, उन्हें सबसे ज्यादा गालियां मिलती थीं. कुछ घरेलू स्तर पर और कुछ गालियों के लिए उन्हें फील्ड पर उतरना पड़ता था. बड़े होकर सबसे ज्यादा गालियों का इस्तेमाल भी वही करते थे. वो पूरे तन-मन-धन से दूसरों को भी संक्रमित करते थे. कुछ लड़के ज्यादा ही तेज थे तो वो इनमें नए प्रयोग भी लेकर आए. उनकी गालियों का चयन और टाइमिंग इतनी कमाल की होती कि गाली खाने वाला भी नतमस्तक हो जाता. तो वहां से हमने ये सीखा कि गालियां या तो कुसंग से सीखी जा सकती हैं या खुद खाकर.
गालियों का व्याकरण असल में बेहद सरल और सीधा है. यह वो बीड़ी उद्योग है जिसका तम्बाकू अब खत्म हो चुका है. सारा काम रिपीटेशन पर ही चल रहा है. पुरुषों ने जब जीव-जन्तुओं पर बनने वाली गालियों को आम जनमानस की भाषा में शामिल कर लिया तब वो चुभने वाली गालियों में महिलाओं को लेकर आए. ध्यान देने वाली बात यह है कि लोग मुख्यमंत्री की आलोचना जिस भाषा और जिन गालियों को लेकर कर रहे हैं, उनमें कहीं भी महिलाओं का जिक्र नहीं है. यह दिखाता है कि उनके राज्य में महिलाएं कितनी सशक्त हैं. अब NCAER, IJCRT और North East Network की रिपोर्ट्स चाहे कुछ भी कहें, सब बेकार की बातें हैं.
अपनी मातृभाषा से इतर किसी भी नई भाषा को बोलते वक्त हमें संघर्ष करना पड़ता है. कई मात्राएं तो ऐसी होती हैं जो तालु से टकराकर ही दम तोड़ देती हैं. लिखना तो और भी कठिन है. असमिया भाषा बोलने वाले किसी भी व्यक्ति को उसकी खराब हिंदी के लिए टोकना ठीक वैसा ही है जैसे नोएडावालों को खराब भोजपुरी बोलने पर जज करना. आमतौर पर ऐसा कोई करता भी नहीं है.
कम से कम भाषा और खाने को लेकर तो हम काफी सहिष्णु हैं. तो फिर हिंदी गालियों से इतनी घृणा क्यों? गालियां भी तो भाषा का हिस्सा ही हैं. वो भी स्वर और व्यंजन से मिलकर बनी होती हैं. उनमें भी अलंकार का खुलकर इस्तेमाल होता है. उनमें भी एक लय होती है. ये गालियां भी इसी समाज से जन्मी हैं. गाली देने वाले बस 'तेरा तुझको अर्पण' ही तो कर रहे हैं.
सवाल सीएम से होने ही नहीं चाहिए. कहीं नहीं लिखा कि मुख्यमंत्री का काम सवालों का जवाब देना है. कभी आपका पार्षद प्रेस कॉन्फ्रेंस करके कहता है कि सवाल पूछो. कभी गांव के प्रधान से आपने सवाल किया. कभी देश के मुखिया को सवालों के जवाब देते हुए देखा तो सारी जवाबदेही मुख्यमंत्री की ही क्यों?
सवाल होने चाहिए कमेडियनों से. इस तरह के व्यंग्य लिखने वालों से. उन लोगों से जो गालियों का इस्तेमाल करते हैं और हिंदी भी जानते हैं. सवाल होने चाहिए पत्रकारों से. शिक्षकों से. महिलाओं से. लाइन में लगे और घर को लौटते मजदूरों से. महिला डॉक्टरों से. कोर्ट आने-जाने वाली पीड़िताओं से.
लेकिन हो सकता है इनके जवाब मुख्यमंत्री को फिर से नाराज कर दें और उनके मुंह से अनजाने में फिर किसी दूसरी भाषा का कोई ऐसा शब्द निकल जाए जिसका सटीक इस्तेमाल उन्हें ना पता हो. इसलिए जवाब देने की क्या भाषा होनी चाहिए ये तो हम मुख्यमंत्री से सीख सकते हैं, लेकिन सवाल पूछने की कोई भाषा नहीं होनी चाहिए.
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