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टिर्रियों के शहर में बजते ममता कुलकर्णी के गाने डराते क्यों हैं?

देश टिर्रियों के दौर से गुजर रहा है. यह एक ऐसा संक्रमण है जो संभवत: पूरी दुनिया में फैल चुका है. हाल ही में प्रधानमंत्री ने एक अपील की. कहा कि पेट्रोल-डीजल बचाएं. ऐसे काल में मैं इसे एक खतरनाक अपील मानता हूं. पेट्रोल-डीजल की बचत यानी और ज्यादा टिर्रियां. सड़कों पर और ज्यादा खतरे. और ज्यादा ममता कुलकर्णियों के गाने. और ज्यादा खिड़कियां और उनसे सुनाई देते अनेक शोकगीत.

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देश टिर्रियों के दौर से गुजर रहा है.

लड्डू पर बैठकर हाथ मलती मक्खी जैसा आकार और लगभग वैसी ही रफ्तार. रेल से भी ज्यादा मजबूत और पुराने मिग-21 से भी ज्यादा खतरनाक. मैं जब भी सड़क पार करने की हिम्मत जुटाता और कदम आगे बढ़ाता, सामने से आता ममता कुलकर्णी का गाना मुझे मेरे कल का शोकगीत जैसा सुनाई देता.

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'भोली-भाली लड़की, 
खोल तेरे दिल की, 
प्यार वाली खिड़की
हो हो हो हो...'

देश टिर्रियों के दौर से गुजर रहा है. यह एक ऐसा संक्रमण है जो संभवत: पूरी दुनिया में फैल चुका है. हाल ही में प्रधानमंत्री ने एक अपील की. कहा कि पेट्रोल-डीजल बचाएं. ऐसे काल में मैं इसे एक खतरनाक अपील मानता हूं. पेट्रोल-डीजल की बचत यानी और ज्यादा टिर्रियां. सड़कों पर और ज्यादा खतरे. और ज्यादा ममता कुलकर्णियों के गाने. और ज्यादा खिड़कियां और उनसे सुनाई देते अनेक शोकगीत.

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अभी-अभी मेरे बाल उड़ाकर गई ये टिर्री कंपनी द्वारा तय रफ्तार से भी तेज थी. हालांकि मैं खुश हुआ. नोएडा के पानी में मेरे बाल नहीं उड़े इसीलिए वो आज उड़ पाए. नोएडा खतरों से भरा एक शहर है. मैंने यहां कई तरह के खतरों का सामना किया. चांद जैसी सड़क, मंगल जैसा वातावरण और बुध जैसा मौसम. नोएडा एक सौर मंडलीय शहर है. लेकिन सबसे बड़ा खतरा है टिर्री. इसे प्यार से ई-रिक्शा कहना प्यार करने वालों को जलाने जैसा काम है.

देहरादून एक्सप्रेस-वे से लेकर जहांनीखेड़ा कस्बे के खड़ंजे तक हर जगह टिर्री मौजूद है. जाम अब टिर्रियों में फंसा है. रात के सन्नाटे में अब सिर्फ टिर्रियों की गूंज है. कमरे की शिफ्टिंग हो या लाश को ठिकाने लगाना, लोगों को अब सिर्फ टिर्री ही याद आती है. इस जाम में फंसा-फंसा टिर्री नियोजन कानून के बारे में सोचते हुए मैं कल्पनाओं के अतिरेक में डूब जाता हूं और सोचता हूं कि काश पहले टिर्री कपल को निरोध के बारे में पता होता.

प्रमोद कुमार शुक्ल की कविता की पंक्तियां हैं,

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एक रोड पर कितनी सारी टिर्रियां
अतिरिक्त एक टिर्री नहीं
    
लेकिन इस महानगर की महासड़कों पर टिर्रियों का महासागर तैर रहा है. सवारियां कम हैं और टिर्रियां ज्यादा. अगर प्रति यात्री एक-एक टिर्री बांट भी दी जाए तब भी लोग 'फूल और कांटे' के अजय देवगन की तरह दफ्तर आ सकते हैं. बचते-बचाते मैंने सड़क पार की और इंतजार करने लगा अपनी टिर्री का. इंतजार गलत शब्द है. मैं चुनने लगा अपनी टिर्री को. मैंने पहली बार लोगों को अपने लिए लड़ते देखा. भीड़ मेरे लिए आतुर थी. चालक मेरे लिए जान लेने और जान देने को भी तैयार थे. चुनाव की पूरी जिम्मेदारी अब मेरे ऊपर थी. मुझे मजबूरन कुछ दिल तोड़ने ही थे. मेरा परकाया प्रवेश हो रहा था. मैं ही ज्ञानेश कुमार था.

आगे एक और पीछे तीन सवारियों वाली इस टिर्री का नंबर सबसे पहला था. इसलिए मैंने उसे चुना. उस पर बैठते ही मैं अपनी औकात की मूल अवस्था में लौट गया. पीछे एक लड़का और दो लड़कियां बैठे हुए थे. लिहाज़ा मुझे लड़के का बगलगीर होना पड़ा. 10 मिनट के इस पूरे सफर में लड़का लगातार दोनों लड़कियों को हंसाने का भरसक प्रयास करता रहा और अधिकतर सफल हुआ. इस कोशिश में वह कई बार निर्दयता की चौखट तक जा-जाकर लौटा. उसने चालक को भी अपना शिकार बनाया. इस देश के लड़कों की आधी से ज्यादा ऊर्जा लड़कियों को हंसाने में ही खर्च हो जाती है. लेकिन उसे पता नहीं था कि चालक के हाथों में आज के दौर का सबसे खतरनाक स्वदेशी हथियार है.

लाल रंग के लोहे से बनी इस टिर्री ने 10 मिनट के सफर में कई पैदल चलने वालों को सहमाया. एक नई स्कॉर्पियो-एन के बंपर पर अपनी छाप छोड़ी. लाल बत्तियों को दिखाया ठेंगा और एक बूढ़ी औरत की कोहनी में आजीवन रहने वाली अपनी स्मृति दर्ज की. मेरे गंतव्य पर टिर्रियों की संख्या प्रस्थान बिंदु से भी ज्यादा थी. इनकी अधिकता और प्राकट्य से मैं हैरान था. बहुत-बहुत गर्म दोपहर में उतरते ही मैंने अपना फोन निकाला और क्यूआर की मांग की लेकिन चालक सिर्फ कैश पर आधारित था.

20 के एक अदद नोट के इंतजार में वो मिनटों खड़ा रहा और घंटों के लिए तैयार था. उसे सवारियों की देरी या उनके आक्रोश की कोई परवाह नहीं थी जो जल्दी: द लेट हो रहे थे. शायद उसे नहीं पता था लोग बीच सफर में भी छोड़कर चले जाते हैं. लेकिन वो नहीं गए. लड़का हंसाता रहा. लड़कियां हंसती रहीं. मैंने उसे अपनी आत्मा की गुल्लक को फोड़कर जमा किए कुछ सिक्के दिए. वो बड़बड़ाता हुआ चला गया.

ये बात सच है कि सड़कों पर टिर्रियों का आतंक है. इनका ना कोई पार्किंग स्टैंड है और ना कोई ठिकाना. इनके चालक चलते-फिरते मानव बम हैं. लेकिन संकट में इनकी उपलब्धता को नकारा नहीं जा सकता. कर्कश और झगड़ालू पड़ोसियों की तरह अब ये हमारे अस्तित्व का हिस्सा हैं. इनके बिना मानव जीवन की कल्पना संभव ही नहीं है. इनका कोई विकल्प ही नहीं है. पर्यावरण के लिए टिर्रियों की अनुकूलता को स्वीकार करते हुए मैं फिर कहूंगा कि सड़कों पर टिर्रियों का आतंक मौजूद है. अगर हमें पता होता कि झिल्ली इस्तेमाल करने की ये कीमत हमें चुकानी पड़ेगी तो हम टमाटरों और केलों को जेब में ही ले आते, कभी दिवाली पर टायर ना जलाते और ममता कुलकर्णी को कभी जाने नहीं देते.

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