लौंझड़
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अलग-अलग प्रेमी, अलग-अलग टैक्स लेकिन अपनी सरकार से मांग है कि इस सेवा को भी जीएसटी के दायरे में लाया जाए. 5, 12, 18 और 28 फीसदी कर की तरह लव सर्विस सेक्टर में जुटे कामगारों के लिए भी अलग कर निर्धारित किया जाए. दरअसल, जीडीपी में अहम योगदान देने वाले प्रेमी वर्ग के बारे में कभी कायदे से सोचा ही नहीं गया. वरना सोचिए हर तीसरे दिन गिफ्ट लेने-देने, हर हफ्ते सिनेमा दिखाने, बेवजह गाड़ी में बैठाकर शहर के चक्कर लगाते हुए पेट्रोल फूंकने, यूं ही महबूब को देखते हुए कॉफी पीने वगैरह से जीडीपी में कितनी बढ़ोतरी होती है. ये सर्विस बंद हो जाए तो जीडीपी को खासा झटका लग सकता है.
दरअसल, सरकार को समझना चाहिए कि हर प्रेमी एक समान नहीं होता. एक प्रेमी उधार का स्कूटर-बाइक लाकर प्रेम में जुटता है. यह वो प्रेमी होता है-जो प्रेम खुद करता है लेकिन पेट्रोल दोस्त का फूंकता है. इस प्रेमी वर्ग की औकात कॉफी हाऊस में बैठकर कैपेचिनो पीने की नहीं होती तो वो बुद्धा गार्डन टाइप के गार्डन में प्रेमिका को भारी रिस्क पर ले जाता है. कभी पुलिस के डंडे खाता है, कभी 'बंजरगियों' के हाथों ठोंका जाता है. ऐसे प्रेमियों को सरकार को प्रेम भत्ता देना चाहिए.एक अन्य गरीब किस्म का प्रेमी होता है, जो कमाता है लेकिन पेट काट काटकर प्रेम करता है. प्रेमिका को मल्टीप्लेक्स में फिल्म दिखाने ले जाते वक्त उसका दिल जोर-जोर से धड़कता है कि अगर उसने पॉपकॉर्न के अलावा नाचोज और कोल्डड्रिंक का कॉम्बो भी मंगवा लिया तो क्या होगा? मॉल से निकलने से पहले उसके मन में हज़ारों तरह की विपत्तियों की आशंका इसलिए आती रहती है कि कहीं विंडो शॉपिंग करते हुए लड़की वास्तव में कुछ पसंद न कर ले.
चूंकि ये समाज पुरुषवादी है इसलिए बिल देने की मजबूरी और जिम्मेदारी पुरुष की है. वरना कभी-कभी होना ये भी चाहिए कि लड़का मॉल में धांसू सी जींस देखे, और बोले-बेबी, ये जींस मुझ पर अच्छी लगेगी ना? तुम्हारा जानू स्मार्ट लगेगा न ! और बेबी बोले- यस जानू.....लेट मी पिक इट फॉर यू :) :) लेकिन नहीं, अमूमन ऐसा नहीं होता. शॉपिंग का बिल देकर ही बंदा 'मर्द' होने की खुशफहमी या गलतफहमी को बनाए रखता है.
हालांकि, इस भीड़ कुछ विरले नौजवान होते हैं, जो प्रेमिका के बाप के खर्च पर अपना दैनिक जीवन सुचारु रुप से चला जाते हैं. ऐसे लड़कों के लिए अलग से 'प्रेमश्री' उपाधि बनाई जानी चाहिए.खैर, सरकार को चाहिए कि पेट काट-काटकर प्रेम करने वाले ऐसे प्रेमियों के लिए एक अलग 'प्रेमाधार' कार्ड बनवाए और इन्हें कॉफी हाऊस से लेकर सिनेमाघरों तक में डिस्काउंट मिले. वरना, सीसीडी और बरिस्ता में इन दिनों कॉफी का जो रेट चल रहा है, उसके बीच कोई ब्यॉयफ्रेंड महीने भर गर्लफ्रेंड को रोजाना वहां ले जाए तो बैठे बैठाए बीपीएल कैटेगरी यानी गरीबी रेखा के नीचे आ सकता है. देश के लाखों प्रेमियों को आधार से ज्यादा इस प्रेमाधार कार्ड की जरुरत है.
इनसे ऊपर की श्रेणी का प्रेमी वर्ग दरअसल प्रेम नहीं करता, एक ब्यॉयफ्रेंड या गर्लफ्रेंड होने के अहसास को पालता है. वो ब्रेकअप और अफेयर उसी बेशर्मी से करता है, जिस बेशर्मी से नेता वादा करता है.
एक श्रेष्ठि वर्ग का प्रेमी होता है, जो हेलीकॉप्टर पर सवार होकर आता है. मर्सिडीज में गर्लफ्रेंड को घुमाने ले जाता है. सात सितारा होटल में रुतबा दिखाने के लिए प्रेमिका और उसकी फ्रेंड्स को पार्टी देता है. महंगे गिफ्ट को एक्सक्लूसिव मुहब्बत मानता है. इस प्रेमी वर्ग पर 50 फीसदी कर लगाया जाना चाहिए ताकि प्यार की सेवा देने वाला बाकी प्रेमी वर्ग महंगाई से बचकर बेतकल्लुफी से प्यार कर सकें. प्यार में जीएसटी लाकर समाजवाद लाया जाए !
पीयूष पांडे टीवी पत्रकार हैं. व्यंग्यकार हैं. किताबें भी लिखी हैं, हाल ही में आई ‘धंधे मातरम’. पीयूष जी अब हमारे-आपके लिए भी लिख रहे हैं. पाठक उन्हें ‘लौंझड़’ नाम की इस सीरीज में पढ़ रहे हैं. धंधे मातरम ऑनलाइन खरीदने के लिए इस लिंक पर क्लिक करें.