जैसे ही अपन यहां से इनको ऐसे हाथ प्रतिदिन अगर घुमाते हैं तो बीपी हमारा कंट्रोल हो जाता है. आपको मालूम है ये? और... गौशाला में सबसे अच्छी साधना होती है... तपस्या होती है... ग़लत कह रही हूं क्या? [Sic]पीछे से उनके समर्थक उनकी बात पर हामी भरते हैं, इससे उनका जोश और बढ़ जाता है और फिर वो केवल बीपी पर ही नहीं रुकती बल्कि अबकी कैंसर तक जा पहुंचती है-
मैं, कैंसर की पेशेंट... मैंने गोमूत्र से और पञ्चगव से बनी औषधियों से अपने को ठीक किया... अपना कैंसर ठीक किया है. [Sic]पञ्चगव का अर्थ भी उन्होंने एक्सप्लेन किया- गौ घृत, गौ दुग्ध, गौ मूत्र, गोबर और दही. इसके बाद राहुल कंवल लॉजिकल बातें करने लगते हैं. जो शायद ही साध्वी को पसंद आई होंगी. लेकिन चुनावी माहौल में शायद साध्वी ने संयम से काम लिया होगा और अतार्किक लेकिन संयमित जवाब दिया होगा. राहुल पूछते हैं - डॉक्टर लोग कहेंगे कि ये कैसी बातें कर रही हैं साध्वी जी. साध्वी उत्तर देती हैं-
ये, मैं प्रत्यक्ष प्रमाण हूं इसका भी. [Sic]
मेरा पड़ोसी था. अरविंद नाम था. मैं सेकंड फ्लोर में रहता था, वो मुझसे ऊपर थर्ड फ्लोर में. मुझसे उसकी कभी बात नहीं हुई. लेकिन मेरी बीवी और उसकी बीवी अच्छी दोस्त बन गईं थीं. दोनों एक साथ जिम जाती थीं. अरविंद के दो छोटे-छोटे बच्चे थे. चूंकि मेरी छत, उनकी फर्श थी तो बच्चों की धमाचौकड़ी की आवाज़ें देर रात तक आती थीं. अभी कुछ दिनों पहले मुझे पता लगा कि अपने अर्ली थर्टीज़ में जी रहा वो बंदा अब नहीं रहा. होने को मुझे 2-3 महीने पहले पता चल गया था कि उसे कैंसर है. लेकिन चूंकि मुझसे लगता था कि कैंसर क्यूरेबल भले ही न हो लेकिन औषधियों से जीवन को बढ़ाया ज़रूर जा सकता है, इसलिए डिटेक्ट होने के केवल दो ही महीने में उसकी मृत्यु हो जाने पर मुझे दुःख और आश्चर्य दोनों हुए. अब ऊपर से आवाज़ें आना बंद हो गयी हैं. बहरहाल मेरा उद्देश्य आपको इमोशनल करना नहीं, फैक्ट्स से अवगत कराना है. तो हुआ क्या कि जब मैं अपने मकान मालिक को किराया देने पहुंचा तो उत्सुकतावश उनसे भी अपने 'दुखद आश्चर्य' को शेयर किया. तब जाकर शॉकिंग बात पता चली. वो ये कि जब अरविन्द को कैंसर डिटेक्ट हुआ तो वो एलोपेथी के बदले सीधे हरिद्वार चला गया. ऐसी ही किसी साधु, साध्वी के चक्कर में. मकान मालिक ने मुझे बताया कि डेढ़ महीने में वो पहचान में नहीं आ रहा था. 23 किलो वजन घट गया था. अब कीमोथेरेपी वगैरह भी कारगर न थीं.दोस्तो इसके आगे मुझे कुछ नहीं कहना क्यूंकि आप समझ गए होंगे कि क्यों साध्वी की बात सच या फैक्ट तो छोड़िए हास्यास्पद तक नहीं है. अब हम इस कन्वर्सेशन की इतनी ही बात करेंगे. अब बात करेंगे नरेंद्र मोदी की एक खबर की. खबर है 19 फरवरी, 2019 की. उस खबर की हैडिंग देखिए -
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने वाराणसी में देश के दूसरे सबसे बड़े कैंसर हॉस्पिटल का लोकार्पण किया.तो दोस्तो अब आप ही बताओ,जब गोबर और गोमूत्र से कैंसर ठीक हो जा रहा है तो मोदी जी ने क्या इस हॉस्पिटल का लोकार्पण करके बेवकूफी की? आप इस पूरे मुद्दे में किसके पक्ष में हैं? मोदी के या साध्वी के. ओह! सॉरी!! ये दोनों तो एक ही पक्ष के हैं. याद है न अमित शाह का हालिया बयान, साध्वी को डिफेंड करते हुए-
जहां तक साध्वी प्रज्ञा का सवाल है तो कहना चाहूंगा कि हिंदू टेरर के नाम से एक फर्जी केस बनाना गया था, दुनिया में देश की संस्कृति को बदनाम किया गया, कोर्ट में केस चला तो इसे फर्जी पाया गया.बेशक ये दूसरे मुद्दे पर समर्थन था. लेकिन अभी भारतीय राजनीति में इतनी परिपक्वता कहां कि खुलकर किसी एक ही बंदे की एक बात का विरोध और दूसरी का समर्थन कर सकें. फिर चाहे वो पक्ष का हो या विपक्ष का. और जिस तरह उन्हें भोपाल से टिकट मिल गया और पार्टी की लीडरशिप ने उनपर विश्वास जताया इस पर कुछ भी कहना राहुल कंवल के इंटरव्यू में पूछे गए सवाल सरीखा होगा-
डॉक्टर लोग कहेंगे कि ये कैसी बातें कर रही हैं साध्वी जी.
वीडियो देखें:
हिंदी नही आती तो क्या हुआ, गाना तो आता है-





.webp?width=60&quality=70)








