आयुष्मान अपने लेख में कहते हैं कि समस्याओं के मामले में जनसंख्या का एक जुड़वां भाई है, सेक्स. और जितनी समस्या हिंदुस्तान में जनसंख्या के मामले में है, उतनी ही सेक्स के मामले में भी है. तो इस पर बात होनी चाहिए.
पहले गणित समझिए
आयुष्मान की बात समझने के लिए आपको हिंदुस्तान में आबादी का बेसिक गणित समझना होगा. फिलहाल देश की जनसंख्या 134 करोड़ है. इसमें से 69.4 करोड़ मरदुए हैं और 65.2 जनाना. सेक्स रेशो देशभर में 900 से 950 के बीच है. माने अगर 1000 आदमी हों तो उनमें से 50 से 100 ऐसे होंगे जो जीवनभर फ्रेंडज़ोन ही रहेंगे. लोल. और इन सब सिंगल, कॉम्पलिकेटेड, कंफ्यूज़्ड, जस्ट एज़ ए फ्रेंड, एंगेज्ड, शादीशुदा, डायवोर्सी, फ्रेंडज़ोंड इत्यादी में से 68.84 फीसदी लोग शहरों में रहते हैं. बाकी बचे 31.16 फीसदी फिलहाल गावों में हैं. ये सारा डाटा सरकारी है, 2011 की जनगणना से. तो पक्की-पक्की बात है.अब मुद्दे की बात
हम बिजली की गति से बच्चे पैदा कर रहे हैं. लेकिन बच्चों को पैदा करने के लिए सबसे ज़रूरी चीज़ यानी सेक्स के दौरान एक औरत खुद को कितना संतुष्ट पाती है, ये पूरे डिस्कोर्स से गायब है. हमारे यहां ज़्यादातर औरतें ऑरगैज़म (फिलहाल यही सबसे सही शब्द दिमाग में आ रहा है. चरमोत्कर्ष जानते हैं, लेकिन जान-बूझ कर नहीं लिखा है) तक नहीं पहुंच पातीं. सेक्स को लेकर एक तरह के खालीपन का भाव कई औरतों के अंदर है. कहा जाता है कि शहरी इलाकों में इससे कभी एक्स्ट्रामैरिटल अफेयर पनपनते हैं और कभी तलाक (वैसे ये बात देहात पर भी लागू होती है).अमूमन किसी रिश्ते का हनीमून पीरियड (चाहे शादी हो या न हो) शुरू होने से पहले ही खत्म हो जाता है. और उसके खत्म होते ही औरतें एहसास करने लगती हैं कि उनके साथी या तो उन्हें सेक्शुअल सैटिसफैक्शन दे नहीं सकते, या उन्हें इस बात की परवाह ही नहीं है कि एक औरत भी इंसान के प्यार करने के सबसे अंतरंग तरीके को पूरी तरह जीना चाहती है.
सेक्शुअल केमिस्ट्री और सेक्शुअल कंपैटिबिलिटी के सवाल पर अब शादियां टूटने भी लगी हैं. औरतें ये समझने लगी हैं कि ये उनका हक है. वो इस बात को सिरे से नकार रही हैं कि उनके मन और तन की ज़रूरत भी उतने ही मायने रखती है जितना कि एक मर्द की.गावों में स्थिति इस मामले में कुछ अलग है. ऐसा नहीं है कि गांव सारे गांव सत्रहवीं सदी में कैद हैं, लेकिन मोटा-माटी कहा जा सकता है कि सेक्शुएलिटी और सेक्शुअल सुख के बारे में देहात की औरतें कम जान पाती हैं. जया शर्मा ने इस पर रिसर्सच कर के एक रिपोर्ट तैयार की है. उनके मुताबिक गावों में घरेलू हिंसा और यौन हिंसा के शोर में यौन सुख (सेक्शुअल प्लेज़र) की बात कहीं दब जाती है.
देहात की औरतें भी एक ज़रूरत के तौर पर इसे स्वीकारती हैं, उसकी चाह में जलती भी हैं, लेकिन उनके पास वो भाषा नहीं है जिसमें वो अपनी बात कहें. इस हिसाब से शहरी और देहाती औरतों में अपने सेक्शुअल राइट्स के प्रति जानकारी में जो अंतर है, वो चौंकाने वाला है.आयुष्मान अपने लेख में कहते हैं कि उनके लिए सेक्स का मतलब हमेशा से अपने साथी को खुश करना, उसके साथ खुश होना ही रहा है. शायद मेरी तरह और नौजवान भी यही सोचते हैं. लेकिन कई ऐसे हैं जिन्हें फिलहाल ये सीखने की ज़रूरत है कि अपने साथी के साथ बेडरूम में किस तरह पेश आएं. यहीं आयुष्मान चूक गए लगते हैं. ये सही है कि देहात और शहरों में सेक्स को लेकर अलग-अलग तरह की सोच पनपनती है, लेकिन ये पूरी तरह से सही नहीं है कि शहरों में रहने वाले मर्द अपने साथी के सेक्शुअल ज़रूरतों को लेकर देहाती मर्दों की बनिस्बत ज़्यादा संवेदनशील रहते हैं. सच ये है कि ज़्यादातर शहरी मर्द यही मानते हैं कि सेक्स एक ऐसी क्रिया है जिसमें आनंद 'उनका' जन्मसिद्ध अधिकार है. यहीं औरत खारिज हो जाती है.
कुछ मर्द हैं जो अपनी साथी की परवाह करते हैं, लेकिन फिर ये भी है कि परवाह करना एक बात है और ख्वाहिश पूरी करना दूसरी.देश की एक अरब आबादी में से आधी के लिए सेक्शुअल प्लेज़र एक सच से ज़्यादा ख्वाहिश है. ऐसी ख्वाहिश, जो अमूमन पूरी नहीं होती. आयुष्मान अपने लेख के आखिर में एक बेहद ज़रूरी और संवेदनशील पहलू को छूते हैं - कंसेंट और रिस्पेक्ट. ये आसानी से समझ आने वाली बात है. हम इसमें बस एक चीज़ जोड़ना चाहेंगे. वो ये कि रिस्पेक्ट 'म्यूचूअल' हो. माने दो साथियों के बीच रज़ामंदी और एक दूसरे के लिए इज़्ज़त और बराबरी का भाव हो. ज़ोर बराबरी पर है. इसके साथ ही उस भाषा पर काम करने की भी ज़रूरत है जिसमें हम अपने साथी को बिना झिझक और शर्म के बता पाएं कि हम उससे क्या चाहते/चाहती हैं. बढ़िया सेक्स किसी थेरेपी जितना असरकारक होता है. पचासों रिसर्चर बता चुके हैं कि इससे आपका प्रदर्शन सुधरता है. हमें देश को आगे, बहुत आगे ले जाने के बारे में बातें करते हैं. अब वक्त है कि देश का प्रदर्शन सुधारने के इस एक तरीके पर गौर किया जाए.
ये लेख टीना ने लिखा है. 'दी लल्लनटॉप' के लिए इसका अनुवाद निखिल ने किया है.






















