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हमारी मिथकीय कथाओं में ट्रांसजेंडर और होमोसेक्शुअलिटी का ज़िक्र किस तरह आया है?

हिंदू मिथकीय कथाओं में बहुत सी कहानियां भरी पड़ी हैं.

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सभी चित्र सांकेतिक हैं.

यह लेख डेली ओ से लिया गया है जिसे भव्य श्रीवास्तव ने लिखा है.   दी लल्लनटॉप के लिए हिंदी में यहां प्रस्तुत कर रही हैं शिप्रा किरण.

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धारा 377 को लेकर चलने वाली बहस ने हमारे सामने कई जरूरी सवाल खड़े कर दिए हैं. सेक्स से जुड़ी हमारे पसंद-नापसंद से क्या हमारे देवताओं का कोई लेना-देना था या नहीं? क्या इंसान के शारीरिक सुख की चाह ने प्रकृति के संतुलन को बिगाड़ने का काम किया है? आदी के शारीरिक सुख और धर्म के बीच क्या किसी तरह का कोई सम्बन्ध रहा है?

जिस तरह हम जीवन के वास्तविक अर्थों को, उसके मायने को समझने के लिए धर्म, आस्था और अध्यात्म का सहारा लेते हैं. ठीक वैसे ही, उसी अर्थ को पाने के लिए हम भौतिक आनंद की तरफ भी भागते हैं.

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फिर इन दोनों चीजों को एक दूसरे से इतना अलग या कि एक दूसरे से उल्टा क्यों समझ लिया जाता है.

हिंदू मिथकीय कथाओं में ऐसी कहानियां भरी पड़ी हैं, जहां देवी-देवता भी विपरीत लिंग को आकर्षित करने के लिए अपना जेंडर या लिंग परिवर्तन कर लेते हैं. कई ऐसे देवताओं की कहानियां भी मिलती हैं जो किसी न किसी वजह से उभयलिंगी (स्त्री-पुरुष दोनों) बन जाते हैं. भगवान् विष्णु का मोहिनी रूप और भगवान शिव का अर्धनारीश्वर रूप इसके उदाहरण हैं. ये अलग बात है कि इन धर्मग्रंथों में ऐसी हर कथा के साथ उसकी कोई नैतिक व्याख्या भी कर दी गई है. या ऐसा ही कोई और स्पष्टीकरण दे दिया गया है. हिंदू मिथकीय कथाओं में ऐसी कई कथाएं मिलती हैं जिनमें सेक्स से जुड़ी हर प्रक्रिया के पीछे कोई न कोई धार्मिक उद्देश्य रहता है और काम जैसी भावना से उसका कोई लेना-देना नही है. कोई भी धर्म गे-सेक्स को अनुमति नहीं दे रहा लेकिन उन्होंने कभी ये स्पष्ट नहीं किया कि क्या धर्मग्रंथों ने विपरीत लिंग से भी प्यार करने की अनुमति दी है या नहीं?

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जबरदस्ती की बनाए नैतिक नियमों के कारण ही यहां भौतिक या शारीरिक सुख से जुड़ी हर चीज को अपराध की श्रेणी में रख दिया जाता है. इन्हीं वजहों से और धर्म की आधी-अधूरी समझ से नैतिकता और धर्म के तथाकथित ठेकेदारों की हिम्मत बहुत बढ़ जाती है.

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हिंदू मिथकीय कथाओं में समलैंगिकता और किन्नरों के उदाहरण मिलते हैं. ये अलग बात है कि वहां वे हाशिए पर दिखाई देते हैं. और ये मिथक अब हमें परम्पराओं में दिखाई देते हैं.

महाभारत के शिखंडी से लेकर शिव जैसे मिथकीय पात्रों में भी हम लैंगिक-सम्मिश्रण के उदाहरण देखते हैं और उनका महत्व भी. कामदेव का बाण जहां लोगों के भीतर काम और प्रेम का भाव पैदा करता है वहीं कामसूत्र काम की अला-अलग मुद्राओं की जानकारी देता है. रामायण में एक जगह ये ज़िक्र मिलता है कि सीता को बचाने जब हनुमान लंका गए, वहां उन्होंने राक्षसियों को एक दूसरे को चूमते देखा. भगवान अय्यप्पा को भगवान् विष्णु के स्त्री अवतार मोहिनी और शिव का पुत्र माना जाता है.

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जिस समाज के आदर्श मिथकीय पात्रों में ऐसे जरुरी उदाहरण दिखाई देते हैं वहां तो खासकर व्यक्तिगत या निजी इच्छाओं और चुनावों का सम्मान किया जाना चाहिए.

जबकि, मनुस्मृति में समलैंगिक महिलाओं के लिए दंड का प्रावधान है. उसमें कहा गया है कि समलैंगिक लड़कियों (लेस्बियन गर्ल) को 200 पेनी का जुर्माना देना पड़ता था और समलैंगिक महिला (लेस्बियन वीमेन) की उंगलियां काट दी जाती थीं. सिर्फ इतना ही नहीं बल्कि उनके सिर के बाल भी काट दिए जाते थे. समलैंगिक पुरुषों (गे) के लिए नियम इतने कठोर नहीं थे. उन्हें सिर्फ माफ़ी मांग लेने और दुबारा ऐसी गलती नहीं करने की शर्त पर छोड़ दिया जाता था.

प्राचीन भारत के इतिहास में समलैंगिक संबंधों के इतने उदाहरण होने के बावजूद आज लोग इसे किसी तरह का पाप और नैतिकता के खिलाफ समझते हैं. 2009 में जब दिल्ली हाईकोर्ट ने अपना फैसला सुनाते हुए ये बताया कि गे-सेक्स कोई अपराध नहीं या ये किसी भी अपराध की श्रेणी में नहीं आता तब कुछ उम्मीद जगी. लेकिन 2013 में सुप्रीम कोर्ट ने उस निर्णय को खारिज कर दिया.

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2018 में उम्मीद फिर से दिखाई पड़ी. सुप्रीम कोर्ट ने ये कहते हुए कि 'सामाजिक मान्यताएं और नैतिकताएं समय के साथ-साथ बदलती रहती हैं, इस पूरे मामले की जांच के लिए एक कॉन्स्टिट्यूशनल बेंच गठित किया।

सामाजिक-धार्मिक मान्यताएं या नैतिकताएं- दोनों ही, अपने समय के राजनीतिक-आर्थिक बदलावों के साथ बदलती रहती हैं. समलैंगिकता वाले मसले पर भी ऐसा ही कुछ हो रहा है. उम्मीद है कि समलैंगिकता से जुड़े वाद-विवाद और तमाम चर्चाओं के दौरान निजी चुनाव और व्यक्तिगत पसंद को ध्यान में रखा जाएगा.


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