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मैं बलदेव होता तो 'सिमरन' का हाथ कभी नहीं छोड़ता

वो ओल्ड मंक जैसी भारी, प्रयोगधर्मी और ऋतुबद्ध नहीं है. ग्लेनवाद से मुक्त उसे सिर्फ महीने के शुरुआती दिनों में ही नहीं पिया जा सकता.

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सांकेतिक तस्वीर

दिल्ली खांस रही है. तलवों की जलन अब आंखों में उतर आई है. रंग बदलते AQI मीटर डिटॉक्स होने की राह देखते फेफड़ों का इंतजार लंबा... और लंबा करते जा रहे हैं. डिटॉक्स तो लीवर को भी होना था. उसकी फाइल कहां दबी है? काल है संक्रमण का और लड़ाई है शुद्धता की. जहां प्रकाश भी प्रदूषित है और साहित्य भी. हवा और पानी के लिए तो ये शरीर कब का ढल चुका है. अशुद्ध हैं परीक्षाएं. नतीजों की घोषणा करने वाले कागज, उनके पीछे मसला गया गोंद और वो दीवार जिस पर उसे चस्पा होना है. सब कुछ अशुद्ध है.

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मीट की दुकान पर भिनभिनाती मक्खियों से ज्यादा अशुद्ध हैं वीगन लोग. क्या आपने कभी बरसों से छत पर रखी पानी की टंकी को खोलकर देखा है? अंतरिक्ष सा अंधेरा. तो क्या अंतरिक्ष भी अशुद्ध है? तो क्या हर काली चीज अशुद्ध है? फिर क्या सिर्फ दूध को ही शुद्ध माना जाए? अशुद्ध चीजों से आती है गंध. जो बना देती है काले के निकटतम रंगों को भी अशुद्ध. अशुद्ध गहरा नीला. अशुद्ध भूरा. अशुद्ध ग्रे. समय के स्वयंवर में जहां किसी भी रंग के योद्धा में शुद्धता का 'धनुष भंग' करने की शक्ति नहीं है, वहां 'सिमरन ऑफ' की चमक पंकज उधास की महबूबा जैसी है, जिसका रंग है चांदी जैसा और बाल हैं सोने जैसे. उसकी पारदर्शिता साबुन के बुलबुले सी है मासूम और निश्छल. और उसका असर कानपुर की उस लड़की जैसा है जो गले लगाकर झट से दूर कर देती है बंबई से आए एक लड़के की सारी थकान.

वो ओल्ड मंक जैसी भारी, प्रयोगधर्मी और ऋतुबद्ध नहीं है. ग्लेनवाद से मुक्त उसे सिर्फ महीने के शुरुआती दिनों में ही नहीं पिया जा सकता. कपट उससे कोसों दूर है. उसके आर-पार दिखाई देता है क्षितिज जहां से आती है आवाज- 'एक पकड़ लेना'. उसे आते-जाते हुए कभी भी पकड़ा जा सकता है. कहीं से भी पकड़ा जा सकता है. क्रय-विक्रय एक जटिल प्रक्रिया है. 'सिमरन ऑफ' उससे मुक्त है. बेरोजगारी के दिनों में कर्ज लेकर भी उसे पकड़ा जा सकता है. विकल्पों की अधिकता में भी उसे ही पकड़ा जा सकता है. छोड़कर जाने वालों की याद में और जेल से छूटकर आने वालों के उल्लास में उसे पकड़ा जा सकता है. अभिजात्य बनने का ढोंग करते वक्त भी वही सहारा देती है.

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जब देव आकाश की ओर देखता है और अधरों से लगी 'सिमरन ऑफ' बुलबुले छोड़ती हुई नीचे उतरती है. वो वियोग के चरम दिन थे. पीछे बैंड मास्टर रंगीला और रसीला का गीत बजता है- 'चढ़ जाए, हाए अल्लाह, जिसको भी ये बुखार... तौबा तेरा जलवा-तौबा तेरा प्यार.' नुसरत का गाया 'सादगी तो हमारी जरा देखिए' दरअसल एक पार्श्वगीत है जो 'सिमरन ऑफ' की उपस्थिति और अनुपस्थिति में बजता रहता है.

लहरों के कुचक्र में फंसकर मछलियों ने भी पानी को छोड़ दिया लेकिन उसने कभी पानी का दामन नहीं छोड़ा. पानी के लिए लिखे गीत- 'पानी रे पानी, तेरा रंग कैसा' उसने अपना लिए. पानी के साथ उसका वही रिश्ता है जो हाशिए पर पड़ी फिल्मों जैसे 'डुप्लीकेट', 'गोपी-किशन' और 'जुड़वां' में एक ही नायक के दो जुदा किरदारों का था. लेकिन बिना किसी महंगे विज्ञापन के कुलीन महफिलों में रखी लाल ढक्कन की सफेद बिल्ले वाली पारदर्शी बोतल ने हाशिए को हर रोज ठोकर मारी.

एक स्वादहीन, रंगहीन, गंधहीन द्रव जो दिखने में बिल्कुल गांधी पर लिखे किसी गद्य जैसा लगता है. बेहद सरल, बेहद साधारण और लगभग पूरा याद. लेकिन उसका स्वाद... इतना तीव्र, इतना तीव्र. तीव्रता का अतिरेक भी कम पड़ जाए. जीभ से लेकर छोटी आंत तक को दहका देने वाला उसका स्वाद डॉक्टर स्ट्रेंज का वो धक्का है जिसके बाद आत्मा शरीर को छोड़ देती है और जॉन की महबूब के चेहरे की तरह बहुत गौर करने पर ही याद आती है. लेकिन पानी वो माशूका है जो माथे पर हाथ फेरकर इस दहक को शांत कर देती है और फिर पैदा होता है श्रृंगार.

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सफेद रात में जब आलोक धन्वा को बगदाद की याद आ रही है तब मुझे याद आता है रूस. साइबेरिया की नीली और बर्फीली रात. कपूर की गैसीय अवस्था तक को जमा देने वाली उस ठंड को याद करते ही मुझे ठंड लगने लगती है. उस ठंड को बर्दाश्त करने के लिए रूसियों ने किसी ओल्ड मंक या मॉर्गन की ओर नहीं देखा. संकट के दिनों में उन्होंने बार-बार थामा वोडका का हाथ. सिमरनीय अवस्था में मैंने खुद को जमीन से छह इंच ऊपर पाया. निर्वात में. सच और झूठ के पार, भरपूर प्रकट होती नाराजगी और वात्सल्य की वर्षा में, प्रेम को प्रकट करने का दुस्साहस और उद्दंडता जाहिर करने की छूट जमीन से छह इंच ऊपर ही मिलती है.

छह इंच ऊपर होता है मनुष्य होने का एहसास. कुत्ते भी लगते हैं प्यारे. जागती है खुशवंत जैसी संभोग की चाह. खुलकर रो देना. अपनी बात कह देना. बाहें खोलकर लोगों को अपने साथ छल करने का आमंत्रण देना. हार जाना और हार के खतरों का सामना करना. मां को देखना और सोचना कि इनकी भी एक मां थी. जमीन से छह इंच ऊपर होता है मनुष्य होने का एहसास. उस ऊंचाई पर हम बेतकल्लुफ होते हैं और नीचे देखकर कहते हैं- 'दिस टू शैल पास!'

लेकिन जमीन से ऊपर जाना जितना सुखद और सरल है, नीचे आना उतना ही कठिन और कष्टपूर्ण. वो चोट सिर्फ लीवर तक ही महदूद नहीं रहती. वो चोट याद्दाश्त पर भी लगती है. वो घाव आंखों में भी दिखाई देता है. वो गंध किरदार से आती है लेकिन सिर्फ दूसरों को. इंसान अपनी गंध सूंघ पाता, खुद को देख पाता तो कहता- 'क्या नमूना है ये?' ग्लानि में बीतता दिन धीरे-धीरे कैलाश वाजपेयी की कविता बना जाता है,

"कुछ मत चाहो
दर्द बढ़ेगा
ऊबो और उदास रहो"

लेकिन जैसा शाहिद खान के लिए कहा गया था, 'खतरा सिर पे था लेकिन ह&*मी मन साला माने कैसे'. ढलता सूरज ग्लानि को ऐसे मिटा देता है जैसे 'तमसो मा ज्योतिर्गमय'. भूली-बिसरी यादों को समेटता मन निकल पड़ता है एक नई राह पर. एक नई खोज पर. लोग याद आ जाते हैं. बातें याद आ जाती हैं. धन खुद प्रकट हो जाता है. सारी विपन्नता, संपन्नता में बदल जाती है. हालावाद युग की तमाम कविताएं, नासिर काजमी की गजलें और अज़ीज़ मियां की खरखराहट भरी क़व्वाली लाइन लगाकर खड़ी हो जाती हैं. शाम होते ही शुरू होता है एक शगल जो खत्म होता है जमीन से छह इंच ऊपर और फिर एक बार दबी रह जाती है लीवर की फाइल डिटॉक्स के इंतजार में.

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