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हथियारों पर रिकॉर्ड 8.91 लाख करोड़ रुपये, लेकिन किन्नर कल्याण का बजट खर्च भी नहीं कर पा रही सरकार

Transgender Welfare Budget: एक तरफ भारत सरहद की सुरक्षा के लिए सैन्य खर्च बढ़ा रहा है, वहीं दूसरी तरफ ट्रांसजेंडर कल्याण का करोड़ों का बजट प्रशासनिक सुस्ती के कारण लैप्स हो रहा है. पढ़िए इस व्यवस्थागत अंतर्विरोध का पूरा सच.

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किन्नर कल्याण का बजट क्यों हो रहा लैप्स? (फोटो-PTI)

आज सुबह जब हमारी संपादकीय बैठक शुरू हुई, तो मेज पर दो खबरें थीं. पहली खबर अंतरराष्ट्रीय हलकों से आई थी, जिसने भारत के बढ़ते सैन्य रसूख पर मुहर लगाई. दूसरी खबर एक समाचार पत्र के पन्नों में दबी एक खोजी रिपोर्ट थी, जो हमारे अपने समाज के सबसे उपेक्षित कोने की बेबसी बयां कर रही थी. पहली खबर कहती है कि भारत ने अपनी सरहदों को सुरक्षित करने के लिए 92.1 बिलियन डॉलर यानी लगभग 7.6 लाख करोड़ रुपये से ज्यादा खर्च कर डाले हैं. वहीं दूसरी खबर यह पोल खोलती है कि देश के करीब छह लाख ट्रांसजेंडर्स के कल्याण के लिए जो चंद करोड़ रुपये रखे गए थे, वे भी अफसरों की सुस्ती और कागजी चक्रव्यूह के कारण बिना खर्च हुए सरकारी खजाने में वापस लौट गए.

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यह विरोधाभास सिर्फ आंकड़ों का खेल नहीं है. यह हमारे देश की प्राथमिकताओं, हमारी व्यवस्था की सोच और हमारे बजट प्रबंधन का वह सच है जो अक्सर राष्ट्रवाद और चमचमाती हेडलाइंस के शोर में कहीं खो जाता है. जब मई 2025 में सीमा पर तनाव बढ़ा, तो मिसाइलों, ड्रोनों और लड़ाकू जहाजों के लिए तिजोरी का मुंह तुरंत खोल दिया गया. सुरक्षा के नाम पर एक फाइल को रुकने नहीं दिया गया. 

लेकिन जब बात समाज के सबसे हाशिए पर खड़े किन्नर समुदाय को मुख्यधारा में लाने की आई, तो उसी तिजोरी पर लालफीताशाही का ऐसा ताला लटका कि करोड़ों का बजट धरा का धरा रह गया. आखिर हम एक राष्ट्र के तौर पर कहां जा रहे हैं? क्या सरहद की सुरक्षा ही हमारी इकलौती चिंता है, और समाज के भीतर जो लोग हर दिन पहचान और वजूद की जंग लड़ रहे हैं, उनके प्रति हमारी कोई जवाबदेही नहीं है?

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इस पूरे गणित और सामाजिक बेरुखी को समझने के लिए हमें गहराई में उतरना होगा. यह कहानी सिर्फ सेना के बजट और एक सरकारी योजना की नहीं है. यह कहानी उस मिडिल क्लास टैक्सपेयर की भी है जो दिन-रात मेहनत करके टैक्स भरता है और यह उम्मीद करता है कि उसका पैसा देश को हर मोर्चे पर मजबूत बनाएगा. 

यह कहानी उस जेन-जी और मिलेनियल पीढ़ी की भी है जो आज सोशल मीडिया पर जेंडर इक्वेलिटी और सोशल जस्टिस के लिए झंडे उठा रही है, लेकिन जमीनी हकीकत में प्रशासनिक सुस्ती उनके सारे अरमानों पर पानी फेर देती है. आइए, आज इस पूरे घालमेल का पोस्टमार्टम करते हैं और समझने की कोशिश करते हैं कि हमारी व्यवस्था का दिल कहां धड़कता है और दिमाग कहां काम करना बंद कर देता है.

सरहद का पहरा बनाम समाज का चेहरा: सिपरी की रिपोर्ट और भारत का सैन्य खर्च

स्टॉकहोम इंटरनेशनल पीस रिसर्च इंस्टीट्यूट यानी सिपरी (SIPRI) की ताजा रिपोर्ट ने पूरी दुनिया का ध्यान भारत की तरफ खींचा है. इस रिपोर्ट के मुताबिक, भारत अब दुनिया का पांचवां सबसे बड़ा मिलिट्री स्पेंडर बन चुका है. मई 2025 में भारत-पाकिस्तान सीमा पर जो तनाव देखने को मिला, उसके बाद रक्षा बजट में 8.9 प्रतिशत की भारी बढ़ोतरी की गई. 

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नतीजा यह हुआ कि भारत का सैन्य खर्च बढ़कर 92.1 बिलियन डॉलर तक पहुंच गया. चीन और पाकिस्तान की दोहरी चुनौती से निपटने के लिए हमारी सेनाओं को आधुनिक हथियारों, अत्याधुनिक ड्रोनों और लंबी दूरी की मिसाइलों से लैस किया जा रहा है. देश की संप्रभुता और अखंडता के लिए यह खर्च बेहद जरूरी माना जा सकता है, और कोई भी नागरिक इस पर सवाल नहीं उठाएगा.

लेकिन जब हम सिक्के का दूसरा पहलू देखते हैं, तो आंखें फटी की फटी रह जाती हैं. एक तरफ जहां रक्षा सौदों की फाइलें सुपरसोनिक रफ्तार से आगे बढ़ती हैं, वहीं दूसरी तरफ सामाजिक न्याय और अधिकारिता मंत्रालय के गलियारों में फाइलें रेंगती भी नहीं हैं. राजस्थान पत्रिका में छपे वरिष्ठ स्तंभकार डॉ. रमेश ठाकुर के खोजी लेख ने सरकार की इसी दुखती रग पर हाथ रख दिया है. 

डॉ. ठाकुर के जुटाए आंकड़े बताते हैं कि वर्ष 2023-24 में केंद्र सरकार ने किन्नर कल्याण कोष के लिए 52 करोड़ 91 लाख रुपये आवंटित किए थे. आपको क्या लगता है, इसमें से कितना पैसा जमीन पर पहुंचा? सिर्फ 6 करोड़ 59 लाख रुपये. बाकी के तकरीबन 46 करोड़ रुपये प्रशासनिक सुस्ती की भेंट चढ़ गए.

बात यहीं खत्म नहीं होती. अगले साल यानी वर्ष 2024-25 में बजट बढ़ाकर 68 करोड़ 46 लाख रुपये किया गया, लेकिन नतीजा और भी शर्मनाक रहा. इस बार सिर्फ 5 करोड़ 14 लाख रुपये खर्च हो पाए. यानी जैसे-जैसे बजट बढ़ा, वैसे-वैसे खर्च करने की रफ्तार और कम होती गई. 

यह स्थिति तब है जब सुप्रीम कोर्ट ने साल 2014 में ही नेशनल लीगल सर्विसेज अथॉरिटी बनाम भारत सरकार (NALSA) मामले में ट्रांसजेंडर्स को 'थर्ड जेंडर' के रूप में मान्यता दी थी और उनके सामाजिक-आर्थिक अधिकारों की रक्षा करने का साफ आदेश दिया था. देश की सरहदें तो महफूज हो रही हैं, लेकिन देश के भीतर रहने वाले अपने ही नागरिकों का एक हिस्सा बुनियादी हक के लिए तरस रहा है.

कागजी चक्रव्यूह और सिविल सर्जन का दफ्तर: पहचान की दर्दनाक जंग

आखिर ऐसा क्यों होता है कि बजट में पैसा होने के बावजूद वह जरूरतमंदों तक नहीं पहुंच पाता? इसका सबसे बड़ा कारण है वह कागजी चक्रव्यूह जिसे हमारी नौकरशाही ने खड़ा किया है. अगर किसी ट्रांसजेंडर व्यक्ति को सरकार की 'किन्नर कल्याण योजना' या 'आयुष्मान भारत टीजी प्लस' कार्ड का लाभ लेना है, तो उसे सबसे पहले अपनी पहचान का सरकारी प्रमाण पत्र बनवाना होता है. 

पहचान पत्र बनाने की इस प्रक्रिया को इतना जटिल बना दिया गया है कि एक आम ट्रांसजेंडर के लिए इसे पार करना किसी बुरे सपने जैसा है. नेशनल पोर्टल फॉर ट्रांसजेंडर्स पर आवेदन करने के बाद जिला मजिस्ट्रेट और सिविल सर्जन के दफ्तरों के चक्कर काटने पड़ते हैं.

उत्तर प्रदेश के संदर्भ में इसे समझना और भी जरूरी हो जाता है, क्योंकि 2011 की जनगणना के अनुसार देश में सबसे ज्यादा ट्रांसजेंडर आबादी (1,37,465) उत्तर प्रदेश में ही रहती है. लखनऊ के वरिष्ठ पत्रकार राजकुमार सिंह इस प्रशासनिक रवैये पर टिप्पणी करते हुए कहते हैं,

जब एक ट्रांसजेंडर व्यक्ति सिविल सर्जन के दफ्तर में मेडिकल सर्टिफिकेट के लिए जाता है, तो उसे भारी मानसिक प्रताड़ना और संवेदनहीनता का सामना करना पड़ता है. वहां मौजूद स्टाफ का नजरिया सहयोगात्मक होने के बजाय उपहास उड़ाने वाला होता है. निवास प्रमाण पत्र बनवाने के लिए मकान मालिक की गवाही या रेंट एग्रीमेंट मांगा जाता है, जबकि हकीकत यह है कि सामाजिक भेदभाव के कारण ज्यादातर ट्रांसजेंडर्स को कोई आसानी से मकान किराए पर भी नहीं देता.

इस पूरी प्रक्रिया में एक और बड़ा रोड़ा है डिजिटल लिटरेसी की कमी. सरकार ने योजनाएं ऑनलाइन तो कर दी हैं, लेकिन इस समुदाय के बड़े हिस्से के पास न तो स्मार्टफोन हैं और न ही उन्हें इन पोर्टल्स को चलाने की समझ है. जब तक वे किसी एनजीओ या सामाजिक कार्यकर्ता की मदद से फॉर्म भरते हैं, तब तक वित्तीय वर्ष खत्म होने को आ जाता है और बजट लैप्स हो जाता है. इसी को कहते हैं डिजिटल गवर्नेंस का वो चेहरा, जो कागजों पर तो बहुत चमकता है लेकिन जमीन पर आते-आते उसकी रोशनी बुझ जाती है.

नीतिगत खामियां और व्यवस्थागत बेरुखी पर क्या कहते हैं जानकार

इस विषय की गंभीरता को समझने के लिए हमने रक्षा मामलों के विशेषज्ञ और सामाजिक नीतियों के विश्लेषकों से बात की. उनका मानना है कि यह समस्या सिर्फ पैसे की कमी की नहीं, बल्कि इच्छाशक्ति और प्रशासनिक प्राथमिकताओं की है.

रक्षा मामलों के जानकार और सामरिक विश्लेषक कर्नल (रिटायर्ड) अजय शुक्ला कहते हैं,

इसमें कोई दो राय नहीं है कि मई 2025 के संकट के बाद भारत को अपनी सैन्य तैयारियों को मजबूत करना ही था. चीन जिस तरह से एलएसी पर बुनियादी ढांचा खड़ा कर रहा है और पाकिस्तान के साथ मिलकर नई रणनीतियां बना रहा है, उसे देखते हुए 92.1 बिलियन डॉलर का खर्च समय की मांग है. लेकिन एक मजबूत राष्ट्र सिर्फ सीमाओं से नहीं बनता. अगर देश के भीतर का नागरिक समाज कमजोर, कुपोषित या सामाजिक रूप से बहिष्कृत महसूस करेगा, तो आंतरिक सुरक्षा के मोर्चे पर नई चुनौतियां खड़ी हो जाएंगी. बजट का संतुलन ऐसा होना चाहिए कि रक्षा और सामाजिक सुरक्षा दोनों को बराबर अहमियत मिले.


दूसरी तरफ, सामाजिक कार्यकर्ता और ट्रांसजेंडर अधिकारों के लिए काम करने वाली संस्था 'अस्तित्व' की संस्थापक रेशमा प्रसाद का नजरिया बिल्कुल अलग और कड़वा है. वे कहती हैं,

सरकार का बजट बनाना सिर्फ एक रस्म बनकर रह गया है. जब आप 68 करोड़ रुपये में से सिर्फ 5 करोड़ रुपये खर्च कर पाते हैं, तो यह आपकी नीत और नीति दोनों पर सवाल खड़े करता है. नौकरशाही ने पहचान पत्र और मेडिकल बोर्ड के नाम पर ऐसा जाल बुना है कि हमारे लोग डर के मारे दफ्तरों का रुख ही नहीं करते. गृह मंत्रालय ने 2010 में ही राज्यों को निर्देश दिए थे कि ट्रांसजेंडर्स के प्रति पुलिस और प्रशासन के रवैये को सुधारा जाए, लेकिन आज 2026 में भी हकीकत नहीं बदली. जब तक बजट के क्रियान्वयन की जिम्मेदारी तय नहीं होगी और अधिकारियों की जवाबदेही तय नहीं की जाएगी, तब तक यह पैसा ऐसे ही सरकारी तिजोरी में वापस लौटता रहेगा.

बजट आवंटन और वास्तविक खर्च का तुलनात्मक ढांचा

इस पूरे विरोधाभास को साफ-साफ समझने के लिए हमें इन दोनों क्षेत्रों के बजट आवंटन और उसके जमीनी इस्तेमाल के आंकड़ों पर नजर डालनी होगी. नीचे दी गई तालिका से यह साफ हो जाएगा कि हमारी प्राथमिकताएं किस तरह से तय हो रही हैं.

क्षेत्र / योजनाआवंटित बजट (अनुमानित)वास्तविक खर्चखर्च का प्रतिशतमुख्य कारण / प्रभाव
रक्षा बजट (SIPRI 2025/2026)7.6 लाख करोड़ रुपयेलगभग पूरा खर्च98% - 100%मई 2025 के सीमा संघर्ष के बाद हथियारों और ड्रोनों की त्वरित खरीद
किन्नर कल्याण कोष (FY 2023-24)52 करोड़ 91 लाख रुपये6 करोड़ 59 लाख रुपये12.4%प्रशासनिक जटिलता, पहचान पत्रों के आवंटन में देरी
किन्नर कल्याण कोष (FY 2024-25)68 करोड़ 46 लाख रुपये5.14 करोड़ रुपये7.5%सिविल सर्जन स्तर पर मानसिक प्रताड़ना, डिजिटल पोर्टल की खामियां

इस आंकड़े को देखकर कोई भी समझ सकता है कि जहां इच्छाशक्ति होती है, वहां अरबों डॉलर भी कम समय में सही जगह पहुंच जाते हैं. लेकिन जहां सिर्फ कागजी खानापूर्ति करनी होती है, वहां कुछ करोड़ रुपये खर्च करने में भी पसीने छूट जाते हैं.

सोशल जस्टिस बनाम नेशनल सिक्योरिटी

यह बहस केवल नीति निर्माताओं तक सीमित नहीं है. इसका सीधा असर देश के मिडिल क्लास टैक्सपेयर पर पड़ता है. एक आम नौकरीपेशा इंसान जब अपनी सैलरी से इनकम टैक्स कटवाता है, तो वह सोचता है कि उसका पैसा देश के निर्माण में लग रहा है. जब उसे पता चलता है कि सामाजिक कल्याण के लिए रखे गए पैसे का एक बड़ा हिस्सा सिर्फ इसलिए लैप्स हो गया क्योंकि बाबू लोग फाइलें दबाकर बैठे रहे, तो उसका व्यवस्था पर से भरोसा उठने लगता है. 

मिडिल क्लास चाहता है कि देश सुरक्षित भी रहे और समाज के हर तबके को सम्मान से जीने का मौका भी मिले, क्योंकि जब कोई भी समुदाय पीछे छूटता है, तो उसका बोझ अंततः अर्थव्यवस्था पर ही पड़ता है.

वहीं दूसरी तरफ, जेन-जी (Gen Z) और मिलेनियल्स की बात करें, तो यह पीढ़ी मानवाधिकारों, जेंडर न्यूट्रैलिटी और सोशल जस्टिस को लेकर बहुत संवेदनशील है. वे केवल बड़ी-बड़ी बातें पसंद नहीं करते, उन्हें परिणाम चाहिए. सोशल मीडिया पर एक्टिव रहने वाले युवा आज यह सवाल पूछ रहे हैं कि जब हमारा देश डिजिटल इंडिया बन चुका है, जब हम दुनिया की तीसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बनने की राह पर हैं, तो फिर पहचान पत्र बनवाने जैसी बुनियादी चीज के लिए किसी को दफ्तरों में जलील क्यों होना पड़ता है? 

युवाओं के लिए यह स्थिति बेहद निराशाजनक है क्योंकि वे भारत को एक ऐसे आधुनिक राष्ट्र के रूप में देखना चाहते हैं जहां आधुनिक हथियार भी हों और आधुनिक, संवेदनशील सोच भी.

समाज, मनोविज्ञान और नीतिगत खामियों का कॉकटेल

इस विफलता के पीछे केवल प्रशासनिक सुस्ती नहीं है, बल्कि इसके सामाजिक और मनोवैज्ञानिक कारण भी हैं. हमारा समाज आज भी ट्रांसजेंडर समुदाय को बराबरी का दर्जा देने के लिए तैयार नहीं है. नीति आयोग की कई रिपोर्ट्स में इस बात का जिक्र किया गया है कि जब तक सामाजिक दृष्टिकोण नहीं बदलेगा, तब तक कोई भी सरकारी योजना पूरी तरह सफल नहीं हो सकती. जब कोई ट्रांसजेंडर युवा शिक्षा या नौकरी के लिए बाहर निकलता है, तो उसे कार्यस्थल पर भी भेदभाव झेलना पड़ता है.

मनोवैज्ञानिक तौर पर, लगातार मिलने वाली उपेक्षा और प्रताड़ना के कारण इस समुदाय के लोगों में अवसाद और व्यवस्था के प्रति अविश्वास की भावना गहरी हो जाती है. वे मान लेते हैं कि सरकार चाहे कोई भी योजना ले आए, उनके दिन नहीं बहुरने वाले. इसी अविश्वास के कारण वे सरकारी योजनाओं के लिए आवेदन करने से भी कतराने लगते हैं.

इसके अलावा, कॉरपोरेट और इंडस्ट्री सेक्टर का रवैया भी बहुत उत्साहजनक नहीं रहा है. हालांकि कुछ बड़ी कंपनियों ने विविधता और समावेशन (Diversity and Inclusion) की नीतियां अपनाई हैं, लेकिन छोटे और मध्यम उद्योगों में अभी भी ट्रांसजेंडर्स के लिए रोजगार के अवसर ना के बराबर हैं. जब तक उन्हें आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर नहीं बनाया जाएगा, तब तक वे मुख्यधारा का हिस्सा नहीं बन पाएंगे.

अगर अब भी नहीं संभले तो क्या होगा?

यदि यही स्थिति बनी रही, तो इसके परिणाम दूरगामी और गंभीर होंगे. शार्ट टर्म में तो यह दिख रहा है कि पैसा सरकारी खजाने में लौट रहा है और योजनाएं ठप पड़ी हैं. लेकिन लॉन्ग टर्म में, यह छह लाख की आबादी को हमेशा के लिए विकास की दौड़ से बाहर धकेल देगा. जब एक पूरा समुदाय बुनियादी स्वास्थ्य, शिक्षा और सम्मान से वंचित रहेगा, तो देश के मानव विकास सूचकांक (HDI) पर इसका बुरा असर पड़ना तय है. विश्व बैंक और अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष (IMF) जैसी संस्थाएं भी बार-बार कहती हैं कि समावेशी विकास (Inclusive Growth) के बिना कोई भी देश लंबे समय तक आर्थिक तरक्की नहीं कर सकता.

अगर हम चाहते हैं कि भविष्य में यह तस्वीर बदले, तो हमें कुछ कड़े और व्यावहारिक कदम उठाने होंगे. यह सिर्फ सरकार की जिम्मेदारी नहीं है, बल्कि एक नागरिक के तौर पर हमारी भी जिम्मेदारी है.

कैसे टूटेगा लालफीताशाही का यह ताला?

इस जटिल समस्या से निपटने के लिए हमें बहुआयामी रणनीति अपनानी होगी. यहां कुछ ऐसे बिंदु दिए गए हैं जिन पर तुरंत काम करने की जरूरत है,

वन-स्टॉप अटेस्टेशन सेंटर: पहचान पत्र जारी करने की प्रक्रिया को जिला मजिस्ट्रेट या सिविल सर्जन के दफ्तरों से हटाकर सीधे सिंगल-विंडो सिस्टम के तहत लाया जाए, जहां इस समुदाय के प्रतिनिधि भी शामिल हों ताकि संवेदनशीलता बनी रहे.

अधिकारियों की अकाउंटेबिलिटी: सामाजिक न्याय मंत्रालय को यह नियम बनाना चाहिए कि यदि किसी राज्य या जिले का बजट बिना किसी ठोस कारण के लैप्स होता है, तो संबंधित अधिकारियों के खिलाफ अनुशासनात्मक कार्रवाई की जाए.

कम्युनिटी आउटरीच प्रोग्राम: केवल ऑनलाइन पोर्टल के भरोसे बैठने के बजाय, समाज कल्याण विभाग की टीमों को ट्रांसजेंडर बस्तियों में जाकर कैंप लगाने चाहिए और मौके पर ही उनके दस्तावेज तैयार करने चाहिए.

मिडिल क्लास और युवाओं के लिए सलाह: आप अपने स्तर पर इस समुदाय के प्रति अपना नजरिया बदलें. यदि आपके आसपास कोई ऐसा व्यक्ति है जिसे सरकारी योजना का लाभ चाहिए, तो उसकी कागजी कार्रवाई और ऑनलाइन फॉर्म भरने में मदद करें. आपका यह छोटा सा कदम किसी की जिंदगी बदल सकता है.

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मजबूत सरहदें और खुशहाल समाज ही सच्चे राष्ट्र की पहचान हैं

आखिर में, बात घूम-फिरकर उसी मोड़ पर आ जाती है कि हम कैसा भारत बनाना चाहते हैं. एक ऐसा भारत जिसकी सीमाएं तो अभेद्य हों, जिसके पास दुनिया के सबसे घातक हथियार हों, लेकिन उसके अपने ही नागरिक बुनियादी पहचान पत्र के लिए सरकारी दफ्तरों के बाहर रो रहे हों? या फिर एक ऐसा भारत जो सरहद पर जितना सख्त है, अपने समाज के भीतर उतना ही संवेदनशील और समावेशी है?

रक्षा पर खर्च करना देश की मजबूरी और जरूरत हो सकता है, लेकिन अपने ही नागरिकों के कल्याण के बजट को अफसरों की मेज पर सड़ने देना एक प्रशासनिक अपराध है. जब तक हमारी तिजोरी का मुंह देश की सीमाओं और देश के नागरिकों, दोनों के लिए बराबर सम्मान के साथ नहीं खुलेगा, तब तक हमारा विकास अधूरा ही रहेगा. समय आ गया है कि हम इस अंतर्विरोध को पहचानें और बजट के आंकड़ों से आगे बढ़कर इंसानी जिंदगियों को संवारने का काम शुरू करें.

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