मनोज अरबपती हैं. डॉलर वाले अरबपति. उन्होंने ऐलान कर दिया है कि वो अपनी दौलत का 99% फीसदी ज़रूरतमंदों के लिए दान कर देंगे. लेकिन इनकी तारीफ इनके दान के लिए नहीं होती, दान करने के तरीके के लिए होती है. क्योंकि दान का उनका तरीका क्लीशे नहीं है. लल्लनटॉप है. वो अपना पैसा बांट देने में यकीन नहीं करते. उनका मानना है कि बेहतर ये होगा कि इस पैसे से ऐसे आविष्कार किए जाएं जिनसे ज़रूरतमंदों की ज़िंदगी बेहतर हो. हमें ये बात मस्त लगी. इन दिनों मनोज दिल्ली आए हुए हैं, तो हम पहुंच गए उनसे मिलने. हमारी उनकी क्या बात हुई, आपको बता रहे हैं-
लल्लनटॉप - हिंदुस्तान से अमरीका जाने और वहां कामयाब रहने तक की आपकी जर्नी के बारे में बताइए.
मनोज - पर्सनल जर्नी उतनी ज़रूरी नहीं है. साधारण ही है. यहां से बहुत से हिंदुस्तानी यूएस गए. हमारे पिताजी भी गए. हम वहां पर पढ़े. धीरे-धीरे मेरी दिलचस्पी आध्यात्म में हुई. तो बहुत साल उसी सब में लगा रहा. फिर हमें लगा कि लोगों की भलाई के लिए कुछ करें. उसके लिए धन चाहिए. तो हमने बिज़नस शुरू किया. कुछ साल दिक्कतें रहीं फिर एक चीज़ सफल हो गई. (मनोज 5 Hour Energy के मालिक हैं. 2015 में अमरीकी एनर्जी ड्रिंक मार्केट में इसकी हिस्सेदारी 90% तक थी.)लल्लनटॉप - ऐसा क्या हुआ कि आपने तय किया कि मैं कमाऊंगा ज़रूर लेकिन खर्च ऐसे (ज़रूरतमंदों के लिए) करूंगा?
मनोज की बनाई 5 Hour Energy Drink अमरीका में बड़ी सफल रही.
सफल होने के बाद मुझे लगा कि ऐसी चीज़ करें जिसका लोगों को फायदा हो. ऐसे लोगों के पास, जिनके पास कम है. मैं उन्हें गरीब नहीं कहता. क्योंकि जब मैं उनके पास गया तो मुझे लगा नहीं कि वो गरीब हैं. वो मुझे दिल से अमीर लगे.
मनोज - कोई म्यूज़िशियन होता है, वो आच्छा म्यूज़िक बनाता है. ऐसे ही और लोगों में हुनर होता है. लेकिन मुझ में कोई खास हुनर नहीं था. एक धंधा था, जिसमें ऐसा लगता था कि कुछ हो सकता है. मेरा टैलेंट धंधे में ही था. मेरा शौक मेरा काम है. और काम करने में खर्च नही होता है. इसलिए मेरे पास सवाल था कि अपना पैसा लगाऊं कहां. मेरे साथ काम करने वाले लोग भी यही मान कर चलते हैं कि सिर्फ अपने लिए जीने में कोई मतलब नहीं. हमने मिल कर कुछ चीज़े बना ली हैं. अब समय आ गया है कि इन आविषकारों को सब जगह पहुंचाया जाए. मैं भारतीय हूं तो पहली प्राथमिकता मैंने भारत को दी.लल्लनटॉप - दुनिया बदलने वालों में बड़ी तादाद कॉलेज ड्रॉपआउट्स की है. आपने भी प्रिंस्टन (यूनिवर्सिटी) एक साल पढ़ाई कर के छोड़ दी. क्या वजह रही?
मनोज की बनाई फ्री इलेक्ट्रिक बाइक से कसरत करते हुए बिजली बनाई जा सकती है.
मनोज- मैं ये नहीं कहता कि प्रिंस्टन बुरी जगह है. लेकिन मैंने ये देख लिया था कि जितना एक साल में सीख लिया, उतना बहुत था. चार साल लायक नहीं था. जिन्हें नौकरी चाहिए होती है, उन्हें कॉलेज के ठप्पे की ज़रूरत पड़ती है. लेकिन मुझे नौकरी करनी नहीं थी. लोग पूछते हैं कि एक साल ही क्यों तो मैंने सोचा कि चार ही साल क्यों, पांच क्यों नहीं. मैं बिल गेट्स जैसे ड्रॉपआउट्स से मिला हूं. इन्हें काम करने का शौक था. पढ़ा-पढ़ाया करने में रुचि नहीं थी. वो कुछ बने ही इसलिए कि उन्होंने कॉलेज छोड़ दिया.लल्लनटॉप - अब हम उन तीन फील्ड्स की बात करेंगे, जिनमें आपने आविष्कार किए हैं.
मनोज ने एक साल पढ़ाई कर के प्रिंस्टन यूनिवर्सिटी छोड़ दी थी.
मनोज - सबसे पहले हम बिजली (सबके लिए, सस्ती) पर ध्यान दे रहे हैं. पुराने समय में जब टेलिफोन लाइन होती थीं और फिक्स्ड टेलिफोन होते थे, तो बहुत कम लोगों के पास फोन होते थे. जब मोबाइल आया तो सब जगह फैल गया. उसी तरह हमने बिजली को मोबाइल कर दिया है. हर घर के पास उनकी अपनी बिजली होगी. उतनी जिसमें लाइट, मोबाइल फोन और पंखा चल जाए. इसके लिए हमने 'हंस पावरपैक' बनाया है. इस से छोटा टीवी और कंप्यूटर भी चल सकता है.लल्लनटॉप - 12 साल में लोगों की ज़रूरतें बढ़ेंगी ही. हंस पावर पैक खरीदने वालों में कई लोगों के यहां समय के साथ ऐसी चीज़ें आएंगी जो इस पावर पैक से चल नहीं पाएंगी. तो क्या इतने लंबे समय में पावरपैक की उपयोगिता कम नहीं हो जाएगी?
उत्तराखंड सरकार ने इसकी एक लाख यूनिट का ऑडर भी दे दिया है. ये सोलर पावर से चार्ज हो सकता है. तो ये सारी बिजली मुफ्त रहेगी. हम इसपर 12 साल की वॉरंटी देंगे.
मनोज - पावरपैक आपकी बुनियादी ज़रूरतों को पूरा कर सकता है. ज़्यादा इस्तेमाल के लिए आप इसे सोलर ब्रीफकेस से चार्ज कर सकते हैं. इतने में ज़्यादातर लोगों की ज़रूरतें पूरी हो जाएंगी. मैंने अमीर लोगों के लिए ये चीज़ नहीं बनाई है.लल्लनटॉप - आप खारे पानी को साफ करने की मशीन बना रहे हैं. उसके पीछे क्या सोच है और ये कैसे होने वाला है?
मनोज के बनाए सोलर ब्रीफकेस से पावरपैक ज़्यादा तेज़ी से चार्ज हो जाता है
मनोज - शुरू में हमने सोचा कि समुद्र का पानी मीठा किया जाए. लेकिन इसके लिए काफी भारी और महंगी मशीनरी की ज़रूरत पड़ती है. और ऐसी मशीन सिर्फ समुद्र के आसपास ही इस्तेमाल की जा सकती है. तो हमने सोचा कि क्यों न उस खारे पानी को पीने लायक बनाने के बारे में सोचा जाए जो हर ज़मीन में हर जगह मौजूद है. तो हमने पानी साफ करने की एक ऐसी मशीन बनाई जो सिर्फ दो किलोवॉट बिजली से चल जाती है और 24 घंटे में 60 हज़ार लीटर पानी साफ कर देती है. इससे हिंदुस्तान में साफ पानी की किल्लत काफी हद तक कम हो जाएगी.लल्लनटॉप - इस मशीन की कीमत क्या होने वाली है?
मनोज का दावा है कि ये मशीन 24 घंटे में 60 हज़ार लीटर पानी साफ कर देती है
मनोज - अभी हमने ये तय नहीं किया है लेकिन इसकी कीमत दो से तीन लाख के बीच रहेगी.लल्लनटॉप - अब आते हैं उस आविषकार पर जो आपने खेती के लिए किया है. आपने कहा कि आपके ईजाद किए शवांश फर्टिलाइज़र में भूसा, गोबर और गीली पत्तियां पड़ती हैं. ये खाद हमारे यहां खेतों में पड़ने वाली पारंपरिक खाद से कैसे अलग है?
मनोज - हमारे खाद बनाने के तरीके में 18 दिनों में खाद तैयार हो जाती है. इतनी जल्दी कहीं खाद नहीं बनती, न इतनी अच्छी बनती है. इस खाद से ज़मीन की उपज बढ़ेगी, पानी और फर्टिलाइज़र कम लगेगा. यहां खास बात ये है कि हमारे तरीके से पहली बार में ही नतीजे मिलेंगे. जिस फसल से पहले खाद तैयार की जाएगी, उसी फसल में आप उसका असर देख पाएंगे. हमने ये तरीका इंटरनेट पर डाल रखा है और कोई भी मुफ्त में इस तरीके को अपना सकता है.लल्लटॉप - इस खाद को भारत के खेतों में परखा गया है?
मनोज ने शिवांश फर्टिलाइज़र बनाने की तकनीक सभी के लिए मुफ्त रखी है
मनोज - हमने 50 खेतों में इस खाद के इस्तेमाल से शुरुआत की थी. वहां से बढ़ कर ये 40 हज़ार खेतों में पहुंच गए हैं. कई किसानों को इस तरीके से इतना फायदा हुआ है कि उन्होंने घर बना लिए हैं.मनोज भार्गव कहते रहे कि प्रधानमंत्री में सही काम करने की दिल और इरादा है, लेकिन जब-जब उनसे सवाल किया जाता कि क्या वो अपने आविष्कारों को हिंदुस्तान में बनाने के लिए फैक्ट्री लगाएंगे, तो वो यही कहते कि मैंने दुनियाभर में बिज़नेस करके देखा है. हिंदुस्तान में काम करना बहुत मुश्किल है. इसलिए फैक्ट्री यहां लगने में कुछ वक्त लगेगा. अपने मिशन को लेकर भी वो काफी प्रैक्टिकल लगे. कहा कि लोगों के भले के लिए भी ऐसी कोई चीज़ नहीं बनाएंगे जो हमें सड़क पर ले आए. एक सफल उद्योगपति के बाद वो एक सफल समाजसेवक कैसे बनेंगे, समय ही बताएगा.
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