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आपके बदन में दूसरों को लुभाने वाली खुशबू कहां से आती है?

"तू धरती पे चाहे जहां भी रहेगी, तुझे तेरी खुशबू से पहचान लूंगा."

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फोटो - thelallantop
जब भी ख्यालों में तू आये मेरे बदन से खुशबू आये महके बदन में रहा न जाए ये लाइनें लिखने वाले गुलज़ार साहब हैं. जो भी आगे कहा-सुना जाएगा, इन लाइनों को संदर्भ में रखते हुए ही कहा-सुना जाएगा. बदन की खुशबू! वही खुशबू जिस से कि नवजात बच्चा अपनी मां को पहचानता है, जिस से भंवरा फूल को पहचानता है, और चांद चकोर को. ये वो खुशबू है जो कि हर बदन की अपनी होती है. ये खुशबू आती कहां से हैं? असल में इसकी वजह कुछ केमिमल्स हैं जो हर एक के शरीर में बनते हैं. ये केमिकल्स असल में एक इंडिकेटर की तरह होते हैं. गाड़ी वाले नहीं, केमिस्ट्री वाले. जैसे लिटमस पेपर एक इंडिकेटर होता है. किसी केमिकल में नीला लिटमस पेपर डालने पर अगर वो लाल रंग का हो जाए तो केमिकल एसिडिक होता है. वैसे ही ये शरीर से रिसने वाले केमिकल्स अपने आप में इंडिकेटर होते हैं. शरीर जब किसी एक स्थिति में होता है तो उसमें उस सिचुएशन से जुड़े केमिकल बनते हैं. याद रहे कि ये स्थिति आपके आस पास की सिचुएशन नहीं बल्कि अपने अंदर की सिचुएशन पर निर्भर करती है. इन शरीर के अंदर बनने वाले तमाम केमिकल्स को ही फेरोमोंस (pheromones) कहते हैं. यही फेरोमोंस आपके शरीर से आने वाली गंध की असली वजह होते हैं. ये हर जीव में पाये जाते हैं. यहां तक कि सिंगल सेलुलर जीवों में भी. कम्यूनिकेशन. यानी आपका कुछ कहना और किसी का उसे सुनना. कम्यूनिकेशन के लिए कुछ भी कहे जाने के बाद उसे सुना जाना बेहद ज़रूरी है. वरना मम्मी आपसे पानी की बोतल भर के फ्रिज में रखने को कहती रहें और आप उसे सुनें ही न, तो उसे कम्यूनिकेशन नहीं कह सकते. ये कम्यूनिकेशन ज़रूरी नहीं कि बोल कर ही किया जाए. ऐसा भी हो सकता है कि आपके बार-बार न सुनने पर मम्मी चप्पल या झाड़ू जैसा कुछ हाथ में उठा लें. आप तुरंत ही बोतल भरने के लिए कूच कर देते हैं. ये झाड़ू या चप्पल एक सिग्नल होता है. मम्मी सिग्नल देती हैं और आप उसे रिसीव करते हैं. शरीर में यही कम्यूनिकेशन चल रहा होता है. सिग्नल वाला कम्यूनिकेशन. एक शरीर से सिग्नल भेजा जाता है, फिर उसे दूसरा शरीर रिसीव करता है. और फिर सिग्नल के हिसाब से वो शरीर प्रतिक्रिया करता है. इसे रिस्पोंस कहते हैं. दूसरा शरीर अपनी किसी हरकत या अपनी अवस्था में बदलाव ला सकता है. तो कुल मिला के फेरोमोन वो केमिकल होते हैं जो एक शरीर की अवस्था (प्रजाति, लिंग, सामजिक ओहदा, उम्र, मादकता, सेहत इत्यादि) के बारे में सिग्नल देते हैं और सिग्नल रिसीव करने वाले का शरीर उन्हीं के अनुरूप रेस्पोंड करता है. फेरोमोन का नाम लेते ही सिर्फ प्यार, मोहब्बत, आकर्षण जैसे शब्दों का ही ख़याल आता है. मगर असल में फेरोमोन की दुनिया इन सब से कहीं आगे है. आपसी बातचीत के लिए जीवों के द्वारा केमिकल का इस्तेमाल शायद प्रकृति का सबसे पुराना नियम है. गंध जीवों के बीच बातचीत का सबसे प्रबल माध्यम है. गंध का संचार अंधेरे में, उजाले में और हर तरह की बाधा के परे हो सकता है. और तो और, गंध वातावरण में लम्बे समय तक रहती है जिस से कि उसे छोड़ने वाले जीव के होने का एहसास लम्बे समय तक बना रहता है. मगर क्या फेरोमोने इंसानों में भी होते हैं? इस का जवाब हमें 1971 के एक नेचर साइंटिफिक आर्टिकल में मिलता है. 1971 में वैज्ञानिक मार्था मचक्लिंटॉक नाम की एक वैज्ञानिक ने 135 अमेरिकी कॉलेज छात्रा ओन के पीरियड्स शुरू होने की तिथियों की जांच की. ये सभी स्टूडेंट्स हॉस्टल में रहती थीं. कुछ अपने सिंगल रूम में और कुछ रूम शेयर करती थीं. लगभग आठ मासिक चक्रों की जांच के बाद ये पता चला की समय के साथ साथ रूममेट्स के मासिक चक्र समक्रमिक (synchronised) होने लगे. इस से ये अनुमान लगाया जा सकता है की जब औरतें एक साथ समय बिताती हैं तो उनमें जांच के द्वारा फेरोमोनल कम्युनिकेशन भी होता है और इसी कम्युनिकेशन की वजह से मासिक चक्र समक्रमिक हो जाता है. तब से औरतों में मासिक चक्र के समक्रमिक होने की कई साइंटिफिक ग्रुप्स ने पुष्टि की है. तब से ऐसी कई साइंटिफिक रिसर्च हो चुकी हैं जिन में मनुष्यों में फेरोमोनल कम्युनिकेशन के प्रमाण मिलते हैं. 2001 में न्यूरॉन जर्नल में छपे एक साइंटिफिक आर्टिकल में स्वीडन की इवांका साविक ने औरत के फेरोमोन से आदमी के दिमाग की गतिविधि में होने वाले परिवर्तन को दिखाया था. इन्होने positron emission tomography से 12 आदमियों और 12 औरतों के दिमाग का, सिंथेटिक एस्ट्रोजन सूंघते हुए स्कैन लिया. इस स्कैन में ये देखा गया की एस्ट्रोजन सूंघने से आदमियों के दिमाग के हाइपोथेलेमस (hypothalamus) में रक्त प्रवाह बढ़ गया, मगर औरतों के दिमाग में कोई परिवर्तन नहीं दिखा. हाईपोथेलेमस दिमाग का वो हिस्सा है जो हमारे नर्वस सिस्टम को एन्डोक्राइन सिस्टम (हार्मोनल सिस्टम, फंक्शनल रिएक्शन) से जोड़ता है. 2011 में फ्लोरिडा स्टेट यूनिवर्सिटी से मिलर और मैनर नाम के दो वैज्ञानिको ने अपनी रिसर्च में ये दिखाया की गंध से मनुष्यों में क्या प्रतिक्रिया होती है. इस काम में इन वैज्ञानिकों ने महिलाओं को 3 कमीज़ दीं. ये कमीज़ उन्हें अपने पीरियड्स के दिन और नॉर्मल दिन में पहनने थे. फिर ये कमीज़ें आदमियों को सुंघाई गई और उनके थूक का सैंपल लिया गया. जिन मर्दो ने पीरियड्स वाली कमीज़ को सूंघा था, उन में टेस्टोस्टेरोन ज़्यादा मात्रा में पाया गया. और तो और इन मर्दो ने इन कमीज़ों की गंध को सबसे अच्छा भी कहा. ये तो हुई शारीरिक स्थिति और सेक्स की बात. और मानसिक स्थिति का क्या? 2009 में स्टोनी ब्रूक यूनिवर्सिटी के पारदी और उनकी टीम ने अपनी रिसर्च में ये दिखाया की गंध के द्वारा मनुष्य एक दूसरे की मानसिक स्थिति भी पता कर सकते हैं. इस रीसर्च के तहत उन्होंने इमोशनली स्ट्रेस्ड लोगों के, व्यायाम करते हुए, पसीने के सैंपल लिए और इन सैम्पल्स को उन लोगों को सुंघाया गया जिन्हें इनके बारे में कोई जानकारी नहीं थी. पहले पहलू में, इन लोगों के दिमाग का MRI स्कैन लिया गया जिस से ये पता चला कि जिन लोगों ने इमोशनल स्ट्रेस वाले डोनर्स का सैंपल सूंघा था, उनके दिमाग की उन जगहों की गतिविधियों में बदलाव आया जहां इमोशनल सेंटर होता है. जिन लोगों ने नॉर्मल लोगों का पसीना सूंघा, उनके दिमाग में कोई परिवर्तन नहीं देखा गया. इस रीसर्च में ये भी दिखाया गया कि ये रिस्पांस ऐसा इसलिए है क्यूंकि डोनर्स में अलग अलग तरह के इमोशंस हैं.इन्होने ये भी देखा कि स्ट्रेस में जी रहे लोगों के सैम्पल्स सूंघने से सूंघने वाल लोग चेहरे देख के उनके जज़्बात समझने लगते हैं. 70 और 80 के दशक में टेस्टोस्टेरोन के भाई समझे जाने वाले एन्ड्रोस्टेनोन और एन्ड्रोस्टेनॉल ने काफी धूम मचाई. ये माना जाने लगा कि सुअर में पाए जाने वाले ये फेरोमोन मनुष्यों में भी हैं और केस रिसर्च में ये भी दिखाया गया की इनका इस्तेमाल मनुष्यों में सेक्सुअल पार्टनर और उनके साथ कम्पेटिबिलिटी का आंकलन करने के लिए होता है. मगर ये सब अनुमान ही रहे. कुछ भी पक्का नहीं कहा जा सका. इसी के चलते 90 के दशक में एन्ड्रोस्टेडियेनोन और एस्ट्रेनोल पे फोकस शिफ्ट हुआ. ये दोनों एस्ट्रोजन (जो कि गर्भवती औरतों में पाया जाता है) के रिश्तेदार मोलिक्यूल्स हैं. 90 के ही दशक में कुछ ऐसी कंपनियों में भी इजाफा हुआ जो ये दावा करती हैं कि वो इंसानी फेरोमोन बेस्ड परफ्यूम बेचती हैं. ह्यूमन फेरोमोन साइंस नामक एक कंपनी ये इत्र Natural Attraction, Inner Realm, Erox और Realm के ट्रेड मार्क के अंतर्गत बेचती है. यही नहीं PheromoneXS , Alpha Dream, Raw Chemistry, Nutra Champ, ऐसी कई कंपनियां और ट्रेड मार्क हैं जो ये दावा करते हैं कि वो ह्यूमन फेरोमोन बेचते हैं. विनीफ्रेड कटलर नाम के एक वैज्ञानिक की कंपनी एथीना इंस्टिट्यूट फोर वुमेन्स वेलनेस का तो ये दावा है कि उन्होंने वो एक फेरोमोन फ़ॉर्मूला पेटेंट कराया हुआ है जिसे सूंघने से मर्द औरत की तरफ आकर्षित होते हैं. ये कंपनी दो तरह के फॉर्मूले बेचती है. मर्दों और औरतों, दोनों के लिए. और तो और, गूगल कीजिये, कई प्रोडक्ट्स मिलेंगे जो कि ये सभी दावे करते हैं. लेकिन वैज्ञानिकों के अनुसार ये सभी दावे बिलकुल गलत हैं.

ये आर्टिकल हमारे लिए हमारी दोस्त रोहिणी ने लिखा है जो इज़रायल में बड़ी भारी वाली साइंटिस्ट हैं. अभी वहां की हीब्रू यूनिवर्सिटी ऑफ़ जेरुसलम में फेरोमोन्स पर ही रीसर्च करने में जुटी हैं.


जाते जाते, गुलज़ार का लिखा वो गाना जो इस आर्टिकल की शुरुआत में आया था. विनोद मेहरा और रेखा की फ़िल्म घर.

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