देश के सबसे बड़े बिजनेस हाउस के चेयरमैन पद से हटाए गए सायरस मिस्त्री पर लगातार बातें हो रही हैं. हर जगह अपनी-अपनी समझ के हिसाब से उन्हें हटाने के पीछे की संभावनाएं और आशंकाएं तलाशी जा रही हैं. लेकिन ये मामला उतना सनसनीखेज है नहीं, जितना इसे बनाया जा रहा है. हां, पेचीदा जरूर है. आइए देखते हैं.
जबराट लीडर रतन टाटा ने अभी जो काम किया है, लोग युगों तक याद रखेंगे!
ये कोई सनक में लिया गया फैसला नहीं है.

एक महीने पहले सायरस मिस्त्री एक रिपोर्टर से बातचीत में टाटा की खूबियां गिना रहे थे. कह रहे थे कि किसी एम्प्लाई का कंपनी से इज्जत के साथ बाहर होना हमारे टाटा की परंपरा रही है. जाहिर सी बात है, वो किसी दूसरे के बारे में बात कर रहे थे. लेकिन, इसी बीच उनकी टीम यानी टाटा संस की ग्रुप एग्जिक्यूटिव काउंसिल (GEC) के एक सदस्य ने भी कहा कि अगर टाटा को किसी को बाहर करना भी होता है, तो उसे डिग्निटी के साथ जाने का मौका दिया जाता है. टाटा में पिछले दो महीनों से जो कुछ भी रहा था, मिस्त्री उसे आंकने में नाकाम रहे और 21 अक्टूबर, शुक्रवार से पहले तक उन्हें या उनकी टीम के किसी भी सदस्य को भनक तक नहीं लगी कि मिस्त्री के साथ क्या होने वाला है. इस हफ्ते की शुरुआत में मिस्त्री टाटा के चेयरमैन नहीं रहे.
क्यों बाहर किए गए मिस्त्री

इस पर हर कोई अपने हिसाब से चीजें एक्सप्लेन कर रहा है, लेकिन इतने बड़े ग्रुप में जब इतना बड़ा फैसला लिया गया है, तो ये किसी सनक में तो नहीं लिया गया होगा. कंपनी के सोर्सेज का कहना है कि मिस्त्री कंपनी की व्यवसायिक उम्मीदों पर खरे नहीं उतर रहे थे. असल में टाटा की व्यवसायिक प्राथमिकता पैसा कमाने से कहीं ऊपर की रही है. 2018 में टाटा के 150 साल पूरे होने जा रहे हैं और 150 सालों में उसके फैसले देखने पर आप पाएंगे कि इस कंपनी ने पैसे कमाने से ज्यादा बिजनेस फैलाने पर फोकस किया.
मिस्त्री पर यही आरोप लग रहे हैं कि उनका पूरा फोकस पैसा कमाने पर लग गया. टाटा की जो कंपनियां और धंधे घाटे में जा रहे थे या ज्यादा मुनाफा नहीं कमा रहे थे, मिस्त्री उन्हें बेचने के पक्ष में थे और ये बात टाटा ट्रस्ट को बेहद नागवार गुजरीं. आखिरकार मिस्त्री बाहर हो गए.
टाटा संस और टाटा ट्रस्ट का क्या लोचा है
रतन टाटा और मिस्त्री का झोल समझने से पहले टाटा का स्ट्रक्चर समझना होगा. टाटा संस में जितने भी शेयर हैं, उनमें से 66% का मालिकाना हक टाटा ट्रस्ट के पास है. बचे हुए शेयर्स टाटा संस के बोर्ड सदस्यों, चेयरमैन और दूसरी संस्थाओं/अधिकारियों के पास हैं. इसी वजह से टाटा ट्रस्ट को बोर्ड और चेयरमैन से ज्यादा पॉवर मिलती है और इस ट्रस्ट के मुखिया रतन टाटा हैं. चार साल पहले जब सायरस मिस्त्री टाटा संस के चेयरमैन बनाए गए थे, तो वो हर फैसले से पहले रतन टाटा और ट्रस्ट की राय लेते थे. लेकिन एक साल बाद उन्होंने ऐसा करना बंद कर दिया.
चेयरमैन बनने के बाद मिस्त्री ने टाटा संस के मैनेजमेंट के सदस्यों में भी कोई बदलाव नहीं किया था. लेकिन एक साल बाद उन्होंने कई जगहों पर अपने मन के लोग बिठाए. जाहिर सी बात है कि इसमें कुछ भी गलत नहीं था. इतना बड़ा बिजनेस एंपायर चलाने के लिए नियंत्रण होना जरूरी है. टाटा की यही शिकायत है कि मिस्त्री नियंत्रण से बाहर जा रहे थे. मिस्त्री की शिकायत है कि उन्हें टाटा जितना बड़ा बिजनेस चलाने के लिए जरूरी आजादी नहीं दी गई. हालांकि, खुले तौर पर ये कहा जा रहा है कि मिस्त्री को टाटा के एथिक्स से जुड़े संघर्ष की वजह से हटाया गया है.
किन विवादित फैसलों की बात हो रही है
मिस्त्री को हटाए जाने के पीछे उनके कुछ फैसले हैं. इनमें से कुछ फैसले उन्होंने ले लिए थे, जबकि कुछ लेने की तैयारी में थे. टाटा ट्रस्ट और टाटा संस के कई बड़े अधिकारियों के मुताबिक इन फैसलों से वैश्विक स्तर पर टाटा की छवि खराब होती. आइए बताते हैं कौन से हैं ये फैसले:
1.
मिस्त्री का कहना है कि उनके मना करने के बावजूद उन पर दो एविएशन बिजनेस (विस्तारा और एयर एशिया इंडिया) में निवेश करने के लिए दबाव डाला गया. मिस्त्री के मुताबिक टाटा एयरलाइन सेक्टर के लिए बहुत पैशनेट है, लेकिन उनके हिसाब से ये फैसला फायदेमंद साबित नहीं होगा. इस मसले पर मतभेद थे.
2.
मिस्त्री टाटा स्टील यूके को बेचने के पक्ष में थे और उनके और टाटा के बीच अनबन का सबसे बड़ा कारण यही फैसला था. टाटा ने 2007 में कोरस ग्रुप का 12 अरब डॉलर में अधिग्रहण किया था. ये विदेश में किसी भारतीय कंपनी द्वारा किया गया सबसे बड़ा अधिग्रहण था, लेकिन जल्दी ही ये टाटा के लिए सिरदर्द भी बन गया. 2014 तक तो फिर सब ठीक रहा, लेकिन उसके बाद चीन का दबदबा बढ़ने के बाद टाटा को फिर इस धंधे से दिक्कत हुई. आखिरकार 2016 में इसे बेचने के लिए ग्राहक ढूंढा जाने लगा. इस मामले में टाटा ट्रस्ट का मानना है कि मिस्त्री ने बहुत जल्दी घुटने टेक दिए और इससे मार्केट में टाटा की छवि कमजोर हुई.
3.
टाटा ने बड़ी शान से वादा किया था कि वो महज एक लाख रुपए में भारत की जनता को चार पहिए पर घूमने का मौका देंगे. टाटा ने नैनो लॉन्च की, जो शुरुआती दिनों में अच्छे-खासे फीचर्स के साथ 1 लाख 20 हजार में आ जाती थी. वक्त के साथ इसकी कीमत इतनी बढ़ गई कि लखटकिया कहने लायक नहीं बची. कुछ दिनों बाद वो वक्त भी आया, जब टाटा का ये वेंचर घाटे में चला गया. मिस्त्री इसे भी बंद करने के पक्ष में थे, लेकिन टाटा की वैल्यूज यहां भी आड़े आ गईं.

4.
टाटा डोकोमो का मामला और भी पेचीदा है. जापानी कंपनी NTT डोकोमो ने 2008 में टाटा में 2.20 अरब डॉलर का निवेश किया था. तब खुद रतन टाटा चेयरमैन थे. डोकोमो की इस बिजनेस में 25 फीसदी हिस्सेदारी थी, लेकिन अब इसकी हालत बहुत अच्छी नहीं है. ऐसे में डोकोमो ने अलग होने की योजना बनाई. इस क्रम में टाटा को डोकोमो द्वारा निवेश की गई रकम का आधा हिस्सा वापस करना था, लेकिन RBI और सरकारी नियमों के मुताबिक कोई कंपनी एक बार में इतना पैसा देश से बाहर नहीं दे सकती. डोकोमो ने टाटा को कोर्ट में भी घसीटा था, जहां वो जीती भी. अब टाटा पैसे न दे पाए, ये बात इंटरनेशनल बिजनेस में बहुत मायने रखती है. मिस्त्री यहां पर कोई समाधान नहीं दे सके.
5.
टाटा पॉवर द्वारा वेल्स्पन की अल्टरनेटिव एनर्जी वाली संपत्ति का अधिग्रहण भी बड़ा मामला रहा. टाटा पॉवर पहले से कमाई की उम्मीदों के मुताबिक प्रदर्शन नहीं कर रही है, लेकिन मिस्त्री ने टाटा ट्रस्ट को विश्वास में लिए बिना इसे मंजूरी दे दी. इस बात पर टाटा ट्रस्ट के कई बड़े सलाहकारों की भौंहें तन गईं कि एक तरफ मिस्त्री कर्ज कम करने के लिए वेंचर्स बेचने की सलाह दे रहे हैं और दूसरी तरफ उन्होंने कम मुनाफे वाले वेंचर में ज्यादा निवेश की मंजूरी दे दी.
6.
इन सबके अलावा इंडिया होटल्स और इंडोनेशिया में टाटा पॉवर की खदानों और टाटा मोटर्स वाले वेंचर को बेचने और इनमें बदलाव के मसले पर भी मिस्त्री की सहमति थी. उनके मुताबिक टाटा पर बहुत कर्ज है, जिसे कम मुनाफे वाले इन वेंचर्स को बेचकर कम किया जा सकता है, लेकिन टाटा ट्रस्ट का यही मानना है कि मिस्त्री बहुत जल्दी गिव अप कर रहे हैं और उनका फोकस सिर्फ पैसे कमाने पर है.
इन उदाहरणों से साफ समझा जा सकता है कि आखिर सायरस मिस्त्री, रतन टाटा और टाटा ट्रस्ट में किस तरह की समस्या थी.
रतन टाटा और सायरस मिस्त्री के रिश्ते
चेयरमैन पद पर नियुक्ति के एक साल बाद सायरस ने जैसे बदलाव किए थे, उनसे टाटा संस और टाटा ट्रस्ट, दोनों के कई लोग नाखुश थे. कंपनी के कई पुराने लोगों ने रतन टाटा से कई बार इसकी शिकायत भी की, लेकिन रतन ने इस पर कोई ध्यान नहीं दिया. लेकिन कुछ वक्त बीतने के बाद उन्होंने इस पर ध्यान देना शुरू किया. जब मिस्त्री के हटाए जाने की खबर आई, तो कॉरपोरेट कम्युनिटी में सन्नाटा था. 29 दिसंबर, 2012 को हैंडओवर के समय टाटा ने मिस्त्री को 'अपना आदमी' (his own man) कहा था.
बताया ये भी जाता है कि मिस्त्री की नियुक्ति के एक साल तक दोनों के बीच रिश्ते बहुत अच्छे रहे. तब तक रतन ने भी मिस्त्री के हर फैसले का समर्थन किया. एक वक्त तो ऐसा आ गया था, जब मिस्त्री को टाटा ट्रस्ट में जगह दिए जाने की तैयारी शुरू हो गई थी. माना गया कि रतन के पूरे रिटायरमेंट के बाद मिस्त्री को ट्रस्ट का भी मुखिया बना दिया जाएगा और इसी के लिए रास्ता बनाया जा रहा है. टाटा ट्रस्ट के मुताबिक इसके कुछ समय बाद मिस्त्री ने अपने फैसले में ट्रस्ट को शामिल करना बंद कर दिया. उन्होंने कई बड़ी नियुक्तियां कीं, कई फैसले लिए. लेकिन अकेले. यही बात उनके खिलाफ चली गई.
कैसे बाहर किए गए मिस्त्री
सायरस मिस्त्री टाटा के चेयरमैन थे. जाहिर सी बात है कि उन्हें उनके पद से हटाना आसान नहीं रहा होगा. बोर्ड की जिस मीटिंग में उन्हें हटाने का फैसला लिया गया, उस मीटिंग में 6 लोग मिस्त्री को हटाने के पक्ष में थे. 2 लोग आए नहीं थे. मिस्त्री टाटा की छवि को नुकसान पहुंचा रहे थे और उन्हें हटाना मुमकिन हुआ टाटा ट्रस्ट की मदद से. टाटा ट्रस्ट के पास टाटा संस के कुल 66% शेयर हैं, लेकिन टाटा ग्रुप के आर्टिकल ऑफ एसोसिएशन की वजह से इसकी ताकत शेयर होल्डिंग से कहीं ज्यादा है.
टाटा संस के आर्टिकल ऑफ एसोसिएशन को पहली बार जेआरडी टाटा के समय मॉडिफाई किया गया था, जिससे कंपनी पर ट्रस्ट की पकड़ मजबूत हो सके. फिर जब मिस्त्री की नियुक्ति हुई, तो आर्टिकल में एक बार फिर बदलाव किया गया, ताकि सर्वेसर्वा ट्रस्ट ही रहे. इस आर्टिकल के मुताबिक जब तक ट्रस्ट के पास 40 फीसदी शेयर रहेंगे, तब तक उनके पास एक तिहाई डायरेक्टर्स नॉमिनेट करने का अधिकार रहेगा और डायरेक्टर्स के पास वोटिंग के जरिए टाटा संस के चेयरमैन को नियुक्त करने या हटाने का अधिकार होगा. इस हिसाब से रतन टाटा जिंदगी भर टाटा संस की ड्राइविंग सीट पर रहेंगे.
मिस्त्री का टाटा और शपूरजी पलोनजी वाला रिश्ता
टाटा संस का चेयरमैन होने के साथ-साथ मिस्त्री टाटा में शपूरजी पलोनजी के 18.4 फीसदी शेयरों के मालिक भी थे. शपूरजी पलोनजी की टाटा में लंबे समय से हिस्सेदारी रही है. इस शेयरों के बूते मिस्त्री अकेले इतने शेयर रखने वाले इकलौते आदमी थे. 2006 में मिस्त्री के पिता टाटा से रिटायर हुए थे, जिसके बाद से वो इन शेयरों के मालिक बन गए थे. मिस्त्री इससे पहले भी टाटा की कई अलग-अलग कंपनियों के डायरेक्टर बोर्ड में रह चुके हैं. साथ ही, रतन टाटा के सौतेले भाई नोएल की शादी भी मिस्त्री की बहन एलो से हुई है.
टाटा से आखिरी विवादित निष्कासन
मिस्त्री से पहले टाटा में इकलौता विवादास्पद निष्कासन 1991 में हुआ था. रतन टाटा के कंपनी संभालने के कुछ साल बाद ही रूसी मोदी, दरबारी सेठ, अजीत केरकर और नानी पालखीवाला को कंपनी से बाहर का रास्ता दिखाया गया था. इन्हें बाहर करने के लिए कंपनी से रिटायरमेंट की उम्र कम कर दी गई थी और इनके जाने के बाद टाटा संस ने रिटायरमेंट एज फिर बढ़ा दी थी.
टाटा के किसी भी चेयरमैन के कार्यकाल के हिसाब से मिस्त्री का कार्यकाल सबसे छोटा, सिर्फ चार साल का रहा. इससे पहले सबसे छोटा कार्यकाल एन सकलटवाला का था, जो 1932 से 1938 यानी 6 साल तक टाटा के चेयरमैन रहे थे. रोचक बात ये है कि मिस्त्री से पहले वो टाटा के इकलौते ऐसे चेयरमैन थे, जिनके नाम के आगे 'टाटा' नहीं लगा था.
एक महीने पहले मिस्त्री ने कहा था कि टाटा किसी व्यक्ति या बिजनेस से अपना मुंह तब मोड़ती है, जब कंपनी के पास कोई चारा नहीं बचता है. ये बात उनके समर्थन और उनके विरोध, दोनों में फिट बैठती है. इस समय मिस्त्री के पास कानूनी कार्रवाई का विकल्प खुला हुआ है, लेकिन कहा यही जा रहा है कि लो-प्रोफाइल रखने वाले सायरस मिस्त्री ऐसा कोई कदम नहीं उठाएंगे. मिस्त्री को हटाना टाटा के लिए सही फैसला है या गलत, ये तो वक्त ही बताएगा.










