शरीर जागा, दिमाग जाग गया. लेकिन आंखें सो रही थीं. आंखें बंद किए हुए ब्रश की खोज में निकल पड़ा. अब इसमें जिंदबाज जहाजी या जैक स्पैरो वाले एडवेंचर न खोजो. ब्रश कर के चाय वाय पेट में डाली. चाय के साथ ही एक सूचना मिली कि डॉक्टर गुप्ता खतम हो गए. पिता जी के सहपाठी थे. 61 साल की उमर हो गई थी लेकिन दोस्ती कायम थी. पढ़ने लिखने में तेज थे तो BAMS तक कर लिया. ये डाक्टरी की कोई डिग्री है. इससे ज्यादा मुझसे न पूछना. आयुर्वेद की डिग्री थी. लेकिन जिंदगी भर प्रैक्टिस एलोपैथ की करते रहे गांव में. अगर वो प्रैक्टिस न करते तो यहां 20 किलोमीटर तक कोई अस्पताल नहीं है. न साधन मरीज लाने ले जाने का. तो भैया उल्टी टट्टी में ही आदमी अदमपुर की राह ले लेता. अगर वो इलाज जैसा कुछ न कर देते. एक और काम था उनका. राम नाम का प्रचार. राजनैतिक नहीं, आध्यात्मिक वाला. सबसे सीताराम करते थे. इत्ते बड़े धार्मिक थे कि हीरो हिरोइन के फोटू वाला कैलेंडर घर में दिख जाए तो फाड़ देते थे. पक्के प्रोफेशनल रामनामी आदमी थे. हर महा शिवरात्रि बाल भंडारा कराते थे. जब तक मैं गांव में रहा, कभी भंडारा मिस नहीं किया. हमसे उनका कनेक्सन ये था कि जब हमारा बियाह हुआ तो हम लाखैरा थे. एकदम उठाईगीर. उन्होंने बड़ी मदद करी थी हमारी. वो शायद पहले आदमी थे मेरी जानकारी में, मरने के बाद जिसकी सच्ची तारीफ हो रही थी. सूचना मिलते ही तय हो गया कि हमको उनके दाह संस्कार में जाना है. किसी जान पहचान वाले की मौत की खबर मिलने पर मेरा मन अजीब सा हो जाता है. हालत एकदम सिद्ध पुरुषों सी हो जाती है. सुख-दुख, लोभ मोह माया क्रोधादि से मुक्त टाइप. ये होता है किसी अनजाने डर के चलते. ऐसा सोचते हुए लगता है कि हम फ्यूचर का कित्ता प्लान किए बैठे हैं. न जाने कब सारे प्लान पर जला मोबिल पुत जाए. तो हम पहुंचे उनके घर. वहां से 'मिट्टी' ले जाई जा चुकी थी. किसी अनजाने बाग की तरफ. अनजाना क्योंकि मैंने सिर्फ फोन पर इतना सुना था "बगिया लइ जाय रहे हैं, नहरिया के पास वाली." स्मार्टफोन ने गदहा बना रखा है हमको. GPS पर लोकेशन ट्रेस करने की आदत ने दिमाग का चक्रतीर्थ बना रखा है. यहां साला कउन GPS का अब्बा बइठा है कि हमको नहरिया के पास वाली बगिया तक पहुंचा देगा. तो सदियों पुरानी पूंछने की परंपरा का पालन करते हुए हम पहुंच गए. रास्ते में बाइक लेके घुसड़ने से बचे, ये न बताएंगे. नहीं तो आपको हमारी बाइक राइडिंग स्किल पर कतई शक होने लगेगा. पहुंचे वहां तो देखा 'मिट्टी' को नहलाने की शुरुआत हो चुकी है. हमारे दिमाग में उस वक्त वही खयाल आ रहे थे जिनका जिक्र ऊपर किया. मन में अनदेखे भविष्य के बतासे फूट रहे थे. सोचा था कि घर जाते ही पत्नी को अपने मोबाइल का पैटर्न लॉक बता दूंगा. सारी मैसेज हिस्ट्री डिलीट करके. ATM का पिन भी. और ये भी कि अगर मैं किसी दिन बिना बताए धोखा देकर दुनिया से कूच कर जाऊं तो आगे बेहतर जिंदगी के लिए क्या करना है, ये टिप्स भी देने हैं. हालांकि घर लौटने के बाद बिना नहाए किचन में घुसने, चाय छान के पीने और बिटिया को दुलार करने पर माता जी की तरफ से जो हल्ला मचा. उसमें हमारा सब रमझल्ला दब गया. प्लान खूंटी पर टंग गए. मिट्टी वाले उतरे कपड़ों के साथ. उस कांय कांय में दिमाग का जितना फ्यूज उड़ने से बच गया था. सब समेट कर लिख रहा हूं.हमको पता था कि हम यहां सिर्फ अपने नैतिक कर्तव्य का निर्वाह करने तो आए नहीं हैं मिट्टी में. इसका सीधा प्रसारण भी हमको लिखना है. तो हम हर वो बात नोटिस कर रहे थे जो अगली कई सदियों तक नहीं बदलने वाली हैं. जैसे- लाश को नहलाते वक्त तमाशाइयों की झल्लाऊ बकैती. डॉक्टर साहब का एक बेटा और भतीजा. नहलाने के बाद उनको कफन लपेट रहे थे. अब उसको कैसे लपेटना है इसको लेकर वहां मौजूद विद्वानों में मतभेद था. हर फोल्ड के साथ एक अनौपचारिक राय गिर जाती थी. लाश को दाईं करवट लिटा कर कफन लपेटना शुरू किया तो बड़ी और सफेद मूंछ वाले एक बुढ़ऊ- हमए हियां तौ अइसा हुवत नहीं. कफ्फन दहिनी करवट से कहूं पहिरावा जात है? जब तक उनकी बात पर संज्ञान लेकर दिशा निर्देश जारी किए जाएं, कफन लपेट गया. दादा अगली राय खोजने लगे बगल में झांक कर. पैरों के पास कफन का कपड़ा आधा फीट बाहर निकला था. विद्वानों पर गाज गिर गई. ये कपड़ा यहां निकला कैसे रह गया. उस पर हर निरहू घुरहू की प्रतिक्रिया आ रही है. कुछ बुजुर्गों को ये मालूम है कि उनके आदेश पर अमल नहीं होना, फिर भी दिए पड़े हैं. दो चार ऐसे हैं जिनकी बात वो दोनों भाई बहुत जज्ब करते हुए सुन और मान रहे हैं. आवाजें कुछ ऐसी आती हैं- 1. वहिका उठाय के गोड़े पा लपेटि दियो. 2. थ्वारा चीरा लगाय के वतनेन पा बांधि देओ सारे का. 3. वही मा से तागा निकारौ तनिक याक. औ कसि के बांधौ. 4. भाई कफ्फन निकरा तौ न रहै का चही देखौ. 5. परा रहै देओ सारे का जइसे है वइसेन. 6. जउनु करै का हुवै जल्दी करौ. टैम बहुतु ह्वै रहा है. दैवा चढ़ा है. पानी वइरि दिहिस तो अली अली करत रहि जइहौ सब जने. इस पूरे हल्ले के बीच दोनों भाई बड़ी बेचैनी से एक बार उस निकले हुए टुकड़े की गांठ खोलते. कभी वापस लपेट कर बांध देते. मुझे बेचारों पर बड़ा तरस आता था. ऐसे मौके पर फंसे हैं बेचारे कि मुंह फाड़ के गरिया भी नहीं सकते. अगर यहीं कोई और मौका होता तो कहते "आव सारेव नानी** बांधि लेओ बत्ती बनाय के औ डारि लेओ अपनी**मा." लेकिन आज फंस गए हैं तो निभाना पड़ रहा है. फिर भैया वही बतकही चिता सजाने में. चार ठो खुंटरा गाड़ दिए और बीच में रख दी लकड़ी. अब पहले तो इस मसले पर एका नहीं बन रहा कि खूंटे हरी लकड़ी के गड़े है. बताव, हरी लकड़ी है ससुरी. महराज हमसे कहिन होतीं. वह सेंदुरिया आम झुरान खड़ा है. चहै जेतनी काटि लउतीं. तुम हौ खांसे चूतिया. हरे खुंटरा लागि हैं तो तुम्हरी नानी कै काजर काहे. ई देर तक थाम्भे रहिहैं बाकी लकड़िन का. खूंटे तो लग ही गए थे. इसलिए उन पर सिर्फ बहस हो सकती थी. बदलाव नहीं. बदलाव की गुंजाइश उसमें थी, जो लकड़ियां ऊपर रखी जा रही थीं. हम कहिति है कि मोटकई लकड़ी पच्छू कइती धरौ- मूंछ और बालों में डाई कराए हुए कोई रिश्तेदार. अबहीं हवा चली तौ सब बिल्टि जाई. जउन यह सहरन कस बिल्डिंग ठाढ़ कइ रह्यो है, मचमचाय के बइठ जाई- बुजुर्गी की गलतफहमी पाले 20 साल के भग्गू पंडित हां हां बस हियैं धरौ हियां. हां बअअअअअअअस- जिनको पता है उनकी बात कोई सुन नहीं रहा. चिता जल उठी. आगे कम से कम दो घंटे का खेला है. जब खोपड़ी फोड़ी जाएगी. हम दो लोगों को लेकर एक सुरक्षित जगह पर बैठ गए. जनसैलाब 4-4 6-6 के गोल में बंट गया. बैठ गया. कोई पेड़ के नीचे. कोई बादल छाए सूरज के नीचे. बहुत दिन बाद मौका मिला है साथ बैठ के पंचायत करने का. बातों की जलेबियां छन रही हैं. जो गैंग आम के पेड़ के नीचे बैठा है. उसकी औसत आयु है 30 साल बात हो रही है- मोदिया अच्छा काम कइ रहा है. जेतनी सड़कै फड़कै वह दुइ साल मा बनाय दिहिस, कांगरेस के औकाति नहीं परी कि साठि साल मा बनाय दियै. थ्वारा दिक्कत यहिकै परि जात है कि उनकै सादी बियाव नहीं भा है. दूसरी आवाज- अबे लप्फूस यहै तो मजा है. सादी होइगै होतै तो हमार सिंघट्टा एतना काम करि पउतीं. गेंहूं खेत की मेड़ पर बैठे हुए गैंग की औसत आयु है 20 से 22 साल. उसमें बड़ी बारीक, बहुत महीन मुस्कान लिए हुए लौंडे बतिया रहे हैं- मोबाइल घर मा बाप छोरि लिहिन है. औ सब बीएफ काटि दिहिन. गिराय के मरबो भएं. अब हम दूसर लेबै. तुम बिरजेस से कहि दिहौ कि हमका वहिमा भराय के कोहू अउरे का दियै का है. औ सुनौ, जानवर वाली डरायो. औ जेहिमा तमाम ले रहत हैं. दूसरी आवाज- झटिहा सारे तुम खुद्दै जाय के डराय काहे नहीं लेतेव. जो गैंग सूखी हुई जामुन के नीचे बैठा है इसमें एक आदमी फुल मनोरंजन का साधन है दूसरों के लिए. सेक्स रोगी है. बीवी दो महीने पहले किसी और के साथ चली गई है. जिससे इसको काफी तकलीफ है. दोबारा घर बसाना चाहता है. यही बात सबसे एंटरटेनिंग है. सब मिल कर उसका रिश्ता तय करा रहे हैं. कोई भवानिन की नंगी सिर्रिन(पगलिया) का नाम सजेस्ट कर रहा है. कोई 80 साल की विधवा कंकाला बुवा के साथ गांठ जोड़ रहा है. इधर गांव के प्रधान जी बैठे हैं. नव निर्वाचित. उनके लग्गू भग्गू तेल लगा रहे हैं. किसी को पेंसन बंधानी है. किसी को सरकारी नल की पाइप मारनी है. किसी को खड़ंजे में आया ईंटा पार करना है. किसी को मनरेगा के जॉब कार्ड में नाम चढ़वाना है. परधान जी सबको बहुत मीठी लिसलिसी गोली दे रहे हैं. ये गोल है 50 साल के करीब लोगों का. एक जने के सपूत दिल्ली चले गए हैं. किसी अफसर की कार चलाते हैं. बुढ़ऊ बता रहे हैं कि लौंडा दिल्ली जाकर पैसा छापने की मशीन बन गया है. दूसरे मुंह लटकाए दुखड़ा रो रहे हैं. "केतना पइसा फूंक दीना सारेन पा लेकिन कउनेव लायक नहीं निकरें. मंझिलकए का कहित रहेन छोटक्के लगे डाक्टरी सिखि लेओ. लेकिन वी लागि गे हैं लउंडियाबाजी मा. सरीर देखौ कसक बनी जात है. जानि परत अन्न पानी से भेंट नहीं हुवत. बड़कए तौ जान परत के हमका बेंचि खइहैं तबै राम का नाव लेहैं." मृतक के बड़े भाई के साथ आ बैठे हैं. बड़ी मूंछ वाले दादा. हमारे जस्ट बगल. कोई संत प्रतीत होते हैं. बस दाढ़ी की कसर है. बातें उनकी ऐसी हैं- देखि लेओ. छिन मा हुवै आन कै ताना. का कोऊ कोहू का रोकि पावा है. कि हमरे तुमरे बस कै है. जउन करम कमाई हियां करिहौ. वहै साथे जाई. बाकी पिंजड़ा हियैं रहि जाई. देखौ डाक्टर केतने आराम से गएं. राति मा बताइन कि कमर मा बहुत तेज दरद है. जब तक दुरगेस भैया टोवैं टावैं तब तक राम कै नाम लइ लिहिन. यहि तिना कै मउत संत महतिमन का मिलत है. दाग की प्रथा सिर पर उठाए आदमी निपट अकेला है. चिता से थोड़ी दूर बैठा. घुटनों पर सिर रखे कुछ सोचता. शायद मन ही मन गरियाता कि साले इतने लोग आए हैं. दो चार मेरे पास आकर नहीं बतियाते. गांठ जोड़े बैठे हैं. फिर थोड़ी ही देर में वो हरा वाला बांस लेकर उठ खड़े होते हैं. खोपड़ी पर मार कर अंतिम क्रिया पूरी करने के लिए. इसके बाद सब लोग हाथ में लकड़ी उठाते हैं. रस्म का आखिरी चरण. सूखी नीम के तने से पापड़ जैसी लकड़ी झांक रही है. होशियारों की नजर में चढ़ गई है. दो दो चार चार इंच के टुकड़े लेकर सब मुस्कान और अगले को भी ले लेने की सलाह बिखेरते चले जा रहे हैं. एक आदमी और है. जो अपनी भुजाओं से सोचता है. दिमाग की कमी है. उसके पास लाठी है. किसी ने उकसा दिया कि "काहे नहीं लाठी के हूरा से दुइ चार पपरा निकार देतेव." ये लाइन उसके लिए वेद वाक्य हो गई. जुट गया पट्ठा. तरह तरह से मुंह बनाते हुए पापड़े खोद रहा और सबको बांट रहा. लगता था कर्ण या दधीचि की आत्मा घुस गई है उसके अंदर. देखते देखते सूखे नीम के पेड़ को नंगा कर दिया. आस पास की सारी सूखी लकड़ी चिता के साथ भस्म हो गई. अपने नैतिक उत्तरदायित्व का निर्वाह करके हम बढ़ चले वापस खड़ंजे पर खड़ी अपनी बाइक की तरफ. वहां थोड़ी सी डंडियां दिख रही थी मोबाइल में. लगा कि यहां नेट चल सकता है. पैकेट डाटा ऑन करके मैंने सब नोटिफिकेशन चेक कर डाले.
दाह संस्कार देख कर बोले, वाह! संस्कार हों तो ऐसे
छुट्टी लेकर गांव गए थे हम. वहां एक नॉर्मल सुबह थोड़ी सैड हो गई जब पता चला कि गांव में 'मिट्टी' हो गई है. उस दाह संस्कार में अपना जो एक्सपीरिएंस रहा वो पढ़ो.
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फोटो - thelallantop
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