अगर आप भी उन लोगों में से हैं जिन्हें लगता था कि सुप्रीम कोर्ट द्वारा इलेक्टोरल बॉन्ड पर बैन लगाने के बाद पार्टियों को मिलने वाले चंदे का खेल खत्म हो गया है, तो शायद आप थोड़े गलत हैं. राजनीति में पैसा बहना कभी बंद नहीं होता, बस उसका 'रास्ता' बदल जाता है.
'इलेक्टोरल बॉन्ड' तो गया, लेकिन चंदे का धंधा अब नए लिफाफे में लौट आया है!
Electoral Trust vs Electoral Bond: चुनावी चंदे का नया अड्डा बने इलेक्टोरल ट्रस्ट! जानिए पिछले 5 साल में बीजेपी, कांग्रेस और टीएमसी को इस रास्ते से कितने करोड़ मिले. क्या है प्रूडेंट ट्रस्ट का राज और बॉन्ड बंद होने के बाद कैसे बदल गया चंदे का भूगोल? क्या आप चाहते हैं कि मैं उन टॉप 10 कंपनियों की लिस्ट तैयार करूँ जिन्होंने इस साल सबसे ज्यादा चंदा दिया है?


आज हम बात करेंगे उस रास्ते की जिसे 'इलेक्टोरल ट्रस्ट' (Electoral Trust) कहते हैं. ये कोई नई चीज नहीं है, लेकिन बॉन्ड के जाने के बाद अब यही चर्चा के केंद्र में है. चलिए, इसे आसान भाषा में समझते हैं.
क्या है ये इलेक्टोरल ट्रस्ट का माजरा?सबसे पहले बेसिक बात. इलेक्टोरल ट्रस्ट एक तरह की 'नॉन-प्रॉफिट कंपनी' होती है. इसे आप एक ऐसे 'मिडलमैन' या बिचौलिए की तरह समझ सकते हैं जिसका काम है कॉरपोरेट घरानों (बड़ी कंपनियों) से पैसा लेना और उसे राजनीतिक दलों को बांट देना.
इसे भारत सरकार ने साल 2013 में नोटिफाई किया था. उस वक्त यूपीए (UPA) की सरकार थी. मकसद ये बताया गया था कि चंदा देने की प्रक्रिया में थोड़ी पारदर्शिता (transparency) आए.
अब आप सोचेंगे कि कंपनियां सीधे पार्टी को पैसा क्यों नहीं दे देतीं? देखिए, जब कोई कंपनी सीधे किसी पार्टी को चेक काटती है, तो उसके बही-खातों में सीधे उस पार्टी का नाम आता है.
कई बार कंपनियां अपनी पहचान छिपाना चाहती हैं या ये दिखाना चाहती हैं कि वो किसी एक विचारधारा से नहीं जुड़ी हैं. बस यहीं काम आता है इलेक्टोरल ट्रस्ट.
काम की बात: इलेक्टोरल ट्रस्ट का मुख्य काम चंदा इकट्ठा करना और उसे पार्टियों को डोनेट करना है. आयकर अधिनियम 1962 के नियम 17CA के मुताबिक एक ट्रस्ट कई कंपनियों से पैसा ले सकता है और कई पार्टियों को दे सकता है.
इलेक्टोरल बॉन्ड बनाम इलेक्टोरल ट्रस्ट: असली फर्क क्या है?यही वो सवाल है जो आज की पीढ़ी और जागरूक वोटर समझना चाहते हैं. इलेक्टोरल बॉन्ड (जो अब बंद हो चुके हैं) और इलेक्टोरल ट्रस्ट में जमीन-आसमान का अंतर है. इसे इस टेबल के जरिए समझिए,
| फीचर | इलेक्टोरल बॉन्ड (अब अवैध) | इलेक्टोरल ट्रस्ट (अभी लागू) |
| पहचान | पूरी तरह गुप्त (सिर्फ बैंक जानता था) | पारदर्शी (चुनाव आयोग को नाम बताने होते हैं) |
| कौन खरीदता था | कोई भी व्यक्ति या कंपनी | मुख्य रूप से कंपनियां और कुछ व्यक्ति |
| रिपोर्टिंग | पार्टियों को डोनर का नाम बताने की जरूरत नहीं थी | ट्रस्ट को बताना पड़ता है कि किससे कितना लिया और किसे कितना दिया |
| माध्यम | स्टेट बैंक ऑफ इंडिया (SBI) के जरिए | रजिस्टर्ड ट्रस्ट के जरिए |
सोर्स: Association for Democratic Reforms (ADR)
सीधे शब्दों में कहें तो बॉन्ड 'अंधेरे का सौदा' था, जबकि ट्रस्ट में कम से कम ये पता चलता है कि किस कंपनी ने किस ट्रस्ट को पैसा दिया और उस ट्रस्ट ने आगे किस पार्टी की झोली भरी.
किसे मिला कितना हिस्सा? पिछले 5 साल का 'महा-हिसाब'अब आते हैं सबसे जरूरी हिस्से पर-पैसा गया किसके पास? एसोसिएशन फॉर डेमोक्रेटिक रिफॉर्म्स (ADR) और चुनाव आयोग के आंकड़ों को देखें, तो एक बड़ी तस्वीर साफ होती है. इलेक्टोरल ट्रस्ट के जरिए आने वाले चंदे में 'असमानता' काफी ज्यादा है.
नीचे दी गई टेबल प्रमुख पार्टियों को पिछले 5 वित्तीय वर्षों (FY 2020-21 से FY 2024-25 तक) में इलेक्टोरल ट्रस्टों से मिले चंदे का मोटा-माटी (अनुमानित) ब्यौरा देती है,
| राजनीतिक दल | पिछले 5 साल का अनुमानित हिस्सा (ट्रस्ट के जरिए) | मुख्य ट्रेंड |
| बीजेपी | 5,500 करोड़ रुपये से ज्यादा | कुल ट्रस्ट फंडिंग का लगभग 75% से 82% हिस्सा |
| कांग्रेस | 550 करोड़ रुपये से ज्यादा | वित्त वर्ष 2024-25 में इसमें उछाल आया (लगभग 298 करोड़ रुपये) |
| तृणमूल कांग्रेस | 250 करोड़ रुपये से ज्यादा | पिछले 2 सालों में ट्रस्ट के जरिए चंदे में भारी बढ़ोतरी |
| समाजवादी पार्टी | 30 से 50 करोड़ रुपये | मुख्य रूप से क्षेत्रीय और कुछ राष्ट्रीय ट्रस्टों से सीमित चंदा |
| लेफ्ट दल | शून्य या नहीं के बराबर | वामपंथी दल आमतौर पर कॉरपोरेट या ट्रस्ट फंडिंग से बचते हैं |
सोर्स: ADR Annual Reports and ECI Contribution Data
ये आंकड़े डेटा ADR की वार्षिक रिपोर्टों का विश्लेषण है. इसमें हालिया वित्त वर्ष (2024-25) में बीजेपी का हिस्सा बढ़कर 82% तक पहुंच गया है, जो इलेक्टोरल बॉन्ड बंद होने के बाद का 'पोस्ट-बॉन्ड विंडफॉल' माना जा रहा है.
ये काम कैसे करता है? (मैकेनिज्म समझिए)मान लीजिए एक बड़ी कंपनी है 'X लिमिटेड'. उसे राजनीति में 100 करोड़ रुपये का चंदा देना है. अब वो सीधे किसी पार्टी के पास जाने के बजाय एक रजिस्टर्ड 'इलेक्टोरल ट्रस्ट' के पास जाएगी. कंपनी X ट्रस्ट को पैसा देगी. अब ये ट्रस्ट उस पैसे का कम से कम 95% हिस्सा वित्त वर्ष खत्म होने से पहले अलग-अलग राजनीतिक दलों को बांट देगा.
चुनाव आयोग के नियम ये है कि ट्रस्ट अपने पास आए कुल चंदे का सिर्फ 5% हिस्सा ही अपने प्रशासनिक खर्च के लिए रख सकता है. और सबसे जरूरी बात-साल के अंत में ट्रस्ट को चुनाव आयोग (ECI) को एक रिपोर्ट देनी होती है, जिसमें लिखा होता है कि किस कंपनी ने हमें कितना दिया और हमने किस पार्टी को कितना दिया.
बड़े खिलाड़ी: कौन है चंदे का 'बेताज बादशाह'?जब हम इलेक्टोरल ट्रस्ट की बात करते हैं, तो एक नाम सबसे ऊपर आता है-प्रूडेंट इलेक्टोरल ट्रस्ट (Prudent Electoral Trust). यह भारत का सबसे अमीर ट्रस्ट है. वित्त वर्ष 2024-25 में इसने अकेले 2,668 करोड़ रुपये से अधिक का चंदा बांटा.
| इलेक्टोरल ट्रस्ट का नाम | प्रमुख डोनर (कंपनियां) | मुख्य लाभार्थी |
| प्रूडेंट (Prudent) | एयरटेल, आर्सेलर मित्तल, डीएलएफ, जेएसडब्ल्यू स्टील | बीजेपी, कांग्रेस, बीआरएस, आप |
| प्रोग्रेसिव (Progressive) | टाटा ग्रुप की कंपनियां | बीजेपी, कांग्रेस |
| समाज (Samaj) | आदित्य बिड़ला ग्रुप | बीजेपी, कांग्रेस, बीजेडी |
सोर्स: Financial Express / ADR Data Analysis
क्या इसमें भी कोई 'लूपहोल' या झोल है?हां, पेच यहां भी है. इलेक्टोरल ट्रस्ट में सबसे बड़ी दिक्कत 'वन-टू-वन मैपिंग' की है. इसे 'ब्लेंडर' की तरह समझिए जहां 10 कंपनियों का पैसा मिलकर एक हो जाता है और फिर पार्टियों को बंटता है.
इससे ये बताना मुश्किल होता है कि किस विशिष्ट कंपनी का पैसा किस विशिष्ट पार्टी की जेब में गया. आलोचक इसे 'लेयरिंग' कहते हैं, जो पारदर्शिता को थोड़ा धुंधला कर देती है.
"बॉन्ड तो गया, पर हिसाब जारी है"इलेक्टोरल बॉन्ड का अंत एक बड़ी जीत थी क्योंकि वो पूरी तरह 'अंधेरे' में था. इलेक्टोरल ट्रस्ट कम से कम 'उजाले' में है. यहां डोनर के नाम सार्वजनिक हैं. हालांकि, 82% चंदा एक ही पार्टी को मिलना लोकतंत्र के 'लेवल प्लेइंग फील्ड' पर सवाल तो उठाता ही है.
याद रखिये, जागरूक नागरिक वही है जो ये देखे कि उसकी सरकार की नीतियों पर किसका प्रभाव है. चुनाव आयोग की वेबसाइट पर ये आंकड़े सबके लिए खुले हैं.
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