तारीख़, 21 नवंबर 2023.
जगह, इज़रायल के तेल अवीव का किरया मिलिटरी बेस.
घड़ी की सुई 02 का कांटा पार करने वाली थी. मगर लोगों की आंखों से नींद ग़ायब थी. ये हाल सिर्फ़ किरया का नहीं था, पूरी दुनिया की सांस अटकी थी. तभी एक ख़बर फ़्लैश हुई, Israel’s Cabinet approves the much-awaited hostage deal
यानी, इज़रायल ने बंधकों को छुड़ाने वाली बहुप्रतीक्षित डील पर मुहर लगाई
इज़रायल-हमास में बड़ी डील, जंग खत्म?
हमास को खत्म करना ही इज़रायल की सेना का मकसद है


इस पर इज़रायल के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू का बयान आया. वो बोले, ये सही फ़ैसला था. लेकिन…
लेकिन क्या? आइए समझते हैं,
- इज़रायल-हमास के बीच डील कैसे हुई?
- इस डील में किसको क्या मिलने वाला है?
- और, जंग की नियति पर कैसा असर पड़ेगा?
पहले बैकग्राउंड बता देते हैं.
07 अक्टूबर 2023 की सुबह कई फ़िलिस्तीनी गुटों ने इज़रायल पर आतंकी हमला किया. इनको हमास लीड कर रहा था. उन्होंने 12 सौ से अधिक लोगों की हत्या की. और, 02 सौ से ज़्यादा को किडनैप कर लिया. गाज़ा पट्टी ले गए. हमास को पता था कि इज़रायल जवाब देगा. तब बंधक सबसे बड़ा हथियार साबित होंगे. हाल के बरसों में गिलाड शालित सबसे बड़ा उदाहरण है. शालित इज़रायली सेना में थे. उन्हें 2006 में हमास ने किडनैप किया था. 2011 में रिहाई हुई थी. बदले में 01 हज़ार से अधिक फ़िलिस्तीन क़ैदियों को छोड़ा गया था. इनमें याह्या सिनवार भी थी. वो मौजूदा समय में गाज़ा पट्टी में हमास का लीडर है.
ख़ैर, किसी बड़ी शर्त की आस में हमास ने बंधकों को सुरंगों में छिपा दिया. अलग-अलग जगहों पर. अलग-अलग गुटों के पास. पूरा लेखा-जोखा और पल-पल का अपडेट हमास के पास रहा. इससे हमास को दो फ़ायदे थे,
- नंबर एक, अगर इज़रायली सेना उसके ठिकानों की तलाश कर लेती, तब भी उन्हें सभी बंधक नहीं मिलते. इससे डील की गुंजाइश बची रहती.
- नंबर दो, हमास ये मनवा सकता था कि असली लीडर हम हैं. बाकी गुटों तक पहुंचना है तो भी हमसे ही बात करनी होगी.
पिछले 46 दिनों का घटनाक्रम देखा जाए तो, पता चलता है, पूरी कहानी कमोबेश इसी पैटर्न पर चली है. कैसे?
- हमास के हमले के तुरंत बाद इज़रायल ने युद्ध का ऐलान किया. हवाई बमबारी शुरू की. साथ में 03 लाख सैनिक गाज़ा बॉर्डर पर भेजे. इज़रायल ने अपने दो मुख्य मकसद बताए - सभी बंधकों को वापस लाना. और, हमास का जड़ से खात्मा.
- फिर 18 अक्टूबर को जो बाइडन इज़रायल पहुंचे. इज़रायल की कार्रवाई को सपोर्ट किया. फिर बोले, बंधकों की रिहाई मेरी पहली प्राथमिकता है.
इसके दो दिन बाद ही हमास ने 02 अमेरिकी नागरिकों को छोड़ दिया. इस समय तक इज़रायल गाज़ा में ग्राउंड फ़ोर्स भेजने की तैयारी कर चुका था. उनका कहना था कि हमें बंधकों की लोकेशन पता है. ग्राउंड ऑपरेशन करके छुड़ा सकते हैं. हमास बोला, ज़मीन से हमला किया तो अपने लोगों को भूल जाना.
इसी ज़द्दोजहद के बीच 23 अक्टूबर को 02 और इज़रायली नागरिक रिहा किए गए. दोनों बुजुर्ग महिलाएं थीं. उन्हें प्रॉपर फ़ोटो-ऑप के बीच इज़रायल को सौंपा गया. हमास ने ये जताया कि हमने किडनैप तो किया, मगर उनका ख़याल भी रखा. इसलिए, हमें गुड किडनैपर्स मानो. और, हमला रोक दो. कइयों ने उनकी हां में हां मिलाई. मगर इज़रायल नहीं माना. उसने साफ-साफ कहा, जब तक सभी बंधक नहीं छोड़े जाते, तब तक हम नहीं रुकेंगे.
वहां पर मामला अटकने लगा. क़तर में चल रही मीटिंग्स रोकनी पड़ीं.
अक्टूबर के आख़िरी हफ़्ते में जंग एक लेवल आगे पहुंच गई. इज़रायली टैंक्स गाज़ा के अंदर घुसने लगे. शुरुआती फेज़ में उनका फ़ोकस छापेमारी पर रहा. इक्का-दुक्का टीम गाज़ा जाती. ऑपरेशन चलाकर वापस लौट आती. 30 अक्टूबर को ये पैटर्न बदल गया. इज़रायली सेना एक बंधक को छुड़ाने में सफल रही. इससे इज़रायल में उम्मीद जगी. डिफ़ेंस मिनिस्टर योआव गलांत ने कहा, ये हमारी क्षमता का सबूत है कि हम बंधकों तक पहुंच सकते हैं. ये ग्राउंड ऑपरेशन की अहमियत भी बताता है.
ये बयान संकेत था कि फ़ुल स्केल पर ज़मीनी हमला शुरू होने वाला है. इज़रायल को बहाना या वाजिब कारण मिल चुका था. ग़ौर करिएगा, हमने बहाना और वाजिब कारण, दो शब्दों का इस्तेमाल किया. दोनों एक-दूसरे से कतई अलग हैं. फिर एक साथ उनका इस्तेमाल क्यों?
दरअसल, कोई भी जंग सिर्फ़ ज़मीन या लोगों पर प्रभुसत्ता थोपने के इरादे से नहीं लड़ी जाती. एक मकसद बाकियों का नज़रिया बदलना भी होता है. ख़ुद को पाक-साफ साबित करना भी होता है. द वॉर ऑफ ऑप्टिक्स.
ख़ैर, हम ग्राउंड ऑपरेशन पर लौटते हैं. हमास का आरोप था कि इज़रायल पूरी गाज़ा पट्टी पर कब्ज़ा करना चाहता है. इसलिए, बंधकों वाली बात महज एक बहाना है.
जबकि इज़रायल को पता था कि अंदर घुसने पर नुकसान बढ़ेगा. और भी आम लोग मारे जाएंगे. इससे इंटरनैशनल कम्युनिटी का प्रेशर पड़ेगा. इसलिए, उन्हें एक मज़बूत वजह की दरकार होगी.
30 अक्टूबर के ऑपरेशन ने उनकी एक मुसीबत खत्म कर दी थी. इसके बाद ज़मीनी हमले का स्तर बढ़ता ही चला गया. जल्दी ही उन्होंने गाज़ा सिटी को घेर लिया. ये गाज़ा पट्टी की राजधानी है. इस शहर को हमास का गढ़ माना जाता है. गाज़ा सिटी में कई दिनों तक लड़ाई चलती रही. मगर बंधकों का कोई अता-पता नहीं था.
फिर 15 अक्टूबर को इज़रायली सेना अल-शिफ़ा अस्पताल में घुस गई. दावा किया कि अल-शिफ़ा में हमास का कमांड सेंटर है. वहां बंधक भी हो सकते हैं. इसलिए, हमें चाहिए फ़ुल कंट्रोल. अल-शिफ़ा गाज़ा पट्टी का सबसे बड़ा अस्पताल है. इसमें हज़ारों की संख्या में मरीज़ और शरणार्थी थे. कई नवजात बच्चे भी भरती थे. आरोप लगे कि नाक़ाबंदी के चलते 03 बच्चों की मौत हो चुकी है. विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) बोला, अल-शिफ़ा क़ब्रिस्तान में बदलता जा रहा है. पूरी दुनिया से लानत-मलानत आने लगी. अमेरिका तक ने हाथ पीछे खींच लिया. अब सबूत लाने की ज़िम्मेदारी इज़रायल की थी. उन्हें ये साबित करना था कि अस्पताल में हमास था या है. और, वहां आतंकी गतविधियों के निशान मिले हैं.
फिर इज़रायल डिफ़ेंस फ़ोर्स (IDF) ने सिलसिलेवार ढंग से कई वीडियोज़ रिलीज़ किए. कुछ में हथियार और लैपटॉप्स की बरामदगी दिखाई गई. कुछ वीडियोज़ अस्पताल के पास के सुरंगों के थे. दावा किया गया कि इनका संबंध हमास से है. हमास बोला, ये सब झूठ है. IDF प्रोपेगैंडा फैला रही है. हथियार वे लेकर आए हैं.
कोई भी स्वतंत्र संस्था किसी के भी दावों की पुष्टि नहीं कर सकी है. IDF ने कुछ पत्रकारों को अल-शिफ़ा में जाने की इजाज़त दी. मगर उन्हें उन्हीं जगहों पर जाने दिया गया, जहां IDF चाहती थी.
फिर 17 नवंबर को अल-शिफ़ा के पास दो महिला बंधकों की डेडबॉडी मिली. IDF ने कहा, हमारे पहुंचने से पहले उन्हें मार दिया गया. हमास ने दावा किया, उनमें से एक इज़रायल की बमबारी में मारी गई थी.
ये घटना बहुत बड़ी थी. इससे इज़रायल और हमास, दोनों पर दबाव बढ़ा. हमास को बचने की उम्मीद खोने का डर था. जबकि इज़रायल में पीड़ित परिवारों की नाराज़गी बढ़ती जा रही थी. ब्रिन्ग बैक होम का नारा आंदोलन में बदल चुका था. उन्हें आम जनता का सपोर्ट मिल रहा था. बंधकों में कई अमेरिकी नागरिक भी हैं. वहां भी कैंपेन ज़ोर पकड़ रहा था. लेकिन इज़रायल सरकार युद्ध खत्म करने के पक्ष में नहीं थी. हमास बंधकों के बदले सारे फ़िलिस्तीनी क़ैदियों की रिहाई भी मांग रहा था. इज़रायल इसपर राज़ी नहीं था. फिर भी हर रोज़ क़तर में बातचीत होती रही. दो बंधकों की बॉडी मिलने के बाद इसमें तेज़ी आई. 21 नवंबर को सुगबुगाहट तेज़ हो चुकी थी. कहा गया कि किसी भी वक़्त डील का ऐलान हो सकता है. क़तर में बात तय भी हो चुकी थी. मगर इज़रायली कैबिनेट की मंजूरी के बिना इसपर अमल नहीं हो सकता था. 21 नवंबर की रात क़रीब 09 बजे कैबिनेट बैठी. कई लोग सहमत नहीं थे. उन्हें मनाया गया. मोसाद चीफ़ डेविड बर्निया, शिन बेत चीफ़ रॉनेन ब्रार और IDF चीफ़ हर्ज़ी हलेवी ने प्रजेंटेशन दिया. बताया कि इससे हमारा मकसद प्रभावित नहीं होगा. फिलहाल डील को फ़ाइनल करना सबसे सही रास्ता है.
आख़िरकार, रात के 02 बजे वोटिंग हुई. कुछ मंत्री वोटिंग से पहले ही कमरा छोड़कर निकल गए. 03 ने ख़िलाफ़ में वोट डाला. किसने-किसने? गृहमंत्री बेन-ग्विर, वित्तमंत्री बेयालेल स्मोत्रिच और सेटलमेंट्स मिनिस्टर ओरिक स्त्रोक. हालांकि, इस विरोध के बावजूद प्रस्ताव पास हो गया. डील पर मुहर लग गई.
इस डील में क्या तय हुआ है?
- 04 दिनों का संघर्षविराम होगा. इस दौरान हमास 50 बंधकों को छोड़ेगा. अगर संघर्षविराम की अवधि बढ़ाई गई तो प्रत्येक दिन के हिसाब से 10-10 और बंधक छोड़े जाएंगे. बदले में इज़रायल 150 फ़िलिस्तीनी क़ैदियों को रिहा कर सकता है. सरकार ने 300 क़ैदियों की एक लिस्ट जारी की है. इनमें से 150 चुने जाएंगे. अधिकतर महिलाएं और बच्चे होंगे. सबकी उम्र 14 से 59 बरस के बीच है. उनपर क्या-क्या इल्ज़ाम हैं? हत्या का प्रयास, बम फेंकना, धमाका करना, पत्थरबाज़ी, चरमपंथी संगठनों से लिंक, आगजनी और दूसरों को शारीरिक नुकसान पहुंचाना.
डील के बाद कितने और बंधक बचेंगे?
अभी तक कुल 244 की पुष्टि हो चुकी है. इनमें से 04 को हमास ने छोड़ा, 01 को IDF ने छुड़ाया और 02 की डेडबॉडी मिली. अब बचे हैं 237. अगर तय डील के मुताबिक 50 को छोड़ा गया, तब 187 और बच जाएंगे. इनमें अधिकतर सैनिक और इज़रायली नागरिक होंगे. पहले चरण में महिलाओं, बच्चों और दोहरी नागरिकता वाले लोगों को वापस लौटाया जा रहा है.
और क्या-क्या होगा?
- संघर्षविराम के दौरान इज़रायल कोई हमला नहीं करेगा. दक्षिणी गाज़ा में ड्रोन उड़ाने पर पाबंदी रहेगी. हालांकि, उत्तरी गाज़ा में रोज़ाना 06 घंटों तक इज़रायली ड्रोन्स उड़ सकते हैं.
- डील के तहत, हमास ने दूसरे गुटों के कब्ज़े में क़ैद बंधकों को तलाशने का वादा किया है. इस बात पर भी राज़ी हुआ है कि हत्या के आरोपियों की रिहाई नहीं मांगेगा.
- टाइम्स ऑफ़ इज़रायल की रिपोर्ट के मुताबिक, विदेशी बंधक अभी भी गाज़ा में ही रहेंगे. डील में उनके लिए कोई बात नहीं हुई है.
अब आगे क्या?
24 घंटों तक कोर्ट में याचिका दायर की जा सकती है. जानकार कहते हैं, कैबिनेट का फ़ैसला पलटने के आसार न के बराबर हैं. यानी, 23 नवंबर की सुबह से संघर्षविराम चालू हो जाएगा. उसके बाद ही बंधकों की रिहाई शुरू होगी.
- पहले चरण में हमास बंधकों को रेड क्रॉस के हवाले करेगा. फिर उन्हें IDF को सौंपा जाएगा. उनका मेडिकल चेकअप होगा. इसके बाद उन्हें मेडिकल सेंटर्स में रखा जाएगा. जहां वे अपनी फ़ैमिली से मिल सकेंगे.
- फिर मेडिकल और डिफ़ेंस डिपार्टमेंट के अधिकारी पूछताछ कर सकते हैं. फ़ाइनल ब्रीफ़िंग के बाद उन्हें अपने घर जाने की इजाज़त होगी.
अब सवाल उठता है कि क्या जंग खत्म होने वाली है?
उम्मीद तो है, लेकिन आशंकाएं ज़्यादा हैं.
इस डील में क़तर और ईजिप्ट की भूमिका सबसे अहम रही. हमास की पॉलिटिकल लीडरशिप क़तर में ही बैठती है. जबकि ईजिप्ट पहले भी कई समझौतों में शामिल रहा है. बाइडन ने दोनों को शुक्रिया कहा है. क़तर के प्रधानमंत्री मोहम्मद बिन अब्दुलरहमान बिन जासिम अल थानी ने कहा, इस समझौते से भरोसा पैदा हुआ है. ये युद्ध और रक्तपात रोकने की बुनियाद बन सकता है.
हालांकि, बेंजामिन नेतन्याहू कुछ और ही राय रखते हैं. वो कहते हैं, ये युद्ध का अंत नहीं है. हम अपने लक्ष्य पर कायम हैं.
अब जंग की अपडेट्स जान लेते हैं.
- हॉस्टेज डील के बाद भी इज़रायल ने हमला जारी रखा है. मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, डील की शर्तें 23 नवंबर की सुबह से लागू होंगी. इज़रायल उससे पहले पर्याप्त बढ़त हासिल कर लेना चाहता है.
- एक अपडेट साउथ अफ़्रीका से है. 21 नवंबर को वहां की संसद में इज़रायल के ख़िलाफ़ प्रस्ताव लाया गया. इसमें इज़रायल से डिप्लोमैटिक रिश्ता खत्म करने और इज़रायली दूतावास को बंद करने की मांग थी. प्रस्ताव बहुमत से पास हो गया. हालांकि, इसको लागू करने का फ़ैसला सरकार लेगी. साउथ अफ़्रीका 06 नवंबर को ही इज़रायल में अपना दूतावास बंद कर चुका है.
दोनों देशों के संबंधों का इतिहास क्या है?
साउथ अफ़्रीका ने यूनाइटेड नेशंस में इज़रायल की स्थापना के पक्ष में वोटिंग की थी. मई 1948 में इज़रायल को मान्यता भी दी. हालांकि, इज़रायल ने उनकी रंगभेद की नीतियों का विरोध किया. फिर अक्टूबर 1973 में चौथा अरब-इज़रायल युद्ध हुआ. अरब देशों ने इज़रायल पर आर्थिक प्रतिबंध लगाए. तब उसने साउथ अफ़्रीका के साथ रिश्ते मज़बूत किए. 1986 में दुनियाभर के लोकतांत्रिक देशों ने साउथ अफ़्रीका पर प्रतिबंध लगाए. इज़रायल ने मना कर दिया. फिर अमेरिका के दबाव में झुका. 1994 में साउथ अफ़्रीका में नेल्सन मंडेला राष्ट्रपति बने. उनके साथ भी संबंध ठीक रहे. मगर मंडेला का झुकाव फ़िलिस्तीन की तरफ़ अधिक था. मंडेला की पार्टी अफ़्रीका नेशनल कांग्रेस (ANC) और यासिर अराफ़ात की फ़िलिस्तीन लिबरेशन ऑर्गनाइज़ेशन (PLO) के बीच अच्छे संबंध थे. ANC आज भी सरकार में है. फ़िलिस्तीन को लेकर उनका सपोर्ट भी बरकरार है. ज़ाहिर तौर पर इसका असर इज़रायल के साथ संबंधों पर पड़ता है. हाल की जंग में साउथ अफ़्रीका ने खुलेआम इज़रायल पर वॉर क्राइम के आरोप लगाए हैं. और, वे नेतन्याहू को इंटरनैशनल क्रिमिनल कोर्ट (ICC) में भी खड़ा करना चाहते हैं. एक दिलचस्प बात बताएं. यही साउथ अफ़्रीका रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन के ख़िलाफ़ जारी अरेस्ट वॉरंट पर अमल करने से कन्नी काट चुका है.






















