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क्या वाक़ई रफाल विमान सौदे में दलाली की गई है?

जानें रफाल विमान सौदे की पूरी कहानी

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जानें रफाल विमान सौदे की पूरी कहानी
रफाल. पिछले छह साल में हम इस शब्द को इतनी बार और इतनी तरह से सुन चुके हैं कि अब इसका कोई एक अर्थ रह नहीं गया है. लड़ाकू विमानों के घटते स्कॉड्रन्स से परेशान वायुसेना के लिए रफाल है ऑक्सीजन. 36 नए विमान. नई तकनीक, जो देश की रक्षा के काम में लगाई जाएगी. मुद्दों की कमी से परेशान राजनीति के लिए रफाल वो झुनझुना है, जो कभी भी, कैसे भी बजाया जा सकता है - देश की रक्षा, सेना का सम्मान, पाकिस्तान, चीन, बालाकोट - विषय कोई भी हो, बात में रफाल उड़ाया जा सकता है. और हर चीज़ से परेशान देश की आम जनता के लिए रफाल है एक पहेली. जिसे सुलझाने का अब कोई तरीका बाकी रह नहीं गया है. लोग नहीं जानते, कि रफाल का सौदा ठीक तरीके से हुआ, या नहीं हुआ. वायुसेना जो चाहती थी, वो उसे मिला, या नहीं मिला. जितना पैसा हिंदुस्तान जैसे विकासशील देश ने खर्च किया, वो सही जगह लगा, या नहीं लगा. और इस पूरे खेल में उद्योगपतियों, राजनेताओं और दलालों ने दलाली खाई, या नहीं खाई. सुप्रीम कोर्ट का एक फैसला ज़रूर है, जिसमें सौदे को क्लीन चिट दे दी गई है. लेकिन इस मामले में खुलासों का सिलसिल अभी तक थमा नहीं है. फ्रांस में खोजी पत्रकारिता करने वाली वेबसाइट मीडियापार्ट ने अपनी एक रिपोर्ट में दावा कर दिया है कि रफाल बनाने वाली कंपनी दासौ एविएशन ने सौदे के एवज़ में कम से कम 65 करोड़ रुपए की दलाली खिलाई. लेकिन भारतीय एजेंसियों ने इसकी जांच ही नहीं की. हम दलाली वाले एंगल पर इस सबसे नए खुलासे पर आएंगे. लेकिन पहले संक्षेप में समझ लेते हैं कि रफाल सौदा क्या है और इसे कैसे अंजाम दिया गया. वायुसेना के लिए एक नए और उन्नत लड़ाकू विमान की खरीद का विचार आया कारगिल की लड़ाई के बाद. अटल बिहारी वाजपेयी के प्रधानमंत्री रहते हुए एक प्रस्ताव बना. सोचा गया कि 126 मिराज-2000 फाइटर जेट खरीदे जाएं. मिराज-2000 भारतीय वायुसेना के पास पहले से थे और इन्हें भी दासौ एविएशन ने ही बनाया था. लेकिन आगे चलकर इस प्रस्ताव को बदला गया. तय किया गया कि 126 ‘मीडियम मल्टीरोल फाइटर जेट’ खरीदे जाएं. मीडियम मल्टीरोल फाइटर जेट माने ऐसे लड़ाकू विमान जो अलग अलग तरह के मिशन पर तैनात किये जा सकें. इस सौदे में 126 के आंकड़े का महत्व ये था कि इतने विमानों के आने से भारतीय वायुसेना भारत के दोनों मोर्चों पर पूरी क्षमता के साथ पहरा दे पाती - पश्चिम की तरफ पाकिस्तान और ऊत्तर की तरफ चीन. जैसे जैसे मिग 21 और जैगुआर जैसे विमान सेवा से बाहर होते जाते, नए और उन्नत रफाल उनकी जगह लेते जाते. 2007 में मनमोहन सिंह सरकार ने ‘रिक्वेस्ट फॉर प्रपोज़ल’ (RFP) जारी किया गया. माने दुनिया भर की कंपनियों से कहा गया कि वो अपने अपने प्रस्ताव भेजें. 1 लाख 28 हज़ार करोड़ की इस डील को हथियार बाज़ार में मदर ऑफ ऑल डिफेंस डील्स कहा गया. दुनिया के सारे बड़े हथियार निर्माता इसके लिए लाइन में लग गए. 2011 में भारतीय वायुसेना ने सरकार को बताया कि उसे दासौ का रफाल और यूरोफाइटर का टायफून विमान पसंद आया है. तो सरकार इनमें से कोई विमान खरीद सकती है. चूंकि दासौ L-1 बिडर था - माने सबसे कम कीमत पर सौदा करने को तैयार था, तो सरकार ने 2012 में दासौ से बातचीत शुरू की. सरकार चाहती थी कि दासौ 18 विमान फ्रांस में बनाए और बचे 106 हिंदुस्तान एयरोनॉटिक्स लिमिटेड को बनाने दे. इन 106 विमानों की कीमत और क्वालिटी कंट्रोल पर दासौ और सरकार के बीच सहमति नहीं बन पाई. फिर 2013 में अगुस्ता वेस्टलैंड हेलिकॉप्टर घोटाले में यूपीए के शीर्ष नेताओं पर गबन का इल्ज़ाम लगा. तो यूपीए सौदे को अंतिम रूप देने से हिचकता ही रहा. 2014 में नरेंद्र मोदी सरकार आई. अप्रैल 2015 में प्रधानमंत्री मोदी फ्रांस गए तो उन्होंने फ्रांस के राष्ट्रपति फ्रांस्वा ओलांद के साथ एक प्रेस कॉन्फ्रेंस में ये कह दिया कि भारत सरकार फ्रांस की सरकार से 36 राफेल ‘फ्लाई अवे कंडीशन’ में खरीदेगी. माने विमान फ्रांस की सरकार के ज़रिए खरीदे जाएंगे और वो फ्रांस में ही बनेंगे. भारत ने इस सौदे के लिए 59 हज़ार करोड़ खर्च किए. सितंबर 2020 से रफाल भारतीय वायुसेना को मिलने शुरू हो गए. अब तक 26 जेट आ चुके हैं और इन्हें हरियाणा के अंबाला और पश्चिम बंगाल के हासिमारा में तैनात किया गया है. भारतीय वायुसेना कह चुकी है कि 2022 तक उसके पास 36 रफाल आ जाएंगे और इन्हें तैनात भी कर दिया जाएगा. फौज की भाषा में कहें, तो 36 के 36 इंडक्ट कर लिए जाएंगे. तो ये थी सौदे की मोटा-माटी टाइम लाइन. अब आते हैं दलाली के उस इल्ज़ाम पर, जिसकी बात मीडियापार्ट ने अपनी रिपोर्ट में की है. मीडियापार्ट का दावा है कि दासौ ने फर्ज़ी इन्वॉइस जारी किए. और इन इन्वॉइस के ज़रिए सुषेन गुप्ता नाम के एक कथित दलाल को साढ़े सात मिलियन यूरो दिए. भारतीय मुद्रा में ये पैसा करीब 65 करोड़ होता है. और इसके बदले सुषेन ने दासौ को लड़ाकू विमानों का सौदा दिलवाया. आपको यहां दो बातों पर ध्यान देना होगा. ये कथित दलाली सुषेन गुप्ता को कब खिलाई गई और ये बात बाहर कैसे आई. मीडियापार्ट के मुताबिक ये कांड तभी से शुरू हो गया था, जब मनमोहन सिंह सरकार ने लड़ाकू विमान खरीद के लिए RFP जारी किया - माने 2007. और तब तक चला जब तक मनमोहन सिंह सरकार ने लड़ाकू विमानों की खरीद के लिए दासौ से बात शुरू नहीं कर दी - माने 2012. मीडियापार्ट का दावा है कि 2007 से 2012 के बीच सुषेन गुप्ता की कंपनी इंटरस्टेलर टेक्नॉलजी को दासौ से पैसा मिलने लगा. कहने को ये पैसा IT से जुड़े कॉन्ट्रैक्ट्स की एवज़ में था. लेकिन इंटरस्टेलर दासौ के लिए जो काम कर रही थी, उसके लिए उसे सामान्य से कहीं अधिक पैसा चुकाया जाता रहा. इसमें से काफी पैसा खुफिया तरीके से मॉरीशिस भेजा गया. इसके लिए फर्ज़ी इन्वॉयस जारी किए गए. कुछ इन्वॉयस में तो दासौ का नाम तक सही तरीके से नहीं लिखा गया था. कथित दलाली की टाइमलाइन से अब हम इस सवाल पर आते हैं कि ये सब बाहर कैसे आया. मीडियापार्ट का दावा है कि रफाल खरीद में इस अनियमितता का पता एक दूसरे रक्षा सौदे में अनियमितता की जांच के दौरान लगा - अगुस्ता वेस्टलैंड वीवीआईपी हेलकॉप्टर स्कैम. अगुस्ता वेस्टलैंड से AW101 मॉडल के हेलिकॉप्टर खरीदने का मन बतौर प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी ने बनाया था. लेकिन सौदा तय हुआ 2010 में मनमोहन सिंह के वक्त. कुल कीमत थी तकरीबन 36 सौ करोड़ रुपए. ये हेलिकॉप्टर वायुसेना को मिलते और राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री और दूसरे वीवीआईपी लोगों की सवारी के लिए काम आते. सब ठीक-ठाक चल रहा था. भारत ने 1 हज़ार 620 करोड़ रुपए चुका दिए थे और 3 हेलिकॉप्टर हिंदुस्तान आ गए थे. फिर 24 फरवरी, 2012 को इंडियन एक्सप्रेस ने एक खबर छापी. खबर ये कि इटली में फिनमिकैनिका के खिलाफ हुई जांच में ये सामने आया है कि अगुस्ता वेस्टलैंड ने भारत के साथ हुए सौदे में तकरीबन लगभग 423 करोड़ रुपए की घूस दी. फिनमिकैनिका अगुस्ता वेस्टलैंड की मालिक है. भारत में इस मामले की जांच प्रवर्तन निदेशालय और सीबीआई को सौंपी गई. इस जांच के दौरान जो दस्तावेज़ सीबीआई के हाथ लगे, उनके मुताबिक 2002 से लेकर 2006 के बीच सुषेन गुप्ता की शेल कंपनी को 9 लाख 14 हज़ार यूरो पहुंचाए गए. भारतीय मुद्रा में करीब - आठ करोड़ रुपए. इस लेनदेन का संबंध कथित रूप से अगुस्ता वेस्टलैंड डील से था. इन्हीं दस्तावेज़ों से ये भी पता चला कि सुषेन गुप्ता की रफाल सौदे में भी संदिग्ध भूमिका है. मीडियापार्ट का दावा है कि ये दस्तावेज़ 11 अक्टूबर, 2018 से सीबीआई के पास हैं. लेकिन एजेंसी ने कोई जांच नहीं की. बावजूद इसके कि महज़ एक हफ्ते पहले, माने 4 अक्टूबर 2018 को रफाल मामले में एजेंसी को एक आधिकारिक शिकायत मिली थी. मीडियापार्ट का दावा यहां तक है कि एक दस्तावेज़ के मुताबिक सुषेन गुप्ता ये इशारा भी करता है कि उसने दासौ के कहने पर कुछ अधिकारियों को पैसा दिया है. सितंबर 2012 में सुषेन ने एक नोट लिखा. इसमें वो कहता है कि अगर इन लोगों को हम पैसा नहीं देते हैं, तो ये हमें जेल में डाल देंगे. पैसा नहीं, तो डील नहीं. 2015 आते आते दासौ से अंतिम बातचीत शुरू हो गई थी. मीडियापार्ट का दावा है कि तब सुषेन गुप्ता के हाथ कुछ गोपनीय दस्तावेज़ लग गए. इनमें ये जानकारी तक थी कि भारत डील में क्या रुख रखने वाला है और वो विमानों की कीमत की गणना कैसे करने वाला है. मीडियापार्ट का कहना है कि इस खुलासे पर सीबीआई, ईडी या दासौ ने कोई प्रतिक्रिया नहीं दी है. रही बात सुषेन गुप्ता की, तो उनके वकील ने अप्रैल 2021 में कहा था सुषेन की रफाल डील में कोई भूमिका नहीं है. भारत में सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद रफाल सौदे पर आरोप प्रत्यारोप का सिलसिल थम सा गया है. 2019 में भाजपा लगातार दूसरी बार लोकसभा चुनाव जीत गई, तो कांग्रेस को भी लगा कि अब इस मुद्दे में वैसा दम नहीं रहा. 2019 में ही सुप्रीम कोर्ट ने दूसरी बार कहा कि रफाल सौदे में जांच की आवश्यकता नहीं लगती. इससे पहले 2018 में भी अदालत ने ऐसा ही फैसला दिया था. दोनों बार केंद्र ने अदालत से यही कहा कि मामले में जांच या एफआईआर का सवाल नहीं उठता. लेकिन 2019 वाले फैसले में सुप्रीम कोर्ट ने एक बात और कही थी. कि अदालत का फैसला सीबीआई को जांच से नहीं रोकता है. जैसा कि हम जानते ही हैं, ऐसी कोई जांच फिलहाल चल नहीं रही है. लेकिन फ्रांस में ऐसा नहीं है. इस साल जुलाई में फ्रांस के एक जज को रफाल डील की जांच करने का आदेश दिया गया था. जज को इस डील के वक्त फ्रांस के राष्ट्रपति रहे फ्रांस्वा ओलांद की भूमिका की जांच करनी है. सुषेन गुप्ता से जुड़े दूसरे मामले - अगुस्ता वेस्टलैंड मामले में इटली में मुकदमा चला. कंपनी के शीर्ष अधिकारियों को सज़ा हुई. लेकिन दोबारा मुकदमा चला तो ये सब बरी हो गए, क्योंकि अदालत को सबूत पर्याप्त नहीं लगे. हमारे यहां अगुस्ता वेस्टलैंड मामले में चार्जशीट और सप्लिमेंट्री चार्जशीट की कार्रवाई हो रही है. वैसे आपको ये मालूम होना चाहिए कि हाल ही में प्रधानमंत्री मोदी इटली गए थे. अगुस्ता वेस्टलैंड के देश. मोदी वापस आए तो उनके साथ एक खबर भी वापस आई. कि वीवीआईपी चॉपर स्कैम के बाद अगुस्ता वेस्टलैंड से जुड़ी कंपनियों पर जो बैन लगाया गया था, उसमें सशर्त छूट दे दी गई है. इतिहास इस बात का गवाह है कि हर बड़ी रक्षा खरीद में हमारे यहां खूब हो हल्ला होता है. ये हमारे यहां अब एक परंपरा बन चुकी है. लेकिन आरोप-प्रत्यारोप के एक लंबे दौर के बाद न हमारे यहां निष्पक्ष जांच हो पाती है. न ही तेज़ी से मुकदमे चल पाते हैं. सरकार, जांच एजेंसी और अदालत में क्या होता है, कभी आम आदमी को समझ नहीं आता. रह जाती हैं कॉन्सपिरेसी थ्योरीज़. तो इस खुलासे के बाद रफाल फिर से कुछ दिन खबरों में रहेगा. विपक्ष हमलावर होगा. सरकार अपना बचाव करेगी. खूब आरोप प्रत्यारोप होगा. लेकिन सच क्या है, वो कभी हमारे सामने नहीं आएगा. ठीक उसी तरह, जैसे बोफोर्स और अगुस्ता वेस्टलैंड मामले में भी नहीं आया. हम कभी नहीं जान पाएंगे कि इन डील्स में कितना घोटाला हुआ, या हुआ भी कि नहीं. मीडियापार्ट की रिपोर्ट कोयले पर से राख झटक सकती है. लेकिन उसमें आग नहीं लगा सकती. एक मुद्दे के रूप में रफाल हाल फिलहाल के लिए बीत गया लगता है.

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