ठिठुरन वाली ठंड. घना कोहरा. घने जंगल से घिरे पहाड़. और, एक हेलिकॉप्टर की तलाश. ये कुछ-कुछ वैसा ही था, जैसे भूसे के ढेर में राई का दाना ढूंढने की कोशिश हो रही हो. तमाम दुश्वारियों के बावजूद 20 घंटे बाद तलाश पूरी हो गई. इसी के साथ आशंका का चक्र भी पूरा हुआ. फिर एक पुष्टि आई. ईरान के सरकारी मीडिया की. कहा गया, हेलिकॉप्टर में सवार सभी यात्रियों की मौत हो गई है. इस ख़बर ने ईरान के साथ-साथ पूरी दुनिया को हिला दिया. दरअसल, उस हेलिकॉप्टर में ईरान के राष्ट्रपति इब्राहिम रईसी और विदेशी मंत्री हुसैन अमीर-अब्दुल्लाहियान बैठे थे.
इब्राहिम रईसी की मौत की पूरी कहानी क्या है?
सुप्रीम लीडर बन सकते थे इब्राहिम रईसी

पुष्टि के तुरंत बाद दुनियाभर से श्रद्धांजलि आनी शुरू हुई. भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने लिखा, दुख की घड़ी में भारत, ईरान के साथ खड़ा है. पाकिस्तान ने एक दिन के राजकीय शोक और झंडा झुकाने का एलान किया. चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग ने शोक संदेश भेजा है. लिखा, रईसी का निधन ईरान के लिए अपूरणीय क्षति है. चीन ने अपना एक अच्छा दोस्त खो दिया है. एक तरफ़ ईरान के सहयोगी और पड़ोसी देश शोक जता रहे थे. दूसरी तरफ़ कुछ देशों की चुप्पी और उनके नेताओं की रहस्यमयी बातों ने नए रहस्यों को जन्म दिया.
तो आइए जानते हैं,
- इब्राहिम रईसी की मौत की पूरी कहानी क्या है?
- हेलिकॉप्टर हादसे पर कैसी कॉन्स्पिरेसी थ्योरीज़ चल रहीं है?
- और, इस हादसे का भारत और बाकी दुनिया पर क्या असर पड़ेगा?
तारीख़, 19 मई 2024. जगह, ईरान-अज़रबैजान का बॉर्डर. मौका था, अरास नदी पर बने दो बांधों के उद्घाटन का. जिसका फ़ायदा ईरान और अज़रबैजान के 40 हज़ार लोगों को मिलने वाला था. इस मौके को ख़ास बनाने के लिए अज़रबैजान के राष्ट्रपति इब्राहिम आलियेव पहुंच रहे थे. ईरान की तरफ़ से राष्ट्रपति इब्राहिम रईसी, विदेश मंत्री अब्दुल्लाहियान और स्थानीय नेता पूरे दल-बल के साथ पहुंचे. बाकायदा समारोह हुआ. कार्यक्रम के बाद आलियेव अपनी राजधानी लौट गए. जबकि ईरान का प्रतिनिधिमंडल तीन हेलिकॉप्टर्स में सवार होकर तबरीज़ लौटने लगा. तबरीज़, ईरान के ईस्ट अज़रबैजान प्रांत की राजधानी है.
दो हेलिकॉप्टर्स तो सकुशल अपनी मंज़िल तक पहुंच गए. मगर तीसरा हेलिकॉप्टर अचानक ग़ायब हो गया. उसका कंट्रोल रूम से संपर्क टूट गया. इसी हेलिकॉप्टर में राष्ट्रपति रईसी और उनके विदेश मंत्री बैठे थे. उनके अलावा कई और लोग थे. संपर्क टूटने से पहले उन्होंने मदद के लिए मेसेज भेज दिया था. मेसेज मिलते ही सरकारी एजेंसियां अलर्ट हो गईं. हालांकि, सर्च एंड रेस्क्यू ऑपरेशन शुरू होते-होते तीन घंटे बीत गए. शाम के साढ़े चार बजे रेड क्रॉस की 40 टीमें एक साथ काम पर लगीं. इस्लामिक रेवॉल्युशनरी गार्ड्स कोर (IRGC) ने अपनी सभी इकाइयों को पूरी ताक़त से राहत अभियान में जुटने का आदेश दिया. पुलिस और फ़ौज भी ऑपरेशन में शामिल हुईं.
इस बीच ईरान के सरकारी मीडिया पर एक हेडलाइन लगातार फ़्लैश हो रही थी.
Helicopter carrying President Raisi suffers “Hard Landing”
ईरानी मीडिया का ज़ोर “हार्ड-लैंडिंग” पर था. जानकारों के मुताबिक़, ये फ़्रेज रूस में ख़ूब चलन में है. इसका इस्तेमाल मिलिटरी एयरक्राफ़्ट्स के दुर्घटनाग्रस्त होने पर किया जाता है. ताकि दहशत फैलने से रोका जा सके. ईरान भी उसी लीक पर चल रहा था. जिस तेज़ी से घटनाक्रम बदल रहा था, ये साफ़ हो चुका था कि कोई अनहोनी घट चुकी है. बस पुष्टि का इंतज़ार है. सरकारी मीडिया पर रईसी की सलामती की दुआ मांगने के लिए कहा जा रहा था. ईरानी सत्ता-प्रतिष्ठान के केंद्र में भी हलचल तेज़ हो रही थी. कैबिनेट और फ़ौज की इमरजेंसी मीटिंग्स बढ़ने लगी थी. आख़िरकार, 19 मई की देर रात सुप्रीम लीडर अयातुल्लाह अली ख़ामेनई को देश के नाम संदेश जारी करना पड़ा. वो बोले, चिंता मत करिए. देश अपने हिसाब से चलता रहेगा. जैसे-जैसे रात ढली, कोहरा बढ़ता गया. तापमान भी गिर रहा था. ऊपर से बियाबान जंगल. जिसके चलते ऑपरेशन चलाना मुश्किल हो रहा था. तब ईरान ने यूरोपियन यूनियन (EU) से मदद मांगी. फिर यूरोपियन कमिशन ऑफ़ क्राइसिस मेनेजमेंट ने कॉपरनिकस सिस्टम एक्टिवेट किया. ये सेटेलाइट इमेजरी से धरती की रियल-टाइम तस्वीरें मुहैया कराती है.
इसी बीच तुर्किए ने अपना ड्रोन, एक नाइट विजन सर्च हेलिकॉप्टर और 32 सदस्यों की एक टीम ईरान में भेजी. 20 अप्रैल की सुबह तक़रीबन पांच बजे तुर्किए के ड्रोन को एक पहाड़ के ऊपर हीट का सोर्स मिला.
फिर ऑपरेशन का फ़ोकस सोर्स की तरफ़ मोड़ा गया. आख़िरकार, सुबह के आठ बजे एक टीम क्रैश वाली जगह पर पहुंच गई. कुछ देर बाद उन्हें हेलिकॉप्टर का मलबा भी मिल गया. हेलिकॉप्टर बुरी तरह जल चुका था. किसी के भी जीवित बचने का कोई आसार नहीं दिख रहा था. आख़िरकार, ईरान की कैबिनेट ने राष्ट्रपति रईसी और उनके साथ हेलिकॉप्टर में बैठे लोगों की मौत की आधिकारिक पुष्टि कर दी.
इस हादसे में किनकी मौत हुई?
> नंबर आठ.
मेजर बहरुज़ गदिमी - फ़्लाइट टेक्नीशियन.
> नंबर सात.
कर्नल मोहसिन दरयानुस - को-पायलट.
> नंबर छह.
कर्नल सैयद ताहिर मुस्तफ़ावी - पायलट.
> नंबर पांच.
सरदार सैयद मेहदी मोसावी - रईसी की गार्ड टीम के हेड.
> नंबर चार.
अयातुल्लाह मोहम्मद अली अल-हाशेम - ईस्ट अज़रबैजान प्रांत में सुप्रीम लीडर ख़ामेनई के प्रतिनिधि.
> नंबर तीन.
मलिक रहमती - ईस्ट अज़रबैजान प्रांत के गवर्नर.
> नंबर दो.
हुसैन अमीर-अब्दुल्लाहियान - जून 2021 में ईरान के विदेश मंत्री बनाए गए. यूनिवर्सिटी ऑफ़ तेहरान से इंटरनैशनल रिलेशंस में पीएचडी. 1997 से विदेश मंत्रालय में काम कर रहे थे. बहरीन में ईरान के राजदूत के तौर पर तैनाती रही.
अब्दुल्लाहियान, रईसी की फ़ॉरेन पॉलिसी का चेहरा थे. सऊदी अरब के साथ डिप्लोमेटिक संबंध बहाल करने में अहम भूमिका रही. इज़रायल-हमास जंग के बीच हमास के लिए सपोर्ट जुटा रहे थे.
> नंबर एक.
इब्राहिम रईसी - जून 2021 में ईरान के आठवें राष्ट्रपति बने थे. उससे पहले ईरान के चीफ़ जस्टिस थे.
क्या है उनकी कहानी?1960 की पैदाइश. ईरान के मशहद के एक शिया परिवार में जन्म हुआ. शिया मदरसे में पढ़ाई-लिखाई हुई. 1979 में ईरान के शाह मोहम्मद रेज़ा पहलवी के ख़िलाफ़ क्रांति हुई. जिसके बाद अयातुल्लाह रुहुल्लाह ख़ोमैनी निर्वासन से वापस लौटे. शाह को देश छोड़कर भागना पड़ा. ख़ोमैनी ने इस्लामिक रिपब्लिक ऑफ़ ईरान की स्थापना की. इब्राहिम रईसी भी इस क्रांति का हिस्सा थे.
क्रांति के बाद रईसी ने अपनी पढ़ाई जारी रखी. शाहिद मोताहारी यूनिवर्सिटी से इस्लामी धर्मशास्त्र और लॉ में डॉक्टरेट की डिग्री ली. 25 की उम्र में न्यायपालिका का हिस्सा बन गए. उसी दौर में मुजाहिदीन-ए-खल्क़ (MEK) नाम के एक संगठन का उभार हुआ. इसकी स्थापना 1965 में हुई थी. बतौर वामपंथी मुस्लिम गुट. इसने शाह के ख़िलाफ़ विरोध प्रदर्शनों में भी हिस्सा लिया था. MEK ने इस्लामी क्रांति के दौरान ख़ोमैनी का सपोर्ट किया. लेकिन जब उसके मुखिया मसूद रजावी को राष्ट्रपति चुनाव लड़ने से रोका गया, तब ये गुट सरकार के ख़िलाफ़ हो गया.
MEK ने दावा किया कि वो ईरान में लोकतंत्र का समर्थन करता है. उसने महिलाओं की आज़ादी और अभिव्यक्ति की आज़ादी को मांग भी उठाई. MEK ने इस्लामी रिपब्लिक के ख़िलाफ़ सशस्त्र विद्रोह शुरू किया. इसे रोकने के लिए सरकार ने MEK सपोर्टर्स के ख़िलाफ़ मोर्चा खोल दिया. रजावी देश छोड़कर भाग गए. उनके गुट ने ईरान-इराक़ की लड़ाई में सद्दाम की सेना के साथ मिलकर कई हमले भी किए.
रजावी तो देश छोड़कर जा चुके थे. लेकिन जो पीछे छूट गए थे, उनका जीना मुश्किल होने वाला था. लोगों को प्रोटेस्ट में हिस्सा लेने के लिए या किसी तरह का सरकार-विरोधी साहित्य रखने के आरोप में अरेस्ट किया जाने लगा. इनमें से अधिकतर इविन जेल में रखे गए. इस जेल को पहले 300 क़ैदियों को रखने के लिए बनाया गया था. बाद में कैपिसिटी बढ़ाकर 15 सौ कर दी गई. लेकिन इसमें एक समय 15 हज़ार से अधिक लोगों को क़ैद में रखा गया था. 1988 में ईरान-इराक़ युद्ध खत्म हो गया. तब सुप्रीम लीडर ने फतवा जारी किया. कहा गया कि जो कोई इस्लामी रिपब्लिक के ख़िलाफ़ है, वो अल्लाह के ख़िलाफ़ है. ऐसे लोगों को एक ही सज़ा मिलनी चाहिए, सज़ा-ए-मौत.
इसके बाद एक ड्रामा शुरू हुआ. अचानक से पूरे ईरान में जेलों के दरवाज़े बंद होने लगे. फ़ैमिली विजिट्स पर बैन लगा दिया गया. रेडियो, टीवी और न्यूज़पेपर पर रोक लगा दी गई. किसी भी तरह का बाहरी संपर्क काट दिया गया. उन दिनों में सिर्फ़ कुछ पगड़ीधारी अधिकारी अंदर जेलों में आते थे. वे क़ैदियों से एक-दो सवाल पूछते और उनके भविष्य का फ़ैसला कर दिया जाता था. ये सवाल विरोधी गुट से रिश्ते की पुष्टि के लिए किया जाता था.
जिनकी पुष्टि हो जाती, उन्हें सीधे फांसी वाली जगह पर भेज दिया जाता था. फांसी पर लटकाने के बाद लाशों को अज्ञात क़ब्रों में दफ़्न कर दिया जाता था. ये कांड अगले पांच महीने तक चला. तब तक लगभग तीस हज़ार क़ैदियों को फांसी पर चढ़ाया जा चुका था. इविन जेल भी इस बर्बरता का गवाह बनी. वहां एक दिन में दो सौ लोगों को असेंबली हॉल में फांसी पर चढ़ा दिया गया था.
इब्राहिम रईसी 1988 में ईरान की जेलों में हुए नरसंहार के लिए बनी डेथ कमिटी के चार जजों में से एक थे. उस दौरान उन्होंने कई विरोधियों के मौत का फ़रमान लिखा था. इसके चलते उनको ‘तेहरान का कसाई’ कहा जाने लगा.
1990 के दशक में रईसी जनरल इंस्पेक्शन ऑर्गनाइज़ेशन (GIO) के मुखिया बने. ये एजेंसी ये देखती है कि सरकारी एजेंसियां क़ानूनों का सही ढंग से पालन करती है या नहीं. रईसी 2004 तक GIO में रहे.
अगले 10 बरस उन्होंने न्यायपालिका में फ़र्स्ट डेप्युटी के तौर पर काम किया. 2014 से 2015 के बीच वो ईरान के अटॉर्नी जनरल रहे. 2016 में उनको अस्तान क़ुद्स रज़ावी की ज़िम्मेदारी दी गई. ये एक ट्रस्ट है, जो अहम दरगाहों का संचालन करता है. 2019 में रईसी को ईरान का चीफ़ जस्टिस बना दिया गया.
2021 में उन्होंने राष्ट्रपति चुनाव के लिए अर्ज़ी लगाई. इस चुनाव में 500 से ज़्यादा उम्मीदवारों ने आवेदन किया था. जिसमें से सिर्फ़ सात को चुनाव लड़ने की इजाज़त मिली. बाकी नामों को गार्डियन काउंसिल ने खारिज कर दिया था. गार्डियन काउंसिल में 12 सदस्य होते हैं. ये इस्लाम के जानकार होते हैं. छह की नियुक्ति सुप्रीम लीडर करते हैं. जबकि छह सदस्यों को न्यायपालिका मनोनीत करती है. अप्रूवल संसद से मिलता है. गार्डियन काउंसिल ये तय करती है कि कोई उम्मीदवार ज़रूरी अर्हताओं को पूरा करता है या नहीं. ये संसद द्वारा पास किए किसी बिल पर वीटो भी कर सकती है. 2021 के राष्ट्रपति चुनाव से पहले गार्डियन काउंसिल ने जिन नामों को दरकिनार किया था, उनमें महमूद अहमदीनिजाद भी थे. अहमदीनिजाद 2005 से 2013 तक ईरान के राष्ट्रपति रहे. वो 2021 के चुनाव में रईसी को चुनौती दे सकते थे. जानकारों ने दावा किया, सुप्रीम लीडर ख़ामेनई ने रईसी को राष्ट्रपति बनाने का पूरा मन बना लिया था. इसलिए, उनके प्रतिद्वंदियों की उम्मीदवारी रद्द की गई थी.
आख़िरकार, रईसी 72 फीसदी वोट पाकर जीत गए.
- नंबर एक.
रईसी को पश्चिमी देशों के प्रतिबंधों में जकड़ा ईरान विरासत में मिला था. उन्होंने वादा किया कि इस जकड़न से देश को निकालेंगे. मगर पश्चिमी देशों के आगे घुटने नहीं टेकेंगे. हालांकि, वो प्रतिबंध कम करवाने में सफल नहीं हो सके.
- नंबर दो.
फ़रवरी 2022 में रूस ने यूक्रेन से जंग शुरू की. रूस को भरोसा था कि वो बहुत जल्द यूक्रेन को पछाड़ देगा. मगर लड़ाई लंबी खिंचती गई. फिर रूस को हथियारों की कमी पड़ने लगी. अमेरिका का आरोप है कि ईरान वो कमी पूरी कर रहा है. रूस को ड्रोन्स और मिसाइल सप्लाई कर रहा है. हालांकि, ईरान इस आरोप से इनकार करता है.
- नंबर तीन.
मार्च 2023 में ईरान ने सात बरस तक चली अनबन के बाद सऊदी अरब के साथ डिप्लोमेटिक संबंध स्थापित किए. ये सुलह चीन की मध्यस्थता में हुई थी.
- नंबर चार.
अक्टूबर 2023 में हमास ने इज़रायल पर आतंकी हमला किया. 11 सौ से अधिक लोगों की हत्या कर दी. 250 से अधिक को बंधक बनाकर ले गए. रईसी ने इस हमले के लिए हमास को शाबासी दी थी. जब इज़रायल ने गाज़ा पर हमले तेज़ किए, ईरान ने उसको धमकी भी दी. वो ख़ुद तो इज़रायल के ख़िलाफ़ सीधी लड़ाई में नहीं कूदा. मगर उसने ‘एक्सिस ऑफ़ रेसिस्टेंस’ तैयार करके दिया. इसमें ईरान के प्रॉक्सी गुट शामिल हैं. मसलन, यमन में हूती, इराक़ और सीरिया में इस्लामिक रेसिस्टेंस इन इराक़, लेबनान में हिज़बुल्लाह, गाज़ा में हमास आदि. ये गुट इज़रायल और उसके सहयोगी देशों के सामरिक हितों को निशाना बना रहे हैं.
- नंबर पांच.
01 अप्रैल 2024 को सीरिया में ईरान के वाणिज्य दूतावास पर हमला हुआ. इसमें ईरान की IRGC के दो सीनियर कमांडर्स समेत सात लोग मारे गए. ईरान ने हमले का आरोप इज़रायल पर लगाया. धमकी दी कि हम बदला लेंगे. फिर 13 अप्रैल को उसने तीन सौ से ज़्यादा मिसाइलों और ड्रोन्स से इज़रायल पर हमला किया. इतिहास में पहली बार ईरान ने इज़रायल पर सीधा हमला किया था. ये भी रईसी के कार्यकाल में ही हुआ.
इन्हीं रईसी के कार्यकाल में हिजाब-विरोधी प्रोटेस्ट भी देखने को मिला. सितंबर 2022 में एक नौजवान कुर्द लड़की महसा अमीनी की पुलिस कस्टडी में मौत हो गई. महसा को ठीक से हिजाब नहीं पहनने के लिए अरेस्ट किया गया था. उसके घरवालों ने आरोप लगाया कि पुलिस की पिटाई के चलते उसकी मौत हुई है. इसके बाद पूरे ईरान में प्रोटेस्ट की सीरीज़ चली. मगर सरकार को इससे कोई फ़र्क़ नहीं पड़ा. उसने प्रोटेस्ट को कुचल दिया. कई प्रदर्शनकारियों को जेल और टॉर्चर भी झेलना पड़ा. इसके लिए उनकी काफ़ी आलोचना भी हुई.
अब रईसी की मौत हो चुकी है. उनके बाद कौन बनेगा राष्ट्रपति?
ईरान के संविधान के मुताबिक़, अगर किसी राष्ट्रपति की पद पर रहते हुए मौत हो जाती है या वो काम करने के योग्य नहीं रहता, उस स्थिति में फ़र्स्ट वाइस-प्रेसिडेंट को कार्यवाहक राष्ट्रपति बनाया जाता है. अभी फ़र्स्ट-वाइस प्रेसिडेंट मोहम्मद मुख़बर हैं. सुप्रीम लीडर ने उनकी नियुक्ति को मंज़ूरी दे दी है.
इसके साथ ही टेम्पररी प्रेसिडेंशियल काउंसिल भी एक्टिव हो गई है. इसमें कार्यवाहक राष्ट्रपति, ईरान की संसद के स्पीकर और ईरान के चीफ़ जस्टिस होते हैं. उनकी ज़िम्मेदारी अगले 50 दिनों के अंदर अगला राष्ट्रपति चुनाव कराना है.
अभी तक कोई नाम उभर कर सामने नहीं आया है. जानकार मानते हैं कि सुप्रीम लीडर खामेनई का पूरा ज़ोर अराजकता या विद्रोह की आशंका को खत्म करने पर रहेगा. चूंकि उम्मीदवार तय करने का अधिकार गार्डियन काउंसिल के पास है. और, गार्डियन काउंसिल की शक्ति सुप्रीम लीडर के पास. इसलिए, अंतत: अगला राष्ट्रपति उनकी मर्ज़ी का ही होगा.
ईरान में राष्ट्रपति के पास क्या-क्या शक्तियां हैं?- राष्ट्रपति को ईरान में दूसरा सबसे शक्तिशाली व्यक्ति माना जाता है. सुप्रीम लीडर के बाद. हालांकि, राष्ट्रपति की शक्तियां बहुत हद तक सीमित हैं.
- राष्ट्रपति हेड ऑफ़ द गवर्नमेंट होते हैं. उनकी ज़िम्मेदारी संविधान के प्रावधानों को लागू करवाना है.
- राष्ट्रपति का कार्यकाल चार बरस का होता है. कोई भी व्यक्ति लगातार दो टर्म से अधिक दफ़ा राष्ट्रपति नहीं रह सकता है.
ईरान में सबसे शक्तिशाली कौन?
- इसका सीधा जवाब है - सुप्रीम लीडर.
ये कुर्सी अभी अयातुल्लाह अली ख़ामेनई के पास है. वो ईरान के दूसरे सुप्रीम लीडर हैं. 1989 में कुर्सी पर बैठे थे. उससे पहले आठ बरस मुल्क के राष्ट्रपति रहे.
पहले सुप्रीम लीडर थे - अयातुल्लाह रुहुल्लाह ख़ोमैनी. वो इस्लामी क्रांति के अगुआ और इस्लामिक रिपब्लिक ऑफ़ ईरान के फ़ाउंडर थे. उन्हीं के विचारों पर ईरान का संविधान बेस्ड है. 1989 में ख़ोमैनी की मौत हो गई. उनके बाद अली ख़ामेनई को सुप्रीम लीडर बनाया गया.
उनके पास क्या-क्या शक्तियां हैं?
- चीफ़ जस्टिस की नियुक्ति करते हैं.
- गार्डियन काउंसिल के छह सदस्यों की नियुक्ति वही करते हैं.
- आर्म्ड फ़ोर्सेस के मुखिया की नियुक्ति सुप्रीम लीडर करते हैं.
- इस्लामिक रेवॉल्युशनरी गार्ड्स कोर (IRGC) उनको रिपोर्ट करती है.
- सुप्रीम लीडर ही ईरान के सशस्त्र सेनाओं के मुखिया होते हैं.
- राष्ट्रपति के नाम पर अंतिम मुहर सुप्रीम लीडर की लगती है.
- ईरान की विदेश-नीति और सुरक्षा से जुड़े मसलों पर उनका फ़ैसला अंतिम होता है.
सुप्रीम लीडर का चुनाव कैसे होता है?
- उनका चुनाव असेंबली ऑफ़ एक्सपर्ट्स करती है. इसमें तक़रीबन 90 सदस्य हैं. इनका कार्यकाल आठ बरस का होता है. चुनाव जनता के वोट से होता है.
- असेंबली ऑफ़ एक्सपर्ट्स का सबसे हालिया चुनाव मार्च 2024 में हुआ था. उनका कार्यकाल 2032 तक का है. चूंकि मौजूदा सुप्रीम लीडर की उम्र 85 के पार जा चुकी है. इसलिए, इस बार की असेंबली पर नया सुप्रीम लीडर चुनने की ज़िम्मेदारी आन पड़ी है. इब्राहिम रईसी इस पद के सबसे प्रबल दावेदार बताए जा रहे थे. इसी वजह से उनकी अकस्मात मौत ने कई कॉन्स्पिरेसी थ्योरीज़ को जन्म दिया है.
एक-एक कर समझते हैं.
इब्राहिम रईसी के साथ जिस शख़्स का नाम सुप्रीम लीडर के लिए चर्चा में था, वो हैं मोज्तबा ख़ामेनई. वो मौजूदा सुप्रीम लीडर अली ख़ामेनई के बेटे हैं. उनका नाम पिछले 15 बरसों से कतार में है. हालांकि, वो बहुत सी अर्हताओं पर खरे नहीं उतरते. मोज्तबा का कोई राजनीतिक अनुभव नहीं है. उनके नाम पर IRGC के अफ़सर बंद कमरे में विरोध जता चुके हैं. और, ईरान में सुप्रीम लीडर की कुर्सी पर वंशवादी नेताओं को अभी तक बैठने नहीं दिया गया है. जब तक क़ुद्स फ़ोर्स के कमांडर क़ासिम सुलेमानी जीवित थे, वो सुप्रीम लीडर के टेलर-मेड उत्तराधिकारी माने जा रहे थे. मगर जनवरी 2020 में अमेरिका ने ड्रोन हमले में उनकी हत्या कर दी. इसके बाद फिर मोज्तबा का नाम आगे आया. उसी वक़्त रईसी ने अपना कद ऊपर किया. सुप्रीम लीडर के वफ़ादार बने. और, जून 2021 में राष्ट्रपति की कुर्सी हासिल की. मिडिल ईस्ट इंस्टीट्यूट ने सितंबर 2022 में अंदरुनी सूत्रों के हवाले से दावा किया था कि रईसी को जानबूझकर राष्ट्रपति बनाया गया. ताकि उनको नाकारा साबित कर सुप्रीम लीडर बनने की रेस से अलग किया जा सके.
इज़रायल और अमेरिका ने ईरान में हुए हादसे पर चुप्पी साध रखी है. यहीं पर कॉन्स्पिरेसी थ्योरी नंबर दो का ज़िक्र ज़रूरी हो जाता है. हेलिकॉप्टर ग़ायब होने के बाद से ही चर्चा है कि क्रैश में इज़रायल की ख़ुफ़िया एजेंसी मोसाद का हाथ हो सकता है. हालांकि, ईरान ने आधिकारिक बयान में किसी पर कोई आरोप नहीं लगाया है. वहीं एक शीर्ष इज़रायली अधिकारी ने न्यूज़ एजेंसी रॉयटर्स को कहा कि हादसे से हमारा कोई लेना-देना नहीं था. इसमें हम शामिल नहीं थे. इज़रायल सरकार ने आधिकारिक तौर पर कुछ भी नहीं कहा है. अमेरिका ने 19 मई को कहा था कि हम हालात पर नज़र बनाए हुए हैं. मगर उसने शोक नहीं जताया.
हालांकि, कई अमेरिकी सांसदों ने कहा है कि अच्छा हुआ. इज़रायल के एक सांसद अविडोर लिवरमैन ने कहा, हमारे लिए इसका कोई मतलब नहीं है. इससे ईरान के प्रति हमारा रवैया नहीं बदलेगा. ईरान की पॉलिसी सुप्रीम लीडर तय करते हैं. अब इंडिया कनेक्शन की तरफ़ चलते हैं. भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने रईसी की मौत पर गहरा दुख जताया. उन्होंने सोशल मीडिया प्लेटफ़ॉर्म एक्स पर लिखा, भारत-ईरान संबंधों को मज़बूत बनाने में उनकी भूमिका को याद रखा जाएगा. दुख की घड़ी में भारत, ईरान के साथ खड़ा है.
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी अपने कार्यकाल में सिर्फ़ एक बार ईरान के दौरे पर गए हैं. 2016 में. तब चाबहार पोर्ट डील पर दस्तख़त हुआ था. वो समझौता तत्कालीन ईरानी राष्ट्रपति हसन रुहानी के कार्यकाल में हुआ था. रईसी 2021 में ईरान के राष्ट्रपति बने. तब तक स्थिति बदल गई थी. भारत ने ईरान से तेल खरीदना बंद कर दिया था. हालांकि, चाबहार का काम जारी रहा.
ईरान हादसे से और क्या अपडेट्स हैं?
- ईजिप्ट, क़तर, यूएई, सऊदी अरब, इराक़, तुर्किए, मलेशिया, वेनेज़ुएला, फ़्रांस समेत कई देशों ने ईरान हादसे पर दुख जताया है.
- अली बाग़ेरी को ईरान का कार्यवाहक विदेश मंत्री बनाया गया है. वो ईरान के न्युक्लियर नेगोशिएटर के तौर पर काम कर रहे थे.
- रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन ने ईरान के कार्यवाक राष्ट्रपति मोहम्मद मुख़बर से फ़ोन पर बात की है. दोनों नेताओं ने आपसी संबंधों को मज़बूत बनाने का वादा किया.
- हिज़बुल्लाह औऱ हमास ने रईसी की मौत को निजी क्षति बताया है. हिज़बुल्लाह लेबनान का चरमपंथी संगठन है. ईरान का सबसे बड़ा और सबसे ताक़तवर प्रॉक्सी गुट. जबकि हमास को ईरान का अच्छा-खासा सपोर्ट मिलता है.
- ईरान ने अपने यहां पांच दिनों के राजकीय शोक का एलान किया है.
- लेबनान और सीरिया ने तीन-तीन दिनों के राजकीय शोक की घोषणा की है.
वीडियो: ईरान के राष्ट्रपति इब्राहिम रईसी की हेलीकॉप्टर दुर्घटना में मौत, असली वजह क्या?










