तो धनतेरस का जितना महत्व धर्म या संस्कृति के लिहाज़ से है, उतना ही बाज़ार के लिहाज़ से भी है. ये बाज़ार की नब्ज़ टटोलने का मौका होता है. और इस तरह समाज के अलग अलग तबकों की आर्थिक सेहत कैसी है, उसकी साफ तस्वीर उभरती है. वो तस्वीर, जिसे किसी के भी दावे-नारे और प्रचार न बना सकते हैं, न बिगाड़ सकते हैं. जो सच है, वो दुकानदारों के गल्लों, कंपनियों की फाइलों और हमारे घरों में दर्ज हो जाता है. आज हम यही समझने की कोशिश करेंगे कि साल 2021 के धनतेरस पर हमारे देश के लोगों की आर्थिक स्थिति कैसी है. कितनी आवक है और कितनी महंगाई. और कितनी बचत है, जिससे धनतेरस का शगुन खरीदा जाए.
आगे बात शुरू करने से पहले ये वीडियो देखिए-
ये हैं यूपी के डिप्टी सीएम केशव प्रसाद मौर्य. एक पत्रकार उनसे सवाल पूछने की कोशिश करता है. लेकिन मौर्य हाथ के इशारे से रिपोर्टर को हटाने का संकेत करते हैं. मंत्री जी भी इस सवाल से बोर हो गए होंगे ना. महंगाई रोज़ ही तो बढ़ती है, इसमें क्या नया है. ऐसे घिसे पिटे सवालों का क्या जवाब देना. केशव प्रसाद मौर्य का ये वीडियो एक उदाहरण मात्र है. सत्ता में बैठे हुक्मरानों को महंगाई पर सवाल बिल्कुल पसंद नहीं आते. केंद्र के मंत्री हों या किसी राज्य के, वो नहीं चाहते कि कोई महंगाई पर उनसे बात करे. मंत्री जी के पास तो सवाल इग्नोर करने का विकल्प है. देश के उन करोड़ों आम लोगों के पास क्या है, जिन्हें रोज़ चूल्हा जलाना है, रोज परिवार का पेट भरना है. आमदनी नहीं बढ़ती है, और खर्च हर नए दिन और बढ़ जाता है.
तो देश की आम जनता और सरकार के लिए इस बार की धनतेरस कैसी रहेगी, कमाई और खर्च के हिसाब से हम ये समझने की कोशिश करेंगे. पिछली दिवाली से दिवाली के बीच हमारा जीना, रहना-खाना कितना महंगा हुआ है, इसका हिसाब लगाते हैं. केंद्रीय उपभोक्ता मामलों के मंत्रालय की वेबसाइट से हमने एक नवंबर 2020 और 1 नवंबर 2021 के भावों की लिस्ट निकाली. ये देखने के लिए कि दिल्ली में खाने-पीने का सामान कितना महंगा हुआ.
सरकारी डेटा के हिसाब से पिछले साल 1 नवंबर के दिन-
सरसों का तेल 142 रुपये किलो था. अब 208 रुपये प्रति किलो. यानी एक साल में दाम 64 रुपये बढ़ गए हैं. यानी करीब 45 फीसदी दाम बढ़े हैं. सालभर पहले पैक्ड नारियल तेल 184 रुपये किलो था. अब 201 रुपये किलो. सोया तेल पिछले साल 122 रुपये किलो था. अब हो गया 165 रुपये किलो.ये सरकार की बताए दिल्ली के रेट्स हैं. मुमकिन है कि कई शहरों में इससे भी महंगा सामान मिल रहा हो.
अब सब्जियों पर आते हैं. टमाटर पिछले साल 50 रुपये किलो था. अब 60 रुपये किलो. चीनी 38 रुपये किलो थी. अब 44 रुपये किलो. दूध 46 रुपये किलो से बढ़कर अब 48 रुपये किलो हो गया. आटा 24 रुपये किलो था. अब 26 रुपये किलो. हालांकि कई चीजों के भाव में कमी भी आई है. जैसे मूंग दाल तब 106 रुपये किलो थी. अब है 103 रुपये किलो.

रोजमर्रा की कई चीजों के दाम भी पिछले साल के मुकाबले चढ़ गए हैं. (फाइल फोटो पीटीआई)
ये तो हुई खाने-पीने की चीज़ें. अब आते हैं. रसोई गैस पर. दिल्ली में 14 किलो 200 ग्राम के एलपीजी सिलेंडर का दाम है 884 रुपये 50 पैसे. पिछले साल के एक नवंबर को इस सिलेंडर का भाव था- 594 रुपये. यानी सिर्फ एक साल में रसोई गैस का सिलेंडर 290 रुपये महंगा हो गया. आपको याद होगा मोदी सरकार ने गिवअप सब्सिडी करके एक मिशन शुरू किया था. जिसमें पैसों वाले कहा गया था कि आप सब्सिडी छोड़िए ताकि गरीबों को फायदा मिले. लाखों परिवारों ने अभियान के तहत सब्सिडी लेना बंद किया. लेकिन अब गरीबों के लिए भी रसोई गैस सब्सिडी दुर्लभ चीज हो गई है.
और अब पेट्रोल-डीज़ल की बात. इस साल के पहले दिन यानी 1 जनवरी 2021 को दिल्ली में पेट्रोल का भाव था 83 रुपये 71 पैसे. और 1 नवंबर 2021 को क्या भाव है - 109.34 पैसे. यानी सिर्फ 10 महीने में पेट्रोल 25 रुपये 63 पैसे महंगा हो गया. डीज़ल पर आते हैं. दिल्ली में 1 जनवरी 2021 को डीजल की रेट थी - 73.87. और इस साल 1 नवंबर को - डीज़ल - 98.07. करीब 24 रुपये बढ़ गए हैं. ये दिल्ली की रेट है. देश के कई हिस्सों में डीज़ल भी 100 रुपये के पार चला गया है. जैसे मुंबई में डीजल 106 रुपये 23 पैसे हो गया है.
हम ये भी समझते हैं कि जब पेट्रोल-डीज़ल के भाव बढ़ते हैं तो असर सिर्फ उन पर ही नहीं पड़ता है जो लंबी गाड़ियां या बाइक्स रखते हैं. ट्रांसपोर्टेशन महंगा होता है तो हर चीज़ महंगी होती है.
इस बढ़ती महंगाई के बचाव में आपको नेता ऐसे तर्क देते भी मिलेंगे कि सामान महंगा हो रहा है, तो लोगों की कमाई भी तो बढ़ रही है. अभी दो दिन पहले ही मध्य प्रदेश के मंत्री महेंद्र सिंह सिसौदिया ने कहा था कि जनता की आमदनी बढ़ी है.
लेकिन क्या वाकई महंगाई के मुकाबले लोगों की आमदनी बढ़ी है. हमारे पास बढ़ी महंगाई को बताने के लिए प्रमाण के तौर पर आंकड़े हैं, क्या ये नेता आमदनी बढ़ने के आंकड़े दे पाएंगे. बल्कि जो रिपोर्ट्स आ रही है उनके मुताबिक लोगों की आमदनी बढ़ने के बजाय घटी है. इसी साल जून में आई एक क्रेडिट इंफॉर्मेशन कंपनी की रिपोर्ट के मुताबिक भारत में कामकाजी आबादी का आधा हिस्सा कर्ज़ में डूबा है. इसके अलावा हमने इसी साल वो रिपोर्ट्स भी देखी थी भारत प्रति व्यक्ति आमदनी के मामले में बांग्लादेश से पिछड़ गया है. तो ये मंत्री बताएं कि किस आधार पर महंगाई की तुलना में आमदनी बढ़ी है.
हालांकि जनता के पैसे से सरकार की कमाई खूब बढ़ी है. कम से एक्ससाइज़ के टैक्स से तो बिल्कुल बढ़ी है. हमारे पास आंकड़े हैं.
अप्रैल से सितंबर वाली छमाही में केंद्र सरकार ने पेट्रोलियम पदार्थों पर उत्पाद शुल्क में 1 लाख 71 हजार रुपये कमाए हैं. यानी पिछले साल से तुलना करें तो 43 हजार करोड़ रुपये ज्यादा. सरकारी की कमाई में 33 फीसदी इन्क्रिमेंट हुआ है. और 2019 के मुकाबले ये कमाई 79 फीसदी ज्यादा है. 2020-21 में पेट्रोलियम उत्पादों पर सरकार को कुल 3 लाख 89 हजार करोड़ की कमाई हुई थी. इस वित्त वर्ष में शुरू के 6 महीने के रुझान बता रहे हैं कि ये कमाई और बढ़ने वाली है.
अब सरकार जनता पर टैक्स से खूब कमाई कर रही है, लेकिन क्या बाकी क्षेत्रों में भी अर्थव्यवस्था बेहतर हो रही है? इसका जवाब है नहीं.
जून क्वार्टर के बाद से खपत बढ़ रही है, सामान की अंतर्राज्यीय खरीद बिक्री में बढ़ोतरी हुई है, रिटेल और ऑर्गेनाइड्ज्ड सेक्टर की सेल बढ़ी है. लेकिन चीज़ें अभी पूरी तरह से नहीं सुधरी हैं. अप्रैल से सितंबर के 6 महीने में 8 मुख्य उद्योगों की ग्रोथ रेट पिछले साल के मुकाबले में 16.6 फीसदी रही है. पिछले साल इन 6 महीनों में ग्रोथ रेट माइनस में 14.5 थी. मतलब उद्योगों ने माइनस 14.5 के मुकाबले इस बार 16.6 फीसदी की वृद्धि दर्ज की. मतलब ये कि पिछले साल हमारे उद्योग साढ़े चौदह कदम पीछे चले गए थे. वहां से अब 16.6 कदम आगे बढ़ गए हैं. तो अभी हमने सिर्फ गड्डा ही भरा है.
आर्थिक तरक्की के नाम पर रौनक सिर्फ शेयर बाज़ार में दिखती है. शेयर बाज़ार 60 हजार के पार पहुंच गया है. हालांकि शेयर बाज़ार के बारे में ये भी कहा जाता है, देश की अर्थव्यवस्था का थर्मामीटर नहीं है सेंसेक्स. सेंसेक्स के क्रैश करने की आशंका भी हमेशा बनी रहती है.










