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अमेरिका अपना अपराध कैसे छिपाकर रखता है?

अमेरिका के अपराध के खुलासे से क्या बदलने वाला है?

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अमेरिका के अपराध के खुलासे से क्या बदलने वाला है?
एक बड़ी मशहूर टैगलाइन है - दाग अच्छे हैं. अमेरिका भी यही कहता है. बस इतना अंतर है कि वो दाग छिपाकर रखता है. सारे तिकड़म भिड़ाकर. फिर एक अख़बार की एंट्री होती है. वो पर्दे हटा देता है. फिर जो दिखता है, वो दुनिया की सबसे बड़ी महाशक्ति कहलाने वाले देश का एक घिनौना चेहरा है. इस चेहरे की पूरी कहानी क्या है? अमेरिका अपना अपराध कैसे छिपाकर रखता है? और, खुलासे से क्या बदलने वाला है? ये साल 2021 है. दिसंबर का महीना चल रहा है. ये नए साल में नई शुरुआत के लिए तैयार होने का मौसम है. लेकिन अमेरिका के पुराने पापों ने उसका रूटीन चौपट कर रखा है. इस समय अमेरिका में दो ड्रोन हमलों का जिन्न बाहर निकला हुआ है. पहला मामला काबुल से जुड़ा है. तालिबान के क़ब्ज़े के बाद अमेरिकी सेना निकलने की तैयारी कर रही थी. इसी बीच 26 अगस्त 2021 को काबुल एयरपोर्ट पर हमला हुआ. इसमें सौ से अधिक लोग मारे गए. मरनेवालों में 13 अमेरिकी सैनिक भी थे. इस हमले का आरोप इस्लामिक स्टेट ख़ुरासान प्रॉविंस (ISKP) पर लगा. हमले के तीन दिन बाद अमेरिका ने बदला लेने का दावा किया. दावा कुछ यूं कि यूएस आर्मी के ड्रोन अटैक में ISKP की टॉप लीडरशिप को मार गिराया गया है. जब जांच हुई तो पता चला कि ये दावा पूरी तरह से झूठ है. ड्रोन हमले में मारे गए लोग बेगुनाह नागरिक थे. कुल दस लोगों की मौत हुई थी. सब के सब एक ही परिवार से थे. इनमें से सात बच्चे थे. अमेरिका एक हफ़्ते तक इस सच को नकारता रहा. जब दबाव बढ़ा तब उसने माना कि ग़लती हुई है. फिर दोषियों पर कार्रवाई की मांग उठी. पेंटागन ने जांच बिठाई. पेंटागन अमेरिका के रक्षा मंत्रालय का मुख्यालय है. 13 दिसंबर को पेंटागन का बयान आया. कहा गया कि ये हमें एक भी दोषी नहीं मिला. ये सब चलता रहता है. किसी पर कोई कार्रवाई नहीं की जाएगी. दूसरा मामला सीरिया का है. 18 मार्च 2019 की बात है. सीरिया के बगुज़ में एक काफ़िले पर ड्रोन से हमला किया गया. पहले तीन सौ किलो का बम गिराया गया. पहले अटैक में ज़िंदा बच गए लोग बचने के लिए भागे तो दूसरा बम गिराया गया. इस बार बम चार गुणा बड़ा था. हमले में कुल 90 लोग मारे गए. इनमें से 70 बेगुनाह नागरिक थे. उनका इस्लामिक स्टेट से कोई लेना-देना नहीं था. ये बात सेना को पता थी. मगर घटना को पूरी तरह दबा दिया गया. नवंबर 2021 में न्यू यॉर्क टाइम्स ने गुमनाम स्रोतों और क्लासीफ़ाईड दस्तावेजों के आधार पर पूरी रिपोर्ट छाप दी. इसके बाद अमेरिकी रक्षा मंत्री लॉयड ऑस्टिन को जांच का आदेश देना पड़ा. रिव्यू रिपोर्ट 90 दिनों के भीतर आ जाएगी. जानकारों का कहना है कि इसका हाल भी काबुल जैसा ही होगा. रिपोर्ट आएगी. जिसमें कोई भी दोषी नहीं होगा. मतलब किसी पर कोई कार्रवाई नहीं होगी. इन दोनों मामलों को लेकर अमेरिकी सरकार और सेना की भयानक किरकिरी हो रही थी. पारदर्शिता की मांग चल रही थी. मानवाधिकार संगठनों ने मोर्चा खोला हुआ था. इसी बीच 18 दिसंबर को न्यू यॉर्क टाइम्स ने नया बम फोड़ दिया. टाइम्स ने पेंटागन के तहखाने में बंद कुछ लिफाफे खोले हैं. इनसे क्या पता चला है? इससे सामने आया है कि काबुल और बगुज़ की घटना तो महज एक तिनका भर है. असलियत में इसकी अनगिनत परतें है. मसलन, यूएस आर्मी कहती है कि 2014 से सीरिया और इराक़ में किए गए हवाई हमलों में 1407 नागरिक मारे गए. अफ़ग़ानिस्तान में 2018 के बाद के हवाई हमलों में 188 नागरिक मारे गए. टाइम्स की पड़ताल कहती है कि ये गिनती कई गुणा अधिक है. टाइम्स ने फ़्रीडम ऑफ़ इंफ़ॉर्मेशन और कोर्ट केसेज़ के ज़रिए 13 सौ से अधिक सीक्रेट दस्तावेज़ हासिल किए हैं. उन्होंने हमले की सौ से अधिक जगहों की पड़ताल की. सैकड़ों सर्वाइवर्स और पूर्व अधिकारियों का इंटरव्यू किया. तब जाकर उनकी रिपोर्ट पूरी हुई है. पहले कुछ उदाहरण देख लेते हैं. ताकि आपको यूएस आर्मी की चूक का दायरा पता चले. नील क्रिस्टोफ़र प्रकाश एक ऑस्ट्रेलियाई नागरिक था. वो इस्लामिक स्टेट के लिए नए लोगों को रिक्रूट किया करता था. अप्रैल 2016 में टिप मिली कि नील मोसुल की एक इमारत में छिपा है. टिप के आधार पर यूएस आर्मी ने हमला किया. आर्मी ने दावा किया कि हमले में नील मारा गया. छह महीने बाद नील प्रकाश को तुर्की बॉर्डर पर अरेस्ट किया जाता है. तब पता चलता है कि मोसुल अटैक में मारे गए लोग आम नागरिक थे. इसी तरह की एक घटना जून 2015 की है. इराक़ के हविजा में एक कार बम बनाने वाली फ़ैक्ट्री की जानकारी मिली. तय हुआ कि रात में हमला किया जाएगा. आकलन ये था कि सिर्फ़ फ़ैक्ट्री को निशाना बनाया जाएगा. लेकिन हमला इतना भयानक था कि आस-पास की कई इमारतें भी उड़ गईं. इन इमारतों में विस्थापित हुए परिवारों ने शरण ले रखी थी. उनके पास अपना घर नहीं बचा था. और, ना ही इतने पैसे कि वे कहीं किराये पर रह सकें. उस रात हमले में कम-से-कम 70 लोग मारे गए थे. कई मामलों में पुष्टि की ज़रूरत नहीं समझी गई. जब पहला बम गिरता, तब आस-पास के लोग बचाने के लिए मेडिकल मदद के लिए दौड़ते थे. उन्हें IS आतंकी समझकर उनके ऊपर हमला किया गया. मोटरसाइकिल पर सफ़र कर रहे आम लोगों को हमलावर समझकर मारा गया. एक बार तो घर के अंदर सो रहे लोगों पर बम गिराया गया. यूएस आर्मी ये मान रही थी कि उस घर में कोई भी आम नागरिक नहीं है. जो घटनाएं हमने आपको सुनाईं, वे तो बस उदाहरण भर हैं. असल संख्या सैकड़ों में है. टाइम्स की रिपोर्ट के मुताबिक, यूएस आर्मी ने जान-बूझकर नियम-कानूनों को ताक पर रखा. एयर स्ट्राइक की एक परंपरा रही है. हमले से पहले नागरिकों को होने वाले नुकसान का आकलन किया जाता है. फिर ऊपर से अप्रूवल मिलने के बाद ही आगे बढ़ा जाता है. लेकिन हुआ क्या? कई मामलों में ग़लत और अधूरे सबूतों के आधार पर बम गिराने की इजाज़त दे दी गई. सिर्फ़ एक मामले में अधिकारियों ने हमले की जगह की पड़ताल की. सिर्फ़ दो बार सर्वाइवर्स का हाल-चाल लिया गया. 1311 में से एक रिपोर्ट में ये कहा गया कि ज़रूरी प्रक्रिया का पालन नहीं हुआ है. उस एक मामले में भी किसी पर कोई एक्शन नहीं लिया गया. अब ये जान लेते हैं कि इन ग़लतियों की शुरुआत कहां से हुई थी? 9/11 के हमले के बाद अमेरिका अफ़ग़ानिस्तान में आया. तालिबान और अल-क़ायदा को जड़ से खत्म करने के लिए. दो महीने के अंदर तालिबान का बस्ता गोल हो गया. अमेरिका को लगा ये जंग तो आसानी से जीत गए. उन्होंने अपना ध्यान इराक़ पर फ़ोकस किया. इस बीच तालिबान और बाकी आतंकी संगठनों ने फिर से सिर उठा लिया. वे विदेशी सैनिकों पर हमले करने लगे. दूतावासों में बम फोड़ने लगे. विदेशियों को किडनैप कर अपनी मांगें मनवाने लगे. जनवरी 2009 में बराक ओबामा अमेरिका के राष्ट्रपति बने. उन्होंने वादा किया था कि वे इराक़ और अफ़ग़ानिस्तान से अपने सैनिकों को निकाल लेंगे. लेकिन हालात इतने खराब हो चुके थे कि उन्हें संख्या बढ़ानी पड़ी. तब तक स्थिति साफ़ हो चुकी थी कि अफ़ग़ानिस्तान में जीतना नामुमकिन है. रोज़ अमेरिकी सैनिक मारे जा रहे थे. ओबामा पर दबाव बढ़ रहा था. 2014 में वो नई स्कीम लेकर आए. उन्होंने कहा कि अब यूएस आर्मी ग्राउंड पर लड़ाई करने नहीं उतरेगी. अब हम दूर बैठकर अपने टारगेट पर हमला कर सकेंगे. अनमैन्ड एयरक्राफ़्ट्स के ज़रिए. ओबामा ने दावा किया कि ये इतिहास का सबसे सटीक एयर कैंपेन होगा. फिर अमेरिका ने इराक़, सीरिया और अफ़ग़ानिस्तान में ड्रोन और यूएवी से हमले की शुरुआत की. जनवरी 2017 में डोनाल्ड ट्रंप सत्ता में आ गए. उनके टाइम में यूएस आर्मी ने 50 हज़ार से अधिक हवाई हमले किए. जैसा कि दावा किया गया था, हमले सटीक होंगे और आम लोगों को कम-से-कम नुकसान होगा. अंत में ये सारे दावे खोखले साबित हुए. अमेरिका ने अपनी ग़लती सुधारने की बजाय रिपोर्ट्स को दबाना ज़्यादा ज़रूरी समझा. इससे साबित होता है कि वे आम लोगों की जान को लेकर कितने लापरवाह थे. अंत में रिपोर्ट का सार समझ लेते हैं. - पहली बात, अमेरिकी एयर स्ट्राइक्स में मारे गए आम लोगों की संख्या में बेमानी हुई है. आर्मी की गिनती 14 सौ के आस-पास है. असली गिनती इससे कई गुणा अधिक है. मसलन, 2016 में सीरिया के तोखर गांव पर हमला किया गया. यूएस आर्मी ने कहा कि इसमें 07 से 24 आम नागरिक मारे गए. टाइम्स की पड़ताल में ये आंकड़ा 120 निकला. - दूसरी बात, हवाई हमलों की प्लानिंग में ख़ूब लोचा किया गया. कई मामलों में नीचे के अधिकारियों ने हमले के आदेश दिए. हीट ऑफ़ द मोमेंट में. इन मामलों में पहले से कोई प्लानिंग नहीं की गई थी. - तीसरी बात, खुफिया एजेंसियों ने अपना काम ठीक से नहीं किया. निशाना लगाने में भारी चूक हुई. कई बार पूर्वाग्रह के आधार पर हमले किए गए. जिसके चलते बड़ी संख्या में आम लोग मारे जाते रहे. - चौथी बात, पेंटागन ने रिपोर्ट्स को छिपाने की पूरी कोशिश की. किसी भी दोषी के ख़िलाफ़ कार्रवाई नहीं की गई. कई हमलों के वीडियो फुटेज भी डिलीट कर दिए गए. यूएस आर्मी ने दावा किया कि हम पुरानी ग़लतियों से सीखते हैं. टाइम्स की रिपोर्ट कहती है कि आर्मी ने पुरानी ग़लतियों से कोई सीख नहीं ली. उन्होंने उसे सुधारने की कोई कोशिश भी नहीं की. हक़ीक़त तो ये है कि उन्होंने उन ग़लतियों को दोहराना जारी रखा. खुलासा हो चुका, अब आगे क्या होगा? टाइम्स ने अपनी रिपोर्ट के लिए यूएस सेंट्रल कमांड को कुछ सवाल भेजे थे. कमांड के प्रवक्ता कैप्टन बिल अर्बन ने कहा कि ग़लतियां हो जाती हैं. दुनिया की सबसे बेहतरीन तकनीक भी ग़लतियों को नहीं रोक सकतीं. हम इनसे बचने की पूरी कोशिश करते हैं. जानकारों का मानना है कि रिपोर्ट से कुछ खास बदलाव की उम्मीद नहीं है. अमेरिका ने अपने गुनाहों को छिपाना और उस पर मिट्टी डालना सीख लिया है. अफ़ग़ानिस्तान से भले ही उसकी वापसी हो चुकी है. इराक़ और सीरिया में वो बना हुआ है. उसके हवाई हमले ज़ारी हैं. आम नागरिकों का मरना बदस्तूर ज़ारी है. और, सच को दबाने का चलन भी.

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