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सायरस से खामनेई तक: ईरान का वो इतिहास, जिसकी गूंज आज सड़कों पर सुनाई दे रही है

Iran Protest Explainer: ईरान का इतिहास सिकंदर से लेकर आज के इस्लामी गणराज्य तक फैला है. पर्शिया की राजशाही, शाह की सत्ता और 1979 की क्रांति से आज के विरोध तक सब इसी संघर्ष की कहानी हैं. इन दिनों ईरान की सड़कों पर खामेनेई के विरोध में और क्राउन प्रिंस के समर्थन में चल रहे प्रदर्शनों को इससे अलग करके नहीं देखा जा सकता.

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सायरस से खामनेई तक: ईरान का वो इतिहास

ईरान में आज जब सड़कों पर फिर से नारे गूंज रहे हैं, कहीं इस्लामी गणराज्य के खिलाफ, तो कहीं पुराने शाह के नाम पर, तब सवाल उठता है कि आखिर ये मुल्क बार बार अतीत की तरफ क्यों देखता है. जवाब छुपा है ईरान के उस लंबे इतिहास में, जो सिकंदर से शुरू होकर खोमैनी तक आता है. इस कहानी में राजशाही है, धर्म है, खून है, किताबें हैं, और भारत से जुड़ी ऐसी डोर है जो ढाई हजार साल से नहीं टूटी.

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तो चलिए, किस्सागोई के अंदाज़ में समझते हैं ईरान की पूरी कहानी.

ईरान, पर्शिया, फारस… नाम कई, कहानी एक

आज जिसे हम ईरान कहते हैं, उसे दुनिया सदियों तक पर्शिया या फारस के नाम से जानती थी. खुद ईरानी इसे हमेशा से ईरान ही कहते आए. बाहर वालों ने फारस कहा. नाम बदले, लेकिन ताकत और संस्कृति की कहानी वही रही.

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करीब चार हजार साल पहले यहां इलेमाइट लोग रहते थे. फिर अस्सीरियन आए, फिर मेडियन. राजधानी बनी हमदान. यहीं से ईरान में बाकायदा राजशाही की जड़ें पड़ीं.

सायरस द ग्रेट, पहला सुपरस्टार

ईरान के इतिहास का पहला बड़ा सितारा थे सायरस द ग्रेट. इन्होंने मेडियन साम्राज्य को हराकर एकेमेनिड साम्राज्य खड़ा किया. साम्राज्य ऐसा कि पूर्वी यूरोप से लेकर सिंधु नदी तक फैल गया.

सायरस सिर्फ तलवार वाले राजा नहीं थे. उन्होंने शासन को व्यवस्थित किया. क्षत्रप प्रणाली शुरू की. अलग अलग इलाकों में गवर्नर नियुक्त किए. जब बेबीलोन जीता, तो वहां कैद यहूदियों को आज़ाद कर दिया. इसी वजह से यहूदी ग्रंथों में सायरस को मसीहा जैसा दर्जा मिला.

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यहीं से भारत और फारस का रिश्ता पक्का होता है. अफगानिस्तान और सिंधु के पश्चिमी इलाके फारस के अधीन आए. अदालत, जमीन, बाजार, दीवान, आदमी जैसे शब्द भारत की जुबान में यहीं से आए.

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ईरान का इतिहास
डेरियस, हिंदुस्तान और दुनिया का आधा हिस्सा

सायरस के बाद डेरियस द ग्रेट आए. इनके दौर में फारस दुनिया की करीब 44 प्रतिशत आबादी पर राज करता था. यही वो डेरियस हैं जिनके समय भारत को ‘हिंदुस्तान’ नाम मिला. लेकिन फारस की सबसे बड़ी गलती भी यहीं हुई. ग्रीस पर चढ़ाई.

सिकंदर, एक अंगूठी और पर्शिया की हार

331 ईसा पूर्व. सिकंदर मैदान में खड़ा है. सामने रथ पर डेरियस थर्ड की लाश. सिकंदर दुखी है. वो दुश्मन को जिंदा पकड़ना चाहता था. डेरियस की उंगली से अंगूठी उतारता है और खुद पहन लेता है. इसी पल मैसेडोनिया का सिकंदर बन जाता है पर्शिया का सुल्तान. 

सिकंदर ने फारस को हराया, फिर हिंदुस्तान की तरफ बढ़ा. लेकिन फौज थक चुकी थी. वापसी करनी पड़ी. कुछ ही सालों में सिकंदर मर गया.

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सिकंदर और ईरान
सासानी, शहंशाह और रोम की बेइज्जती

सिकंदर के बाद सेल्युकिड, फिर पार्थियन आए. आखिरकार सासानी साम्राज्य खड़ा हुआ. संस्थापक थे अर्दशीर. उनके बेटे शापुर को शहंशाह कहा गया.

शापुर ने वो कर दिखाया जो किसी फारसी राजा ने नहीं किया था. रोमन सम्राट वैलेरियन को युद्ध में पकड़ लिया. किस्सों के मुताबिक शापुर ने उसे घोड़े पर चढ़ते वक्त पायदान बनाया. सच जो भी हो, रोम की बेइज्जती पक्की थी.

इस्लाम का आगमन और पारसी लोगों का भारत आना

सातवीं सदी में इस्लाम आया. अरब सेनाओं ने फारस पर कब्जा कर लिया. जोरोस्ट्रियन धर्म के अनुयायियों पर दबाव बढ़ा. यही लोग आगे चलकर पारसी कहलाए.

जान बचाने के लिए ये लोग फारस से निकले. पहले होरमुज, फिर समुद्र पार करके भारत पहुंचे. गुजरात के जदी राणा ने उन्हें शरण दी, शर्तों के साथ. पारसियों ने शर्तें मानी और संजान बसाया. पवित्र अग्नि को साथ लाए. आज मुंबई, नवसारी और सूरत की पारसी पहचान यहीं से निकली.

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चंगेज खान और ईरान
फिरदौसी, शाहनामा और फारसी पुनर्जागरण

अरबों के बाद तुर्क आए. सेल्जुकों का दौर आया. यही इस्लामिक गोल्डन एज था. फारसी भाषा फिर फली फूली. फिरदौसी ने शाहनामा लिखा. ईरान में शाहनामा वही है, जो भारत में महाभारत.

मंगोल, चंगेज और तबाही

1219. ओतरार में मंगोल व्यापारियों की हत्या हुई. चंगेज खान भड़का. नतीजा ऐसा कि ख्वारिज्म साम्राज्य मिट्टी में मिला दिया गया. बुखारा जला. समरकंद उजड़ा. फारस के शहर सदियों तक उबर नहीं पाए. इनलचुक को पिघली चांदी से मारा गया. इतिहास कांप उठा.

तैमूर, दिल्ली और खून की होली

मंगोलों के बाद तैमूर लंग आया. 1398 में दिल्ली पर हमला. पंद्रह दिन में शहर लूट लिया. दिल्ली सौ साल तक संभल नहीं पाई.

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ईरान की हिस्ट्री दिलचस्प है
शिया ईरान और नादिर शाह

सफवी वंश के दौर में ईरान ने सुन्नी से शिया होने का फैसला किया. यही वजह है कि आज ईरान शिया बहुल है. फिर आया नादिर शाह. 1739 में दिल्ली पर हमला. मुगल बादशाह रंगीला शराब में चिट्ठी डुबोता रहा और नादिर शाह तख्त ए ताऊस, कोहिनूर, तैमूरिया माणिक उठा ले गया. उसी दिन से मुगल सल्तनत का सूरज ढल गया.

पर्शिया से ईरान और पहलवी वंश

उन्नीसवीं सदी में पर्शिया ब्रिटेन और रूस की रस्साकशी में फंसा. 1925 में रेजा शाह पहलवी आए. 1935 में उन्होंने देश का नाम आधिकारिक तौर पर ईरान कर दिया.

दूसरे विश्व युद्ध में ब्रिटेन और रूस ने हमला किया. रेजा शाह हटे. बेटे मोहम्मद रेजा शाह आए.

तेल, अमेरिका और तख्तापलट

1951 में मोहम्मद मोसादिक ने तेल राष्ट्रीयकरण किया. जनता खुश, अमेरिका और ब्रिटेन नाराज. 1953 में सीआईए की मदद से तख्तापलट हुआ. शाह वापस आए. 

ये भी पढ़ें: ईरान के कई शहरों में बड़े पैमाने पर उग्र प्रदर्शन, 'शाह जिंदाबाद' के नारे गूंजे

2500 साल की पार्टी और जनता का गुस्सा

1971 में शाह ने पर्शियन साम्राज्य की 2500वीं सालगिरह पर दुनिया की सबसे महंगी पार्टी दी. देश भूखा था, शाह जश्न में था. यही पार्टी आगे चलकर उनकी सबसे बड़ी गलती बनी.

खोमैनी और इस्लामी क्रांति

अयातुल्ला रुहुल्लाह खोमैनी, जो निर्वासन में थे, जनता के नायक बन गए. 1979 में लौटे. इस्लामी गणराज्य बना. शाह भागे.

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खामेनेई विरोधी प्रदर्शन
आज का ईरान और राजशाही की याद

खोमैनी के बाद खामेनेई आए. आज भी वही सुप्रीम लीडर हैं. लेकिन सड़कों पर फिर सवाल हैं. क्या इस्लामी गणराज्य सही था. क्या शाह का दौर बेहतर था.

ईरान का इतिहास यही बताता है. ये मुल्क जब भी आगे बढ़ता है, अतीत उसकी टांग खींच लेता है. और शायद इसी वजह से आज भी सिकंदर की अंगूठी, शाहनामा के शेर और शाह की ताजपोशी, सब एक साथ ईरान की राजनीति में जिंदा हैं.

वीडियो: दुनियादारी: ईरान में जेन-जी के प्रदर्शन पर क्या करेंगे खामेनेई?

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