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एक से ज्यादा बच्चे पैदा करो और इनाम पाओ, CM चंद्रबाबू नायडू ऐसा क्यों कर रहे?

Cash for Second and Third Child: आंध्र प्रदेश सरकार दूसरी और तीसरी संतान पर 25,000 रुपये देने की ‘बेबी पॉलिसी’ क्यों ला रही है? अब बड़ा सवाल ये है कि जिस देश में दशकों तक ‘जनसंख्या विस्फोट’ की चिंता रही, वहां एक मुख्यमंत्री आबादी बढ़ाने की बात क्यों कर रहा है?

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‘हम दो हमारे दो’ से यू-टर्न: आंध्र में बच्चे पैदा करने पर मिलेगा इनाम, वजह है 2026 का परिसीमन

कभी टीवी पर एक लाइन बहुत चलती थी. ‘हम दो, हमारे दो’. सरकारें लोगों से कहती थीं कि ज्यादा बच्चे मत पैदा करो. लेकिन अब तस्वीर उलटी दिख रही है. आंध्र प्रदेश के मुख्यमंत्री कह रहे हैं कि दूसरी और तीसरी संतान पैदा करो, सरकार इनाम देगी.

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इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट के मुताबिक मार्च 2026 में इस नई ‘बेबी पॉलिसी’ को लेकर चर्चा तेज है. ड्राफ्ट के मुताबिक अगर किसी परिवार में दूसरी या तीसरी संतान होती है तो सरकार 25 हजार रुपये की प्रोत्साहन राशि दे सकती है.

अब सवाल सीधा है. जिस देश में दशकों तक ‘जनसंख्या विस्फोट’ की चिंता रही, वहां एक मुख्यमंत्री आबादी बढ़ाने की बात क्यों कर रहा है?
जवाब तीन हिस्सों में छिपा है. जनसंख्या का गणित. अर्थव्यवस्था का डर. और सबसे बड़ा, राजनीति का समीकरण.

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क्या बूढ़ा होता जा रहा है आंध्र प्रदेश?

आंध्र प्रदेश समेत दक्षिण भारत के कई राज्यों में एक बड़ा बदलाव दिख रहा है.

फर्टिलिटी रेट तेजी से गिर रहा है

आंध्र प्रदेश समेत दक्षिण भारत के कई राज्यों में जनसंख्या का पैटर्न धीरे धीरे बदल रहा है. पहले जहां परिवारों में तीन चार बच्चे होना आम बात थी, वहीं अब ज्यादातर दंपती एक या दो बच्चों तक ही सीमित रह रहे हैं. शहरों में यह बदलाव और तेज दिखता है. 

शिक्षा का स्तर बढ़ा है, महिलाएं नौकरी और करियर पर ज्यादा ध्यान दे रही हैं, शादी की उम्र भी बढ़ गई है. इसके साथ ही बच्चों की पढ़ाई, स्वास्थ्य और परवरिश का खर्च इतना बढ़ गया है कि कई परिवार ज्यादा बच्चों की जिम्मेदारी लेने से बच रहे हैं. यही वजह है कि आंध्र प्रदेश की जनसंख्या का ढांचा धीरे-धीरे बूढ़ा होता दिखाई दे रहा है.

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इस बदलाव की सबसे बड़ी वजह फर्टिलिटी रेट का गिरना है. फर्टिलिटी रेट का मतलब है कि औसतन एक महिला अपने जीवन में कितने बच्चे पैदा करती है. किसी भी देश या राज्य की आबादी को स्थिर बनाए रखने के लिए यह आंकड़ा लगभग 2.1 होना जरूरी माना जाता है. लेकिन आंध्र प्रदेश में यह करीब 1.5 तक आ गया है, जो रिप्लेसमेंट लेवल से काफी नीचे है. 

इसका सीधा मतलब है कि आने वाली पीढ़ी अपने से पहले वाली पीढ़ी की संख्या को भी पूरी तरह रिप्लेस नहीं कर पाएगी. यानी धीरे धीरे जनसंख्या का आकार स्थिर होने के बजाय सिकुड़ने लगता है और उम्र का संतुलन बुजुर्गों की तरफ झुकने लगता है.

इसका मतलब क्या है?

इसका असर तुरंत दिखाई नहीं देता, लेकिन 15 से 20 साल बाद इसके परिणाम साफ दिखने लगते हैं. उस समय काम करने वाली उम्र के लोग कम हो जाते हैं और पेंशन या सामाजिक सुरक्षा पर निर्भर बुजुर्गों की संख्या बढ़ जाती है. 

दुनिया के कई देशों ने यह दौर पहले ही देख लिया है, जैसे Japan और Italy. वहां आबादी तेजी से बूढ़ी हो रही है और सरकारों को पेंशन, स्वास्थ्य सेवा और श्रम की कमी जैसी चुनौतियों से जूझना पड़ रहा है. आंध्र प्रदेश सरकार को भी यही चिंता सता रही है. 

अगर आने वाले वर्षों में युवा आबादी घटती रही, तो उद्योग, टेक सेक्टर और सर्विस सेक्टर को पर्याप्त कामगार नहीं मिल पाएंगे और इसका असर राज्य की अर्थव्यवस्था की रफ्तार पर पड़ सकता है..

असली चिंता: 2026 का परिसीमन

अब आते हैं उस मुद्दे पर जिसकी चर्चा इन दिनों राजनीति के गलियारों में सबसे ज्यादा हो रही है. यह है लोकसभा सीटों का परिसीमन. परिसीमन का मतलब होता है चुनावी क्षेत्रों की सीमाओं और सीटों की संख्या का नया बंटवारा. यह प्रक्रिया आम तौर पर जनसंख्या के आधार पर होती है ताकि हर सांसद लगभग बराबर आबादी का प्रतिनिधित्व करे. यानी जहां आबादी ज्यादा होगी, वहां सीटें बढ़ सकती हैं और जहां आबादी कम होगी, वहां सीटों का अनुपात घट सकता है.

भारत में यह प्रक्रिया कई दशकों से लगभग रुकी हुई है. 1970 के दशक में जब जनसंख्या नियंत्रण को बढ़ावा देने की नीति शुरू हुई, तब सरकार ने यह फैसला किया कि लोकसभा सीटों का बंटवारा कुछ समय के लिए फ्रीज रखा जाएगा. बाद में यह अवधि बढ़ती रही. आखिरकार 84वें संविधान संशोधन (84th Constitutional Amendment of India) के जरिए यह तय किया गया कि 2026 तक सीटों का नया बंटवारा नहीं होगा. 

इसका मकसद यह था कि जिन राज्यों ने परिवार नियोजन को गंभीरता से लागू किया है, उन्हें तुरंत राजनीतिक नुकसान न झेलना पड़े. लेकिन अब 2026 करीब आ रहा है, इसलिए यह बहस फिर से तेज हो गई है कि अगला परिसीमन किस आधार पर और कैसे होगा.

यहीं से असली पेंच शुरू होता है. उत्तर भारत के कई राज्यों में पिछले दशकों में आबादी तेजी से बढ़ी है. खासकर Uttar Pradesh और Bihar जैसे राज्यों में जनसंख्या वृद्धि की रफ्तार ज्यादा रही. दूसरी तरफ दक्षिण भारत के राज्यों ने परिवार नियोजन और शिक्षा के जरिए जन्मदर को काफी हद तक नियंत्रित कर लिया. नतीजा यह हुआ कि उनकी आबादी अपेक्षाकृत धीमी गति से बढ़ी. 

अब अगर लोकसभा सीटों का बंटवारा पूरी तरह जनसंख्या के आधार पर किया जाता है, तो जिन राज्यों की आबादी तेजी से बढ़ी है, उन्हें ज्यादा सीटें मिलने की संभावना है.

इसका मतलब यह हो सकता है कि भविष्य में उत्तर भारत के राज्यों की लोकसभा में हिस्सेदारी और बढ़ जाए. वहीं दक्षिण भारत के राज्यों की सीटें या तो लगभग स्थिर रह सकती हैं या उनका अनुपात कुल सीटों में कम हो सकता है. 

सीधे शब्दों में कहें तो संसद में राजनीतिक ताकत का संतुलन बदल सकता है. यही वजह है कि दक्षिण भारत के कई नेता इस मुद्दे को गंभीरता से उठा रहे हैं. उनका तर्क है कि जिन्होंने दशकों तक जनसंख्या नियंत्रण की नीति का पालन किया. उन्हें अब राजनीतिक प्रतिनिधित्व के मामले में सजा नहीं मिलनी चाहिए. यही चिंता आंध्र प्रदेश की नई जनसंख्या नीति के पीछे भी एक अहम वजह मानी जा रही है.

परिसीमन से क्या बदल सकता है?

अभी भारत की लोकसभा में कुल 543 सीटें हैं. हर सीट एक निश्चित जनसंख्या का प्रतिनिधित्व करती है. सिद्धांत यह है कि देश के हर हिस्से की आबादी के हिसाब से संसद में प्रतिनिधित्व मिले. लेकिन पिछले कई दशकों से सीटों का नया बंटवारा नहीं हुआ है. 

अगर भविष्य में परिसीमन लागू होता है और सीटों की संख्या या उनका वितरण फिर से जनसंख्या के आधार पर तय किया जाता है, तो जिन राज्यों की आबादी तेजी से बढ़ी है. उन्हें ज्यादा सीटें मिलने की संभावना बन सकती है.

उदाहरण के तौर पर उत्तर भारत के कुछ राज्य पहले से ही संसद में सबसे ज्यादा प्रतिनिधित्व रखते हैं. खासकर Uttar Pradesh लोकसभा में सबसे ज्यादा सांसद भेजता है. अगर नई जनसंख्या के आधार पर सीटों का पुनर्वितरण होता है, तो संभावना है कि इन राज्यों की सीटें और बढ़ जाएं. 

वहीं दक्षिण भारत के कई राज्यों में जनसंख्या वृद्धि अपेक्षाकृत धीमी रही है. इसलिए उनकी सीटें या तो लगभग वहीं रह सकती हैं या कुल सीटों में उनका प्रतिशत कम हो सकता है. इसका मतलब यह होगा कि संसद में क्षेत्रीय संतुलन धीरे धीरे बदलने लगेगा.

इस बदलाव का असर सिर्फ संसद में सीटों की संख्या तक सीमित नहीं रहेगा. संसद में किसी क्षेत्र की ताकत बढ़ने या घटने का असर नीतियों पर भी पड़ सकता है. किस क्षेत्र को कितनी प्राथमिकता मिलेगी, किस सेक्टर में ज्यादा निवेश होगा और किन राज्यों को केंद्र से कितनी फंडिंग मिलेगी, इन सब पर अप्रत्यक्ष प्रभाव पड़ सकता है. राजनीति में भी इसका बड़ा असर दिख सकता है क्योंकि राष्ट्रीय दलों की रणनीति और चुनावी समीकरण नए सिरे से बनेंगे.

यही वजह है कि दक्षिण भारत के कई नेता इस मुद्दे को खुलकर उठा रहे हैं. उनका तर्क है कि जिन राज्यों ने पिछले कई दशकों में जनसंख्या नियंत्रण, शिक्षा और स्वास्थ्य नीतियों को गंभीरता से लागू किया, उन्हें अब राजनीतिक प्रतिनिधित्व के मामले में नुकसान नहीं होना चाहिए. 

उनका कहना है कि अगर सिर्फ जनसंख्या के आधार पर सीटें बढ़ाई गईं, तो इससे उन राज्यों को फायदा मिलेगा जिन्होंने परिवार नियोजन को उतनी सख्ती से लागू नहीं किया. इसलिए परिसीमन की बहस सिर्फ तकनीकी या प्रशासनिक मुद्दा नहीं रह गया है, बल्कि यह आने वाले समय में भारत की राजनीति के संतुलन को तय करने वाला बड़ा विषय बनता जा रहा है.

25 हजार का इनाम और चुनावी नियमों में बदलाव

आंध्र प्रदेश सरकार के प्रस्ताव में सिर्फ कैश इंसेंटिव की बात नहीं है, बल्कि इसके साथ कुछ अहम नीतिगत बदलाव भी जोड़े जा रहे हैं. सबसे ज्यादा चर्चा जिस प्रावधान की हो रही है, वह है दूसरी और तीसरी संतान पर 25 हजार रुपये की प्रोत्साहन राशि. सरकार का तर्क है कि अगर परिवारों को आर्थिक सहयोग दिया जाए तो वे ज्यादा बच्चों के बारे में सोच सकते हैं. 

हालांकि यह रकम बहुत बड़ी नहीं मानी जा रही, लेकिन इसे एक प्रतीकात्मक संदेश की तरह देखा जा रहा है. यानी सरकार यह बताना चाहती है कि अब उसकी प्राथमिकता जनसंख्या को सीमित करना नहीं, बल्कि संतुलित स्तर तक बढ़ाना है.

इस प्रस्ताव का दूसरा अहम हिस्सा स्थानीय निकाय चुनावों से जुड़ा है. पिछले दो दशकों में देश के कई राज्यों में यह नियम लागू किया गया था कि अगर किसी व्यक्ति के दो से ज्यादा बच्चे हैं तो वह पंचायत या नगर निकाय चुनाव नहीं लड़ सकता. इस नियम का उद्देश्य लोगों को परिवार नियोजन के लिए प्रेरित करना था. 

आंध्र प्रदेश में भी इसी तरह की पाबंदी लागू रही है. लेकिन अब सरकार इस शर्त को हटाने या नरम करने पर विचार कर रही है. अगर ऐसा होता है तो तीन या उससे ज्यादा बच्चों वाले लोग भी पंचायत, नगर पालिका या अन्य स्थानीय चुनावों में भाग ले सकेंगे.

सरकार के इस कदम को कई लोग एक बड़े नीति बदलाव के संकेत के तौर पर देख रहे हैं. पहले जहां जनसंख्या नियंत्रण को बढ़ावा देने के लिए सख्त नियम बनाए गए थे, वहीं अब गिरती जन्मदर को देखते हुए वही नियम धीरे धीरे हटाए जा रहे हैं. इसका मकसद यह संदेश देना है कि ज्यादा बच्चों को अब सामाजिक या राजनीतिक नुकसान से नहीं जोड़ा जाएगा. 

कुल मिलाकर सरकार सिर्फ लोगों को सलाह नहीं दे रही, बल्कि नीति और कानून के स्तर पर भी बदलाव करने की कोशिश कर रही है ताकि जनसंख्या के गिरते ग्राफ को रोका जा सके.

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क्या 25 हजार से लोग बच्चे पैदा करेंगे?

यहीं आकर पूरी बहस का सबसे बड़ा सवाल खड़ा होता है. क्या सच में 25 हजार रुपये का प्रोत्साहन किसी परिवार को दूसरा या तीसरा बच्चा पैदा करने के लिए प्रेरित कर सकता है? आज की युवा पीढ़ी यानी मिलेनियल्स और Gen Z का जीवन पहले की पीढ़ियों से काफी अलग है. उनके फैसले सिर्फ परंपरा या परिवार के दबाव से नहीं, बल्कि करियर, आर्थिक स्थिरता और लाइफस्टाइल जैसे कई कारकों से प्रभावित होते हैं. 

शहरों में खासकर यह सोच तेजी से बदल रही है कि पहले करियर बनाओ, आर्थिक सुरक्षा हासिल करो और उसके बाद ही परिवार बढ़ाने के बारे में सोचो.

इसका एक बड़ा कारण बढ़ती महंगाई भी है. पिछले कुछ वर्षों में बच्चों की शिक्षा का खर्च बहुत तेजी से बढ़ा है. अच्छे स्कूलों की फीस, कोचिंग, डिजिटल लर्निंग और अन्य गतिविधियों पर होने वाला खर्च कई मध्यमवर्गीय परिवारों के बजट को प्रभावित करता है. 

इसके साथ ही स्वास्थ्य सेवाएं भी पहले से काफी महंगी हो चुकी हैं. गर्भावस्था से लेकर बच्चे के जन्म और उसके बाद के मेडिकल खर्च तक, हर चरण में बड़ी रकम लगती है. यही वजह है कि अब कई परिवार बच्चों की संख्या तय करते समय इसे भावनात्मक नहीं बल्कि आर्थिक फैसले की तरह देखते हैं.

इसी वजह से कई विशेषज्ञों का मानना है कि 25 हजार रुपये का प्रोत्साहन बहुत बड़ा बदलाव नहीं ला पाएगा. यह रकम बच्चे के जन्म और उसकी परवरिश के कुल खर्च के सामने बेहद छोटी मानी जाती है. 

दुनिया के कई देशों ने इस समस्या से निपटने के लिए इससे कहीं बड़े प्रोत्साहन दिए हैं. उदाहरण के तौर पर Japan और South Korea में सरकारें बच्चों के जन्म पर भारी आर्थिक सहायता, टैक्स छूट और चाइल्ड केयर सुविधाएं देती हैं. इसके बावजूद वहां फर्टिलिटी रेट बढ़ाना आसान नहीं रहा. 

यही कारण है कि आंध्र प्रदेश की इस योजना को लेकर भी बहस जारी है कि क्या सिर्फ आर्थिक इनाम से लोगों के पारिवारिक फैसलों को बदला जा सकता है, या इसके लिए शिक्षा, रोजगार, चाइल्ड केयर और सामाजिक सुरक्षा जैसी बड़ी नीतियों की जरूरत पड़ेगी.

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