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बनारस हिंदू विश्वविद्यालय में बीटेक और यौन शोषण के चार साल

लड़कियों को दबोचा गया, चलते रिक्शे से उठाने की कोशिश की गई.

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आज जो वहां की लड़कियों के साथ हो रहा है, उसे देख मेरा खून उसी तरह खौलता है जिस तरह 10 साल पहले खौलता था. इतने सालों में कुछ भी नहीं बदला, कुछ भी नहीं.

BHU में मेरा पहला साल था. मुझे बताया गया कि हॉस्टल वापस आने का आखिरी वक़्त शाम 7 बजे है और मैंने इसका पालन किया. अपनी सुरक्षा के लिए.

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एक दोपहर 3 बजे मैं अपनी सहेली के साथ स्विमिंग पूल से अपने हॉस्टल गांधी स्मृति महिला छात्रावास की तरफ पैदल जा रही थी. सेमी-सर्कल आकार की रोड नंबर 5 पर. सफ़ेद स्कूटर पर एक आदमी जाने कहां से अचानक आया. हमारे पास रुका और पैंट से अपना लिंग बाहर निकालकर हस्तमैथुन करने लगा! 17 साल की उम्र में मेरा 'मर्दानगी' से अनचाहा सामना हुआ. हम रामानुजन हॉस्टल की तरफ बदहवास भागे. उसी साल मेरी एक और सहेली को विश्वकर्मा हॉस्टल के पास दबोचा गया. दो लड़के बाइक पर आए और मेरी दोस्त की छाती पकड़कर मुस्कुरा रहे थे. मुस्कुराते भी क्यों न, इसमें उनकी मर्दानगी जो थी. मैंने BHU में अपने पहले साल में सेमी सर्कल आकार वाली रोड नंबर 5 पर न चलना सीखा, अपनी सुरक्षा के लिए.


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मैंने BHU में अपने पहले साल में सेमी सर्कल आकार वाली रोड नंबर 5 पर न चलना सीखा, अपनी सुरक्षा के लिए.

सेकंड इयर में हॉस्टल का इन-टाइम रात 8 बजे का होता था. मैंने इसका भी पालन किया, अपनी सुरक्षा के लिए. हमने एक घंटे की छूट चाही, ताकि हम पढ़ाई के अलावा और भी चीजों में भाग ले सकें. ये बताना न होगा कि हमें अतिरिक्त एक घंटा नहीं दिया गया. उल्टा हमसे कहा गया कि IIT वाली लड़कियां बहुत डिमांड करती हैं. महिला महाविद्यालय हॉस्टल की लड़कियों का इन-टाइम तो 6 बजे का है. अपनी तानाशाही बरकरार रखने के लिए लड़कियों के एक समूह की इस तरह दूसरे समूह से तुलना की गई. महामना को याद किया गया और हमें याद दिलाया गया कि अगर हम शाम को हॉस्टल के बाहर रहे, तो उनकी आत्मा को कितना कष्ट होगा. उस साल मैंने सीखा कि पढ़ाई के अतिरिक्त कुछ भी करना हो, तो छुट्टियों के दिन करूं या सुबह-सवेरे, अपनी सुरक्षा के लिए.

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मैंने सीखा कि पढ़ाई के अतिरिक्त कुछ भी करना हो तो छुट्टियों के दिन करूं या सुबह-सवेरे, अपनी सुरक्षा के लिए.
मैंने सीखा कि पढ़ाई के अतिरिक्त कुछ भी करना हो तो छुट्टियों के दिन करूं या सुबह-सवेरे, अपनी सुरक्षा के लिए.

BHU में तीसरा साल. सुबह 6-7 बजे मैं IT-BHU रोड और SBI ऑफिस से हैदराबाद रोड तक दौड़ने जाती थी. विश्वनाथ मंदिर से धनराजगिरी हॉस्टल तक मुझे स्कूटर से वही लड़का फॉलो करता था, जो फर्स्ट इयर में मिला था. मैं एक दिन जूस की दुकान पर रुक गई कि वो चला जाए. मगर वो रुका रहा और मुझे हॉस्टल तक फॉलो किया. मैंने उसके स्कूटर का नंबर याद कर लिया. फिर हॉस्टल पहुंचकर गार्ड और वॉर्डन से शिकायत की. गार्ड ने बताया कि कैंपस में ही रहने वाले एक महाशय की जान-पहचान का बंदा है वो, इसलिए उसे कुछ नहीं कह सकते. उसके बाद से जॉगिंग पर मैंने अपने एक पुरुष दोस्त से साथ चलने के लिए कहा, अपनी सुरक्षा के लिए.


जॉगिंग पर मैंने अपने एक पुरुष दोस्त से साथ चलने के लिए कहा, अपनी सुरक्षा के लिए.
जॉगिंग पर मैंने अपने एक पुरुष दोस्त से साथ चलने के लिए कहा, अपनी सुरक्षा के लिए.

BHU में चौथा साल. मुझे याद है वो सितंबर-अक्टूबर का ही महीना होगा, जब मेरी एक सहेली को रिक्शे से उठा ले जाने की कोशिश की गई. ये विश्वसरैया हॉस्टल और हमारे हॉस्टल के बीच एक कोने में हुआ. 200 मीटर दूर हैदराबाद गेट पर ही प्रॉक्टर थे. फिर भी उन लोगों में इतनी हिम्मत थी कि एक लड़की को किडनैप करने की कोशिश की गई. लड़की की ताकत और हिम्मत काबिले-तारीफ थी कि पूरी ताकत लगाकर वो रिक्शे पर बैठी रही और उन लड़कों को भागना पड़ा.


हर जगह जाने के लिए ऑटो रिक्शा लेने का फैसला कर लिया, अपनी सुरक्षा के लिए.
हर जगह जाने के लिए ऑटो रिक्शा लेने का फैसला कर लिया, अपनी सुरक्षा के लिए.

हमारे हॉस्टल के सामने की स्ट्रीट लाइट बहुत धीमी थी. हमने एक हफ्ते तक विरोध-प्रदर्शन कर उसे बदलवाया, जिसके बाद प्रॉक्टर्स को सड़क पर गश्त लगाने के लिए बोला लगा. मगर प्रॉक्टर्स को कभी कोई छेड़खानी करने वाला नहीं मिला. केवल वो लड़कियां दिखीं, जो पुरुष दोस्तों के साथ टहल रही होती थीं. दो हफ़्तों बाद ये मॉरल पुलिस भी गायब हो गई और हमने खुद ही हर जगह जाने के लिए ऑटो रिक्शा लेने का फैसला कर लिया, अपनी सुरक्षा के लिए.

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BHU को देश की सबसे पुरानी यूनिवर्सिटी होने पर गर्व है, मगर यहां होने वाली मॉरल पुलिसिंग भी उतनी ही पुरानी है, जितनी ये यूनिवर्सिटी है. शोषित होने का दोष यहां पीड़ितों को ही दिया जाता है. ये सोच यहां के प्रॉक्टर्स, प्रबंधन और पुलिस के दिमाग में मानो सुई-धागे से टांक दी गई है. आज जो वहां की लड़कियों के साथ हो रहा है, उसे देख मेरा खून उसी तरह खौलता है, जिस तरह 10 साल पहले खौलता था. इतने सालों में कुछ भी नहीं बदला, कुछ भी नहीं.


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यहां होने वाली मॉरल पुलीसिंग भी उतनी ही पुरानी है, जितनी ये यूनिवर्सिटी है

कहते हैं,


यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते रमन्ते तत्र देवता: यत्रैतास्तु न पूज्यन्ते सर्वास्तत्राफला: क्रिया:

मगर इस आध्यात्मिक और शैक्षिक लिहाज से देश के सबसे पुराने शहर काशी में इसका कोई महत्त्व नहीं है.



जयंतिका

ये आर्टिकल जयंतिका सोनी ने लिखा है. जयंतिका ने IT-BHU (अब IIT) से पढ़ाई की है. 2011 में वहां से पास हुईं. फ़िलहाल नेशनल यूनिवर्सिटी ऑफ़ सिंगापुर से पीएचडी कर रही हैं. ये आर्टिकल सबसे पहले मीडियम
पर छपा था.



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