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क्या ऑयल के निगेटिव प्राइस के चलते, उल्टा हमें तेल खरीदने के पैसे मिलेंगे?

इसको पढ़ने के बाद दौड़-दौड़ कर लोगों को 'क्रूड' का सारा गणित समझाने की चुल्ल उठेगी.

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लेफ़्ट वाली तस्वीर 1973 में ली गई है. जब ओपेक ने अमेरिका तक पर प्रतिबंध लगा दिया था और तेल के दाम चार गुना हो गए थे. (तस्वीर: David Falconer). राईट वाली तस्वीर मॉस्को के इंडेक्स की है.क्रूड के दाम गिरने से मॉस्को का शेयर मार्केट डाउन हो गया. (तस्वीर:एपी).
दिल-दिल दारा मेरा तेली का तेल. कौड़ी-कौड़ी पैसा-पैसा, पैसे का खेल.
गुलज़ार ने भी नहीं सोचा होगा कि उनकी ये लाइन कितनी फ़्यूचरस्टिक है. कि क्या संबंध स्थापित होने वाला है कौड़ी और तेल में. तेल जिसे काला सोना कहा जाता है.
'काला सोना' कहा जाता है, या कहा जाता था? चलिए जानते हैं, ‘ग़लिबन’ वो सब कुछ जिसके चलते 'सोना' हट गया और सब कुछ सिर्फ़ 'काला' रह गया.
# ख़बर क्या है (ख़ाक हो जाएंगे हम, तुमको ख़बर होने तक)-
अमेरिका में कच्चे तेल का बेंचमार्क है- वेस्ट टेक्सास इंटरमीडिएट. शॉर्ट में, WTI. सोमवार को कुछ घंटों के भीतर ही इसका वायदा भाव (यानी फ्यूचर प्राइसिंग, मतलब आने वाले मई महीने की कीमत) 18 डॉलर प्रति बैरल से घटकर -38 (माइनस 38) डॉलर पहुंच गई. # इसके मायने क्या हैं (कोई हमको ये तो समझा दो कि समझाएंगे क्या)-
हमने ऊपर कई खास टर्म इस्तेमाल किए. मसलन- 'WTI', 'फ़्यूचर प्राइसिंग', 'किसी चीज़ का भाव माइनस हो जाना'.
यक़ीनन ये टर्मस ऐसे पेंचो-ख़म हैं कि ये छोटी सी ख़बर और इसका असर इतनी आसानी से समझ में नहीं आ रहा है. तो चलिए शुरू से शुरू करते हैं सब कुछ आसान करते हुए.
# ख़बर में मेंशन वायदा बाज़ार क्या है (तो ये जान झूठ जानां)-
आपके पास ढेरों पैसे आए हैं. आप उन पैसों से छह महीने का राशन ख़रीदना चाहते हैं. अब आप क्या करते हैं, परचून वाले के पास जाते हैं और सारा सामान घर में भर लेते हैं. कुछ दिनों बाद देखते हैं, चावल चूहे खाने लग गये. दालों में कीड़े लग गए. दो दिन लाइट नहीं आई, फ्रिज में रखा बटर पिघलने लगा. मतलब नुक़सान.
इससे बेहतर तो ये है कि आप हर महीने राशन ख़रीदें. लेकिन सोचिए, अगर राशन के दाम बहुत तेज़ी से घटते-बढ़ते हों तो? और कहीं इसकी कीमत लगातार बढ़ने लगे, तो? आप कहेंगे कि इसी जोखिम के बारे में सोचकर ही तो आप एक मुश्त राशन ख़रीद रहे थे. तो फिर क्या कोई तीसरा विकल्प भी है?
जी बिलकुल. इसी तीसरे विकल्प का नाम है वायदा बाज़ार, जिसमें आपके और दुकान के बीच एक कॉन्ट्रैक्ट हो गया. करार हुआ कि अगले महीने, यानी मई में वो दुकानदार आपको 5000 रुपये में ही देगा राशन. और उसके अगले महीने 6000 में. फिर चाहे उस वक़्त राशन की कीमत इससे कम हो या ज़्यादा. इस सिस्टम में आप सामान तो करार के मुताबिक, तय वक़्त पर लेंगे. मगर पैसे कॉन्ट्रैक्ट बनते वक़्त ही दे देने पड़ेंगे.
कोरोना के चलते लोगों ने दबा के शॉपिंग की. ख़ासतौर पर रोज़मर्रा की चीजों की. फिर भी वो एक लिमिट तक ही सामान स्टोर कर सकते थे. (तस्वीर: एपी) कोरोना के चलते लोगों ने दबा के शॉपिंग की. ख़ासतौर पर रोज़मर्रा की चीजों की. फिर भी वो एक लिमिट तक ही सामान स्टोर कर सकते थे. (तस्वीर: एपी)

अब ये जो आपके और दुकानदार के बीच आने वाले महीनों के लिए 5000 और 6000 का कॉन्ट्रैक्ट हुआ, उसे ‘राशन मई फ़्यूचर कॉन्ट्रैक्ट’ और ‘राशन जून फ़्यूचर कॉन्ट्रैक्ट’ कहेंगे. अब आपको ये करना है कि मई और जून में दुकानदार के पास जाकर अपना राशन घर ले आना है. उस वक़्त न दुकानदार आपसे पैसे बढ़ाकर मांगेगा. न ही राशन लेने से इनकार करके आप अपना पैसा वापस मांग सकते हैं.
हालांकि दुकानदार के पास एक विशेषाधिकार है. ये कि, वो आपको चुनने का मौक़ा दे. कि कॉन्ट्रैक्ट में जितना सामान देना तय था, या तो उतना सामान ले लो. या फिर सामान के वर्तमान मूल्य के बराबर रक़म ले लो. वो इनाम वग़ैरह में ‘उतने ही मूल्य की नगदी’ का ज़िक्र होता है न कई बार, उसी तरह की व्यवस्था समझिए इसको.
अब ऐसा तो नहीं है कि आप अकेले को ऐसा कॉन्ट्रैक्ट देगा दुकानदार. उसका तो बिज़नस मॉडल ही है ये, सो वो कइयों के साथ ऐसा करार करके बैठा होगा. इसमें कुछ लोग क्या करते हैं कि उन्हें मई का राशन नहीं चाहिए, लेकिन फिर भी इस कॉन्ट्रैक्ट को ख़रीद लेते हैं. क्यों? क्योंकि उन्हें लगता है कि वे इस कॉन्ट्रैक्ट को और अधिक दामों में बेच सकते हैं. यहां पर उनका मक़सद केवल फ़ायदा कमाना है. राशन ख़रीदने से उन्हें कोई मतलब नहीं हैं. इस तरीक़े से बाज़ार में इस कॉन्ट्रैक्ट का ख़रीदना-बेचना चलता रहता है. जिस बाज़ार में ये खरीद-बिक्री हो रही है, उसे ही वायदा बाज़ार (फ़्यूचर मार्केट) कहते हैं.
लोग किसी सुपरहिट मूवी के टिकट भी तो कई बार थोक में ख़रीद लेते हैं. इसलिए नहीं कि उन्हें मूवी देखनी है. बल्कि इसलिए कि उन्हें ये टिकट ब्लैक करके प्रॉफ़िट कमाना है. लेकिन इस ब्लैक करने में भी दो चीज़ें हो सकती हैं.
एक तेलुगु मूवी के एक सीन में, तब्बू का किरदार टिकट ब्लैक करता हुआ. (सांकेतिक इमेज) एक तेलुगु मूवी के सीन में, तब्बू का किरदार टिकट ब्लैक करता हुआ. (सांकेतिक इमेज)
पहली ये कि किसी टिकट ब्लैक करने वाले से कोई दूसरा टिकट ब्लैक करने वाला ही टिकट ख़रीद ले, ताकि वो उसे और अधिक दामों में बेच सके.
दूसरा ये कि ब्लैक करने वाले ने शुरुआत में टिकट इसलिए ख़रीदी कि उसे लगा, पिक्चर भाईजान की है और हिट होगी ही होगी. लेकिन पिक्चर निकलती है ‘ट्यूबलाइट’. अब टिकट ख़रीदने वाले को पिक्चर तो देखनी नहीं. तो वह घाटा खाकर टिकट बेचना शुरू कर देता है.
यहां ये भी जानना ज़रूरी है कि टिकट हमेशा के लिए बचाकर नहीं रखी जा सकती. ये नहीं हो सकता कि आप सोचें, 'जब दाम बढ़ेंगे तो बेच दूंगा.'
ऐसा इसलिए कि आपके पास मैटिनी शो की टिकट है और उसको तीन बजे से पहले ही बेच देना है. इस तीन बजे को समझ लीजिए टिकट की ‘एक्सपायरी डेट’.
अगर यहां पर टिकट के बदले फ़्यूचर कॉन्ट्रैक्ट और ब्लैक के बदले सब लीगल हो जाए, तो टिकट खिड़की के बाहर का सारा कारोबार वायदा बाज़ार या फ़्यूचर मार्केट कहलाएगा. तब हम टिकट की 'एक्सपायरी डेट’ नहीं, कॉन्ट्रैक्ट की ‘एक्सपायरी डेट’ कहेंगे.
जिस तरह टिकट, टिकट-खिड़की से बाहर निकलने से लेकर टिकट चेकर के हाथों फटने तक, कई हाथों से गुजर सकता है. और इस दौरान उसकी कीमत घट या बढ़ सकती है. उसी तरह फ़्यूचर कॉन्ट्रैक्ट भी बनने से लेकर डिलिवरी लेने तक, कई हाथों से गुजरता है और उसके दाम घटते-बढ़ते रहते हैं. लेकिन इस सब के दौरान दो चीज़ें ध्रुव की तरह टिकी रहती हैं. एक, पिक्चर बनाने वाले को मिला टिकट का दाम. दूसरा, दर्शक द्वारा देखी जाने वाली फ़िल्म का अनुभव.
कच्चे तेल के मामले में फ़्यूचर प्राइस और करेंट प्राइस, लगभग एक ही है. कैसे? ये हम आगे समझेंगे. (सांकेतिक इमेज - एपी). कच्चे तेल के मामले में फ़्यूचर प्राइस और करेंट प्राइस, लगभग एक ही है. कैसे? ये हम आगे समझेंगे. (सांकेतिक इमेज - एपी).

वैसे ही जैसे दुकानदार वाले उदाहरण में दो चीजें नहीं बदली थीं. एक, दुकानदार को मिलने वाले राशन का दाम. और अंत में कॉन्ट्रैक्ट के आधार पर राशन ख़रीदने वाले का राशन. उसे उतना ही राशन मिला, जितना पहले से तय था.
यानी इस सारी व्यवस्था से दो पक्षों की सुरक्षा बढ़ी. और दोनों का ही जोखिम घट गया. किन दोनों की? 
1) जो वाक़ई में सामान ख़रीदना चाहते हैं.
2) जो वाक़ई में सामान बेचना चाहते हैं.
# ख़बरें में ही मेंशन WTI क्या है (हरेक बात पे कहते हो तुम)-
दुनिया के हर देश की अपनी एक अलग करंसी है. लेकिन कुछ मुद्राएं बाक़ियों के मुक़ाबले ज़्यादा सुनाई देती हैं. ज़्यादा चलन में हैं. क्यूंकि उन्हीं के हिसाब से अंतर्राष्ट्रीय कारोबार होता है. और यूं ये करेंसीज़ बेंचमार्क बन जाती हैं. जैसे डॉलर, पाउंड, येन और यूरो. अब इसी तरह क्रूड-ट्रेडिंग के मुख्यतः तीन बेंचमार्क हैं. मतलब कि दुनिया भर के तेल के कीमतें इन्हीं के हिसाब से तय होती हैं. ये तीनों बेंचमार्क हैं-
# ब्रेंट (Brent) - ये अटलांटिक क्रूड ऑयल के लिए बेंचमार्क है. मतलब, यूरोप, रूस वग़ैरह. इस बेंचमार्क का प्रयोग दुनिया के दो तिहाई से ज़्यादा तेल के दाम तय करने में किया जाता है.
# WTI - वही जिसकी खबर में बात हो रही थी. मोटा-मोटी ये समझ लीजिए कि अमेरिकी कच्चे तेल के कारोबार में बेंचमार्क यही है.
# दुबई क्रूड- ये मिडिल ईस्ट में होने वाले कच्चे तेल के कारोबार का पैमाना है.

# वायदा बाज़ार और क्रूड का कनेक्शन (कभी तू न तोड़ सकता, अगर उस्तुवार होता)-
एक ऐसा समय था, जब तेल को ‘करेंट प्राइस’ (वर्तमान या अभी के रेट) पर ख़रीदा और बेचा जाता था. और तेल की डिलीवरी तुरंत (कुछ घंटों या दिनों में) ले/दे दी जाती थी. पर 1973 में इज़राइल और अरब देशों की भसड़ के चलते तेल के दाम 1974 में चार गुना तक बढ़ गए.
तो सबने इस अचानक होने वाली मूल्य वृद्धि से होने वाले रिस्क को कम करने का तरीका खोजना शुरू किया. उसी जुगत का नतीजा है- क्रूड ऑईल फ़्यूचर. आप पहले ही देख चुके हैं कि किस प्रकार वायदा कारोबार (फ़्यूचर्स) का उपयोग जोखिम घटाने और स्थिरता बढ़ाने के लिए किया जाता है. इस तरीक़े से विक्रेताओं और ख़रीददारों ने तेल के दाम महीनों, कभी-कभी सालों अडवांस में लॉक करना शुरू कर दिए. ताकि अगर तेल के दाम अचानक बहुत घटे या बढ़े, तो ख़रीददार फ़्यूचर कॉन्ट्रैक्ट के साथ कम रिस्क में रहेगा.
बाक़ी कमोडिटीज़ (दालें, चावल, सोना, चांदी) और क्रूड में ये बड़ा अंतर है कि आप कमोडिटीज़ की तो मौजूदा कीमत (स्पॉट प्राइस) पर भी ख़रीद-फ़रोख़्त कर सकते हैं. लेकिन 1974 के बाद से जोखिम घटाने के लिए क्रूड ऑयल का पूरा कारोबार, कम से कम अंतरराष्ट्रीय स्तर पर, फ़्यूचर कॉन्ट्रैक्ट के मार्फ़त ही होता है. इसलिए ही क्रूड में फ़्यूचर कॉन्ट्रैक्ट के प्राइस को ही बेंचमार्क माना जाता है. और जैसे-जैसे डिलीवरी डेट नज़दीक आती है, करेंट प्राइस और फ़्यूचर प्राइस और नज़दीक आते रहता है.
अब देखिए. जैसे शादी के लहंगे ख़रीदने के लिए चांदनी चौक. मोबाइल के लिए ग़फ़्फ़ार मार्केट. शेयर्स के लिए स्टॉक एक्स्चेंज होते हैं. वैसे ही, तेल के फ़्यूचर कॉन्ट्रैक्ट की भी मार्केट्स हैं.
जैसे Brent क्रूड के फ़्यूचर कॉन्ट्रैक्ट को ‘ICE फ़्यूचर्स यूरोप’ में, WTI के फ़्यूचर कॉन्ट्रैक्ट को ‘न्यूयॉर्क मर्चेंटाइल एक्सचेंज’ (नायमेक्स - NYMEX) में और दुबई क्रूड ऑयल के फ़्यूचर कांट्रैक्ट्स को दुबई मर्चेंटाइल एक्सचेंज में ख़रीदा-बेचा जाता है.
हालांकि मोबाइल की छोटी-छोटी दुकानें कई दिख जाएंगी, हर गली मुहल्ले में. लेकिन बड़ी मार्केट तो 'गफ़्फ़ार मार्केट' ही ठहरी. ठीक उसी तरह कच्चे तेल (क्रूड ऑयल) का भी हिसाब-किताब है. हालांकि मोबाइल की छोटी-छोटी दुकानें कई दिख जाएंगी, हर गली मुहल्ले में. लेकिन बड़ी मार्केट तो 'गफ़्फ़ार मार्केट' ही ठहरी. ठीक उसी तरह कच्चे तेल (क्रूड ऑयल) का भी हिसाब-किताब है.

क्रूड के फ़्यूचर कॉन्ट्रैक्ट में आम फ़्यूचर कॉन्ट्रैक्ट से इतर एक और चीज़ है. चूंकि तेल की फ़िज़िकल डिलिवरी में एक से दो हफ़्ते तो लगते ही हैं. इसलिए क्रूड फ़्यूचर कॉन्ट्रैक्ट की एक्सपायरी डेट महीना शुरू होने से कई दिनों पहले ही आ जाती है. जैसे, मई 2020 के क्रूड फ़्यूचर कॉन्ट्रैक्ट की एक्सपायरी डेट 30 अप्रैल, 2020 नहीं 21 अप्रैल, 2020 थी.
# सोमवार को क्या हुआ (तेल-ए-नादान तुझे हुआ क्या है) -
सोमवार को थी 20 तारीख़. अमेरिकी बेंचमार्क क्रूड ‘वेस्ट टेक्सास इंटरमीडिएट’ (WTI) के फ़्यूचर कॉन्ट्रैक्ट उसके अगले दिन एक्सपायर होने थे. तो जिन्हें मई में तेल की डिलिवरी नहीं लेनी थी, वो किसी भी हाल में अपने हाथ में पड़े कॉन्ट्रैक्ट स्क्वेर-ऑफ़ करना, यानी बेचना चाहते थे.
चलिए, ओने-पौने दामों पर अपने कॉन्ट्रैक्ट बेचने तक तो सब सही था. पर फिर माइनस में क्यूं गए दाम? आसान सा रास्ता तो ये था कि आप अपने कॉन्ट्रैक्ट को फाड़ देते, फेंक देते. न कि उसे कंपनी को दिखाकर तेल की फ़िज़िकल डिलीवरी लेते.
इसे समझने के लिए हमें फिर से ‘ब्लैक टिकट’ वाले उदाहरण में जाना होगा. मानिए कि कुछ लोग ब्लैक में टिकट बेच रहे थे. कोई ख़रीददार नहीं था, तो औने-पौने दामों में बेचने लगे. या मुफ़्त में बांटने लगे. लेकिन फिर भी ऐसा क्यूं ही करेंगे कि टिकट के साथ-साथ पैसे भी देने लगें?
पर ये भी तो सोचिए, जब टिकट का कोई ख़रीददार ही नहीं है, तो बहुत से टिकट तो अभी सिनेमा हॉल के पास भी बचे हैं न. तो इन ब्लैक करने वालों ने तो नहीं, मगर ख़ुद सिनेमा हॉल ने अपने बचे टिकट फ़्री में देना शुरू कर दिया. साथ ही एक्स्ट्रा 20-20 रूपये भी देने लगी. क्यूं? शायद ये सोचकर कि लोग सिनेमा हॉल में आएंगे, तो अंदर पॉपकॉर्न-पेप्सी तो ख़रीदेंगे ही.
ऐसे ही WTI में मई के कॉन्ट्रैक्ट भी वायदा बाज़ार के ट्रेडर्स ने नहीं, ख़ुद उन कंपनियों ने माइनस में कर दिए जो इन कॉन्ट्रैक्ट को जारी कर रही थीं. या जिन्होंने माल देना था. क्यूं कर दिए? क्यूंकि कॉन्ट्रैक्ट के अलावा उनके पास कोई और विकल्प नहीं कि वो अपना तेल बेच सकें. पता ही है आपको, 1974 के बाद के नियम. तो अब अगर ये कॉन्ट्रैक्ट एक्सपायर हो जाते, तो तेल उनके पास ही रह जाता. उसको संभालकर रखने का खर्चा पैसे देकर तेल बांटने से ज़्यादा पड़ रहा था.
1973 में इज़रायल और खाड़ी देशों में अच्छा ख़ासा तनाव हो गया था. तनाव जो अक्टूबर में 20 दिन लंबे युद्ध में परिवर्तित हो गया. इस सबके चलते ओपेक ने अमेरिका पर भी प्रतिबंध लगा दिया. और तेल के दाम बढ़ने लगे. कितने बढ़ने लगे? 3 डॉलर से बढ़कर 12 डॉलर हो गए. (तस्वीर में: इज़रायल के सैनिक स्वेज़ कनाल क्रॉस करते हुए. By Israel Defense Forces, CC BY-SA 2.0, https://commons.wikimedia.org/w/index.php?curid=34369608) 1973 में इज़रायल और खाड़ी देशों में अच्छा ख़ासा तनाव हो गया था. तनाव जो अक्टूबर में 20 दिन लंबे युद्ध में परिवर्तित हो गया. इस सबके चलते ओपेक ने अमेरिका पर भी प्रतिबंध लगा दिया. और तेल के दाम बढ़ने लगे. कितने बढ़ने लगे? 3 डॉलर से बढ़कर 12 डॉलर हो गए.
(तस्वीर में: इज़रायल के सैनिक स्वेज़ कनाल क्रॉस करते हुए. By Israel Defense Forces, CC BY-SA 2.0, https://commons.wikimedia.org/w/index.php?curid=34369608)

क्यूं पड़ रहा था? क्यूंकि कोरोना के चलते अमेरिका में खपत हो नहीं रहीं. भंडारण भी इनका पूरा ही हो चुका. आख़िरकार ये तेल निर्माता कंपनी हैं, भंडारण वाली नहीं. कितना ही क्रूड अपने पल्ले में रख लेतीं.
जहां Brent कई देशों की कई लोकेशंस पर अपने तेल की डिलीवरी करता है वहीं WTI अपने तेल की डिलीवरी केवल एक जगह (ओकलाहोमा राज्य के कुशिंग इलाक़े में) करता है. वहां से आपको खुद अपना तेल ढोकर ले जाना होता है. अभी पिछले हफ़्ते ही यूएस के ‘एनर्जी इंफ़ॉर्मेशन एडमिनिसिट्रेशन’ ने ये घोषणा की थी कि कुशिंग का तेल भंडारगृह लगभग 2/3 तक भर गया है. जो कि बहुत ज़्यादा है.
कुशिंग (पाइपलाइन क्रॉसओवर, ओकलाहोमा). कुशिंग (पाइपलाइन क्रॉसओवर, ओकलाहोमा).

हालांकि दामों का गिरना रियलटी में इससे कहीं ज़्यादा 'ऑरगेनिकली' होता है जितना या जैसा हमने बताया. और इसमें सबसे ज़्यादा हाथ डिमांड और सप्लाई का होता है. और कुछ विशेषज्ञों का मानना ये है कि दाम का गिरना और माइनस हो जाना टेक्निकल ज़्यादा था. मतलब कॉन्ट्रैक्ट इस तरह से बनते हैं कि वो नेगेटिव भी चले जाएं तो कोई आश्चर्य नहीं होता. बावज़ूद इसके कि आज तक कभी नेगेटिव गए नहीं हैं. रियल वर्ल्ड में बेशक ऐसा नहीं होगा कि तेल ख़रीदने वाले को, तेल बेचने वाला पैसा दे, लेकिन नम्बर्स यही दिखाएंगे. उदाहरण से समझिए-
गणित के हिसाब से अगर एक केले को शून्य लोगों में बांटना है तो हर एक को अनंत केले मिलेंगे. या अगर एक आदमी किसी काम को एक घंटे में करता है तो 3600 आदमी उस काम को एक सेकेंड में कर देंगे.
लेकिन रियल वर्ल्ड में दोनों ही बातें असंभव हैं. यही चीज़ मई के कॉन्ट्रैक्ट में भी हुई बताई जा रही. कि वो संख्याओं में तो ऋण हो गया लेकिन ऐसा नहीं हुआ कि आपको तेल ख़रीदने पर पैसे मिलेंगे. हालांकि हो सकता है कुछ 'आइसोलेटेड' जगहों में ऐसा फिजिकली भी होते हुए दिखे कि आप अपने तेल का टैंकर और अपनी जेबें दोनों भर के लाएं.

केवल सड़कें ही नहीं आकाश पर भी वीरानी छाई है. इसका मतलब ये कि पेट्रोल-डीज़ल-कच्चा तेल, कुछ भी नहीं खप रहा. केवल सड़कें ही नहीं आकाश पर भी वीरानी छाई है. इसका मतलब ये कि पेट्रोल-डीज़ल-कच्चा तेल, कुछ भी नहीं खप रहा.

और हां, आप देखेंगे कि Brent और दुबई के एक्सचेंज में दाम इतनी तेज़ी से नहीं गिरे हैं, जितने कुछ दिनों पहले गिरे थे.
क्यूंकि तब-
दिक्कत सप्लाई में वृद्धि के चलते थी. उस समय रूस और तेल उत्पादक देशों का संगठन ओपेक अड़ गया था. ज़िद में था कि हम तो दबा के उत्पादन करेंगे. और उनकी ये दिक्कत ये वैश्विक समस्या बन गई थी.
लेकिन अब-
दिक्कत डिमांड में कमी के चलते है. कोरोना के चलते. लॉकडाउन के चलते और ये दिक्कत सिर्फ़ अमेरिका भर तक सिमटी है. मतलब लॉकडाउन और कोरोना तो दुनिया भर में हैं लेकिन पूरी दुनिया के अंदर मांग में उतनी कमी नहीं आई है. और आई भी है, तो भी अमेरिका दुनिया के मुक़ाबले तो छोटा ही है. कमी को उतने बेहतर तरीक़े से एबजॉर्ब नहीं कर पाएगा.
Organization of the Petroleum Exporting Countries (ओपेक) और रूस के बीच समझौता नहीं हो पाने के चलते अभी हाल ही में (9 मार्च, 2020 को) क्रूड ऑयल के दाम में बहुत बड़ी गिरावट आई. पिछले तीस साल की सबसे बड़ी गिरावट. हालांकि अंत में सारे स्टेकहोल्डर्स तैयार हुए कि उत्पादन में कमी लानी है. (फ़ाइल फ़ोटो) रूस और ओपेक के बीच समझौता नहीं हो पाने के चलते अभी हाल ही में (9 मार्च, 2020 को) क्रूड ऑयल के दाम में बहुत बड़ी गिरावट आई. पिछले तीस साल की सबसे बड़ी गिरावट. हालांकि अंत में सारे स्टेकहोल्डर्स तैयार हुए कि उत्पादन में कमी लानी है. (फ़ाइल फ़ोटो)

अमेरिका में जून फ़्यूचर्स के प्राइस अभी भी 9 डॉलर प्रति बैरल के आसपास हैं. (हालांकि ये भी कोई बड़ी राशि नहीं, लेकिन फिर भी ऋण में नहीं है) क्यूंकि फ़्यूचर कॉन्ट्रैक्ट ख़रीदने-बेचने वाले मान रहे हैं कि जून तक मांग कुछ बढ़ जाएगी. साथ ही तेल के भंडारण की क्षमता में भी इज़ाफ़ा हो जाएगा. इसके अलावा वैश्विक स्तर पर सप्लाई में लगाम लगाने की क़वायदें तो कई दिन पहले से शुरू हो ही गई हैं.
# अभी खपत नहीं है तो तेल निकाल क्यूं रहे हैं (मुफ़्त हाथ आए तो बुरा क्या है)-
ज़ाहिर सी बात है कि जिन जगहों से तेल निकलता है, उन जगहों को या तो ख़रीदना पड़ेगा या किराए पर लेना पड़ेगा. ज़्यादातार किराए पर ही ली जाती हैं. और किराए पर लेते ही ये हो जाती है ‘पेरिशेबल कमोडिटी’. यानी एक समय बाद समाप्त या नष्ट हो जाने वाली.
प्लस, ये एक ‘रिसोर्स एक्स्ट्रेक्शन’ इंडस्ट्री है, मतलब इसे बनाया नहीं इसका दोहन ही किया जा सकता है. इसलिए रोज़मर्रा के तेल के दामों के उतार-चढ़ाव के मुताबिक तेल की उत्पादकता उतनी तेज़ी से घटाई-बढ़ाई नहीं जा सकती. इसकी तुलना साबुन के साथ कर सकते हैं (जो कि ‘रिसोर्स एक्स्ट्रेक्शन’ नहीं है). तो साबुन के उत्पादन पर तुलनात्मक रूप से बेहतर तरीक़े से नियंत्रण किया जा सकता है.
साथ ही, मान लीजिए, आज तेल की क़ीमत अचानक बहुत गिर जाती है. तब भी लेबर, मशीनों की लागत और किराए की रक़म (लीज़ कॉस्ट) एकदम से नहीं बदली जा सकती. इसलिए तेल निकालने वाली कंपनियां कुछ वर्षों के लिए इन सबको बुक कर लेती हैं. ताकि रोज़मर्रा के उतार-चढ़ाव का उत्पादन पर अधिक फ़र्क़ न पड़े. ऐसा वो अपना जोखिम घटाने के लिए करती हैं.
तेल निकाला जाता है, बनाया नहीं जाता. इसी 'निकालने' और 'बनाने' के बीच के अंतर के चलते अचानक इसकी खपत बढ़ाना या घटाना इतना आसान नहीं है. (तस्वीर: एपी) तेल निकाला जाता है, बनाया नहीं जाता. इसी 'निकालने' और 'बनाने' के बीच के अंतर के चलते अचानक इसकी खपत बढ़ाना या घटाना इतना आसान नहीं है. (तस्वीर: एपी)

चाइना में घोस्ट सिटीज बन गईं. बड़े-बड़े शहर, जहां रहने वाला कोई नहीं. लेकिन चाइना ने भवन निर्माण कम नहीं किया. ताकि स्टील की खपत और GDP बढ़ती रहे. जर्मनी में कई जगह बिजली खर्च करने के ग्राहकों को पैसे मिलते हैं. क्यूंकि उत्पादन हो रहा है. उसको रोक नहीं सकते. और एक हद से ज़्यादा स्टोर भी नहीं कर सकते. अगर किसी दूध बेचने वाले को खरीददार न मिले, तो क्या वो अपनी गाय का दूध निकालना बंद कर देगा? बस ऐसे ही इसको भी समझिए…
# ऐसा क्यूं न करें कि अभी ख़रीद कर जमा कर लें (और बाज़ार से ले आए अगर टूट गया)-
बिलकुल कर रहे हैं. लेकिन जमा भी तो उसी लिमिट तक होगा, जिस लिमिट तक भंडारण क्षमता होगी. बंदर अपने गले में खाना जमा तो कर ही लेता है. लेकिन एक लिमिट तक ही न. अमेरिका में तो कम से कम वो लिमिट क्रॉस हो चुकी है.
# इंडिया पर असर (देखिए पाते हैं उश्शाक़ बुतों से क्या फ़ैज़)-
जैसे अमेरिकी डॉलर की दुनिया भर में तूती बोलती है, वैसा उनके यहां के WTI के साथ नहीं है. भारत की क्रूड बास्केट में भी मुख्यतः ब्रेंट और दुबई क्रूड ही हैं, WTI नहीं.
ब्रेंट का मई फ़्यूचर अभी भी 25 डॉलर है. यूएस से इंडिया में तेल नहीं इंपोर्ट किया जाता. दूरी नाम की एक ‘भौगोलिक बाधा’ है. हालांकि भारत ने अपने कच्चे तेल के 'बास्केट' में विविधता लाने के लिए 2017 में अमेरिका से भी आयात शुरू किया. पहले वित्तीय वर्ष, यानी 2017-18 में 14 लाख टन की आपूर्ति की गई थी. जोकि वित्तीय वर्ष 2018-19 में बढ़ कर 64 लाख टन हो गई. स्पष्ट है कि अमेरिका बहुत तेज़ी से इस आपूर्ति का प्रमुख स्त्रोत बनता जा रहा है. लेकिन फिर भी इंडिया पर इस गिरावट का कोई सीधा और बड़ा असर नहीं पड़ेगा. और परोक्ष रूप से भी, या कभी दुनिया भर में तेल के दाम कम होते हैं तो भी भारत पर पड़ने वाला असर मिक्सड ही रहता है.
ये है सुनसान इंडिया की एक तस्वीर. इससे पता चलता है कि पेट्रल-डीजल और फलतः कच्चे तेल की खपत में इंडिया की क्या स्थिति है. यानी इस वक़्त इंडिया तेल स्टोर करना भी चाहे तो कितना कर लेगा? ये है सुनसान इंडिया की एक तस्वीर. इससे पता चलता है कि पेट्रल-डीजल और फलतः कच्चे तेल की खपत में इंडिया की क्या स्थिति है. यानी इस वक़्त इंडिया तेल स्टोर करना भी चाहे तो कितना कर लेगा?

एक तरफ़ कम दाम होने से भारत का आयात बिल कम हो जाएगा. लेकिन दूसरी तरफ़ विदेशी निवेश पर भी असर पड़ेगा. क्यूंकि भारत में बहुत सारा निवेश, तेल उत्पादक देश करते हैं. साथ ही मिडिल ईस्ट के वर्कर भी इसी कारण के अपने घर कम पैसे भेजेंगे. हालांकि ये ज़रूर है कि तेल के दाम कम हो जाने की स्थिति में भारत अधिक से अधिक तेल भंडारण करके ट्रेड डेफिसिट को कम करने की कोशिश करता है.

तो कुल मिलाकर निष्कर्ष ये कि-

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बाज़ीचा-ए-अतफ़ाल है दुनिया मेरे आगे,

होता है शब-ओ-रोज़ तमाशा मेरे आगे.

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