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कच्चे तेल की कीमत में 30 साल की सबसे बड़ी गिरावट, कितने रुपए तक घटेंगे पेट्रोल-डीजल के दाम?

क्रूड ऑयल. यानी कच्चा तेल. टेक्निकल वाली हिंदी में कहें तो अपरिष्कृत तेल, जिसे रिफाइन नहीं किया गया है. इसी क्रूड ऑयल में से निकलता है पेट्रोल, डीजल, केरोसिन का तेल, गैस और वैसलीन. सोमवार 9 मार्च, 2020 को क्रूड ऑयल के दाम में बहुत बड़ी गिरावट आई. शुरुआती कारोबार में  करीब 30 प्रतिशत की गिरावट आई. इसे 30 साल की सबसे बड़ी गिरावट बताया जा रहा है. इसे 17 जनवरी, 1991 को गल्फ वॉर शुरू होने के बाद की सबसे बड़ी गिरावट कहा जा रहा है.

लेकिन इतनी बड़ी गिरावट क्यों हुई?

एक लाइन में कहें, तो तेल उत्पादन कम करने के मुद्दे पर तेल उत्पादक देशों के समूह ओपेक (OPEC) और रूस के बीच समझौता नहीं हो पाया. ओपेक पर सऊदी का दबदबा है. पिछले सप्ताह सऊदी ने रूस को तेल उत्पादन में कटौती का प्रस्ताव दिया था. लेकिन रूस ने सऊदी की बात नहीं मानी और मौजूदा तेल उत्पादन को बनाए रखने की बात कही. इसके बाद रूस को सबक सिखाने के लिए सऊदी अरब ने तेल की कीमतें घटा दीं. लेकिन ओपेके तेल का उत्पादन कम क्यों करना चाहता है? ये जानने से पहले ये समझ लेते हैं कि ओपेक है क्या?

क्या है ओपेक?

Organization of the Petroleum Exporting Countries. OPEC. पेट्रोलियम निर्यातक देशों का संगठन. ओपेक की स्थापना 1960 में ईरान, इराक, कुवैत, सऊदी अरब और वेनेज़ुएला ने की थी. मकसद अमेरिका और यूरोपीय तेल कंपनियों की ताकत और रसूख से तेल उत्पादक देशों के हितों की हिफ़ाज़त करना था. ओपेक के गठन का सुझाव वेनेज़ुएला ने दिया था. वो इकलौता देश था, जो फ़ारस की खाड़ी से काफ़ी दूर था. वेनेज़ुएला वो देश है, जिसके पास कच्चे तेल का बड़ा भंडार है. अमेरिका की ख़ुफ़िया एजेंसी सीआईए के अनुसार, करीब 30,230 करोड़ बैरल कच्चा तेल.

ओपेक की स्थापना 1960 में ईरान, इराक, कुवैत, सऊदी अरब और वेनेज़ुएला ने की थी. OPEC का लोगो (फाइल फोटो)
ओपेक की स्थापना 1960 में ईरान, इराक, कुवैत, सऊदी अरब और वेनेज़ुएला ने की थी. OPEC का लोगो (फाइल फोटो)

1960 से 2018 के बीच पांच सदस्य देशों के साथ, 10 अन्य देश भी इसमें शामिल हो गए. ये 10 देश हैं क़तर, इंडोनेशिया, लीबिया, संयुक्त अरब अमीरात, अल्जीरिया, नाइजीरिया, इक्वाडोर, अंगोला, गैबॉन और इक्वेटोरियल गिनी. कई देश इस संगठन में आते-जाते रहे. क़तर 2018 में ओपेक से अलग हो गया. ओपेक देश दुनिया की तेल सप्लाई का 40 फीसदी से ज्यादा का हिस्सा नियंत्रित करता है. ये 82 फीसदी तेल भंडार के मालिक भी हैं. सऊदी अरब का इस संगठन पर दबदबा है.

ओपेक चाहता था कि रूस तेल के उत्पादन में कटौती करे. लेकिन रूस ने ओपेक की बात नहीं मानी. सहमति नहीं बनने के बाद शुक्रवार, 6 मार्च को ही तेल की कीमत में 10 प्रतिशत की गिरावट देखने को मिली थी.

कोरोना वायरस से कैसे जुड़ा है मामला?

दुनिया में कच्चे तेल का सबसे बड़ा खरीदार चीन है. कोरोना वायरस संक्रमण की वजह से चीन बड़े स्तर पर प्रभावित है. यहां फैक्ट्रियां, ऑफिस और दुकानें पहले ही तरह नहीं चल रही हैं. कई कंपनियों का प्रोडक्शन घट गया है. चीन सामान्य तौर पर हर दिन औसतन 1 करोड़ 40 लाख बैरल तेल खपत करता है. लेकिन कोरोना वायरस की वजह से ऐसा हो नहीं रहा है. चीन के साथ अन्य देश भी कोरोना की चपेट में हैं. कई देशों में यात्रा पर बैन है. सड़कों पर गाड़ियां नहीं चल रही हैं. फ्लाइट्स कम हुई हैं. हवाई जहाजों के काम आने वाले जेट फ़्यूल भी कम खपत हो रही है.

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कोरोना वायरस की वजह से दुनिया की अर्थव्यवस्था प्रभावित हुई है. (फाइल फोटो)

इस वजह से तेल की मांग में कमी आई है. कच्चे तेल की कीमतों में हो रही लगातार गिरावट को थामने के लिए ओपेक और सहयोगी देश ऑयल प्रोडक्शन में रोजाना 1.5 मिलियन बैरल कटौती करना चाहते थे, लेकिन रूस ने इस पर अपनी सहमति नहीं दी. इसके बाद दुनिया के सबसे बड़े ऑयल प्रोड्यूसर देश सऊदी अरब ने क्रूड ऑयल की कीमतों में कटौती का ऐलान कर दिया.

रूस ने क्यों नहीं कम किया प्रोडक्शन?

चाहे सऊदी अरब हो, रूस या तेल उत्पादन करने वाले अन्य बड़े देश. ये बाजार में कब्जे की जंग लड़ रहे हैं. अमेरिका ने शेल ऑयल फील्ड से पिछले दशक में तेल उत्पादन बढ़ाकर दोगुना कर दिया है. अमेरिका जिस तेजी से तेल उत्पादन बढ़ा रहा है, उससे सऊदी और रूस जैसे बड़े देशों के मार्केट पर खतरा मंडरा रहा है. यही वजह है कि रूस ने तेल उत्पादन में कटौती की बात नहीं मानी.

रूस के उत्पादन में कटौती से इनकार करने के बाद सऊदी ने अप्रैल में तेल उत्पादन बढ़ाने का भी फैसला किया है. सऊदी की अगले महीने अपने तेल उत्पादन को बढ़ाकर 10 लाख बैरल प्रतिदिन करने की बात कही है. जानकारों का कहना है कि कच्चे तेल की कीमत और घटेगी.

क्या पेट्रोल-डीजल सस्ता होगा?.

सोमवार 9 मार्च को कीमत घटने के बाद भारतीय बाजार में कच्चा तेल 2,200 रुपये प्रति बैरल के नीचे आ गया है. एक बैरल में 159 लीटर कच्चा तेल होता है. इस तरह एक लीटर कच्चे तेल का दाम करीब 13-14 रुपए हो गया.

देश में कच्चा तेल पहुंचने के बाद उसे रिफाइन किया जाता है. फिर तेल कंपनियां उसे सभी राज्यों में पहुंचाती हैं. देश की टैक्स व्यवस्था के हिसाब से देश और राज्यों की सरकारें उस पर टैक्स लगाती हैं. फिर पेट्रोल पंप पर तेल बेचने वाले डीलर अपना कमीशन लेते हैं. लागत के बाद टैक्स और कमीशन वगैरह लगने की वजह से तेल की कीमत उसकी शुरुआती कीमत से कहीं ज़्यादा हो जाती है और आम ग्राहकों को उस बढ़ी कीमत पर तेल मिलता है.

कच्चे तेल की कीमत घटने से पेट्रोल-डीजल की कीमत घटनी चाहिए. लेकिन इंडस्ट्री के जानकारों का कहना है कि इसका बहुत ज्यादा फायदा लोगों को नहीं मिलने वाला है. पेट्रोल-डीजल की कीमत में 2 से 3 रुपए तक की कटौती हो सकती है.

लेकिन एक और गणना है. भारत के क्रूड बास्केट की कीमत 47.92 डॉलर प्रति बैरल है. मतलब भारत को 159 लीटर कच्चा तेल के लिए 3567.45 रुपये खर्च करने पड़ रहे हैं. ऐसे में क्रूड अगर 30 पर्सेंट सस्ता हो गया है तो क्रूड बास्केट के भी जल्द 30 पर्सेंट तक सस्ता होने की गुंजाइश है. क्रूड बास्केट 2470 रुपये का हो सकता है. अगर इसका पूरा फायदा लोगों को मिलता है तो पेट्रोल 50 रुपये लीटर के भाव मिल सकता है.


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