फिल्म 'बर्फी' में प्रियंका चोपड़ा का पात्र ऑटिस्टिक होता है. रणबीर का पात्र उसे बेपनाह प्यार देता है, और वो जीवन साथ बिताते हैं.
अनिल और सुनीता पति-पत्नी हैं. अनिल को करीब की एक शादी में जाना है. उसकी चचेरी बहन की. लेकिन अनिल और सुनीता साथ-साथ इस शादी में शरीक नहीं हो सकते. दरअसल अनिल और सुनीता कहीं भी साथ में नहीं जा पाते हैं. दोनों में से एक को घर पर रुकना ही पड़ता है. और इसका कारण है उनकी बेटी सौम्या.
सौम्या और बच्चों से थोड़ी अलग है क्योंकि उसे ऑटिज़म स्पैक्ट्रम डिसऑर्डर (ASD) है. ज़्यादातर लोग इस अवस्था को 'ऑटिज़म' नाम से जानते हैं. इसलिए मम्मी-पापा में से एक हमेशा सौम्या के साथ रहता है. ऑटिज़म वही अवस्था है, जो 'माय नेम इस खान' में शाहरुख की होती है. 'नॉर्मल' लोगों से थोड़ी अलग ज़िंदगी जीने वाले ऑटिस्टिक लोगों को कई बार पागल समझ लिया जाता है. और भी ढेर सारी भ्रांतियां हैं इस डिसॉर्डर को लेकर. इसके चलते सौम्या, अनिल और सुनीता की तरह कई परिवारों की ज़िंदगी और मुश्किल हो जाती है.
2 अप्रैल को दुनियाभर में वर्ल्ड ऑटिज़म डे होता है. दुनिया के कई हिस्सों में अप्रैल को 'ऑटिज़म अवेयरनेस मंथ' के तौर पर मनाया जाता है. सो इस मौके पर लल्लनटॉप आपको ये बताएगा कि ऑटिज़म क्या होता है और क्यों इससे जूझने वालों को पागल कहना गलत है. साथ में ऐसे पांच महान लोगों का ज़िक्र भी होगा, जिन्होंने ऑटिज़म को मात देकर कामयाबी हासिल की.
'माय नेम इज़ खान' में शाहरुख का पात्र ऑटिस्टिक होता है. लेकिन वो एक सामान्य ज़िंदगी जीता है, अपनों के प्यार और खुद की हिम्मत के सहारे.'बीमारी' नहीं 'विकार' है ऑटिज़मएक चीज़ का गोदना बना लीजिए - ऑटिज़म बीमारी नहीं है, एक विकार है. कैसे, हम बताते हैं. बीमारी किसी अंदरूनी या बाहरी फैक्टर (वजह) से शरीर में पैदा होने वाला रिएक्शन होता है. शरीर इससे लड़ता है और दवाइंयों से इसमें मदद हो सकती है. तो टीबी एक बीमारी है जो एक खास किस्म के बैक्टीरिया से फैलती है. शरीर इससे लड़ता है और आप दवाइयों से उसकी मदद करते हैं.
विकार (डिसॉर्डर) उस अवस्था को कहते हैं जब शरीर या दिमाग अपने कुदरती तौर तरीकों से भटक जाए. विकार के मामलों में शरीर इस भटकाव से लड़ता नहीं है. इसलिए इनका इलाज कुछ मुश्किल होता है. ऑटिज़म में भी शरीर और खासतौर पर दिमाग अपना काम ढंग से नहीं कर पाता. इसलिए ऑटिज़म को विकार माना जाता है.
कैसे होता है ऑटिज़म?औसतन हर 68 में से एक बच्चा ऑटिज़म का शिकार होता है. क्यों, ठीक तरह से कोई नहीं जानता. वैज्ञानिक इस विकार के कारणों के बारे में कुछ अनुमान बस लगा पाए हैं. इन कारणों में कुछ हैं - इंफेंक्शन (जैसे रुबेला), प्रेगनेंसी के दौरान मां की डाइट (शराब और कुछ खास तरह की दवाएं) और अनुवांशिकी. अनुवांशिकी माने जेनेटिक लोचा. आम बोल-चाल में गुण सूत्र कहते हैं जिन्हें. ये माता-पिता से बच्चों में आते हैं. इन सब कारणों से दिमाग को नुकसान पहुंचता है और उसी के नतीजे में बच्चा ऑटिस्टिक हो जाता है.
हैन्स एस्पर्गर ने इस विकार पर काफी शोध किया था. इसलिए ऑटिज़म का एक नाम एस्पर्गर्स सिंड्रोम भी है.
आइन्स्टीन भी ऑटिस्टिक थे.क्या लक्षण हैं इस डिसऑर्डर के?ऑटिज़म के लक्षण बड़े विविध होते हैं. इससे पीड़ित हर बच्चे में अलग तरह के बदलाव आते हैं. लेकिन फिर भी कुछ चीज़ें हैं, जो ज़्यादातर ऑटिस्टिक बच्चों में बचपन से नज़र आने लगती हैं. ये बच्चे अपने-आप में ही गुम रहते हैं, आस-पास के माहौल से बेखबर. सामान्य तौर पर जिस तरह बच्चे मां-पिता या अपने आस-पास मौजूद लोगों के चेहरे को देखकर या आवाज़ सुनकर प्रतिक्रिया देते हैं, ऑटिज़म पीड़ित बच्चे नहीं दे पाते. वो किसी से भी नजरें मिलाने से कतराते हैं. ये बच्चे प्रतिक्रिया देते भी हैं तो वो बहुत धीमी और दबी हुई होती है.
इन बच्चों को भाषा संबंधी परेशानियों का सामना भी करना पड़ता है. इन्हें लंबे शब्दों को बोलने में बहुत परेशानी होती है और ये बमुश्किल ही कोई लंबा शब्द बोल पाते हैं. कुछ मामलों में ऑटिस्टिक बच्चों की सोच बहुत विकसित नहीं होती है. इसलिए वे रचनात्मकता से दूर ही नजर आते हैं. लेकिन अगर ये किसी एक तरफ अपना मन लगा कर काम करते हैं तो उसमें बहुत अच्छे परिणाम देते हैं. ऑटिज्म से पीड़ित बहुत से लोग अच्छे कलाकार बने हैं.
क्रमिक विकास का सिद्धांत देने वाले डार्विन. डार्विन के वक्त तक ऑटिज़म को एक विकार के रूप में पहचान नहीं मिली थी.कैसे समझें कि बच्चे में ऑटिज़म के लक्षण हैं?अगर कोई बच्चा नौ महीने का होने के बावजूद न तो मुस्कुराता है और न ही कोई प्रतिक्रिया देता है तो हो सकता है उसे यह परेशानी हो. इसके अलावा बच्चा अगर बोलने के बजाय अजीब-अजीब सी आवाज़ें निकाले और तेज़ आवाजों (जैसे पटाखे) से बहुत डरे तो आपको इसे गंभीरता से लेना चाहिए. ये ऑटिज़म के लक्षण हैं. ऑटिस्टिक बच्चे भीड़भाड़ में जाने से बहुत कतराते हैं और किसी भी बात को लेकर बहुत जल्दी परेशान होकर चीखने-चिल्लाने लगते हैं. इन्हें तेज़ रंगों - जैसे पीला या लाल से भी परेशानी होती है.
आमतौर पर 2 साल तक की उम्र तक ये पक्के तौर पर मालूम चल जाता है कि इन लक्षणों वाला बच्चा ऑटिस्टिक है या नहीं.
ऑटिज़म का इलाज क्या है?ऑटिज़म का शर्तिया इलाज फिलहाल मौजूद नहीं हैं. दवाएं इसके कुछ लक्षणों को ही कम कर सकती हैं, मसलन नींद न आना, बैचेनी वगैरह. सटीक दवा के अभाव में थेरेपी का सहारा होता है जिससे ऑटिस्टिक बच्चों बढ़ती उम्र के साथ ऐसी काफी चीज़ें सीख जाते हैं, जिन्हें समाज में 'सामान्य' की संज्ञा दी जाती है.
इस थेरेपी में मां-बाप के सपोर्ट की काफी ज़रूरत पड़ती है. एक और बात है, जितनी जल्दी इलाज शुरू हो जाए, उतना बेहतर रहता है.
डेरिल हाना 'किल बिल -1' में नर्स के रोल में.इतनी सारी तकलीफों को हराकर दुनिया में जिन लोगों ने ऊंचा मकाम हासिल किया है, उनमें से चुनिंदा पांच के बारे में हम यहां बता रहे हैं. इस लिस्ट के बारे में एक बात ध्यान में रखिएगा. वो ये कि ऑटिज़म को बतौर एक बीमारी पहचान मिली 1944 में और इसे लेकर सहज होने में लोगों को काफी वक्त लगा. तो कई महान लोग जो इस वक्त से पहले हुए और जिनमें ये लक्षण थे, ऑटिस्टिक नहीं कहे गए. लेकिन आज उनकी आदतों और स्वभाव पर शोध के आधार पर ये अंदाज़ा लगाया जाता है कि उन्हें ऑटिज़म था.
अल्बर्ट आंइस्टीनजी हां, दुनिया के महानतम वैज्ञानिकों में से एक अल्बर्ट आंइस्टीन ऑटिस्टिक थे. इस विकार के बावजूद वो आज भी दुनिया के सबसे तेज दिमाग इंसानों में गिने जाते हैं.
डेरिल हानाअमेरिकी फिल्म अभिनेत्री और पर्यावरण कार्यकर्ता डेरिल हैना भी इस विकार से पीडित रही हैं. इन्हें आपने क्विंटिन टेरिंटीनो की कल्ट क्लासिक 'किल बिल -1' और 'किल बिल -2' में एल ड्राइवर के रोल में देखा है. 'किल बिल - 1 ' में ये नर्स बनकर आती हैं. 'किल बिल -2' के मशहूर सीन 'आई फॉर एन आई' में ब्राइड (उमा थर्मन) से लड़ने (और हारने वाली) डेरिल ही हैं. डेरिल को रेड कार्पेट पर चलने में बहुत तकलीफ होती थी और अवॉर्ड फंक्शन में जाने में भी. लेकिन दशकों तक अपने ऑटिज़म का पता अपने करीबियों को भी नहीं लगने दिया था.
मोत्ज़ार्ट चोटी के संगीतकार हुए. उनके खतों के आधार पर उन्हें ऑटिस्टिक माना जाता है.चार्ल्स डार्विनआपके मंत्री मानें न मानें, दुनिया डार्विन के दिए क्रमिक विकास के सिद्धांत में मानती है. डार्विन के स्वभाव और आदतों पर शोध करने वाले कई डॉक्टरों और मनोवैज्ञानिकों का मानना है कि डार्विन ऑटिस्टिक थे और शायद इसी वजह से वो इतनी बारीकी से ध्यान लगा पाते थे. 12 फरवरी 1809 को पैदा हुए और 19 अप्रैल, 1882 को सिधार गए डार्विन को कोई भी रिश्ता बनाने और बरकरार रखने में परेशानी होती थी.
मोत्ज़ार्टमोत्ज़ार्ट के बारे में कहा जाता है कि उनके चहरे पर एक ही तरह के एक्सप्रेशन बार-बार आते रहते थे. वो अपने हाथ-पांव लगातार हिलाते रहते थे और सुनने में भी तकलीफ थी. उनके और उनके परिवार के लिखे खतों के आधार पर ये मालूम चलता है कि कई बार ऐसा भी हुआ कि मोत्ज़ार्ट ने बोरियत भगाने के लिए टेबल-चेयर पर कूदा-फांदी की और बिल्ली की तरह म्याऊं की आवाज़ निकालते हुए कलाबाज़ियां खाईं. इस आधार पर उन्हें भी ऑटिस्टिक बताया जाता है.
स्टैनली क्यूब्रिक दुनिया के महानतम फिल्मकारों में गिने जाते हैं.स्टैनली क्यूब्रिक'2001: अ स्पेस ऑडेसी', 'आइज़ वाइड शट' और 'अ क्लॉकवर्क ऑरेंज' जैसी महान फिल्में बनाने वाले डायरेक्टर स्टैनली क्यूब्रिक की फिल्में दुनियाभर के फिल्म स्कूल पढ़ाते हैं. स्टैनली भी लोगों में घुलने-मिलने में कमज़ोर थे और नई चीज़ों को अपना नहीं पाते थे. उनकी कई आदतें ऑब्सेशन (जुनून) की हद तक थीं. इन्ही वजहों से विशेषज्ञों का मानना है कि स्टैनली ऑटिस्टिक थे.
उम्मीद है इन उदाहरणों से आप समझ गए होंगे कि ऑटिस्टिक बच्चे कुछ भी हो सकते हैं, लेकिन 'पागल' नहीं. ये बस और बच्चों से थोड़े अलग होते हैं. इन्हें खास तरह की देखभाल की ज़रूरत होती है. प्यार हर बच्चे का हक होता है, लेकिन इन बच्चों को इसकी ज़रूरत थोड़ी ज़्यादा पड़ती है. ये दे पाएं, तो आप इनकी मदद करेंगे और खुद को भी थोड़ा और पूरा महसूस करेंगे.
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