नीतीश कुमार नहीं आ रहे हैं. मतलब जेडीयू से जो भी आएगा, नाम भर का होगा. केसी त्यागी का नाम लिख लीजिए. शरद यादव भी ले सकते हैं. मंच पर तीन यादव दिखेंगे. मुलायम, शरद और लालू. जी, लालू आ रहे हैं. आएंगे ही. रिश्तेदारी जो है. नेता जी के भतीजे से बिटिया बियाही है. मगर फायदा बस बाइट भर का होगा. मतलब लालू आएंगे, एएनआई के माइक और मंच पर मोदी के खिलाफ नया चुटकुला गढ़ेंगे. मगर इससे बैलेट बक्से में वोट नहीं बढ़ता. और जो यादव वोट है, उसका बैनामा करवाने का दावा तो मुलायम सिंह यादव का परिवार दो दशक से कर ही रहा है. नीतीश आते तो कुर्मी वोट लाते. अवध में न सही, पूर्वांचल में ही कुछ उन्नीस बीस करते. मगर क्यों करते. जब नीतीश मोदी के खिलाफ अपनी सबसे बड़ी लड़ाई में उतरे, तो नेता जी ने भी दांव कर दिया था. सब उन्हें राष्ट्रीय अध्यक्ष का पद देने के लिए राजी थे. मगर फिर भी मुलायम महागठबंधन से बाहर आ गए. अपने कैंडिडेट लड़ाए. तोते का डर जो न कराए कम है.अजीत सिंह नहीं आ रहे हैं. कैसे आते. कुछ हफ्ते पहले तो बेटे जयंत चौधरी को सीएम बनवाने का ऐलान कर चुके हैं. बोले, राष्ट्रीय लोकदल का सीएम कैंडिडेट पूर्व सांसद जयंत होगा. अब जयंत के लिए तैयारी करें या मंच पर अखिलेश के बगलगीर हों. वैसे भी मुलायम और अजीत सिंह का पंगा 30 साल पुराना है. 1986 में शुरुआत हो गई थी. यूपी में मुलायम थे. चौधरी चरण सिंह के चेले. और फिर उनकी थाली खिसकाने आ गए थे अजीत सिंह. चौधरी चरण सिंह के विदेश में पढ़े बेटे. आते ही राज्यसभा सदस्य बन गए. चौधरी साब मरे तो पार्टी दो फाड़ हो गई. अजीत सिंह ने मुलायम को भगा दिया बाप की पार्टी से. ज्यादातर विधायक भी छोटे चौधरी संग हो गए. मुलायम के लिए बड़ी बेइज्जती थी. अभी कल तक नेता प्रतिपक्ष थे. अब सिर्फ विधायक भर. मगर वो खुंटे रहे. फिर बना जनता दल. सब साथ हो गए. मलाई की गिलौरी दिख रही थी सबको. मगर जब खाने का मौका आया, तो मुलायम फतेह रहे. जनता दल विधायक दल के नेता बन गए. अजीत सिंह को पटखनी दे दी. साल था 1989. मुलायम बन गए सीएम. अजीत बन पाए वीपी सिंह सरकार में केंद्रीय मंत्री. और तब से मुलायम बारी बारी सीएम बनते रहे. अजीत सिंह केंद्र में मंत्री बनते रहे. मुलायम का कद बढ़ता रहा. अजीत का घटता रहा. मुलायम ने अपनी पार्टी बना ली. बरसों बाद अजीत ने भी बना ली. अब मुलायम चाहते हैं कि अजीत उनकी पार्टी में आएं. जैसे साल 2003 में आए थे. अनुराधा चौधरी को लाए थे. अनुराधा रालोद नेता थीं. कभी अजीत की नंबर टू. बेटा आया. अनुराधा को हटाया. और ये हाल है. अंदरखाने की खबर ये भी है कि जयंत अखिलेश के साथ ज्यादा सहज हैं. उनके लिए भी शिवपाल मार्का पुरानी पॉलिटिक्स जमती नहीं. अब तीसरे इनकार की बारी. न सोनिया गांधी आ रही हैं. न लल्ला राहुल. सोनिया जी की तो सेहत खराब रहती है. सब कहते हैं. और राहुल तो अखिलेश को अच्छा लड़का बताते हैं. शायद इंतजार भी कर रहे हैं. लड़का बाप से अलग हो तो चाय का न्योता दें. न्योते ये याद आया. एक न्योता. जो सोनिया गांधी चाहती थीं. राष्ट्रपति के आर नारायणन से. अप्रैल 1999 में. कि हमें पीएम बनने के लिए इनवाइट करो. राष्ट्रपति बोले, नंबर हैं आपके पास बहुमत के. सोनिया ने कहा, हां जी. अभी कुछ दिन पहले ही तो सोनिया के नेतृत्व में विपक्ष ने अटल बिहारी वाजपेयी की 13 महीने पुरानी सरकार गिराई थी. एक वोट से. वही कॉन्फिडेंस डेंस हो रहा था. मगर तभी नेता जी ने दांव कर दिया. मुलायम और आडवाणी के बीच मीटिंग हुई. सेटिंग हुई. और सोनिया के अरमां अधूरे रह गए. बड़ी राजनीतिक बेइज्जती हुई. कि बताइए सपोर्ट नहीं 273 का और कह रही हैं शपथ दिलवा दीजिए.
बीजेपी ने ऐहसान चुकाया. 2003 में. पहले तो अपने सपोर्ट से चल रही बीएसपी की मायावती सरकार गिरवाई. फिर नेता जी को खुलकर खेलने का मौका दिया. जोड़ तोड़ हुआ और मुलायम सिंह सीएम की शपथ ले गए. अब जब सिटिंग हो गए तो बीएसपी और दूसरे दलों के विधायक भगे भगे चले आए. 2007 तक राज किया धरतीपुत्र ने.सोनिया ने भी बदला लिया. 2004 में. मुलायम की पार्टी के दो दर्जन से भी ज्यादा सांसद थे. मगर सोनिया की यूपीए को नए हालात में उनकी जरूरत नहीं थी. तो गठबंधन दलों की पार्टी में जब मुलायम के दत्तक भाई अमर सिंह पहुंचे, तो उन्हें लिटरली बाहर कर दिया गया. कह दिया, आपको तो न्योता ही नहीं. तो काहे आए. अब मुलायम न्योता दे रहे हैं. मगर सोनिया और राहुल नहीं आ रहे. सब दूर से ही तेल देखो, तेल की धार देखो का जाप कर रहे हैं. ज्यादा दूर तो नहीं,मगर पर्याप्त दूरी से अखिलेश भी देख रहे हैं. पापा के बगल वाले ही घर में रहते हैं टीपू. 5 विक्रमादित्य मार्ग पर सौतेली मम्मी संग पिता जी. और 4 में डिंपल और बच्चों संग अखिलेश. बीच में एक संतरी बैठता होगा. उसके पास रेडियो होगा. रेडियो पर सही समय पर जिंगल चलता होगा. भइया ये दीवार टूटती क्यों नहीं. भइया कौन. शिवपाल या अवध का चलन है जो, तो उस हिसाब से बड़े बेटे अखिलेश.
ड्रामा अभी जारी है. कई अंक बाकी हैं. मूंगफली खरी भुनी, लेकर बैठे रहिए. बहुत चटख होने वाला है सब.














