# एक कविता -
सबसे ख़तरनाक होता है मुर्दा शांति से भर जाना ना होना तड़प का सब कुछ सहन कर जाना घर से निकलना काम पर और काम से लौट कर घर आना सबसे ख़तरनाक होता है हमारे सपनों का मर जाना- अवतार सिंह संधु 'पाश', जिसे खालिस्तानी एक्सट्रीमिस्ट्स ने मार डाला

# एक कथन -
‘1947 में, पंजाब के राज्यपाल, श्री सीएम त्रिवेदी ने, प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू और उपप्रधान मंत्री सरदार पटेल की इच्छाओं का सम्मान करते हुए, भारतीय पंजाब के सभी उपायुक्तों को कुछ निर्देश जारी किए. ये इस आशय के थे कि, देश के कानून को ध्यान में रखे बिना, सामान्य तौर पर सिखों और विशेष रूप से सिख प्रवासियों को 'आपराधिक जनजाति' के रूप में माना जाना चाहिए. उन्हें कठोर प्रताड़नाएं मिलनी चाहिए. इस हद तक कि उन्हें गोली मार के मार दिया जाए ताकि वे राजनीतिक वास्तविकताओं से वाकिफ हों और जानें कि - कौन शासक हैं और कौन प्रजा.’- कपूर सिंह (लुधियाना में जन्मे और लाहौर से पोस्ट ग्रेजुएशन की और कैम्ब्रिज यूनिवर्सिटी से नैतिक विज्ञान में की पढ़ाई पूरी की. वापस आकर आईसीएस ज्वाइन किया. पंजाब के तात्कालीन गवर्नर चंदू लाल त्रिवेदी ने, 1947 में कपूर सिंह को भ्रष्टाचार के आरोपों के चलते बर्खास्त कर दिया था)

# एक नारा -
राज करेगा खालसा, खालसा बाग़ी या बादशाह- खालिस्तान मूवमेंट के दौरान एक्सट्रीमिस्ट
# इंट्रोडक्शन -
इंदिरा गांधी और महात्मा गांधी में क्या कॉमन है – दोनों का लास्ट नेम गांधी है. महात्मा गांधी और जॉन लेनन में क्या कॉमन है – दोनों के चश्मे गोल हैं और इसके बारे में ‘गुलाल’ में पियूष मिश्रा ने भी हमारा ध्यान आकर्षित किया था. अब अंतिम सवाल, इंदिरा गांधी, महात्मा गांधी और जॉन लेनन में क्या कॉमन है – दरअसल इन तीनों का ‘एसोसिएशन’ इन तीनों के ‘एसेसिनेशन’ को लेकर है.
लेंज़ का एक वैज्ञानिक सिद्धांत है, जो कहता है – ‘प्रेरित धारा सदा उस कारण का विरोध करती है जिससे वह खुद उत्पन्न हुई है.’तीनों (इंदिरा गांधी, महात्मा गांधी और जॉन लेनन) के कातिल इन तीनों के द्वारा ही उत्पन्न हुए थे.
महात्मा गांधी और नाथूराम गोडसे के बारे में तो सब जानते हैं.
मार्क डेविड चेपमेन, जिसने जॉन लेनिन को गोली मारी थी, पहले जॉन लेनिन का अंधभक्त था.

मार्क डेविड चेपमेन
अब आते हैं इंदिरा गांधी के ‘एसेसिनेशन’ पर. इसके लिए हमें इतिहास का अध्ययन करना होगा. तो आलती पालती मार कर बैठ जाइए लंबी और इंट्रेस्टिंग स्टोरी बता रहे हैं. उससे पहले मर्फी का लॉ बता देते हैं –
जो कुछ भी बुरा होना संभव है, वो होकर रहेगा.
# सिख धर्म -
गुरु नानकदेव (1469–1539) ने सिख धर्म की स्थापना की थी और इसलिए ही वो सिक्खों के प्रथम गुरु भी कहलाए. सिख धर्म में कुल दस गुरु हुए हैं. सिख धर्म विश्व के कुछ सबसे नए धर्मों में से एक है."attachment_112911" align="alignnone" width="600"

जस्टिन ट्रूडो सपरिवार, गोल्डन टेंपल (फोटो: अदनान आबिदी)
गुरु अर्जन देव (1562-1606) सिखों के पांचवे गुरु हैं. इन्होंने हरमिंदर साहब की स्थापना की. जब बाद में महाराजा रणजीत सिंह ने इस पर सोने की परत चढ़ाई तो इसे गोल्डन टेंपल भी कहा जाने लगा.
# मिस्लें –
पंजाब में ढेर सारी रियासतें थीं जो यदि अलग अलग रहतीं तो जहांगीर और उसके बाद के मुग़लों द्वारा दबा दी जातीं. इसलिए इन सब ने खुद को अलग अलग मिस्ल में संगठित कर लिया. इन मिस्ल को आप आज के यूरोपीय संघ की तरह या राष्ट्र-मंडल की तरह मान सकते हैं. सिख मिस्ल ने पूरे पंजाब पर 1767 से 1799 तक शासन किया. महाराजा रंजीत सिंह (1780 –1839), वही जिन्होंने हरमिंदर साहब पर सोने की परत चढ़ाई, इन सब मिस्लों को अंडर वन अम्ब्रैला ले आए. और जिस साम्राज्य की स्थापना की वो कहलाया – सिख साम्राज्य और उसकी राजधानी बनी लाहौर.
पंजाब प्रोवेंस - 1909
आधी सदी तक ये साम्राज्य चला लेकिन अंग्रेजों से हार चुकने के बाद सिख साम्राज्य फिर कई टुकड़ों में बंट गया जिसमें से लगभग सारा पंजाब अंग्रेजों के अधीन हो गया और उन्होंने उसका नाम पंजाब प्रोवेंस रख दिया. जो छोटे मोटे प्रिंसली स्टेट बचे भी, उन्होंने भी अंततः अंग्रेजों की दासता स्वीकार कर ली.
# शिरोमणि गुरुद्वारा प्रबंधक कमेटी –
नाम से ही बहुत कुछ ज़ाहिर है. ये कमिटी पंजाब, हरियाणा और हिमाचल प्रदेश गुरुद्वारों के रख-रखाव के लिए 1920 में बनाई गई थी. (तब यानी 1920 में तो पंजाब, हरियाणा और हिमाचल प्रदेश थे ही नहीं, तो ये दरअसल गुरुद्वारों के रख-रखाव के लिए बनाई गई थी.). हरमिंदर साहिब या गोल्डन टेंपल भी इनके अंडर में आता है.
एस. जी. पी. सी.
# शिरोमणी अकाली दल –
‘शिरोमणि गुरुद्वारा प्रबंधक कमेटी’ बनी नवंबर, 1920 में और दिसंबर, 1920 में बनी ‘शिरोमणी अकाली दल’. ‘शिरोमणी अकाली दल’ को ‘शिरोमणि गुरुद्वारा प्रबंधक कमेटी’ का राजनैतिक फ्रंट कहा जा सकता है, मतलब ये कि सिखों के हितों की राजनैतिक गलियारों में बात करने का काम है ‘शिरोमणी अकाली दल’ का.# आज़ादी –
पंद्रह अगस्त, 1947 को भारत को आज़ादी मिली. लेकिन आज़ादी मिलने के साथ ही देश दो हिस्सों में बंट गया. और अंग्रेजों का पंजाब प्रोविनेंस भी दो भागों में बंट गया, जिसमें से बड़ा भाग पाकिस्तान के पास चला गया और कुछ भाग इंडिया के पास.
पार्टीशन - 1947
इस दौरान हिंदुओ और मुस्लिमों को जान-माल का बहुत नुकसान हुआ. लेकिन सबसे ज़्यादा नुकसान सिखों को हुआ. भारत के सिक्खों को और नए-नए बने पाकिस्तान के सिक्खों को. लाहौर, जो कभी सिख साम्राज्य की राजधानी था वो एक मुस्लिम राष्ट्र में चला गया. इस सब से आहत होकर फुसफुसाहट में ही सही सिखों की भी अलग राष्ट्र की मांग ज़ोर पकड़ने लगी.
# खालिस्तान –
आपने कई बार सुना होगा – ये घी ‘खालिस घी’ है, ये दूध ‘खालिस दूध’ है. – यानी प्योर घी है, प्योर दूध है. तो इसी तरह खालिस्तान का लिटरर मीनिंग होता है – प्योर या शुद्ध स्थान.
खालिस्तान के कई 'प्रपोज़्ड' नक्शों में से एक
# खालिस्तान मूवमेंट -
तो इस शुद्ध स्थान को एक अलग राष्ट्र बनाने की दिशा में जो प्रयास हुए, हो रहे हैं, उसे खालिस्तान मूवमेंट कहा जाता है. खालिस्तान मूवमेंट उन राष्ट्रवादी सिक्खों का आंदोलन है जो पंजाब के रूप में एक अलग राष्ट्र चाहते थे या हैं.
फोटो - स्ट्रैट
# स्टेस रिओर्गेनाइज़ेश्न कमिशन या राज्य पुनर्गठन आयोग (एसआरसी) –
आपने अमेरिका और ऑस्ट्रेलिया का नक्शा तो देखा होगा कैसे आयताकार डिब्बे बने हैं राज्यों के. कॉलोनाईज़ेशन में अंग्रेज़ ये देखते थे कि कैसे प्रशासनिक सुविधाओं का ख्याल रखा जाए, उन्हें फर्क ही नहीं पड़ता था कि एक लाइन से समान संस्कृति समान भाषा और समान बोलियों को दो भागों में बांट दिया या एक ही प्रोविनेंस में एक दूसरे के जानी दुश्मन आ गए. तो भारत में भी आज़ादी से पहले कमोबेश यही हाल था.
आज़ादी से पहले का भारत (फ़ोटो - मैप्स ऑफ़ इंडिया)
अंग्रेजों से पहले का भारत 21 प्रशासनिक इकाइयों (सूबों) में बंटा था. अंग्रेजों ने प्रशासनिक सुविधा का खयाल करते हुए मनमाने तरीके से भारत को नये सिरे से बड़े-बड़े प्रांतों में बांटा, जिसे फिर से रीऑर्गनाइज़ करने की ज़रूरत थी. उसी के लिए भारत में ‘स्टेस रिऑर्गेनाइज़ेश्न कमिशन’ का निर्माण हुआ था.
# सिख बाहुल्य राज्य –
मुस्लिम बाहुल्य पाकिस्तान ‘धर्म-निरपेक्ष’ नहीं रह गया था, तो वहां पर सिखों की कोई मांग उठने का या बिना उसके दमन हुए लगातार चलते रहने का तो प्रश्न ही नहीं उठता.उधर दूसरी ओर, इंडिया के सिखों ने फिर से मेहनत करके, जो कुछ बचा था उसे इकट्ठा करके, अपने को फिर से स्थापित करना शुरू कर दिया था. भारत में सिखों को, अपने धर्म के चलते कोई बड़ी दिक्कत नहीं आ रही थी इसलिए अलग राष्ट्र की ‘फुसफुसाहट’ तो शांत हो गई मगर फिर भी, उन्हें एट लीस्ट अलग राज्य चाहिए था – राज्य जिसमें सिख बहुसंख्यक हों. लेकिन ‘स्टेस रिओर्गेनाइज़ेश्न कमिशन’ ने इस मांग को अस्वीकार कर दिया. अव्वल तो ये मांग धर्म के आधार पर थी और दूसरा उन्हें (स्टेस रिओर्गेनाइज़ेश्न कमिशन को) लगा कि ये मांग बहुत ढेर सारे और सत्ता में बहुत प्रभाव रखने वाले नहीं कर रहे हैं. इसलिए ही जुलाई, 1956 में पास हुए राज्य पुनर्गठन अधिनियम के अनुसार, पंजाब तो बना लेकिन वो नहीं जिसमें सिख बहुसंख्यक हों. उसमें तो अब का हिमाचल और हरियाणा भी शामिल था.

आज़ादी के बाद का पंजाब
#राज्य बनाम राष्ट्र –
इस ‘बहुसंख्य सिख वाले राज्य’ के रिजेक्शन के बाद नर्म-दल सिखों के लिए ऑटोनोमस स्टेट की मांग करने लगा. ‘ऑटोनोमस स्टेट’ मतलब – पंजाब रहेगा भारत के अंडर में ही लेकिन उसे ज़्यादा स्वायत्तता मिलेंगी. अपने जल, अपनी नदियों पर उसका अधिकार होगा. उनके और अपने नागरिकों के लिए कानून बनाने का उसका अधिकार होगा. केंद्र का राज्य पर निल या बहुत कम हस्तक्षेप रहेगा.वहीं गर्म-दल को खालिस्तान के रूप में अलग देश चाहिए था. न कम – न ज़्यादा.
(प्लीज़ नोट करें कि खालिस्तान मूवमेंट में ‘नर्म-दल’, ‘गर्म-दल’ किसी गुट के कोई ऑफिसियल या अनऑफिसियल नाम कभी नहीं रहे. ये केवल चीज़ों को आसान बनाने के लिए हमने यूज़ किया है. और यहां पर नर्म-दल का मतलब अहिंसा और गर्म-दल का मतलब हिंसा नहीं है.)
# धर्म बनाम भाषा –
56 दिन के आमरण अनशन के बाद 15 दिसंबर, 1952 को रामुल्लू की मृत्यु हो गई. वो तेलगु-भाषियों का आंदोलन था. जिसके बाद 1 अक्टूबर, 1953 को आंध्र प्रदेश, भाषा के आधार पर गठित होने वाला पहला राज्य था.
इससे ‘क्यू’ लेकर अकाली दल ने समझदारी का काम करते हुए ‘सिखों’ के बदले ‘पंजाबी भाषा’ बोलने वालों के लिए अलग राज्य की मांग की. इस स्ट्रेटेजी को बड़ी सफलता मिली जब 1 नवंबर, 1966 में उस वक्त का पंजाब को भाषा के आधार पर विभाजित करके पंजाब (पंजाबी भाषा) एवं हरियाणा (हिंदी भाषी) बना दिया गया.
# अकाली दल बनाम कांग्रेस -
1966 के इस पंजाब पुनर्गठन ने समस्याओं को हल करने के बजाय बढ़ा और दिया. चंडीगढ़ को एक संघ राज्य क्षेत्र और पंजाब और हरियाणा राज्यों की संयुक्त राजधानी में बदल दिया गया था. कुछ पंजाबी बोलने वाले इलाके हरियाणा राज्य को दे दिए गए. केन्द्र सरकार ने नहर के हेडवर्क्स पर भी अपना नियंत्रण स्थापित कर लिया और सतलज, रावी और बीस के पानी के मनमाने आवंटन किए. केंद्र सरकार ने विभिन्न विद्युत और सिंचाई परियोजनाओं का अधिग्रहण कर लिया.
ज्ञानी जैल सिंह
फरवरी 1967 में पंजाब में अकाली दल सत्ता में आया, जो 1966 में भाषा के आधार पर विभाजित पंजाब का पहला इलेक्शन था. कांग्रेस को पंजाब की जनता ने बीस साल बाद सत्ता से बाहर किया था. कांग्रेस पार्टी, जो अब भी केंद्र में सत्ता में थी, इससे तिलमिला गई. उसने राज्य सरकार की उन स्वायत्त शक्तियों के ऊपर भी हस्तक्षेप करना शुरू कर दिया, जो विशुद्ध रूप से राज्य के विषय थे. 1967 और 1971 के बीच पंजाब में हालात बहुत खराब हो गए थे. राज्य सरकार का निराशाजनक प्रदर्शन, चार बार मुख्यमंत्रियों की अदला बदली, दल-बदल, राष्ट्रपति शासन...
1971 में भारत ने इंडो-पाक युद्ध में जब पाकिस्तान को हरा दिया और उस वक्त की प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी को लोग ‘दुर्गा’ का अवतार कहने लगे तो अगले चुनावों में कांग्रेस की लैंडस्लाइड विक्ट्री तो तय थी.
17 मार्च, 1972 को ज्ञानी जैल सिंह को पंजाब का मुख्यमंत्री बनाया गया.
# आनंदपुर साहब रेसोल्यूशन –
स्वतंत्रता के दौरान कांग्रेस और संविधान सभा का नेतृत्व उन लोगों के हाथों में था जो भारत में एक मजबूत, केंद्रीकृत राज्य की आवश्यकता में विश्वास करते थे. लेकिन 70 के दशक में केंद्र-राज्य संबंधों और प्रांतों में अधिक प्रांतीय स्वायत्तता का मुद्दा एक नया मुद्दा नहीं था और न केवल अकाली दल द्वारा उठाया गया था.अप्रैल 1973 में, अकाली दल की कार्यसमिति ने आनंदपुर साहिब में आयोजित एक सम्मेलन में एक नीतिगत प्रस्ताव अपनाया जिसमें संघीय ढांचे की वकालत की गई थी जिसमें कहा गया कि केंद्र सरकार ने प्रांतीय सरकार को स्वायत्तता देकर (डिफेंस, मुद्रा और विदेश नीति को छोड़कर) भारत की संघीय अवधारणा को वास्तविक बनाना चाहिए. इस प्रस्ताव के अप्रकाशित पंजाबी संस्करण में सिखों को एक राष्ट्र के रूप में वर्णित किया गया और उनके लिए सुरक्षा और संरचनात्मक व्यवस्था की मांग की गई, जिसके तहत सिखों की राज्य के प्रशासन में एक प्रमुख भूमिका होगी.
ये महत्वपूर्ण है समझना कि अकाली दल ने अलग राष्ट्र की मांग कभी नहीं की, कम से कम ऑफिशियली या लिखित रूप से तो नहीं ही की. उन्हें केवल सिखों के लिए ऑटोनोमी चाहिए थी. आजकल आप ‘आप’ को इस या इससे मिलते जुलते मुद्दे पर खूब मुखरित देख रहे होंगे. क्यूंकि दिल्ली पूर्ण राज्य नहीं है इसलिए दिल्ली राज्य का ज़्यादातर मैनेजमेंट या तो केंद्र के हाथ में है या फिर उनके हाथों से होकर गुजरता है. बाकी यदि हरियाणा, पंजाब और हिमाचल के बीच का जल विवाद बेशक कावेरी जल विवाद की तरह ‘एक्सट्रीम’ नहीं था, तो भी विवाद तो था ही, 2017 के चुनावों से कुछ महीनों पहले भी इस मुद्दे ने ज़ोर पकड़ा था.

सेक्टर 17 - चण्डीगढ़ (पुराना)
आनंदपुर साहिब रेसोल्यूशन में ऑटोनोमी के आलावा कुछ अन्य चीज़ें भी महत्वपूर्ण थीं –
# हरियाणा में पंजाबी भाषी या सिख बाहुल्य जिलों को पंजाब को देना.इंदिरा गांधी ने इस प्रस्ताव को ‘देशद्रोही’ बताया था. उन्होंने कहा कि ये कोई ऑटोनोमी की डिमांड नहीं ये तो अलग देश की डिमांड है. बहरहाल, कल्ट मूवीज की तरह रिलीज़ के दौरान ये प्रस्ताव एक दशक तक भूला दिया गया था. लेकिन अस्सी के दशक में इसको फिर से लोकप्रियता मिलने लगी.
# चंडीगढ़ पूरी तरह पंजाब को देना
# पंजाब में लैंड रिफोर्म्स, इंडस्ट्रियलाइजेशन
# पैन-इंडिया गुरुद्वारा समिति का निर्माण
# फौज़ में सिखों की भर्ती अधिक से अधिक
# डायसपोरा –
लोग कई कारणों के चलते अपने मूल स्थान से विस्थापित हो जाते हैं. इस विस्थापित लोगों को ही डायसपोरा कहते हैं. पूरी दुनिया में भारत के सबसे ज़्यादा डायसपोरा हैं जो लगभग तीस देशों में बसे हुए हैं. सिख डायसपोरा यूके, कनाडा, ऑस्ट्रेलिया और यूएसए में सबसे ज़्यादा हैं.# न्यू यॉर्क टाइम्स –
विदेश में मुद्दा उठाना आसान था. क्यूंकि वहां भारतीय सरकार का प्रतिबंध नहीं था.1971 में जगजीत सिंह ने न्यू यॉर्क टाइम्स में अलग खालिस्तान का विज्ञापन दे दिया. ये आंदोलन की फंडिंग के लिए था. 1980 में जगजीत सिंह ने ‘खालिस्तान राष्ट्रीय परिषद’ का भी निर्माण कर दिया. ये परिषद खालिस्तान को एक अलग देश मानता था. इस सब में उसके साथ था बलबीर सिंह संधू, जो ‘खालिस्तान राष्ट्रीय परिषद’ के महासचिव हुआ करता था.

विदेशी अख़बारों में खालिस्तान के विषय में लेख और विज्ञापनों से फंडिंग इकट्ठा की जा रही थी
# जगजीत सिंह चौहान -
1969 में पंजाब विधानसभा चुनाव हारने के दो साल बाद जगजीत सिंह चौहान यूनाइटेड किंगडम चला गया. उसने कुछ सिख प्रवासियों के निमंत्रण पर संयुक्त राज्य अमेरिका का दौरा भी किया. 13 अक्टूबर, 1971 को उसने न्यू यॉर्क टाइम्स में एक स्वतंत्र सिख राज्य की घोषणा करते हुए एक विज्ञापन दिया. 1977 में भारत लौटने के बाद चौहान 1979 में ब्रिटेन गया और खालिस्तान नेशनल काउंसिल की स्थापना की.उसने ‘खलिस्तान हाउस’ नाम की एक इमारत से अपना ऑपरेशन ज़ारी रखा. इस दौरान वो सिख धार्मिक नेता जरनैल सिंह भिंडरावाले के संपर्क में बना रहा. चौहान ने कनाडा, अमेरिका और जर्मनी के विभिन्न समूहों के बीच संपर्क बनाए रखा. उसे पाकिस्तान की सरकार भी अपने अतिथि के रूप में बुलाती रहती थी और वो जाता रहता था. चौहान ने खुद को ‘खालिस्तान गणराज्य’ का अध्यक्ष घोषित किया और खालिस्तान ‘पासपोर्ट’, ‘डाक टिकट’ और ‘खालिस्तान डॉलर’ भी जारी कर दिए.

खालिस्तान की मुद्रा
लेकिन अब तक मोटा मोटी तौर पर खालिस्तान का इश्यू इंडिया के बाहर और डायसपोरा सिखों के बीच में ही चर्चित रहा था.
# इमरजेंसी के बाद की इमरजेंसी –
1975 में जब इमरजेंसी लगी तो वो दो साल तक चली.
फिर, 1977 में जब इमरजेंसी खत्म हुई तो कांग्रेस की केंद्र और राज्य (पंजाब) में करारी हार हुई. पंजाब में वापस अकाली दल सत्ता में आया. उस वक्त केंद्र में तो इंदिरा गांधी जैसे करिश्माई लीडर थे जो शायद कांग्रेस को फिर से जीवित कर देते लेकिन पंजाब में कांग्रेस की स्थिति उस वक्त ऐसी हो गई थी जैसी अभी पूरे देश में है.
# जरनैल सिंह भिंडरावाले -
कांग्रेस के लिए इस कैरिश्मेटिक लीडर की खोज ख़त्म हुई जरनैल सिंह भिंडरावाले (1947 – 1984) पर जाकर. जरनैल सिंह बराड़/भिंडरावाले सिखों के धार्मिक समूह दमदमी टकसाल का प्रमुख लीडर था. उसे सिख एक्सट्रेमिस्ट भी कहा जा सकता है. वो सिक्खों को शुद्ध होने के लिए कहता था. उसने शराब पीने, नशा करने, धार्मिक कामों में लापरवाही बरतने और सिक्ख नौजवानों को केश काटने के ऊपर कड़ा रुख अपनाया. पाठक उसे आज के हिंदू और मुस्लिम एक्सट्रीमिस्ट से रिलेट कर पा रहे होंगे. उसने भारतीय संविधान के अनुच्छेद 25, जो सिक्ख, जैन और बौद्ध धर्म के अनुयायियों को हिन्दू धर्म का एक हिस्सा कहता था, का भी विरोध किया.
जरनैल सिंह भिंडरावाले
जरनैल ने दमदमी टकसाल से सिखों के ग्रंथों और सिख धर्म के विषय में गहन अध्ययन किया था. 1977 में जरनैल को दमदमी टकसाल का अध्यक्ष चुन लिया गया.
# दमदमी टकसाल –
दमदमी टकसाल एक सिख शैक्षिक संगठन है. जिसका मुख्यालय चौक मेहता शहर में स्थित है, जो अमृतसर के शहर से लगभग 25 मील की दूरी पर है.
एक युद्ध के दौरान गुरु गोबिंद सिंह ने साबो की तलवंडी में विश्राम किया था. इसलिए यह जगह दमदम के रूप में जानी जाती है. क्यूंकि दमदम का अंतर विश्राम स्थल होता है. बाद में ये दमदमा साहिब हो गया. 1737 में, दमदमा साहिब को सिखों के लिए सीखने की सर्वोच्च गद्दी माना जाता था.
# निरंकारी –
जिस तरह शिया सुन्नी दोनों ही मुस्लिम हैं, जिस तरह शैव और वैष्णव दोनों ही हिंदू हैं और जिस तरह कैथोलिक और प्रोसेस्टेंट दोनों ही क्रिस्टियन हैं मगर आपस में गहरे मतभेद हैं, उसी तरह निरंकारी और सिख भी एक ही धर्म के हैं मगर जहां सिख (जैसा कि ऊपर हमने पढ़ा है) मानते हैं कि उनके केवल दस गुरु हुए और उसके बाद किसी कोई गुरु का दर्ज़ा नहीं दिया जा सकता, और अब गुरु ग्रंथ साहिब ही गुरु बने रहेंगे. लेकिन निरंकारियों का कहना है कि अभी भी जीवित गुरु हो सकते हैं. होने को तो ये अंतर उतना बुरा और विवादास्पद नहीं दिखता लेकिन...# निरंकारी V/S सिख –
भिंडरावाले ने निरंकारी सिखों का विरोध किया और 1978 के आस पास में निरंकारियों और सिखों के बीच खूब मार काट मची. इसमें भिंडरावाले ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई.# ज्ञानी जैल सिंह + संजय गांधी + भिंडरावाले –
अकाली दल के पूरे इतिहास से आप लोगों को पता चल गया होगा कि वो सिखों के कितने बड़े हितैषी थे. तो कांग्रेस को भी यदि अपने को सिखों का हितैषी दिखाना था तो अकाली के इतिहास को अपने वर्तमान से मिटाना होता. कोई और भी बड़ा सिखों का हितैषी अकाली दल के सामने खड़ा करना होता. इसकी के चलते ज्ञानी जैल सिंह ने संजय गांधी के कानों में भिंडरावाले का नाम डाल दिया.सिंध के मतों को विभाजित करने और पंजाब में अपने प्रतिद्वंद्वी अकाली दल को कमजोर करने के लिए इंदिरा गांधी वाली कांग्रेस (कांग्रेस - आई) ने भिंडरावाले का समर्थन किया. भिंडरावाले की फंडिंग करनी शुरू कर दी. और पैसा क्या-क्या करवा सकता है इसके बारे में अफगानिस्तान और सीरिया जैसा कोई मेटाफर देना ज़रुरी नहीं.

संजय गांधी
कांग्रेस ने 1978 में एसजीपीसी (शिरोमणि गुरुद्वारा प्रबंधक कमेटी) चुनावों में भिंडरावाले द्वारा समर्थित उम्मीदवारों का समर्थन किया. 1980 के चुनावों में, भिंडरावाले ने कांग्रेस(आई) उम्मीदवार गुरदिल सिंह ढिल्लन और रघुनाथन लाल भाटिया का समर्थन किया. भिंडरावाले यकीनन पहले उतना प्रभावशाली नहीं था, लेकिन 1980 के दशक की शुरुआत में कांग्रेस की गतिविधियों ने उसे एक प्रमुख नेता की स्थिति में पहुंचा दिया.

जरनैल सिंह भिंडरावाले अपने हथियारबंद समर्थकों के साथ
पैसे आए, हथियार आए, तो संत भिंडरावाले हो गए ‘संत सोल्जर’ भिंडरावाले. AK47 से लेकर उस वक्त के सारे आधुनिक असलहों से लैस, सिक्युरिटी गार्ड, रसूख – एकदम भौकाल. मगर ये भी भिंडरावाले का शिखर नहीं था. अभी उसने और सीढ़ियां चढ़नी थीं. उसे तो अभी कल्ट बनना था.
# जलता पंजाब -
जब रूस ने अफगानिस्तान में आक्रमण किया था तो अमेरिका ने अफगानिस्तान के एक्सट्रीमिस्ट की सहायता करना शुरू कर दिया. पैसे, असलहे, ट्रेनिंग – सब कुछ, जो भी युद्ध के लिए ज़रुरी होता है मुहैया करवाया. और एक दिन रूस जब वापस चला गया तो अफगानिस्तान के पास ये असलहा ही बाकी रह गया था और वही बाद में अमेरिका के खिलाफ इस्तेमाल हुआ, हो रहा है.होने को मैंने अफगानिस्तान की स्थिति का जनरलाईज़ेशन किया है. लेकिन मोटा मोटी तौर पर यही सत्य है. और यही हुआ पंजाब में भी, इसलिए ही अफगानिस्तान का उदाहरण दिया.
जिस भिंडरावाले का कांग्रेस समर्थन कर रही थी, वही अब उनकी नाक में दम करने लगा. कैसे? बताते हैं.

दरबारा सिंह
अस्सी में हुए चुनावों में केंद्र और राज्य दोनों में कांग्रेस वापस आई. कांग्रेस ने दरबारा सिंह को पंजाब का मुख्यमंत्री बनाया. दरबारा सिंह को भिंडरावाले पसंद नहीं था. और होता भी क्यूं, जब सत्ता में आप होते हैं तो वो सभी तत्व आपके लिए बेकाम के हो जाते हैं जिनका सीढ़ियों की तरह आपने उपयोग किया था. कारण कई हैं. सबसे पहला कारण तो इनका सफेद हाथी हो जाना है.
# गुरबचन सिंह और रणजीत सिंह –
गुरबचन सिंह, संत निरंकारी संप्रदाय के तीसरे गुरु थे, जिन्हें मुख्यधारा के सिखों द्वारा अधर्मी माना जाता था. 1962 में उन्हें अपने पिता और पूर्ववर्ती बाबा अवतार सिंह द्वारा सतगुरु घोषित किया गया.
बाबा गुरबचन सिंह
24 अप्रैल 1980 की शाम को रणजीत सिंह ने गुलबचन सिंह को गोली मार दी. रणजीत सिंह बच निकले. एफआईआर में बीस लोगों को हत्या और षडयंत्र के लिए नामांकित किया गया, जिसमें से ज़्यादातर भिंडरावाले के समर्थक और सहयोगी थे. रणजीत सिंह ने 1983 में आत्मसमर्पण कर दिया, और 13 साल के लिए जेल में रहा. 1996 में उसे छोड़ दिया गया था. लेकिन फिर 1997 में दिल्ली उच्च न्यायालय ने अपनी सजा को बरकरार रखा और जमानत को रद्द कर दिया. रणजीत सिंह ने आत्मसमर्पण करने से इंकार कर दिया और उस वक्त की सरकार ने तनावपूर्ण स्थिति से बचने के के लिए आनन फानन में रणजीत की बाकी सज़ा माफ़ कर दी.
# लाला जगत नारायण –
पत्रकार लाला जगत नारायण, ‘हिन्द समाचार समूह’ के संस्थापक थे. 1981 में जब जनगणना शुरू हुई थी तो लाला जगत नारायण उस वक्त पंजाब केसरी के संपादक थे. उन्होंने पंजाब के लोगों को, खासतौर पर हिन्दुओं को, जनगणना के दौरान पूछे जाने पर हिंदी को अपनी मातृभाषा मेंशन करने को कहा.
लाला जगत नारायण
भिंडरावाले और उसके एस्ट्रीमिस्ट फ़ॉलोवर्स को इससे नाराज़ होना ही था. इसी के चलते लाला जगत नारायण की हत्या को अंजाम दिया गया.
# भिंडरावाले का कल्ट –
दो हत्याओं के बाद पंजाब की स्थिति, जो पहले से ही चिंतनीय थी, अधर में जाने लगी. दोनों कत्लों का इल्ज़ाम भिंडरावाले और उसके समर्थकों पर लगा. जनता ज़ल्द से ज़ल्द इसका हल चाहती थी. लेकिन पुलिस और सरकार भिंडरावाले को गिरफ्तार करने में संकोच कर रही थी. कारण वही था जो रणजीत की बची सज़ा को माफ़ करने का कारण था – स्थिति का तनावपूर्ण हो जाना.लेकिन अंततः भिंडरावाले को गिरफ्तार कर ही लिया गया. और जिसका डर था वही हुआ. बड़े पैमाने पर हिंसा, आगजनी और ‘गुरमीत राम रहीम की गिरफ्तारी’ जैसा माहौल क्रियेट हो गया. जिसके चलते गिरफ्तारी के दो-तीन दिन बाद ही उसे छोड़ दिया गया.
कहा जाता है विद्वान् एकेडेमिक्स में फेल होकर और सामजिक कार्यकर्ता गिरफ्तार होकर ही कल्ट का दर्ज़ा प्राप्त करते हैं.
यही भिंडरावाले के केस में भी हुआ, उसकी पॉपुलरिटी के बारे में खुद उसने ही कहा –
जितना सालों की मेहनत से पॉपुलरिटी नहीं मिली उससे कई गुना दो दिन की गिरफ्तारी से मिल गई.
# धर्म युद्ध मोर्चा –
जो भिंडरावाले कल तक कांग्रेस के साथ था अब वो कांग्रेस के धुर विरोधी अकाली दल के साथ हाथ मिला लेता है. इस हाथ मिलाने को नाम दिया जाता है – धर्म युद्ध मोर्चा. इस धर्म युद्ध मोर्चे का उद्देश्य होता है – आनंदपुर साहेब रेसोल्यूशन को एग्ज़ीक्यूट करवाना.ये बात 1982 की है. यानी जैसा कि पहले बताया गया था, आनंदपुर साहेब रेसोल्यूशन, जो तब भुला दिया गया था अब चर्चा में आ गया था. जगह जगह प्रदर्शन होने लगे. जितने उग्र प्रदर्शन, उतना ही उग्र कांग्रेस सरकार (जो केंद्र में भी थी और राज्य में भी) का कॉम्बैट. क्यूंकि अबकी भिंडरावाले और अकाली दल, कांग्रेस के धुर विरोधी, एक साथ हो गए थे.
"attachment_112934" align="alignnone" width="600"





.webp?width=60&quality=70)




