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'जिंदगी में कुछ लोग जॉन एलिया की शाइरी की तरह होते हैं'

आज एक कहानी रोज़ में पढ़िए देवेश तनय की एक कहानी.

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फोटो - thelallantop

देवेश तनय जवां लेखक हैं. कनपुरिया हैं. IIT मुंबई में पढ़ रहे हैं. फेसबुक पर IIT मुंबई नाम से डायरी भी लिखते हैं. अकादमिक पढ़ाई के अलावा सारी पढ़ाई करते हैं. आज एक कहानी रोज़ में पढ़िए देवेश की यह कहानी :

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हमारी फेसबुक की फ्रेंडलिस्ट में अक्सर ऐसे दोस्त शुमार हो जाते हैं जिनसे हम जिंदगी में एक ही बार मिले होते हैं और उनसे दुबारा मिलने की कोई सूरत नहीं होती. पार्थ की जिंदगी में भी इस तरह के दोस्तों की कमी नहीं थी. उसे लिटरेचर में गाढ़ी दिलचस्पी थी और नेचर से गहरा जुड़ाव. हरसिंगार की पीली डंठल का ओस से बतियाना, तालाब में बतखों का अठखेलियां करना, सर्दियों के दिनों में कोहरे का पेड़ों के सीने से लिपट जाना, गांव किनारे लालटेनी शामों का झिलमिलाना उसे बहुत कुछ सिखाता था. कुदरत के इस अनकहे जादू को वह भीतर तक महसूस करता था और कभी-कभी इन्हीं जादुओं में शब्दों की तुकबंदियां और भावों की लयकारी भर के मीठा-सा गीत रचता था. एक शाम को उसने कनेर के फूलों से बिखरती हुई पीली हंसी पर सुनहरा गीत लिखा था. जब लगा कि अब ये ठीक-ठाक बन गया तो उसने पोस्ट कर दिया फेसबुक की वॉल पर. अंगूठा दिखाने का सिलसिला शुरू हो गया. अब अपने लिखे पर लाइक और कमेंट देख कर किस कमबख्त की बांछे नहीं खिलतीं. सो उसकी भी खिल रही थीं हालांकि उसे पता नहीं था बांछे शरीर के किस प्रदेश में पाई जाती हैं. फिर भी लाइक पे लाइक और कमेंट पर कमेंट देखकर वह मन ही मन बावला हुआ जा रहा था. और अगर कोई दिल वाला इमोजी बना देता तो वो इस तरह पगला जाता कि मानो इंडिया पाकिस्तान से मैच जीत गया हो. इन्हीं कमेंट में से एक कमेंट परिधि का भी था. परिधि, ग्रेजुएशन के दिनों में पार्थ की जूनियर थी. पार्थ ग्रेजुएशन के लास्ट सेमेस्टर में सुबह साढ़े आठ बजे कम्युनिकेशन स्किल की एक कॉमन क्लास हुआ करती थी. वहीं दोनों की हल्की-फुल्की दोस्ती हुई थी. उस क्लास में पार्थ अपनी अधूरी नींद पूरी करता था और परिधि पूरी शिद्दत के साथ नोट्स बनाती थी. वह भी अलग-अलग रंगों के पेन यूज करके. क्लास खत्म होने के बाद परिधि उसे धक्के मार-मार के उठाती थी और पार्थ हमेशा कहता, ‘यार! प्लीज परिधि, पांच मिनट रुक जा ना फिर चलते हैं न शंकर भैया की टपरी पर चाय पीने.’ पार्थ जब तक अलसाते हुए उठता, परिधि उतनी देर में अपना बैग पैक कर लेती और फिर दोनों शंकर भैया की टपरी पर चाय पीने चले जाते. यही लगभग डेली का नियम था. एक दिन परिधि ने अपनी आखों और बातों में ढेर सारी जिज्ञासा भरते हुए कहा, ‘मैं कई दिनों से एक बात पूछना चाहती थी, आज पूछ लूं क्या?’ ‘मैं कोई प्रोफेसर साहब थोड़े ही हूं जो सवाल पूछने पर भड़क जाऊंगा. पूछो, जो पूछना है.’ पार्थ ने चाय की लंबी सिप लेते हुए कहा . ‘यार! तुम वहां कॉलेज के गेट पर रामलाल की चाय क्यों नहीं पीते. वह भी तो बिल्कुल ऐसी ही चाय बनाता है और वो तो दो रुपए सस्ती भी देता है.’ परिधि ने काफी उत्सुकता लिए हुए ये सवाल पूछा था. पार्थ बोला, ‘मिस जूनियर, आप नहीं समझेंगी और समझ भी गईं तो मेरे ऊपर केवल हंसेंगी. ‘अरे! बताओ न?’ परिधि जिद करने लगी. पार्थ ने कहा, ‘यार! पता है ये शंकर भैया मिट्टी के कुल्हड़ में चाय देते हैं, और वह रामलाल भैया प्लास्टिक के ग्लास में देते हैं. अब तू ही बता, चाय पीने का जो सौंधापन मिट्टी के कुल्हड़ में है, वो प्लास्टिक के ग्लास में कहां? ‘वाह! क्या बात, क्या बात. आज तो सच में फ्रेशनेस आ गई. परिधि खिलखिलाते हुए बोली. इसी तरह दोनों अक्सर ही हल्की-फुल्की बातें करते और अपने-अपने लेक्चर अटेंड करने चले जाते. सब कुछ बिल्कुल सही था, लेकिन एक दिन कॉलेज के इलेक्शन में दोनों की इतनी जबरदस्त लड़ाई हो गई कि तब से दोनों ने एक दूसरे का चेहरा तक देखना बंद कर दिया था. कुछ ही दिनों के बाद पार्थ का ग्रेजुएशन पूरा हो गया और वह मुंबई में जॉब करने लगा. एक साल बाद परिधि ने भी चेन्नई में एक प्रोजेक्ट ज्वाइन कर लिया था. उस लड़ाई के बाद ये पहला मौका था जब पार्थ और परिधि के बीच फिर से कोई बातचीत शुरू हुई थी. परिधि ने कमेंट किया, ‘यार! क्या लिखा है, यूनिवर्सिटी के दिनों में तुम्हारी लिखाई के बहुत चर्चे थे. लेकिन आज पता चला तुम तो सच में एकदम झक्कास लिखते हो. keep it up. लिखते रहो.’ पार्थ ने थोड़ा टशन मारते हुए कहा, ‘ज्यादा तारीफ is injurious to health like cigarette smoking.’ ‘अच्छा तो देसी बाबू अब मॉडेस्ट हो गए हैं.’ परिधि मजे लेते हुए बोली. ‘नहीं... ऐसी बात नहीं.’ पार्थ कुछ सोचते हुए बोला. धीरे-धीरे दोनों के बीच लाइक, कमेंट का अंजान सिलसिला शुरू हो गया. कमेंट की गलियां अब इनबॉक्स के घर तक आ गई थीं. फोन नंबर भी एक्सचेंज हो गए. वैसे परिधि किसी को भी अपना नंबर देने में झिझकती थी, लेकिन पता नहीं क्यों उसने पार्थ को बिना कुछ सोचे-समझे अपना नंबर दे दिया. दोनों के बीच बातें होतीं, गप्पें होतीं, मजाक, हंसी-ठिठोली होती, रत्ती भर रूठना होता और ढेर सारा मनाना होता. एक दिन पार्थ बातों ही बातों में पूछ बैठा, ‘यार! हम मिलेंगे कब?’ परिधि तपाक से बोली, ‘अरे! मैं यहां चेन्नई में रहती हूं और तुम मुंबई में, how can we meet?’ ‘तो क्या हम ये फेसबुक-फेसबुक ही खेलते रहेंगे. कभी मिलेंगे नहीं. अच्छा सुनो ना, मैं दिसंबर में delhi आ रहा हूं तुम आओगी?’ पार्थ ने बड़ी उम्मीद से पूछा. ‘नहीं. मैं नहीं आऊंगी, बहुत बिजी हूं. i have to finish my project.’ परिधि ने सीधा-सा रिप्लाई दिया. पार्थ ने भी सिंपली, ‘ओके.’ कहा. समय के साथ-साथ बातों की डोर बढ़ती जा रही थी. दोनों एक दूसरे की पसंद-नापसंद को काफी करीब से पहचानने लगे थे. कभी परिधि अपने पसंदीदा ईयर रिंग्स के बारे में बात करती तो कभी पार्थ अपनी ब्लू टाई की तारीफ करते हुए नहीं थकता. बड़ी से बड़ी और छोटी से छोटी बात पर पूरी डिटेलिंग होती. फेसबुक की अंजान दोस्ती ने फास्ट फ्रेंडशिप की प्यारी-सी शक्ल ले थी.
एक रात दोनों ने बहुत बात की. उस रात वीडियो चैट के दौरान पार्थ परिधि को बड़ी ही खुशपोश नजरों से छू रहा था, बिल्कुल वैसे ही जैसे चांद की सफेद रोशनी रातरानी के नर्म फूलों को दूधिया स्पर्श देती है. पार्थ के दिल के छज्जे पर एक अजीब-सा ख्याल बार-बार उचक रहा था. उसने बातों की स्पीड को चौथे गेयर डालते हुए पूछा, ‘परिधि! अगर मुझे तुमसे प्यार हो गया तो?’ ‘तो मुझे नहीं होगा. I know myself very well.’ परिधि ने ये बात उतनी ही तेजी से खत्म की जितनी तेजी से पार्थ ने शुरू की थी. ‘यार हम डेली बात करते हैं. सब कुछ समझते हैं, एक दूसरे के बारे में. मेरी टाई के कलर से लेकर तुम्हारे बालों के क्लचर तक. कुछ भी तो नहीं छिपा है हम दोनों के बीच.’ पार्थ ने एक ही सांस में सब कह दिया. ‘अरे तो इसका मतलब ये नहीं न कि हम दोनों एक दूसरे से प्यार करते हैं.’ परिधि ने कहा. ‘मैं कब बोल रहा हूं प्यार करते हैं. प्यार कोई पिज्जा थोड़ी न है कि खा लिया और पेट भर गया. प्यार तो धीरे-धीरे पकता है, दिल की हांड़ी में एहसासों की बेहद धीमी आंच में.’ पार्थ थोड़ा फिलॉसफर बनते हुए बोला. ‘नहीं. मुझे ये हांडी-वांडी का कॉन्सेप्ट नहीं समझना. तुम्हें अगर बात करने से प्रॉब्लम हो रही है तो प्लीज बात करना बंद कर दो.’ परिधि ने इरिटेट होते हुए कहा. ‘अच्छा तो तुम्हें मेरे बात करने या न करने से तुम्हें कोई फर्क ही नहीं पड़ता. ओके. मैं बात नहीं करूंगा.’ पार्थ गुस्से में बोला. ‘हां, मत करो. बाय. गुड लक.’ इतना कह कर परिधि ने फोन काट दिया.
परिधि को क्या पता था कि पार्थ सच में बात नहीं करेगा. उसने भी न ही कॉल किया, न मैसेज. उसे घर, ऑफिस, शहर, गलियां सब अजीब से लगते. मानो जिंदगी में कोई उमंग ही न हो. सब कुछ बड़ा नीरस-सा हो गया. सुबह की जुबान में न ताजगी का जायका जंचता, न शाम के होंठों पर सुकून के लम्हे ठहरते. इधर पार्थ की शामें अक्सर सिगरेट के धुंए में उड़तीं. एक-एक कश में मानो वह बहुत लंबा-सा दर्द खींच रहा हो. कभी-कभी जब फेसबुक पर परिधि का खिलखिलाता हुआ चेहरा देखता तो उसमें वह अपनी खोई हुई मुस्कान ढूंढ़ता. परिधि का नंबर फोन की कॉन्टेक्ट-लिस्ट से call dialing तक जैसे ही पहुंचता वह फोन काट देता. दोनों ही बेचैन थे तूफानी बादलों की तरह मगर इश्क की बारिश से डरते थे. दोनों अक्सर अपने-अपने शहरों में समंदर की तरफ घुमने जाते. परिधि चेन्नई के समंदर में मुंबई के समंदर की लहरें ढूंढ़तीं और पार्थ मुंबई के समंदर में चेन्नई के समंदर में बिखरी हुई पानी की सिलवटों को ढूंढ़ता. जिंदगी में कुछ लोग जॉन एलिया की शाइरी की तरह होते हैं जिनका असर उनके जाने के बाद होता है. शायद परिधि की जिंदगी में भी पार्थ का असर जॉन एलिया की शाइरी की तरह हो रहा था और कहीं न कहीं वह इस बात को समझ रही थी. दोनों के बीच खामोशी का बहुत लंबा दरिया बह रहा था. लगभग दो महीने तक कोई बातचीत नहीं हुई. इस बीच परिधि का प्रोजेक्ट भी खत्म होने की कगार पर था और पार्थ भी बस छुट्टियों का वेट कर रहा था. दिसंबर का महीना था. पार्थ छुट्टियां बिताने के लिए दिल्ली आ गया था दोस्तों के पास. सारा दिन घूमता था दिल्ली अपने दोस्तों के साथ. कभी चांदनी चौक में पराठे वाली गली में पराठों का स्वाद तो कभी करोलबाग की भीड़ भरी मार्केट में डोलता. करोलबाग में घूमते हुए उसकी नजर अचानक पिंक कलर के ईयर रिंग्स पर टिकी रह गई थी. मानो जैसे उनके रंगों में परिधि का चेहरा बोल रहा था. उसने बिना कुछ समझे वे ईयर रिंग्स को खरीद लिए और मन ही मन मुस्कुराते हुए दोस्तों के फ्लैट पर लौट आया. उसके मन में एक अजीब-सा विश्वास तैरता था परिधि के लौटने का. शायद इसी विश्वास ने पार्थ से ईयर रिंग्स खरीदवाए थे. दिल्ली की हसीं सर्द रातें, अपनेपन से पगे हुए दोस्त, पुरानी यादों की रोशनी और कमरे में शेरो-शाइरी का माहौल. पार्थ दोस्तों के साथ बिताए हुए कॉलेज के दिनों में खोया हुआ था. यार! तुम लोगों को याद है. वह गर्ल्स हॉस्टल से लड़कियां कैसे अपने दुपट्टे में आधी रात को मैगी बना कर भेजती थीं और वह अपना गार्ड न जाने कितनी बार उसे सिगरेट की घूस देकर लेट नाइट शो देखने गए थे. वे भी क्या दिन थे. गुजर गए सो गुजर गए. वैसे भी हम यादें ही सहेज सकते हैं— वक्त और लोगों को नहीं. ये कहते हुए पार्थ की आवाज पर खामोशी की परत चढ़ रही थी कि अचानक उसके फोन की रिंगटोन बजती है. कॉल परिधि की थी. उस दिन परिधि ने पार्थ को फोन लगाने के लिए ईगो के सारे बैरियर थोड़ा दिए थे. पार्थ जानबूझ कर अनजान बनते हुए बोला, ‘who is there?’ परिधि सांसों में ठहराव लेते हुए बोली, ‘मैं.’ पार्थ डपटते हुए बोला, ‘कौन मैं?’ परिधि अगले ही पल खुद को संभालते हुए बोली, ‘अच्छा! तो कभी तो प्यार करने की बातें करता था कोई और आज आवाज तक नहीं पहचान रहे.’ ‘मेमसाब! आप क्या प्रधानमंत्री हैं जो आपकी आवाज पहचान ली जाए.’ पार्थ चुटकी लेते हुए बोला. ‘मैं परिधि बोल रही हूं. जैसे ही ये वाक्य पार्थ के कानों में गूंजा उसका सारा नशा रूई के फाहे की तरह उड़ता चला गया और उसके चेहरे की हंसी रेशमी थान की तरह खुलती चली गई. दोनों कुछ नहीं बोल रहे थे. दोनों के बीच सुकून में झूलता हुआ एक पुल बन रहा था जिसमें सांसों की आवाजाही में पुरानी यादें लिपटती जा रही थीं.
परिधि अपने भीतर बहुत सारी हिम्मत जुटा कर बोली, ‘मैं दिल्ली आ रही हूं. तुमसे मिलना चाहती हूं. तुम मिलोगे?’ पार्थ को ये वाक्य अपनी जिंदगी का महावाक्य लग रहा था फिर भी उसने भाव खाते हुए बोला, ‘नहीं मेरा मूड नहीं है.’ लेकिन परिधि इस न में छुपी हुई हां को समझते हुए बोली, ‘प्लीज, कल आ जाओ!’ पार्थ कुछ सोचते हुए बोला, ‘हांअअ... देखता हूं.’ ‘कल तुम आओगे न? मैं तुम्हारा वेट करूंगी शाम को 7 बजे कनॉट प्लेस में गेट नंबर 4 पर.’ परिधि ने भरे गले से ये कहता हुआ फोन काट दिया.
अगले दिन परिधि शाम के साढ़े 6 बजे ही कनॉट प्लेस के गेट नंबर 4 पर पहुंच गई. उस दिन वह पूरी दिल्ली की सबसे खूबसूरत लड़की लग रही थी. उसने ब्लू जीन्स पर लेमन येल्लो कलर की कुर्ती पहन रखी थी. माथे पर चटक लाल रंग की नन्ही-सी बिंदी और कांधे पर सिमटता हुआ गुलाबी दुपट्टा. उसके गूंथे हुए बालों को देख कर लग रहा था जैसे इनमें कई शामों का इंतजार गुंथा हो. दूसरी तरफ पार्थ भी टॉम क्रूज बनते हुए घर से निकला. सफेद रंग की शर्ट पर ग्रे कलर का ब्लेजर पहन कर बिल्कुल चकाचक लग रहा था. चलते वक्त उसने वह पिंक कलर के ईयर रिंग्स अपनी हथेली में छिपा लिए जो करोलबाग से खरीदे थे. वह मेट्रो से कनॉट प्लेस पहुंचा और रिक्शा किया. परिधि से मिलने का जुनून इस कदर तारी था कि मारे खुशी के उसने रिक्शे वाले को 20 की जगह 100 रुपए थमा दिए और चहकते हुए बोला, ‘भाई! आज खूब खाना-पीना, मेरी तरफ से जश्न है. धीरे-धीरे वह परिधि की तरफ बढ़ रहा था. जैसे ही वह गेट नंबर 3 से 4 के लिए रोड क्रॉस कर रहा था कि हवा से बातें करती हुई एक कार ने उसका सारा जिस्म ठंडा कर दिया. वक्त के सीने में लम्हे कांप गए. पार्थ अपनी आखिरी सांसों में परिधि का नाम भरते हुए जिंदगी को अलविदा कह रहा था. देखते ही देखते चारों ओर लोगों का हुजूम छा गया और पुलिस अपनी खोज-खबर करने लगी. ये सब परिधि से चंद दूरी पर ही हो रहा था मगर वह इस सबसे अंजान थी. वह तो पार्थ के इंतज़ार में मशगूल थी. कई बार पार्थ का फोन मिलाने पर नॉट रीचेबल आया. घड़ी ने रात के 9 बजाए फिर 10... देखते-देखते घड़ी की जेब से पूरी रात खर्च हो गई. मगर पार्थ नहीं आया. शायद अब पार्थ का नाम बदल कर इंतज़ार हो गया था. अब परिधि जब पार्थ के नंबर पर फोन मिलाती है तो दूसरी ओर से आवाज़ आती है, ‘this number does not exist.’ लेकिन परिधि इस वाक्य को मानती ही नहीं. वह तो आज भी अपनी उसी सज-धज के साथ रोज़ शाम को साढ़े 6 बजे कनॉट प्लेस के गेट नंबर 4 पर इंतज़ार करती है. मगर पार्थ कभी आता ही नहीं. उसकी घड़ी में 7 बजता ही नहीं. ***
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