'भाईजान की कमीज़'
जिस दिन से मैंने होश संभाला, मैंने पाया कि हमारा मुल्क़ आज़ाद हो रहा था. बंट रहा था. नए सिरे से हिन्दुस्तान और किसी पाकिस्तान का नक़्शा तैयार किया जा रहा था. चार दिन पुराने अखबारों में हिन्दुओं, मुसलमानों और सिखों के मुन्तक़िल होने की खबरें आतीं, लाशों से भरी रेलगाड़ियों की खबर आती और बाज़ खबरें ऐसी भी थीं जो कि नहीं आतीं. जिस तरह पंजाब का बाज़ हिस्सा हिन्दुस्तान में रह गया और बाज़ पाकिस्तान में चला गया, उसी तरह पूर्वी बंगाल को किसी पूर्वी पाकिस्तान में ढकेल दिया जा रहा था. हालांकि लाहौर, पठानकोट, सिआलकोट के लोगों की तकलीफों को रेडियो और अख़बार वालों ने खूब उछाला. यहां बंगाल के लोग भी इन तनाव-खिंचाव से महफ़ूज़ नहीं थे.
अब्बाजान 'कलकत्ता मेडिकल कॉलेज' के डॉक्टर थे. अम्मी के इंतकाल के बाद वो पूरी तरह से अपने काम में ही लगे रहते थे. वो देर रात को घर लौटा करते और सुबह मेरी आंखें खुलने से पहले ही निकल जाते. उनसे मेरी मुलाकात नहीं होती. घर में नौकर-चाकर तो थे, लेकिन सिर्फ नाम के वास्ते. एक खानसामा था जो तीन वक़्त का खाना पकाता था. मेरी परवरिश खुदा जाने कौन कर रहा था. कभी-कभी इन नौकरों की गुफ़्तगू से इल्म पड़ता कि हमारी किस्मत में भी सरहद के उस पार, 'ईस्ट पाकिस्तान' ही लिखा है.

बंटवारे के वक़्त कई लोग बेघर हुए. साभार: लाइफ मैगज़ीन
जब भी मैं सहमकर, हिम्मत जुटाकर यह बात भाईजान से पूछती तो वो पहले मुझे ऐसा न होने का भरोसा दिलाते, फिर लाहौल कहकर हिन्दुस्तान, पाकिस्तान और ब्रिटेन के सियासतदानों को याद करते. भाईजान मुझसे करीब 12-14 साल बड़े थे. वो कलकत्ता विश्वविद्यालय के 'डिपार्टमेंट ऑफ़ फिलोलोजी' के छात्र थे और काफ़ी मेधावी माने जाते थे. उनके जितना शरीफ और ठन्डा दिमाग रखने वाला मैंने शायद ही कभी किसी को देखा हो. वो बोलते भी बहुत कम थे और ज़्यादातर वक़्त अपने कमरे में ही गुज़ारते थे. अगर हमारे यहां कोई अंग्रेजी बोलना-लिखना जानता था तो वो अब्बाजान थे और अगर कोई 'इंग्लिश' बोलना-लिखना जानता था तो वो मेरे बड़े भाई थे. इंग्लिशस्तान का असर सिर्फ़ उनके ज़बान तक सीमित नहीं था. लिबास भी उनका उतना ही इंग्लिश था जितने उनके ताल्लुक़ात. वो अख़बार और रेडियो भी इंग्लिश में पढ़ा-सुना करते थे. सड़कों पर कभी-कभी हवलदार उन्हें सलाम ठोककर सावधान के अंदाज़ में खड़े हो जाते और उनके जाने के बाद ही सांस लेते.
इस ठाट-बाट के अलावा भी उनकी एक अजीब आदत थी. वो हमेशा खाली हाथ रहना पसंद करते थे. थैलों-झोलों से शायद उनकी कोई दुश्मनी थी और मैं उनकी इस बेहद निजी मामले में मुदाख़िलात नहीं देती. वो जब भी यूनिवर्सिटी जाते तो कॉपी-किताब अपनी कमीज में ही ठूसकर खाली हाथ निकल जाते. इसका एक नतीजा यह होता कि बारिश के मौसम में उनके कॉपी-किताब सूखे रहते और गर्मियों में गीले हो जाते. कहीं-कभी जब पसीने से लथपथ कॉपी से स्याही चूकर उनकी कमीज में लग जाती तब मालूम पड़ता कि उन नाम के वास्ते नौकरों को क्यों तनख्वाह दी जाती है. भाईजान जब शाम को आते तो मेरे लिए हर रोज़ एक आने की तेल की जलेबी लाकर मेरे हाथों में थमाते, मुस्कराते, अपनी कमीज़ को दरवाज़े पर लगी कील पर लटकाते और अपने कमरे में चले जाते.

कई इलाकों में दंगे हुए. बेगुनाहों का कत्ल किया गया.
कुछ दिनों से मैं गौर कर रही थी कि जब वो घर वापस आते हैं तो उनकी कमीज़ कुछ इस तरह से फूली रहती कि मानो उसके अंदर कोई चतुष्कोण गुब्बारा हो. जलेबियों का सिलसिला भी अचानक बंद हो गया. वो पहले भी कम बोला करते थे लेकिन अब तो कुछ भी नहीं बोलते थे. उनका बर्ताव पहले से मुख़्तलिफ़ हो गया था. वो दिन भर अपने कमरे में, दरवाज़े पर क़ुफ़्ल चढ़ाए, बैठे रहते. कभी खाना खाते, कभी वो भी नहीं. मैं इस बात से परेशान तो हुई पर चतुष्कोण गुब्बारों का राज़ मुझे बहुत सताने लगा. मामला कुछ समझ नहीं पाती थी. दिन-रात मैं यही सोचती थी की भाईजान करते क्या हैं इन चतुष्कोणों के साथ.
यहां हमारे खानसामा बग़ैर इत्तला दिए ही मुलाज़िमत छोड़कर चले गए थे. बाहर भी मामला बिगड़ चुका था. हिंदुस्तान और पाकिस्तान के सियासतदानों ने ये तय कर लिया था कि बंगाल के सारे मुसलमान 'ईस्ट पाकिस्तान' भेज दिए जाएंगे. पहले शाज़िया फिर अब्दुल फिर फरीदा फिर एक-एक करके हमारे सारे हमसाए अपने मुल्क़, अपनी मिट्टी से बेदखल होने लगे.

बंटवारे में गांव के गांव उजड़ गए थे.
एक शाम, तक़रीबन चार बजे, घर के बाहर एक गाड़ी खड़ी हुई. मैंने धीरे से खिड़की के पल्ले खोले तो देखा कि अब्बाजान आए थे. मैं भागती हुई दरवाज़े के पास गई. उन्होंने मुझे गले से लगा लिया. उनके हाथ में एक कागज़ था जिसमें हुकूमती मोहर लगी थी और अंग्रेजी में कुछ लिखा था. उन्होंने मुझसे पूछा, "ज़ोया बेटी, भाईजान कहां हैं?" मैंने कहा, "वो सुबह यूनिवर्सिटी गए थे, आते ही होंगे." उन्होंने चाय चढ़ाने का हुक़्म दिया फिर कहने लगे, " हम यहीं रहेंगे. सरहद पार नहीं जाना है हमें." बाहर शोर हो रहा था. लोग चीख-चिल्ला रहे थे. मेरी ज़ेहनी-हालत क्या थी वो तो मुझे भी समझ नहीं आया पर अब्बाजान के शक़्ल पर मानो राहत की एक परत थी. आंखें मूंदकर वो दीवान पर बैठ गए.
उस रोज़ भाईजान घर नहीं लौटे. या शायद ये कहना ज़्यादा दुरुस्त होगा कि उस रोज़ से भाईजान कभी घर नहीं लौटे. दफ़अतन पूछने के बावजूद अब्बाजान ने मुझे इस बारे में कभी कुछ नहीं बताया.काफ़ी साल बाद ख़ालिद चाचा, जो हमारे खानसामा थे, से बड़ाबाजार में मेरी मुलाक़ात हुई. अब वो वहां फलों का कारोबार करते थे. उनसे पूछा तो उन्होंने साफ़-साफ़ बताया कि जिन्हें मैं बचपन में चतुष्कोण गुब्बारे समझती थी, वो दरअसल 'फाइलें' थीं. भाईजान ने अपने कुछ अंगरेज़ दोस्तों और कुछ ऊंचे पद के अफसरों की मदद से कोर्ट में अपील की थी ताकि हमारे परिवार को ईस्ट पाकिस्तान न भेजा जाए. तालुक्कात के बुनियाद पर जज ने सिफारिश की और हिन्दुस्तान की हुकूमत ने एक 'सर्टिफ़िकेट' जारी किया जिसमें ये लिखा था कि हम हिन्दुस्तानी थे और हमें मुल्क़ छोड़ने की ज़रूरत नहीं थी. ख़ालिद चाचा ने और भी बताया कि जिस दिन ये सर्टिफ़िकेट जारी किया गया था, उस शाम हमारे इलाक़े में हिन्दुओं और मुसलमानों में एक दंगा हुआ था. काफ़ी हिन्दुओं को बेरहमी से कूटा गया था. अब्बाजान ने भाईजान को गोद लिया था और भाईजान का असली नाम बीरेन कुमार था.
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