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रूस यूक्रेन युद्ध के चलते आधी दुनिया भूखी रहेगी!

रूस यूक्रेन वॉर के कारण पूरी दुनिया पर फ़ूड क्राइसिस का खतरा

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रूस यूक्रेन वॉर के कारण पूरी दुनिया पर फ़ूड क्राइसिस का खतरा (AP)
हम वापस आ गए हैं. कैलेंडर बता रहा है, आज की तारीख़ 07 मार्च 2022 है. भारत के पांच राज्यों में चल रहे विधानसभा चुनाव का आख़िरी दिन. यानी, चुनावी चकल्लस बीतने वाला है. लेकिन जो नहीं बीत रहा है, वो युद्ध है. रूस और यूक्रेन का. हज़ारों सैनिकों और आम नागरिकों की जान ले चुका ये युद्ध अपनी रफ़्तार से आगे बढ़ रहा है. साथ में बढ़ रहे हैं, नकारात्मक आंकड़े. मसलन, शरणार्थियों की संख्या, महंगाई, भुखमरी आदि. युद्ध की यही तासीर भी है. आज हम बात करेंगे, - रूस-यूक्रेन युद्ध से दुनियाभर में फ़ूड सप्लाई पर क्या असर पड़ेगा? - समझौते के बावजूद लगातार दूसरी बार इवैकुएशन की कोशिश फ़ेल क्यों हुई? - रूस यूक्रेन में लड़ने के लिए सीरिया से फ़ाइटर्स क्यों बुला रहा है? आज रूस और यूक्रेन के बीच चल रही लड़ाई का 12वां दिन है. 24 फ़रवरी की सुबह रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन ने यूक्रेन में ‘स्पेशल मिलिटरी ऑपरेशन’ चलाने का आदेश दिया था. उसके बाद से रूसी सेना यूक्रेन के बड़े शहरों पर बमबारी कर रही है. रूसी टैंक यूक्रेन की सड़कों पर दौड़ रहे हैं. रूस ने खेरसोन शहर पर क़ब्ज़ा कर लिया है. किएव, खारकीव, मेरियोपूल जैसे शहरों के बाहर रूसी सेना ने डेरा डाला हुआ है. यूक्रेन दुनियाभर से मदद मांग रहा है. जिस नेटो और यूरोपियन यूनियन की मेंबरशिप के लिए रूस से उसका तनाव हुआ, उन्होंने हाथ खड़े कर दिए हैं. यूक्रेन अपने संघर्ष और अपनी किस्मत के भरोसे पर टिका है. हालांकि, ये स्थिति कब तक बनी रहेगी, दावे से कह पाना मुश्किल है. यहां पर एक चीज़ गौर करने वाली है. अधिकतर मामलों में युद्ध की शुरुआत नए सिरे से सीमाओं के निर्धारण या प्रभुत्व स्थापित करने के लिए होती है. जैसे-जैसे युद्ध लंबा खिंचता है, इसका चरित्र बदलने लगता है. रूस का यूक्रेन पर हालिया हमला इसका सटीक उदाहरण है. पुतिन ने यूक्रेन पर हमले की दो बड़ी वजहें गिनाई थी. उन्होंने दोनबास इलाके में रूसी लोगों के नरसंहार का आरोप लगाया था. पुतिन ने ये भी कहा था यूक्रेन की मौजूदा सरकार पश्चिमी देशों के हाथों में खेल रही है. उनका इशारा नेटो की तरफ़ था. यूक्रेन लंबे समय से नेटो की सदस्यता लेने की कोशिश कर रहा है. अगर ऐसा हुआ तो नेटो का दायरा रूस की सीमा तक पहुंच जाता. पुतिन यूक्रेन को रूस और वेस्ट के बीच बफ़र ज़ोन की तरह बरकरार रखना चाहते हैं. जानकारों की माने तो पुतिन की गणना में चूक हो गई. पुतिन को लगा था कि यूक्रेन की सरकार बहुत जल्द हथियार डाल देगी. लेकिन ऐसा हुआ नहीं. यूक्रेन के राष्ट्रपति वोलोदिमीर ज़ेलेन्स्की ने झुकने से मना कर दिया. यही वजह है कि भारी बढ़त के बावजूद अभी तक रूस को निर्णायक जीत नहीं मिल सकी है. हमने कहा था कि जब युद्ध लंबा खिंचता है, तब उसका चरित्र बदलता है. सीमाओं के निर्धारण से मामला भूख और पलायन जैसे मुद्दों पर शिफ़्ट हो जाता है. जैसा कि यूक्रेन के मामले में हो रहा है. इस युद्ध की वजह से मानवीय संकट, विशेष तौर पर खाद्यान्न का संकट लगातार बढ़ता जा रहा है. कैसे? - रूस-यूक्रेन युद्ध के चलते 15 लाख से अधिक यूक्रेनी नागरिक देश छोड़ चुके हैं. यूनाइटेड नेशंस की रिपोर्ट के अनुसार, संकट खत्म होने तक 40 लाख लोगों पर शरणार्थी वाला टैग लग सकता है. लाखों लोग विस्थापित भी हुए हैं. इसके अलावा, हज़ारों लोगों ने रूस के ख़िलाफ़ लड़ने के लिए अपना नाम दर्ज़ कराया है. इनमें से बड़ी संख्या में किसान भी हैं. उन्होंने खेती का पेशा छोड़कर संघर्ष का रास्ता चुना है. यानी, फिलहाल के लिए खेती-किसानी का काम स्थगित रहेगा. - दूसरा बिंदु सप्लाई से जुड़ा है. यूक्रेन के कई बड़े बंदरगाह रूसी सेना के नियंत्रण में हैं. या, वहां से सप्लाई पर रोक लगी है. इसके चलते यूक्रेन ना तो अनाज का निर्यात कर पा रहा है और ना ही खेती के लिए ज़रूरी सामानों का आयात ही हो रहा है. ईजिप्ट, पूरी दुनिया में गेहूं का सबसे बड़ा आयातक है. वहां की अधिकांश आबादी सरकारी सब्सिडी पर मिलने वाली रोटी पर निर्भर है. युद्ध के चलते ईजिप्ट को दो बड़े ऑर्डर रद्द करने पड़े हैं. ईजिप्ट की तीस फीसदी आबादी इससे प्रभावित होगी. यही हाल लेबनान का है. अगस्त 2020 में बेरुत बंदरगाह पर भारी विस्फ़ोट हुआ था. इसमें लगभग दो सौ लोगों की जान चली गई थी. इस विस्फ़ोट में अनाज इकट्ठा करने वाले बड़े साइलोज़ भी तबाह हो गए थे. इस समय लेबनान बड़े आर्थिक संकट से जूझ रहा है. वहां भी जनता खाने के लिए सरकारी सब्सिडी के भरोसे पर है. लेबनान को 60 प्रतिशत गेहूं यूक्रेन से मिलता था. उसके पास बस एक महीने का स्टॉक बचा है. लेबनान को अमेरिका, कनाडा और भारत से मदद मांगनी पड़ी है. - तीसरा बिंदु प्रतिबंधों से जुड़ा है. रूस-यूक्रेन युद्ध भले ही यूक्रेन की धऱती पर लड़ा जा रहा हो, लेकिन इसका असर रूस पर भी पड़ा है. पश्चिमी देशों ने रूस के लोगों, बैंकिंग संस्थानों, कंपनियों के कामकाज पर प्रतिबंध लगाए हैं. दुनिया के जो भी देश अमेरिका और यूरोप की तरफ़ झुके हैं, उन्हें भी इन प्रतिबंधों में सहयोगी बनना पड़ा है. अगर उन्होंने रूस के साथ व्यापार किया तो पश्चिमी देश उनके ख़िलाफ़ कदम उठा सकते हैं. अब समझते हैं कि इस संकट का दुनिया पर क्या असर पड़ सकता है? - रूस और यूक्रेन, दुनिया में गेहूं और जौ की कुल खपत का एक-तिहाई हिस्सा मुहैया कराते हैं. गेहूं और जौ अफ़्रीका और मिडिल-ईस्ट में भोजन का मुख्य सोर्स हैं. अगर ये सप्लाई रुकी तो महंगाई के साथ-साथ भुखमरी भी बढ़ेगी. यूक्रेन मक्के के सबसे बड़े सप्लायर्स में से भी एक है. मक्के का इस्तेमाल डेयरी और पॉल्ट्री फ़ार्मिंग में होता है. मक्के की सप्लाई रुकने से मांस के दाम बढ़ेंगे. इस कुपोषण की समस्या खड़ी होगी. - एक बड़ी समस्या खाद के उत्पादन से जुड़ी है. नॉर्वे की यारा इंटरनैशनल दुनिया की सबसे बड़ी खाद कंपनियों में से एक है. कंपनी 60 से अधिक देशों में खाद की सप्लाई करती है. कंपनी कच्चे माल का बड़ा हिस्सा रूस से खरीदती थी. युद्ध और पश्चिमी देशों के प्रतिबंध के बाद ये सप्लाई कम पड़ी है. यारा इंटरनैशनल के सीईओ ने चेताया है कि स्थिति और बिगड़ सकती है. दुनिया की आधी आबादी को खाना खाद की वजह से मिलता है. अगर खेतों से खाद को निकाल दिया जाए तो उत्पादन आधा रह जाएगा. मतलब ये कि आधी आबादी के लिए खाना मिलना मुश्किल हो जाएगा. कुल जमा बात ये है कि रूस-यूक्रेन युद्ध का असर सिर्फ़ इन्हीं दो देशों तक सीमित नहीं रहेगा. अफ़्रीका और मिडिल-ईस्ट के ग़रीब देशों में लोगों के खाने पर संकट आएगा. 2010 में इसी इलाके में बढ़ती महंगाई और भ्रष्टाचार के चलते अरब स्प्रिंग हुआ था. कई देशों में तख़्तापलट भी हुए थे. ये तो तय है कि महंगाई और भुखमरी संकट का पहला चरण है. ये संकट अभी और विकराल रूप धारण करने वाला है. - अब दूसरे टॉपिक पर चलते हैं. रूस-यूक्रेन युद्ध के बीच आम नागरिकों को सुरक्षित निकालना भी मुश्किल हो रहा है. रूस और यूक्रेन के बीच दो बार सेफ़ कॉरिडोर तैयार करने पर सहमति बनी. सेफ़ कॉरिडोर क्या होता है? ये युद्धग्रस्त इलाकों में तय रास्ता होता है. जिसके ज़रिए युद्ध से असंबंधित लोगों को बाहर निकाला जाता है. उन्हें सुरक्षित जगह तक पहुंचाया जाता है. सेफ़ कॉरिडोर तय समय के लिए होता है. इस अवधि में सेनाएं हमला नहीं करती हैं. हालांकि, सेफ़ कॉरिडोर का मतलब पूर्ण संघर्षविराम नहीं है. पिछली दो बार में सेफ़ कॉरिडोर ठीक से काम नहीं कर पाया. दोनों दफ़ा यूक्रेन ने आरोप लगाया कि रूसी सेना बीच में ही हमला कर रही है. इसके कारण आम नागरिक मारे जा रहे हैं. अब रूस ने तीसरी बार सेफ़ कॉरिडोर के लिए छह रास्ते सुझाए हैं. इनमें से चार का एग्जिट पॉइंट रूस या बेलारूस की तरफ़ खुलता है. बेलारूस, इस युद्ध में रूस का पार्टनर है. यूक्रेन ने इन रूट्स को मानने से मना कर दिया है. यूक्रेन ने कहा है कि उसके नागरिक रूस या बेलारूस में नहीं जाएंगे. यूक्रेन ने इस संबंध में अमेरिका, फ़्रांस और यूके से मदद मांगी है. हालांकि, अभी तक इसपर कोई पहल नहीं हो सकी है. - अब तीसरे टॉपिक की बारी. एक तरफ़ यूक्रेन लड़ने के लिए दुनियाभर से लड़ाकों को बुला रहा है. नेटो ने रूस से सीधी लड़ाई करने से मना कर दिया है. हालांकि, नेटो के कई सदस्य देशोंं ने कहा है कि अगर उनके लोग यूक्रेन में लड़ने गए तो उन्हें रोका नहीं जाएगा. यूक्रेन ने ‘इंटरनैशनल लीजन फ़ॉर टेरिटोरियल डिफ़ेंस’ बनाया है. इनमें विदेशी लड़ाकों को शामिल किया जा रहा है. उनके लिए वीजा की अनिवार्यता खत्म कर दी गई है. रूस भी इसी के समानांतर चल रहा है. अमेरिकी अधिकारियों का दावा है कि रूस सीरिया से फ़ाइटर्स बुला रहा है. वॉल स्ट्रीट जर्नल की रिपोर्ट के अनुसार, रूस शहरी लड़ाई में दक्ष सीरियन लड़ाकों को पैसे देकर यूक्रेन ला रहा है. रूस इन लड़ाकों को लगभग 23 हज़ार रुपये का मेहनताना भी दे रहा है. उन्हें छह महीने का कॉन्ट्रैक्ट दिया गया है. ये लड़ाके किएव में रूसी सेना की मदद करेंगे. रूस 2015 से सीरिया में लड़ रहा है. बशर अल-असद सरकार की तरफ़ से विद्रोहियों पर हवाई हमले कर रहा है. सीरिया, यूक्रेन के ख़िलाफ़ हमले में रूस का साथ दे रहा है. उसने यूनाइटेड नेशंस जनरल असेंबली की आपातकालीन बैठक में रूस का समर्थन किया था. उस बैठक में सिर्फ़ पांच देशों ने रूस के पक्ष में वोट डाला था. उनमें से एक सीरिया भी था. अभी ये स्पष्ट नहीं है कि कितने सीरियन लड़ाके रूस-यूक्रेन युद्ध में हिस्सा लेने पहुंचे हैं. हालांकि, जानकारों का दावा है कि रूस लंबी लड़ाई के लिए ख़ुद को तैयार कर रहा है. अब रूस-यूक्रेन युद्ध के बाकी अपडेट्स जान लेते हैं. - युद्ध के बीच में रूस ने पांच हज़ार से अधिक प्रोटेस्टर्स को गिरफ़्तार किया है. ये लोग पूरे रूस में युद्ध के ख़िलाफ़ प्रदर्शन कर रहे थे. - यूक्रेन छोड़कर जाने वाले लोगों की संख्या 15 लाख के पार पहुंच गई है. सबसे अधिक शरणार्थी पोलैंड पहुंचे हैं. वहां दस लाख से अधिक यूक्रेनी नागरिकों ने शरण ली है. - इंटरनैशनल जिम्नास्टिक्स फ़ेडरेशन (FIG) ने रूसी खिलाड़ी इवान कुलियाक के ख़िलाफ़ जांच शुरू कर दी है. कुलियाक ने दोहा में चल रहे अपैरेटस वर्ल्ड कप में रूस के हमले का समर्थन किया था. कुलियाक ने अपनी ड्रेस पर ज़ेड का सिंबल लगाया था. रूसी सेना अपने टैंकों और गाड़ियों पर इस सिंबल का इस्तेमाल कर रही है.

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