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पाकिस्तान के ड्रोन कितने खतरनाक और भारत की तैयारी कितनी मजबूत? पूरा खेल समझिए

Pakistan drone infiltration in India: ड्रोन वॉरफेयर आज भारत की सुरक्षा के लिए बड़ा और वास्तविक खतरा बन चुका है, क्योंकि सस्ते और छोटे ड्रोन सीमा पार से हथियार और हमला दोनों कर सकते हैं. पाकिस्तान ड्रोन का इस्तेमाल छाया युद्ध में कर रहा है, जबकि रूस यूक्रेन युद्ध ने इसकी खतरनाक ताकत दुनिया को दिखा दी है. भारत एंटी ड्रोन सिस्टम, लेजर हथियार और घातक हमलावर ड्रोन के जरिए इस खतरे से निपटने और जवाबी हमला करने की मजबूत तैयारी कर रहा है.

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पाकिस्तान के ड्रोन क्यों बन रहे हैं सिरदर्द, भारत कितना तैयार है ड्रोन वॉरफेयर के लिए?

ड्रोन की घुसपैठ रोकना नामुमकिन नहीं है, लेकिन सौ फीसदी रोक पाना आज की दुनिया में बेहद मुश्किल है. वजह बड़ी सीधी सी है. ड्रोन छोटे हैं, सस्ते हैं, नीचे उड़ते हैं और रडार की आंखों में धूल झोंक देते हैं. आइये अब इसी बात को थोड़ा खोलकर, परत दर परत समझते हैं.

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ड्रोन वॉरफेयर क्या है और ये खेल शुरू कैसे हुआ

युद्ध पहले टैंक, बंदूक और सैनिकों का होता था. फिर मिसाइल आईं, फाइटर जेट आए. अब मैदान में ड्रोन उतर चुके हैं. ड्रोन वॉरफेयर का मतलब है बिना पायलट के उड़ने वाली मशीनों से निगरानी, हमला और सप्लाई करना.

ड्रोन दो तरह से इस्तेमाल होते हैं.

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1- आंख की तरह. दुश्मन की हर हरकत पर नजर रखने के लिए.
2-  हथियार की तरह. बम गिराने, आत्मघाती हमला करने या मिसाइल दागने के लिए.

इस टेक्नोलॉजी की सबसे बड़ी ताकत यही है कि इसमें इंसानी जान का सीधा जोखिम नहीं होता. ऑपरेटर सैकड़ों किलोमीटर दूर बैठा होता है और बटन दबाकर हमला कर देता है.

ड्रोन रोकना इतना मुश्किल क्यों है

पहले दुश्मन सीमा पार करता था तो इंसान दिखता था. बूटों के निशान होते थे, तार कटते थे, हलचल नजर आती थी. अब तस्वीर बदल चुकी है. अब सीमा पर मशीन आ रही है, ऐसी मशीन जो न थकती है, न डरती है और न पकड़े जाने पर कोई बयान देती है. यही ड्रोन वॉरफेयर की असली चुनौती है.

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ड्रोन की सबसे बड़ी खासियत यही है कि ये बहुत नीचे उड़ते हैं. इतनी कम ऊंचाई पर कि आसमान देखने वाले पारंपरिक रडार के नीचे से निकल जाते हैं. इनका साइज भी इतना छोटा होता है कि दूर से देखने पर ये परिंदे या मलबे जैसे लगते हैं. ऊपर से इनकी आवाज बेहद कम होती है, कई बार तो बिल्कुल सुनाई ही नहीं देती.

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पाकिस्तान की ड्रोन घुसपैठ (फोटो- इंडिया टुडे)

ज्यादातर ड्रोन GPS और पहले से तय किए गए रूट पर चलते हैं. इन्हें लगातार इंसानी कंट्रोल की जरूरत नहीं होती. एक बार प्रोग्राम कर दिया और फिर ये अपने आप सीमा पार करके तय जगह तक पहुंच जाते हैं. यही वजह है कि ऑपरेटर सीमा पार सुरक्षित बैठा रहता है और पकड़े जाने का कोई सीधा सबूत नहीं छोड़ता.

पारंपरिक रडार सिस्टम बड़े जहाज, फाइटर जेट और मिसाइल पकड़ने के लिए बनाए गए थे. ड्रोन उनके लिए मच्छर जैसे हैं. रडार की स्क्रीन पर या तो दिखते नहीं या बहुत देर से दिखते हैं. कई मामलों में ड्रोन तब नजर आता है जब वो हथियार गिरा चुका होता है या अपना मिशन पूरा कर वापस लौट रहा होता है. यही वजह है कि ड्रोन की घुसपैठ रोकना चुनौतीपूर्ण है और यही आज के बॉर्डर सिक्योरिटी की सबसे बड़ी परीक्षा भी है.

पाकिस्तान ड्रोन क्यों भेज रहा है

पाकिस्तान ड्रोन का इस्तेमाल खुले युद्ध के लिए नहीं कर रहा. उसका पूरा खेल छाया युद्ध का है, जहां न ऐलान होता है, न जिम्मेदारी ली जाती है. सीमा पार इंसान भेजने के बजाय अब मशीन भेजी जा रही है, ताकि न पकड़े जाने का डर रहे और न सीधे युद्ध का आरोप लगे.

ड्रोन का इस्तेमाल ज्यादातर हथियार गिराने के लिए किया जा रहा है. छोटे हथियार, ग्रेनेड, पिस्टल और गोला बारूद, जो सीधे आतंकी नेटवर्क तक पहुंचाया जाता है. इसके साथ ही ड्रग्स और नकली नोट भेजे जा रहे हैं, ताकि आतंक और अपराध दोनों को फंड मिलता रहे. कई मामलों में ड्रोन से सैटेलाइट फोन, वॉकी टॉकी और दूसरे संचार उपकरण भी गिराए गए हैं, जिससे सीमा के इस पार बैठे आतंकी लगातार संपर्क में रह सकें.

इस तरीके की सबसे बड़ी खासियत पाकिस्तान के लिए ये है कि ये इंसान भेजने से कहीं ज्यादा सस्ता, सुरक्षित और कम जोखिम वाला है. ड्रोन गिर भी जाए तो कोई सैनिक पकड़ा नहीं जाता, कोई कबूलनामा नहीं होता. पाकिस्तान आराम से कह देता है कि उसका इससे कोई लेना देना नहीं. यही इसकी सबसे बड़ी चालाकी है और यही वजह है कि ड्रोन उसके लिए छाया युद्ध का सबसे पसंदीदा हथियार बन चुका है.

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ड्रोन वॉरफेयर कितना खतरनाक है

ड्रोन की असली ताकत उसकी सस्ती कीमत और उससे होने वाली बड़ी तबाही में छिपी है. एक फाइटर जेट को मार गिराने या उड़ाने में जहां करोड़ों रुपये खर्च होते हैं, वहीं एक छोटा सा ड्रोन, जिसकी कीमत कुछ लाख या उससे भी कम होती है, वही काम कर सकता है. फर्क बस इतना है कि नुकसान का हिसाब बराबरी का नहीं रहता. सस्ता हथियार महंगे ठिकानों को तबाह कर देता है.

खतरा तब और बढ़ जाता है जब ड्रोन अकेले नहीं, झुंड में हमला करते हैं. एक साथ कई ड्रोन अलग अलग दिशाओं से आते हैं और एयर डिफेंस सिस्टम को उलझा देते हैं. सिस्टम तय नहीं कर पाता कि पहले किसे गिराए. इसी रणनीति को स्वार्म अटैक कहा जाता है. रूस यूक्रेन युद्ध में यही तस्वीर बार बार सामने आई है, जहां सस्ते ड्रोन ने महंगे टैंक, रडार और ऊर्जा ठिकानों को बेअसर कर दिया. यही वजह है कि आज ड्रोन को भविष्य का नहीं, मौजूदा युद्ध का सबसे खतरनाक हथियार माना जा रहा है.

रूस यूक्रेन जंग से क्या सबक मिला

इस युद्ध ने पूरी दुनिया को साफ संदेश दे दिया कि ड्रोन अब साइड हथियार नहीं रहे, बल्कि मेन हथियार बन चुके हैं. यूक्रेन ने बेहद सस्ते ड्रोन का इस्तेमाल करके रूसी सेना को लगातार नुकसान पहुंचाया. इन ड्रोन से रूसी टैंक उड़ाए गए, तेल डिपो जलाए गए और यहां तक कि नेवी बेस तक को निशाना बनाया गया. वो ठिकाने, जिन्हें कभी सिर्फ मिसाइल या फाइटर जेट की पहुंच माना जाता था, अब छोटे ड्रोन से तबाह होने लगे.

दूसरी तरफ रूस ने भी ईरानी ड्रोन का सहारा लिया और यूक्रेन के शहरों की बिजली, पानी और दूसरी जरूरी इंफ्रास्ट्रक्चर पर हमले किए. पावर ग्रिड ठप हुए, अंधेरा छाया और आम जिंदगी प्रभावित हुई. इसका नतीजा ये निकला कि महंगी सेना और भारी भरकम हथियारों के सामने सस्ती टेक्नोलॉजी मजबूती से खड़ी नजर आई. यही वजह है कि रूस यूक्रेन जंग को ड्रोन वॉरफेयर का टर्निंग पॉइंट माना जा रहा है.

ऑपरेशन सिंदूर जैसे अभियानों में ड्रोन की भूमिका

भारत ने बीते कुछ सालों में आतंकी ठिकानों की निगरानी, सीमा पर नजर और सटीक कार्रवाई के लिए ड्रोन का इस्तेमाल तेजी से बढ़ाया है. ड्रोन ने उन इलाकों की आंख बनकर काम किया है जहां सैनिक भेजना जोखिम भरा होता था. इनकी मदद से घुसपैठ के रास्ते पकड़े गए, आतंकी लॉन्च पैड चिन्हित किए गए और सीमापार की हलचल पर लगातार नजर रखी गई.

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भारत की ड्रोन क्षमता भी मजबूत (फोटो- इंडिया टुडे)

सबसे बड़ा फायदा ये हुआ कि बिना सैनिक भेजे हालात की पूरी तस्वीर मिल गई. कहां मूवमेंट है, कहां तैयारी चल रही है और कहां से खतरा आ सकता है, ये सब जानकारी ड्रोन से पहले ही मिल जाती है. यानी ड्रोन ने न सिर्फ जोखिम कम किया, बल्कि फैसले लेने की ताकत भी बढ़ाई और यही आधुनिक युद्ध में इसकी सबसे बड़ी भूमिका बन चुकी है.

भारत के पास एंटी ड्रोन वॉरफेयर क्या है

भारत खाली हाथ नहीं बैठा है. बीते कुछ सालों में एंटी ड्रोन वॉरफेयर पर तेजी से काम हुआ है.

सॉफ्ट किल टेक्नोलॉजी

इस तरीके में गोली नहीं चलती, बल्कि ड्रोन के दिमाग पर हमला किया जाता है. रेडियो फ्रीक्वेंसी जैमर और GPS जैमर के जरिए ड्रोन और उसके ऑपरेटर के बीच का संपर्क तोड़ दिया जाता है. जैसे ही सिग्नल गायब होता है, ड्रोन को समझ ही नहीं आता कि उसे क्या करना है और कहां जाना है.
नतीजा ये होता है कि कई बार ड्रोन वहीं हवा में भटकने लगता है और जमीन पर गिर जाता है. कुछ मामलों में उसका सेफ्टी सिस्टम एक्टिव हो जाता है और वो वापस उसी दिशा में मुड़ जाता है जहां से आया था. बिना एक भी गोली चलाए दुश्मन के ड्रोन को बेकार कर देना इसी तकनीक की सबसे बड़ी ताकत है और इसी वजह से इसे सॉफ्ट किल कहा जाता है.

हार्ड किल सिस्टम

जब जैमर बेअसर हो जाते हैं या ड्रोन पूरी तरह ऑटोनॉमस मोड में उड़ रहा होता है, तब हार्ड किल सिस्टम काम आते हैं. ऐसे हालात में एंटी ड्रोन गन, लेजर आधारित हथियार और एयर डिफेंस गन का इस्तेमाल किया जाता है. ये सीधे ड्रोन को निशाना बनाकर उसे हवा में ही खत्म कर देते हैं.
भारत ने इस दिशा में स्वदेशी एंटी ड्रोन सिस्टम विकसित किए हैं, जो खास तौर पर छोटे और तेज ड्रोन को मार गिराने के लिए बनाए गए हैं. लेजर आधारित हथियार इस सिस्टम की सबसे बड़ी ताकत हैं. इनमें गोली या मिसाइल की जरूरत नहीं होती, सेकेंडों में तेज ऊर्जा की किरण ड्रोन को जलाकर बेकार कर देती है. ये तकनीक सटीक भी है और लंबे समय तक चलने वाले मुकाबले के लिए काफी कारगर मानी जा रही है.

मल्टी लेयर सुरक्षा

अब ड्रोन से निपटने के लिए एक तरीका काफी नहीं रहा. अकेला रडार, अकेला कैमरा या सिर्फ गन अब काम की गारंटी नहीं देता. इसलिए रडार, हाई रिजोल्यूशन कैमरे, साउंड सेंसर और इलेक्ट्रॉनिक इंटेलिजेंस को आपस में जोड़कर एक साझा नेटवर्क तैयार किया जा रहा है. रडार आसमान में हलचल पकड़ता है, कैमरे उसकी पहचान करते हैं, साउंड सेंसर उसकी आवाज से पुष्टि करते हैं और इलेक्ट्रॉनिक सिस्टम उसके सिग्नल को पढ़ते हैं.

इन सभी सूचनाओं को एक जगह इकट्ठा करके तुरंत अलर्ट जारी किया जाता है, ताकि जवाबी कार्रवाई में एक भी सेकेंड न गंवाया जाए. मकसद यही है कि ड्रोन सीमा पार करते ही पकड़ में आ जाए, न कि तब जब वो अपना काम कर चुका हो. यही मल्टी लेयर सुरक्षा आज के ड्रोन वॉरफेयर के खिलाफ सबसे असरदार तरीका माना जा रहा है.

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फिर भी ड्रोन क्यों घुस आते हैं

ड्रोन की घुसपैठ पूरी तरह रोक पाना इसलिए भी मुश्किल है क्योंकि सीमा बहुत लंबी है और हर हिस्से पर एक जैसी निगरानी संभव नहीं. दूसरी तरफ ड्रोन की संख्या तेजी से बढ़ रही है. जितने ड्रोन पकड़े जा रहे हैं, उससे कहीं ज्यादा नए तरीके और नए मॉडल सामने आ रहे हैं. ऊपर से तकनीक इतनी तेजी से बदल रही है कि जो सिस्टम आज कारगर है, वो कुछ महीनों में पुराना पड़ सकता है.

ये हालात ठीक वैसे ही हैं जैसे चोर हर बार चोरी का नया तरीका खोज ले और सुरक्षा एजेंसियों को हर बार खुद को अपग्रेड करना पड़े. फर्क बस इतना है कि यहां मुकाबला इंसान से नहीं, मशीन से है और मशीन हर दिन और स्मार्ट होती जा रही है. यही वजह है कि ड्रोन के खिलाफ लड़ाई एक बार की तैयारी नहीं, बल्कि लगातार चलने वाली जंग बन चुकी है.

भारत को ड्रोन वॉरफेयर से कितना खतरा है

खतरा है और वो गंभीर है. सीमावर्ती राज्य हों या देश के भीतर मौजूद अहम ठिकाने, आज सब ड्रोन की रेंज में आ चुके हैं. सैन्य ठिकाने, तेल रिफाइनरी, एयरबेस और दूसरी रणनीतिक सुविधाएं अब सिर्फ मिसाइल या फाइटर जेट से ही नहीं, बल्कि छोटे ड्रोन से भी निशाना बनाई जा सकती हैं. यही बात इस खतरे को और ज्यादा खतरनाक बनाती है.

लेकिन खतरे का मतलब बेबसी नहीं है. भारत इस चुनौती को पहचान चुका है और उसी हिसाब से अपनी तैयारी भी कर रहा है. सुरक्षा एजेंसियां अब ड्रोन को अपवाद नहीं, बल्कि स्थायी खतरा मानकर रणनीति बना रही हैं. यानी खतरा बड़ा जरूर है, लेकिन उससे निपटने की समझ और तैयारी भी उसी रफ्तार से आगे बढ़ रही है.

भारत के हमलावर ड्रोन कितने सक्षम हैं

भारत अब सिर्फ बचाव की रणनीति तक सीमित नहीं है. उसने ड्रोन वॉरफेयर में आक्रामक क्षमता भी तेजी से बढ़ाई है. हेरॉन जैसे लंबे समय तक उड़ने वाले ड्रोन दुश्मन की गतिविधियों पर लगातार नजर रखते हैं, जबकि हारोप और हार्पी जैसे कामिकाजे ड्रोन सीधे लक्ष्य पर गिरकर उसे तबाह कर देते हैं. ये ऐसे हथियार हैं जो दुश्मन को चेतावनी का वक्त तक नहीं देते.

इन ड्रोन की सबसे बड़ी ताकत ये है कि ये दुश्मन की जमीन में गहराई तक घुस सकते हैं. ये रडार सिस्टम को खोजकर उड़ाने में सक्षम हैं, एयर डिफेंस नेटवर्क को कमजोर कर सकते हैं और बेहद सटीक हमला करते हैं. मतलब साफ है, भारत अब ड्रोन को सिर्फ आंख की तरह नहीं, बल्कि धारदार हथियार की तरह भी इस्तेमाल करने की स्थिति में पहुंच चुका है.

भारत के घातक हमला करने वाले ड्रोन

हारोप ड्रोन ऐसा हथियार है जो लक्ष्य पर गिरते ही खुद को विस्फोट से उड़ा देता है. इसे उड़ता हुआ बम कहना गलत नहीं होगा. जैसे ही इसे दुश्मन का ठिकाना दिखता है, ये सीधा उस पर हमला करता है और बचने का कोई मौका नहीं देता. वहीं हार्पी ड्रोन खास तौर पर दुश्मन के रडार सिस्टम को खोजकर खत्म करने के लिए बनाया गया है, ताकि पहले ही वार में दुश्मन की आंखें अंधी कर दी जाएं.

इसके साथ ही भारत स्वदेशी हथियारबंद ड्रोन पर भी तेजी से काम कर रहा है, जो निगरानी के साथ साथ हमला करने में भी सक्षम होंगे. इन ड्रोन की तैनाती से भारत की मारक क्षमता और बढ़ेगी. मतलब साफ है, भारत अब ड्रोन से सिर्फ देखता नहीं, जरूरत पड़ने पर दुश्मन पर सटीक और घातक वार भी कर सकता है.

ड्रोन वॉरफेयर से बचाव का रास्ता क्या है

ड्रोन वॉरफेयर से बचने के लिए कोई एक जादुई बटन नहीं है जिसे दबाते ही खतरा खत्म हो जाए. इसका जवाब एक पूरे सिस्टम में छिपा है. मल्टी लेयर डिफेंस, जहां ड्रोन को अलग अलग स्तर पर रोका जाए, तेज डिटेक्शन ताकि खतरा आते ही पहचान हो जाए और AI आधारित सिस्टम जो सेकेंडों में फैसला ले सकें, यही आज की जरूरत है.

इसके साथ सबसे जरूरी है सेना, एयरफोर्स और दूसरी सुरक्षा एजेंसियों के बीच मजबूत तालमेल. जब जानकारी, तकनीक और कार्रवाई एक साथ चलती है तभी ड्रोन जैसे स्मार्ट खतरे को काबू में किया जा सकता है. यही रास्ता है और इसी दिशा में भारत अपनी तैयारी लगातार मजबूत कर रहा है.

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आखिरी बात

ड्रोन वॉरफेयर आने वाला खतरा नहीं, मौजूदा सच्चाई है. पाकिस्तान इसका गलत इस्तेमाल कर रहा है. रूस यूक्रेन जंग ने इसकी ताकत दिखा दी है.
ड्रोन की घुसपैठ पूरी तरह खत्म करना फिलहाल मुश्किल है, लेकिन भारत इस लड़ाई में पीछे नहीं है. ये लड़ाई बंदूक की नहीं, दिमाग और टेक्नोलॉजी की है. और इस मोर्चे पर भारत तेजी से मजबूत हो रहा है. 

वीडियो: जम्मू-कश्मीर में LoC पर पाकिस्तानी ड्रोन देखे गए, अटैक के बाद सर्च ऑपरेशन शुरू

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