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सेल्फी कम लेने से घटती है 'ग्लोबल वॉर्मिंग'? Email डिलीट करने से बचता है पर्यावरण!

Digital Pollution: क्या आप जानते हैं कि क्लाउड पर सेव की गई आपकी पुरानी फोटो और ईमेल पर्यावरण को नुकसान पहुंचा रहे हैं? जानिए 'डिजिटल पॉल्यूशन' क्या है और कैसे इंटरनेट का कबाड़ हमारी धरती को गर्म कर रहा है.

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हमारी एक सेल्फी धरती का तापमान बढ़ा रही है

सुबह आंख खुली नहीं कि हाथ फोन पर. दो रील, चार स्टोरी, पांच नोटिफिकेशन. फिर ऑफिस का काम, क्लाउड पर फाइल, शाम को ओटीटी. हम सबको लगता है हम बहुत स्मार्ट हो गए हैं. सब कुछ हवा में है. हल्का, फुल्का, डिजिटल.

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लेकिन रुकिए! कहानी में ट्विस्ट है. क्या आपने कभी सोचा है कि जब आप कोई फाइल 'क्लाउड' पर सेव करते हैं या एक रील देखते हैं, तो वह जादू से हवा में स्टोर नहीं होती? इसके पीछे एक पूरी 'भौतिक' दुनिया है, जो हमारी धरती को धीरे-धीरे गर्म कर रही है. इसे कहते हैं 'डिजिटल पॉल्यूशन'.

जब हम 'क्लाउड' शब्द सुनते हैं, तो हमारे दिमाग में नीला आसमान आता है. जिसे आप क्लाउड समझ रहे हैं, वो बादल नहीं, कंक्रीट का जंगल है. हजारों सर्वर, जो दिन रात दहाड़ते रहते हैं. 

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बिजली पीते हैं. पानी पीते हैं. और बदले में गर्मी उगलते हैं. ये डेटा सेंटर्स बिजली और पानी के इतने भूखे हैं कि इन्हें 'डिजिटल युग का कोयला खदान' कहा जा सकता है.

यही है डिजिटल पॉल्यूशन की असली कहानी. अब जरा इस खबर का एक्सरे करते हैं.

डेटा सेंटर क्या है-बिजली और पानी का ‘काला बाजार’

डेटा सेंटर कोई जादुई जगह नहीं है, यह एक बहुत बड़ी कंक्रीट की बिल्डिंग है जिसमें हजारों-लाखों कंप्यूटर (सर्वर्स) 24 घंटे बिजली की स्पीड से दौड़ रहे हैं. जब आप अपनी कोई फोटो अपलोड करते हैं, तो वह किसी कंपनी के इसी सर्वर में जाकर सेव होती है. 

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असली पेंच यहीं से फंसना शुरू होता है. ‘यूएस डिपार्टमेंट ऑफ एनर्जी’ (US Department of Energy) की ‘डाटा सेंटर एनर्जी इफीशिएंसी गाइड’ (Data Center Energy Efficiency Guide) ये सर्वर्स इतनी तेजी से काम करते हैं कि बहुत गर्म हो जाते हैं. लिहाजा इन्हें ठंडा करना जरूरी हो जाता है. जिस काम के लिए भारी मात्रा में एयर कंडीशनिंग और लाखों गैलन पानी की जरूरत होती है.

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डिजिटल डाटा सेंटर से पर्यावरण को कितना नुकसान? (फोटो- AP)

यानी दोहरा खर्च. पहले बिजली से सर्वर चलाओ.  बोले तो हम जो डेटा 'क्लाउड' पर हवा में महसूस करते हैं, वह असल में जमीन पर भारी बिजली और पानी पी रहा है. दुनिया के तमाम देशों में जहां ये ‘डेटा सेंटर्स’ हैं, वहां के नागरिकों ने इसका खामियाजा भी भुगतना शुरू कर दिया है.

असली खिलाड़ी कौन हैं?

दुनिया के सबसे बड़े डेटा सेंटर्स के मालिक 'बिग टेक' कंपनियां हैं. अमेरिका, आयरलैंड और चीन जैसे देशों में इनके बड़े हब्स हैं. Google, Amazon (AWS), और Microsoft (Azure) दुनिया के सबसे बड़े क्लाउड ऑपरेटर हैं. 

'डेटा सेंटर मैप' (Data Center Map) के ‘ग्लोबल इंडस्ट्री इनसाइट्स’ (Global Industry Insights) के मुताबिक ये कंपनियां अब अपना डेटा सेंटर वहां शिफ्ट कर रही हैं जहां ठंडी हवा हो या जहां रिन्यूएबल एनर्जी (सौर या पवन) सस्ती हो. 

वर्जीनिया (अमेरिका) को दुनिया की 'डेटा सेंटर राजधानी' माना जाता है. दूसरी तरफ, नॉर्डिक देशों (स्वीडन, नॉर्वे) में कंपनियां डेटा सेंटर इसलिए बना रही हैं क्योंकि वहां की बर्फीली हवा उन्हें मुफ्त में 'कूलिंग' दे देती है. यह पर्यावरण के साथ की जा रही एक चालाकी भरी जुगलबंदी है.

आयरलैंड में डेटा सेंटर्स के कारण बिजली ग्रिड पर इतना दबाव है कि नागरिकों की बिजली कटौती हो रही है. 

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सिर्फ डेटा सेंटर नहीं, मोबाइल भी गुनहगार

हर दो साल में नया फोन. पुराना ड्रॉअर में या कबाड़ में. नए फोन की डिमांड होगी तो उन्हें बनाना भी पड़ेगा. अब फोन बनाने के लिए लिथियम, कोबाल्ट, दुर्लभ धातुओं की जरूरत होती है. जिन्हें आजकल हम ‘रेयर अर्थ मैटेरियल’ कहते हैं.

माइनिंग होगी तो उसमें पानी और एनर्जी खर्च होगी. फिर ई वेस्ट का पहाड़. कुल मिलाकर डिजिटल पॉल्यूशन सिर्फ सर्वर रूम में नहीं, हमारी जेब में भी है.

डिजिटल पॉल्यूशन के 5 कड़वे सच

डिजिटल पॉल्यूशन से जाने-अनजाने हम और आप भी जुड़े हैं. खास तौरपर इन 5 मुद्दों पर तो सच जानकर आप चौंक जाएंगे.

1- ईमेल का काला सच: आपका इनबॉक्स पर्यावरण का 'साइलेंट किलर' तो नहीं?
​हममें से ज्यादातर लोग मानते हैं कि ईमेल डिलीट करना या न करना एक निजी मामला है. हमें लगता है कि जो ईमेल हमारे इनबॉक्स में पड़ा है, वह बस एक डिजिटल कागज का टुकड़ा है जो किसी कोने में पड़ा धूल फांक रहा है. लेकिन असलियत क्या है? वह ईमेल सिर्फ वहां पड़ा नहीं है, वह 'जिंदा' है और उसे जिंदा रखने के लिए दुनिया के किसी कोने में लगे बड़े-बड़े सर्वर लगातार बिजली पी रहे हैं.

​यह महज एक पुरानी मार्केटिंग मेल नहीं है, बल्कि यह आपकी कार्बन फुटप्रिंट का एक अदृश्य हिस्सा है. जब आप एक ईमेल भेजते हैं या उसे स्टोर करके रखते हैं, तो वह सर्वर पर डेटा के रूप में दर्ज होता है. अब इस डेटा को 24 घंटे एक्सेसिबल रखने के लिए डेटा सेंटर को लगातार ठंडा रखना पड़ता है और बिजली सप्लाई देनी पड़ती है. एक छोटा सा ईमेल अगर लाखों लोगों के इनबॉक्स में पड़ा रहे, तो आप सोच सकते हैं कि यह कितना बड़ा बिजली का बिल और कितना बड़ा पर्यावरणीय बोझ पैदा कर रहा है.

डेटा सेंटर: बिजली के भूखे दानव
​दुनिया भर में डेटा सेंटर बिजली की खपत के मामले में बड़े-बड़े देशों को टक्कर दे रहे हैं. ये सर्वर कभी सोते नहीं हैं. उन्हें डेटा को सुरक्षित रखने के लिए हर सेकंड एनर्जी की जरूरत होती है. आप जो 'प्रमोशनल' ईमेल पढ़ते भी नहीं हैं, उसे क्लाउड पर स्टोर रखने का मतलब है कि दुनिया का कोई विशाल कंप्यूटर उसे होस्ट कर रहा है. 

वैज्ञानिकों का मानना है कि एक औसत स्पैम ईमेल या बिना पढ़ा गया ईमेल लगभग 0.3 ग्राम कार्बन डाइऑक्साइड उत्सर्जन के लिए जिम्मेदार हो सकता है. अब इसे करोड़ों ईमेल से गुणा कर लीजिए, आंकड़े डराने वाले हो जाएंगे.

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सेल्फी और ईमेल का ग्लोबल वॉर्मिंग कनेक्शन

​'डिजिटल सफाई' है वक्त की जरूरत
​हम अक्सर 'डिजिटल मिनिमलिज्म' की बात करते हैं, लेकिन क्या कभी अपने इनबॉक्स की सफाई की है? पुराने न्यूजलेटर्स, वो 5 साल पुराने ऑफर और वो ढेर सारे प्रमोशनल मेल जो आपने कभी खोले भी नहीं, ये सब आज के 'डिजिटल कचरे' (Digital Waste) का हिस्सा हैं. 

हम भौतिक दुनिया में कचरा साफ करने को पर्यावरण बचाना मानते हैं, लेकिन डिजिटल दुनिया में भी 'अनसब्सक्राइब' करना और पुराने ईमेल डिलीट करना पर्यावरण के लिए एक बड़ा योगदान है. यह कदम न केवल आपके फोन की मेमोरी बढ़ाता है, बल्कि सर्वर पर पड़ने वाले बोझ को कम कर के कार्बन उत्सर्जन को भी नियंत्रित करता है.

2- स्ट्रीमिंग का असली 'बिजली बिल': क्या आपकी नेटफ्लिक्स की आदतें पर्यावरण पर भारी पड़ रही हैं?

आजकल हम बस एक क्लिक पर कुछ भी देख लेते हैं. नेटफ्लिक्स, यूट्यूब या प्राइम वीडियो पर हाई-डेफिनिशन (HD) या 4K कंटेंट स्ट्रीम करना हमें बिल्कुल मुफ्त और आसान लगता है. लेकिन क्या आपने कभी सोचा है कि पर्दे के पीछे क्या हो रहा है? 

जब आप हाई-डेफिनिशन वीडियो स्ट्रीम करते हैं, तो वह आपकी स्क्रीन पर जादुई तरीके से नहीं आता. उसे आप तक पहुंचाने के लिए डेटा सेंटर से लेकर आपके घर के राउटर तक एक पूरी मशीनरी काम कर रही होती है.

वो बिजली जो हमें दिखती नहीं
​एक रिसर्च के मुताबिक, हाई-डेफिनिशन वीडियो की एक घंटे की स्ट्रीमिंग उतनी ही बिजली खर्च कर सकती है जितनी एक छोटे, चालू फ्रिज को कई घंटों तक ठंडा रखने में होती है. यह बिजली सिर्फ आपके टीवी या लैपटॉप की नहीं है, बल्कि उस विशाल डेटा सेंटर की है जहां से वीडियो आप तक पहुंच रहा है. 

इन डेटा सेंटर्स में हजारों सर्वर 24/7 चलते हैं, और उन सर्वरों को गर्म होने से बचाने के लिए 'कूलिंग सिस्टम' की जरूरत पड़ती है, जो अपने आप में बिजली की एक बहुत बड़ी खपत है.

​डेटा का सफ़र: एक अदृश्य ऊर्जा खपत
​जब आप 'Play' बटन दबाते हैं, तो डेटा फाइबर-ऑप्टिक केबल्स के जरिए दुनिया के एक कोने से दूसरे कोने तक यात्रा करता है. इस पूरी यात्रा में राउटर, स्विच और ट्रांसमिशन टावर काम करते हैं. ये उपकरण बिजली की निरंतर मांग करते हैं. 

जैसे-जैसे वीडियो की क्वालिटी बढ़ती है-मान लीजिए आप 1080p से 4K पर स्विच करते हैं-डेटा का आकार बढ़ जाता है. ज्यादा डेटा का मतलब है ज्यादा सर्वर लोड, और ज्यादा सर्वर लोड का मतलब है-सीधा सा गणित-पर्यावरण पर ज्यादा दबाव.

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​हम क्या कर सकते हैं?
​अब सवाल यह है कि क्या हम मनोरंजन छोड़ दें? बिल्कुल नहीं. लेकिन हम 'स्मार्ट स्ट्रीमिंग' जरूर कर सकते हैं.

  • क्वालिटी का चुनाव: अगर आप छोटी स्क्रीन पर देख रहे हैं, तो बहुत हाई-डेफिनिशन की क्या जरूरत? ऑटोमैटिक सेटिंग्स के बजाय आप मैनुअल क्वालिटी को थोड़ा कम कर सकते हैं.
  • ​डाउनलोडिंग का विकल्प: बार-बार स्ट्रीम करने से बेहतर है कि वाई-फाई पर कंटेंट डाउनलोड कर लें, इससे नेटवर्क लोड कम होता है.
  • बदलाव की शुरुआत: पर्यावरण के प्रति जागरूक होने का मतलब सिर्फ प्लास्टिक कम करना नहीं है, बल्कि अपनी डिजिटल आदतों को भी थोड़ा सा 'सस्टेनेबल' बनाना है.

3- डेटा सेंटर्स की अनकही प्यास: सर्वर ठंडा रखने के लिए कैसे सूख रहे हैं जलस्रोत?

​हमने अब तक ये तो जान लिया कि डेटा सेंटर्स बिजली के कितने भूखे हैं, लेकिन इनका एक और 'काला सच' है जिसके बारे में चर्चा बहुत कम होती है-पानी की भारी खपत. जी हां, डेटा सेंटर्स को सिर्फ बिजली ही नहीं, बल्कि भारी मात्रा में पानी की भी जरूरत होती है.

सर्वर को ठंडा रखने का 'वॉटर कूलिंग' गणित
​डेटा सेंटर के अंदर हजारों सर्वर लगे होते हैं. ये सर्वर जब चलते हैं, तो भीषण गर्मी पैदा करते हैं. अगर इन्हें ठंडा न रखा जाए, तो ये तुरंत क्रैश हो जाएंगे. इसके लिए डेटा सेंटर्स 'इवेपोरेटिव कूलिंग' (Evaporative Cooling) तकनीक का इस्तेमाल करते हैं. 

सरल शब्दों में कहें तो, सर्वर के कमरों में हवा को ठंडा करने के लिए पानी का छिड़काव किया जाता है या पानी को कूलिंग टॉवर्स के जरिए घुमाया जाता है.

​इस प्रक्रिया में लाखों लीटर पानी भाप बनकर हवा में उड़ जाता है. यह पानी केवल इस्तेमाल नहीं होता, बल्कि पूरी तरह 'खपत' हो जाता है-यानी यह वापस उपयोग के लायक नहीं रहता.

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Data सेंटर को इस तरह किया जाता है ठंडा (फोटो- अडानी कनेक्स)

सूखे इलाकों पर दोहरी मार
​समस्या तब और गंभीर हो जाती है जब ये विशाल डेटा सेंटर्स उन इलाकों में बनाए जाते हैं जहां पहले से ही पानी की किल्लत है. नोएडा, चेन्नई या दुनिया के अन्य हिस्सों में जहां वॉटर टेबल नीचे जा रहा है, वहां एक डेटा सेंटर का आना स्थानीय निवासियों के लिए बड़ा खतरा बन सकता है.

  • संसाधनों की लड़ाई: जब एक डेटा सेंटर करोड़ों लीटर पानी हर दिन पीता है, तो स्थानीय जल निकायों पर दबाव बढ़ जाता है. इससे किसानों के खेतों और आम नागरिकों के नल तक पानी पहुंचाने में मुश्किलें आने लगती हैं.
  • अदृश्य पानी का फुटप्रिंट: इसे हम 'वॉटर फुटप्रिंट' कहते हैं. आपकी एक स्ट्रीमिंग या एक क्लाउड स्टोरेज के पीछे उस पानी का हाथ है जो सर्वर को ठंडा रखने में खर्च हुआ.

​क्या है रास्ता?
​अब सवाल यह है कि क्या डेटा सेंटर्स का होना पर्यावरण के लिए हमेशा बुरा है? इसका जवाब तकनीकी नवाचार (Innovation) में है. कंपनियां अब 'लिक्विड कूलिंग' तकनीक पर काम कर रही हैं, जिसमें पानी का पुनर्चक्रण (Recycle) किया जा सकता है या फिर बिना पानी के कूलिंग सिस्टम विकसित किए जा रहे हैं. इसके अलावा, ठंडे इलाकों में डेटा सेंटर शिफ्ट करना भी एक विकल्प है ताकि प्राकृतिक रूप से कूलिंग मिल सके.

4- AI का तड़का: आपके एक 'सवाल' के पीछे जलती है बिजली की बड़ी आग
आजकल हम ChatGPT या किसी भी AI टूल से कुछ भी पूछ लेते हैं-"आज का मौसम कैसा है?", "मेरे लिए एक मेल लिख दो" या "इस फोटो को एडिट कर दो." हमें लगता है कि ये सब बस एक 'मैजिक' की तरह हो रहा है. लेकिन असल में, इस जादुई जवाब के पीछे एक बहुत बड़ा 'ऊर्जा का खेल' छिपा है.

साधारण सर्च vs. AI का तड़का
​गूगल सर्च पर कुछ खोजना और AI से सवाल पूछना, इन दोनों में जमीन-आसमान का फर्क है. जब आप गूगल पर कुछ सर्च करते हैं, तो वह सर्वर में पहले से मौजूद इंडेक्स पेज को उठाकर आपको दिखाता है. 

लेकिन जब आप AI से कुछ पूछते हैं, तो वह 'जनरेटिव' मोड में होता है. वह हर बार आपके लिए नया कंटेंट 'लिखता' या 'बनाता' है. इसके लिए उसे अरबों पैरामीटर्स के साथ कैलकुलेशन करनी पड़ती है.

​एक अनुमान के मुताबिक, ChatGPT से एक साधारण सवाल पूछना, गूगल सर्च की तुलना में लगभग 10 से 15 गुना ज्यादा बिजली खर्च करता है. ऐसा इसलिए क्योंकि आपका हर एक इनपुट मशीन को दोबारा प्रोसेस करने पर मजबूर करता है.

ट्रेनिंग का 'खर्चीला' सफर
​AI मॉडल रातों-रात तैयार नहीं होते. इन्हें 'ट्रेन' करने के लिए विशाल डेटा को पढ़ना पड़ता है. यह ट्रेनिंग प्रक्रिया महीनों तक चलती है और इस दौरान हजारों सुपर-पावरफुल ग्राफिक्स कार्ड (GPU) 24/7 काम करते हैं. 

इन मॉडल्स को ट्रेन करने में लाखों किलोवाट-घंटे (kWh) बिजली खर्च होती है. यह उतनी बिजली है जितनी एक मध्यम दर्जे के शहर को कुछ दिनों तक रोशन करने के लिए काफी हो सकती है.

​गर्मी का बड़ा खेल: GPUs का बढ़ता तापमान
​AI के लिए इस्तेमाल होने वाले GPU (Graphic Processing Units) साधारण सर्वर प्रोसेसर से कहीं ज्यादा गर्म होते हैं. क्योंकि ये बेहद जटिल गणितीय गणनाएं (Complex Calculations) एक सेकंड में लाखों बार करते हैं. इतनी गर्मी पैदा होती है कि डेटा सेंटर के कूलिंग सिस्टम पर जबरदस्त दबाव पड़ता है. इसे तकनीकी भाषा में 'थर्मल लोड' कहते हैं.

ज्यादा गर्मी का मतलब है- ज्यादा कूलिंग की जरूरत, और ज्यादा कूलिंग का मतलब है-बिजली की खपत में कई गुना इजाफा.

डेटा ट्रैफिक और भविष्य की चुनौती
​आज हम AI का इस्तेमाल सिर्फ टेक्स्ट तक नहीं, बल्कि इमेज जनरेशन, वीडियो क्रिएशन और ऑटोमेशन के लिए कर रहे हैं. ये तीनों काम टेक्स्ट की तुलना में कहीं ज्यादा 'कंप्यूटेशनल पावर' (Compute Power) मांगते हैं. जब आप AI से एक वीडियो बनवाते हैं, तो वह बैकग्राउंड में हजारों फ्रेम रेंडर कर रहा होता है.

​सीधी बात यह है कि आज सवाल पूछना एक उंगली के इशारे पर हो सकता है, लेकिन उस सवाल का जवाब देने वाली मशीनें न तो मुफ्त में चलती हैं और न ही पर्यावरण के लिए सस्ती हैं. 

हर बार जब हम बिना सोचे-समझे AI से बहुत लंबे और व्यर्थ के काम करवाते हैं, तो हम अनजाने में ही बिजली का एक बड़ा बिल और कार्बन उत्सर्जन बढ़ा रहे होते हैं.

5- आसमान की उड़ान बनाम डिजिटल रफ्तार: क्या इंटरनेट का कार्बन फुटप्रिंट विमानन उद्योग को पीछे छोड़ रहा है?

​हम अक्सर पर्यावरण के नुकसान की बात करते हुए एयरलाइंस और विमानों (Aviation Industry) की ओर उंगली उठाते हैं. यह सच है कि हवाई जहाज बहुत अधिक कार्बन उत्सर्जन करते हैं. 

लेकिन, एक चौंकाने वाली हकीकत यह है कि हमारी डिजिटल दुनिया-जी हां, वही इंटरनेट, जिसे हम 'हवा' की तरह अदृश्य और साफ-सुथरा मानते हैं-पर्यावरणीय तबाही के मामले में अब दुनिया के विमानन उद्योग के बराबर खड़ी हो गई है.

इंटरनेट का अदृश्य धुआं
​जब आप एक विमान को उड़ते हुए देखते हैं, तो आप उसका धुआं देख सकते हैं. लेकिन, जब आप अपना मोबाइल या लैपटॉप इस्तेमाल करते हैं, तो आपको कोई धुआं नहीं दिखता. यही सबसे बड़ी चुनौती है. 

इंटरनेट का कार्बन फुटप्रिंट केवल आपके फोन की बैटरी में नहीं, बल्कि उन विशाल डेटा सेंटर्स, सबमरीन केबल्स और लाखों टेलीकॉम टावरों में छिपा है जो 24 घंटे बिजली की मांग करते हैं.

​तुलना के मायने: वजन और असर
​आंकड़े बताते हैं कि वैश्विक स्तर पर इंटरनेट और डिजिटल इंफ्रास्ट्रक्चर से होने वाला उत्सर्जन, दुनिया भर के विमानन उद्योग के कुल उत्सर्जन के लगभग बराबर (करीब 2% से 3%) पहुंच चुका है.

सबसे डरावनी बात यह है कि विमानों की संख्या तो फिर भी एक सीमा के भीतर बढ़ती है, लेकिन इंटरनेट का डेटा ट्रैफिक हर साल बेतहाशा रफ्तार से बढ़ रहा है. खासकर दो तरह से- 

  • ऊर्जा की निरंतरता: विमान तो उड़ान भरने के बाद उतर जाता है, लेकिन इंटरनेट कभी 'लैंड' नहीं करता. सर्वर को डेटा को 'लाइव' रखने के लिए बिना थके बिजली चाहिए होती है.
  • ​उपकरणों का जाल: अरबों स्मार्टफोन, स्मार्ट डिवाइसेज और इंटरनेट ऑफ थिंग्स (IoT) सेंसर, जो हम हर दिन इस्तेमाल करते हैं, वे सब मिलकर एक ऐसा 'कार्बन फुटप्रिंट' पैदा कर रहे हैं जो विमानों की सीधी उड़ानों के धुएं को चुनौती दे रहा है.

​क्यों यह समस्या बड़ी है?
​विमानन उद्योग की तरह, इंटरनेट का प्रभाव भी ग्लोबल वार्मिंग में सीधे योगदान दे रहा है. जैसे-जैसे हम 'क्लाउड' पर ज्यादा निर्भर होते जा रहे हैं, वैसे-वैसे हमारी डिजिटल डिपेंडेंसी का पर्यावरण पर बोझ बढ़ता जा रहा है. 

एक औसत डेटा सेंटर को चलाने के लिए उतनी ऊर्जा चाहिए, जितनी एक छोटे शहर को रोशन करने के लिए आवश्यक होती है.

सोर्स- ‘द शिफ्ट प्रोजेक्ट’ की क्लाइमेट क्राइसेस और टेक्नॉलजी रिपोर्ट

'ग्रीन वॉशिंग' का खेल: बड़ी टेक कंपनियों का 'डिजिटल ढकोसला' और असली सच

आजकल आप जब भी किसी बड़ी टेक कंपनी या डेटा सेंटर ऑपरेटर की वेबसाइट खोलते हैं, तो आपको एक बड़े से पोस्टर में लिखा मिलता है-"100% रिन्यूएबल एनर्जी" या "कार्बन न्यूट्रल ऑपरेशंस". सुनने में यह कितना सुकून भरा लगता है, है न? हमें लगता है कि हमारा डेटा किसी ऐसे सर्वर में सुरक्षित है जो सूरज की रोशनी या हवा की ऊर्जा से चल रहा है. 

लेकिन दोस्तों, रुकिए! यह सब चमक-धमक वाली कहानी के पीछे एक बहुत बड़ा 'डिजिटल ढकोसला' छिपा है. जिसे तकनीकी और पर्यावरणीय भाषा में 'ग्रीन वॉशिंग' (Greenwashing) कहा जाता है.

कागजी घोड़े और हकीकत का अंतर
​असल में 'ग्रीन वॉशिंग' का मतलब है-अपनी इमेज को पर्यावरण के प्रति जिम्मेदार दिखाना, जबकि पीछे से काम ठीक उसके उलट हो रहा हो. कंपनियां अक्सर 'रिन्यूएबल एनर्जी सर्टिफिकेट्स' (RECs) का इस्तेमाल करती हैं. 

मान लीजिए, दिल्ली में एक कंपनी का डेटा सेंटर है जो धुआं उगलने वाले कोयला-आधारित बिजली ग्रिड से अपनी ऊर्जा ले रहा है. लेकिन, वही कंपनी कागजों पर दूर किसी राजस्थान के रेगिस्तान में लगे सोलर प्लांट की बिजली का क्रेडिट खरीद लेती है. वे दावा कर देते हैं कि "हमने रिन्यूएबल ऊर्जा खरीदी है," जबकि उनके सर्वर उस वक्त भी कोयले से पैदा हुई बिजली ही खींच रहे होते हैं.

​क्यों यह सिर्फ एक 'मार्केटिंग हथकंडा' है?

​यह समझने वाली बात है कि बिजली का ग्रिड एक 'पानी के टैंक' जैसा है. जब आप उसमें कोयले की बिजली डालें या सोलर की, वह सब एक साथ मिल जाती है. आप ग्रिड से यह नहीं कह सकते कि "भाई, मेरे सर्वर को सिर्फ सोलर वाली बिजली ही देना."

जब कंपनियां कहती हैं कि हम '100% रिन्यूएबल' हैं, तो वे बस अपना 'कार्बन-गिल्ट' कम करने के लिए हिसाब-किताब का खेल खेल रही होती हैं. उनका मुख्य मकसद पर्यावरण बचाना नहीं, बल्कि अपने शेयरधारकों (Shareholders) और पर्यावरण के प्रति जागरूक ग्राहकों को यह यकीन दिलाना है कि वे एक 'साफ-सुथरी' ब्रांड हैं.

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असली असर कहां दिखता है?
​सच्चाई यह है कि डेटा सेंटर 24 घंटे चलते हैं. सूरज डूबा तो सोलर पैनल बंद, और हवा रुकी तो विंड टर्बाइन भी शांत. ऐसे में कंपनी को बिजली के लिए ग्रिड पर निर्भर रहना पड़ता है, जो कि अधिकतर कोयले और गैस से चलता है. 

जब तक कंपनियां खुद के 'बैटरी स्टोरेज' और 'ग्रीन इंफ्रास्ट्रक्चर' में भारी निवेश नहीं करतीं, तब तक ये 100% रिन्यूएबल वाले दावे सिर्फ विज्ञापन की भाषा हैं.

दावे (Corporate Claims)हकीकत (Ground Reality)
हम 100% रिन्यूएबल एनर्जी पर हैंवे क्रेडिट खरीदकर अपना पाप धो रहे हैं
डेटा सेंटर का कोई प्रदूषण नहीं हैसर्वर को ठंडा करने में भारी पानी और कोयले की बिजली खर्च होती है
'कार्बन न्यूट्रल' लक्ष्य पा लिया हैवास्तविक कार्बन उत्सर्जन आज भी साल-दर-साल बढ़ रहा है
भारत का डिजिटल 'स्वर्ण युग' या पर्यावरण के लिए खतरा?

​हम आज जिस दौर में जी रहे हैं, वह डेटा का युग है. डिजिटल दुनिया की चर्चा अक्सर सिलिकॉन वैली या यूरोप के डेटा सेंटर्स से शुरू होती है, लेकिन आज इसकी धुरी शिफ्ट होकर भारत की ओर आ गई है. 

भारत न केवल दुनिया का सबसे बड़ा इंटरनेट बाज़ार बन रहा है, बल्कि यह ग्लोबल टेक कंपनियों के लिए 'डेटा का नया अड्डा' भी बनता जा रहा है.

भारत: डिजिटल दुनिया का नया पावरहाउस
​नोएडा से लेकर मुंबई और चेन्नई तक, आप कहीं भी देख लें, विशालकाय डेटा सेंटर्स (Data Centers) जमीन से सिर उठाए खड़े हो रहे हैं. ऐसा क्यों? क्योंकि हम भारतवासी हर दिन करोड़ों जीबी डेटा इस्तेमाल कर रहे हैं. 

चाहे वह ओटीटी पर फिल्में देखना हो, एआई (AI) का इस्तेमाल हो, या फिर डिजिटल पेमेंट. इन सभी के लिए जिस 'डिजिटल फ्यूल' यानी डेटा की जरूरत है, उसे स्टोर करने और प्रोसेस करने के लिए डेटा सेंटर्स का होना अनिवार्य है.

बिजली और पानी का 'अदृश्य' संकट
​अब असली सवाल यह है कि इस चमकती हुई डिजिटल तस्वीर के पीछे का अंधेरा क्या है? भारत उन देशों में है जहां प्राकृतिक संसाधनों-खासकर बिजली और पानी पर पहले से ही भारी दबाव है. 

नोएडा जैसे शहरों में जहां तापमान और जलस्तर दोनों ही चिंताजनक स्थिति में हैं, वहां इन डेटा सेंटर्स का खुलना एक दोधारी तलवार जैसा है.

  • बिजली की भूख: एक आधुनिक डेटा सेंटर को 24/7 ठंडा रखने और उसे चलाने के लिए जितनी बिजली चाहिए, वह एक छोटे कस्बे की कुल खपत के बराबर हो सकती है. हमारे पास पहले से ही ग्रिड पर दबाव है, ऐसे में डेटा सेंटर्स का बढ़ना बिजली कटौती और कोयले की खपत को और बढ़ा सकता है.
  • पानी की 'प्यास': जैसा कि हमने पहले चर्चा की, डेटा सेंटर्स को ठंडा रखने के लिए लाखों लीटर पानी का इस्तेमाल होता है. जल संकट से जूझ रहे इलाकों में यदि हम उद्योग के नाम पर लाखों लीटर पानी केवल सर्वर ठंडा करने में बहा देंगे, तो यह आने वाली पीढ़ियों के लिए एक बहुत बड़ा खतरा होगा.
डिजिटल प्रदूषण में भारत का योगदान
डिजिटल प्रदूषण में भारत का योगदान

पर्यावरणीय असर: बहस क्यों है जरूरी?
​डिजिटल विस्तार एक हकीकत है जिसे हम रोक नहीं सकते, लेकिन इसे 'कैसे' करना है, यह बहस का विषय है. क्या हम डेटा सेंटर्स को ऐसे इलाकों में लगा रहे हैं जहां पानी की उपलब्धता अधिक है? क्या हम 'सस्टेनेबल' कूलिंग तकनीक का उपयोग कर रहे हैं? 

अगर हम आज इन सवालों पर खुलकर बात नहीं करेंगे, तो कल डिजिटल क्रांति की कीमत हमें सूखे नल और बिजली के बिलों के रूप में चुकानी पड़ेगी.

भारत एक डिजिटल शक्ति बनने की ओर अग्रसर है, और यह गर्व की बात है. लेकिन यह विकास 'पर्यावरण की कीमत' पर नहीं होना चाहिए. हमें ऐसे 'ग्रीन डिजिटल भारत' की नींव रखनी होगी, जहां सर्वर तो चलें, लेकिन हमारे जलस्रोत और ऊर्जा ग्रिड भी सुरक्षित रहें. 

अब वक्त आ गया है कि टेक नीतियां बनाने वाले और हम, उपभोक्ता, दोनों ही इस डिजिटल footprint को गंभीरता से लें.

नई तकनीक-इंटरनेट को 'ठंडा' करने का तरीका

इंजीनियर्स अब इस 'गर्म' होते इंटरनेट को ठंडा करने के लिए कुछ क्रांतिकारी काम कर रहे हैं:

लिक्विड कूलिंग: सर्वर्स को तेल या विशेष तरल पदार्थों में डुबोकर ठंडा करना.

अंडरवाटर डेटा सेंटर्स (प्रोजेक्ट नैटिक): समुद्र के नीचे डेटा सेंटर बनाना जहां पानी प्राकृतिक रूप से उन्हें ठंडा रखे.

वेस्ट हीट रिकवरी: डेटा सेंटर्स से जो गर्मी निकलती है, उसे पास के घरों को गर्म करने के काम में लेना.

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आपकी जिम्मेदारी-'डिजिटल स्वच्छता' (Digital Hygiene)

तकनीक का इस्तेमाल कीजिए, पर उसके गुलाम मत बनिए. अपना 'डिजिटल कार्बन फुटप्रिंट' कम करने के लिए ये कदम उठाएं.

 इनबॉक्स की सफाई: फालतू न्यूज़लेटर्स अनसब्सक्राइब करें.

 क्लाउड का मोह: एक ही फोटो की 10 कॉपी न रखें. जो खराब हैं, उन्हें आज ही डिलीट करें.

 स्ट्रीमिंग क्वालिटी: छोटी स्क्रीन पर बहुत हाई-डेफिनिशन देखने की जरूरत नहीं है.

 बेकार ऐप्स हटाएं: जो ऐप सालों से नहीं खुली, उसे हटा दें.

अब इस काम को आसान बनाने के लिए टूल्स भी जान लीजिए.

 Files by Google: डुप्लिकेट फोटो और जंक फाइल हटाने के लिए.

 CCleaner: फोन का कैश साफ करने के लिए.

Email Unsubscriber Tools: फालतू ईमेल से छुटकारा पाने के लिए.

उम्मीद है कि अब आप अगली बार 'डिलीट' बटन दबाएं, तो खुश होइए-आप सिर्फ कचरा नहीं हटा रहे, आप धरती को थोड़ा ठंडा कर रहे हैं. डिजिटल दुनिया भले ही आभासी लगे, लेकिन इसका असर बहुत ही वास्तविक है!

वीडियो: 'नौकरी जाने के डर' से बहुत आगे पहुंच चुके हैं आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस के ख़तरे, सुनकर होश खो बैठेंगे!

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