बहुत साफ-सफाई से मनाया जाने वाला त्योहार है छठ मैंने अपनी आंखों से कई ऐसे भक्त देखे हैं, जो मजबूरी में ही सही, लेकिन भगवान को गंदे नाले की सैर कराते हैं. हमारे समय की मजबूरी है कि साफ नदी-तालाब बस दादी-नानी की कहानियों से लगते हैं. 'बहुत साल पहले की बात है. एक शहर में एक साफ नदी बहा करती थी,' टाइप. गांवों के पोखरे-तालाब साफ नहीं रहे. जरूरत से ज्यादा आबादी और उद्योग-धंधों का बोझा ढोने वाले शहरों की क्या बिसात फिर? लोगों को पीने का साफ पानी मयस्सर नहीं होता. ऐसे में जब पर्व-त्योहार मनाने की बात आती है, तो लोग गंदे नाली में उतर जाते हैं. बेहद साफ-सफाई से मनाया जाने वाला छठ भी गंदे नालों में मना लिया जाता है. अगर आपके यहां छठ होता हो, तो आप जानते होंगे कि इसमें साफ-सफाई का कितना ध्यान रखा जाता है. प्रसाद बनाते समय बोलते भी नहीं. कि कहीं गलती से मुंह का थूक प्रसाद पर न गिर जाए. बीच में पेशाब करने के लिए भी नहीं उठते. इतना ध्यान रखते हैं. मगर फिर सूर्य को अर्घ्य देने के लिए गंदे नाले में उतर जाते हैं. ये कैसा विरोधाभास है?

शहरों में रहने वाले लोगों के लिए साफ नदी-तालाब तो एक सपने जैसा ही है. (सांकेतिक तस्वीर)
सालभर गंदगी को ठिकाने लगाने में इस्तेमाल होता है नाला हमारा दफ्तर नोएडा में है. नोएडा के फिल्म सिटी में. एकदम दिल्ली की सरहद से सटा हुआ. एक सड़क है उधर. अशोक नगर में. वहां दिल्ली शुरू होता है. नोएडा खत्म होता है. इसी अशोक नगर की कहानी है. वहां एक नाला है. इस नाले के पीछे सपना तो नहर का ही था. वो अलग बात है कि लोगों ने और शहर ने नहर को नाला बना दिया. खूब बड़ा सा है. गंदा. बदबूदार. भांति-भांति की गंदगी से भरा. उधर से गुजरेंगे, तो मन पक्का भिनक जाएगा. आप गंदगी का नाम लीजिए. पक्की बात है कि अशोक नगर के उस नाले में वो गंदगी पक्का मौजूद होगी. कई बार तो लाशें भी निकलती वहां. लोग मारकर फेंक जाते हैं. कभी बोरी में बंद, तो कभी यूं ही. यहां से थोड़ी दूर पर गाजीपुर है. वहां पर एक मंडी है. मच्छी बाजार, मुर्गी बाजार, खस्सी बाजार, सब है वहां. वहां की जो गंदगी होती है, वो भी कई बार इसी नहर में शरण पाती है. सरकार घर-घर शौचालय बनवाने के लिए इतनी योजनाएं बना रही है. इन योजनाओं के असर की क्या बात करें. दूर-दराज के इलाके छोड़िए, यहीं दिल्ली को देख लीजिए. इस अशोक नगर वाले नाले पर सालभर खूब सारे लोग शौच करते दिख जाएंगे. कहने का मतलब ये है कि ये नाला महागंदा है. सालभर इसका इस्तेमाल गंदगी को ठिकाने लगाने के लिए किया जाता है.

ये ही है वो अशोक नगर का नाला जिसकी हम बात कर रहे हैं. ये अकेला नाला नहीं, जहां लोग छठ मनाते हों. नदी और तालाब पर जाकर छठ पर्व मनाने की परंपरा उनकी सेहत से भी खिलवाड़ करती है.
छठ के नाम पर बेवकूफी करने की मजबूरी ही तो है पहले यहां एकदम काला पानी बहा करता था. अब सूखा रहता है. साल के ज्यादातर हिस्सों में यहां पानी नहीं बहता. पानी की सप्लाई रोक दी जाती है. लेकिन छठ के समय इसी नाले में खूब चहल-पहल होती है. पास की दीवारों पर चूना पोता जाता है. बांस की बल्लियां गाड़ी जाती हैं. लाइट-वाइट लगाई जाती है. ये सब छठ के उपलक्ष्य में होता है. छठ के समय इस नाले में लबालब पानी भर दिया जाता है. पानी के गंदा होने की गारंटी है. पिछले कई सालों से इस नाले का सालाना रोल तय हो रखा है. छठ में काम लाया जाता है. लोग आते हैं. छठ करने. यहीं देखा था मैंने पिछले साल. कई औरतें नजर आईं. नाले के पानी में डुबकी लगा रही थीं. पूरी श्रद्धा से. ऐसे जैसे हर की पौड़ी पर स्नान कर रही होंगी. कुछ तो ऐसी भी थीं, जो उसी नाले के पानी से आचमन कर रही थीं. उसी नाले के पानी से कुल्ला कर रही थीं. ये देखकर मन घिना गया. दिल में ऐसी हूक उठी थी कि पूछिए मत.
पानी नहीं है, जहर है मुझे बड़ी चिंता हुई उनकी. वो पानी नहीं, जहर है. इतने जहरीले पानी में नहाने, कुल्ला करने पर बीमार पड़ जाएंगी. ऐसा नहीं कि कोई उन्हें जबरन वहां हांक कर लाया हो. या कि जबर्दस्ती उन्हें उस पानी में उतरने के लिए मजबूर किया हो. वो जो कर रही हैं, अपनी मर्जी से कर रही हैं. हो सकता है कि इस मर्जी के पीछे त्योहार मनाने की मजबूरी हो. छठ पारंपरिक तौर पर नदी-तालाब के किनारे किया जाता है. पानी में खड़े होकर सूर्य को अर्घ्य दिया जाता है. परंपरा है, वो तो ठीक है. मगर परंपरा निबाहना हमारे बस में कहां है? परंपराओं के नाम पर जान-बूझकर बीमारियों को गले तो नहीं लगाया जा सकता! बीमारियों को न्योता तो नहीं दिया जा सकता.

अब तो छोटे शहरों में भी ये चलन काफी जोर पकड़ रहा है. लोग अपने घरों में छोटा सा गड्ढा खोदकर उसमें पानी भर देते हैं और वहीं छठ करते हैं (सांकेतिक तस्वीर)
सेहत और धर्म, दोनों लिहाज से गंदे पानी में नहीं उतरना चाहिए किसी गंदे नाले के पानी से आचमन करके किसी को पुण्य तो नहीं ही मिल सकता है. इतनी गंदगी में, जहां कोई भला आदमी पैर का अंगूठा न डाले, वहां डुबकी लगाने से भगवान कैसे खुश होंगे ? जिसके बगल वाली सड़क से गुजरने पर लोग नाक बंक कर लेते हैं, उसका पानी आचमन के काम में कैसे लाया जा सकता है? सरकार की तो क्या ही बात करें! उसको पता है कि इतनी बड़ी संख्या में लोग वहां छठ करते हैं, लेकिन फिर भी नाले की सफाई नहीं होती. बस फौरी तौर पर थोड़ा पोत-पात दिया जाता है. ये हाल बस अशोक नगर के इस एक नाले का नहीं है. दिल्ली में कई ऐसे नाले हैं. लोग उतरते हैं वहां. जिस नाले को देखकर राहगीर का मन गंधा जाए, वहां पूजा कैसे की जा सकती है? और पूजा के नाम पर जो लोग वहां जाते हैं, वो भी तो पूजा के लिए बताई गई बुनियादी शर्त 'साफ-सफाई' से समझौता करते हैं. धर्म और सेहत, दोनों के ही लिहाज से गलत है ये तो.

अपनी श्रद्धा की तुष्टि के लिए लोग गंदे नाली के पानी में खड़े होने को मजबूर हैं. (सांकेतिक तस्वीर)
वैसे भी, भगवान का मन तो साफ-सफाई में ही बसता है कहते हैं कि साफ-सफाई से ईश्वर खुश होता है. तभी तो पूजा-पाठ की जगह को पवित्र रखते हैं. खुद भी नहा-धोकर पूजा करते हैं. साफ-सुथरे तरीके से प्रसाद बनाते हैं. गंदगी देखकर तो भगवान भी भाग खड़े होते होंगे. माना कि दुनिया में प्रदूषण बहुत बढ़ गया है. साफ नदी-तालाब मिलते नहीं हैं. ये हमारे समय की मजबूरी है. गंदगी किसी को पसंद नहीं. मजबूरी है कि इसके साथ ही जीना पड़ रहा है. हवा गंदी है. पानी गंदा है. खाने की चीजें जहरीली हो गई हैं. मिट्टी जहरीली हो गई है. लेकिन इन चीजों के बिना निभ नहीं सकती. सांस लेना ही है. पानी पीना ही है. खाना भी खाना ही है. लेकिन जिन जगहों पर किनारे से बचकर चल सकते हैं, वहां तो थोड़ा परहेज करना होगा. बिना नाले में उतरे भी पूजा हो सकती है. त्योहार मनाया जा सकता है. इस तरह गंदे नाले में उतरकर त्योहार मनाने को मजबूरी का नाम नहीं दिया जा सकता. त्योहार के नाम पर नाले में नहीं कूदा जा सकता.

आस्था, धर्म और विश्वास के नाम पर कोई तर्क काम नहीं करता है.
गंगा की सफाई नहीं हो पा रही सरकार से, नहर-नाले की क्या सफाई कराएगी गंगा और यमुना जाने कितने सालों से साफ हो रही हैं. इतना पैसा खर्च हुआ, तब भी साफ नहीं हुईं. और गंदी होती जा रही हैं. ऐसे माहौल में समझदारी तो ये ही कहती है कि दिमाग का इस्तेमाल करो. ठीक है कि सरकार का काम है सफाई करवाना. मगर सरकार कितना काम करती है, ये हम सब जानते हैं. जहरीले नाले में उतरने से बीमार तो आप पड़ेंगे. सरकार का क्या बिगड़ेगा! हर साल डेंगू-चिकनगुनिया से लोग मरते हैं. सरकार का क्या बिगड़ता है? इतनी गंदगी में उतरकर त्योहार मनाने से तो बेहतर है कि घर पर बाल्टीभर पानी में खड़े हो जाओ और सूर्य को अर्घ्य दे दो. छोटे शहरों में भी खूब हो रहा है. लोग अपने यहां गड्ढा खोदकर पानी भर देते हैं. उसमें दो-चार बूंद गंगाजल की डाल लेते हैं. दिल की तसल्ली के लिए. त्योहार मनाने से कोई मना नहीं कर रहा. मगर त्योहार के नाम पर अपनी सेहत को नजरंदाज करना ठीक नहीं है. वैसे भी, श्रद्धा और अंधश्रद्धा में बहुत अंतर होता है. भक्ति और अंधभक्ति में बहुत फर्क होता है. पूजा कीजिए, लेकिन अपनी परवाह पहले कीजिए. त्योहार के नाम पर मूर्खता मत कीजिए.
नोट: मूल लेख में बदलाव किए गए हैं.
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