लेकिन ये सब बातें तो हो रही हैं, होती रहेंगी. आरोप और आरोपों पर सफाई भी सामने आ रही है. लेकिन आज हम भारत बायोटेक के बारे में बात करेंगे जिसने सुर्खियों में अचानक से जगह बना ली है. इतना कि कयास लग रहे हैं कि इसके शेयर उछाल मार सकते हैं.
भारत बायोटेक कम्पनी है डॉक्टर कृष्णा एला की. साल 1996 में इसका जन्म हुआ. इस कम्पनी की शुरुआत राजीव गांधी सरकार के दौरान लिए गए एक महत्त्वपूर्ण फ़ैसले से होती है. साल था 1986. राजीव गांधी टेक सेवी कहे जाते थे. उन्होंने इसी साल डिपार्टमेंट ऑफ़ बायोटेक्नॉलॉजी (DBT) की नींव रखी. इसके तहत देश में बायोटेक के क्षेत्र में शोध और कार्यों को बढ़ावा देना था.
लेकिन कृष्णा एला की कहानी इसके पहले की है. आंध्र प्रदेश और तमिलनाडु के बॉर्डर पर मौजूद तिरूथानी में एक किसान परिवार में कृष्णा एला का जन्म हुआ. ख़बरें बताती हैं कि कृष्णा खेती करना चाहते थे, लेकिन उनके पिता ने उन्हें पढ़ाई करने के लिए प्रेरित किया. शुरुआती पढ़ाई के बाद बेंगलुरु के यूनिवर्सिटी ऑफ ऐग्रिकल्चरल साइंसेज़ से स्नातक की परीक्षा पास की. फिर विदेश चले गए. यूनिवर्सिटी ऑफ़ हवाई. ऑनलाइन मिलती जानकारियों के मुताबिक़, डॉक्टर कृष्णा एला ने विस्कॉन्सिन-मैडिसॉन यूनिवर्सिटी से PhD की. उसके बाद चार्ल्स्टन के साउथ कैरलाइना चले गए. वहां की मेडिकल यूनिवर्सिटी में रिसर्च फ़ैकल्टी की तरह काम किया. दसियों जगह काम कर चुकने के बाद कृष्णा एला भारत आए, और अपनी कम्पनी की नींव रखी. एक पोर्टल से बातचीत में उन्होंने इसका श्रेय अपनी मां को दिया था. कृष्णा एला को भारत बुलाते हुए उनकी मां ने कहा था,
“बेटा, तुम्हारा पेट केवल 9 इंच का है. जितना भी पैसा कमा लो, पेट से ज़्यादा नहीं खा सकते. वापिस आ जाओ. और जो मन हो, वो करो. तुम्हें खाना मिले, इसका मैं ध्यान दूंगी. जब तक मैं ज़िंदा हूं, तुम्हें भूख नहीं लगेगी.”एला भारत आ गए. लेकिन कुछ समय तक सबकुछ बहुत कठिन रहा. ये वो समय था, जब भारत में स्टार्टअप एक जटिल संज्ञा के तौर पर जाने जाते थे. उस समय भारत बायोटेक की नींव पड़ी. धीरे-धीरे कम्पनी आगे बढ़ती गयी. एला ने रिसर्च और वैक्सीन पर अपना फ़ोकस बनाया. पहला प्रोजेक्ट था हेपेटाइटिस B की वैक्सीन.
इसके बाद कारवां चल निकला. भारत बायोटेक के प्रोफ़ाइल के मुताबिक़, कम्पनी ने हेपेटाइटिस, रैबीज़, जापानी इनसिफिलाइटिस, रोटावायरस, फ़्लू, डिप्थीरिया, टेटनस की वैक्सीन बनाई. साल 2016 में कम्पनी ने एक बड़ा दावा किया. कहा कि उन्होंने चिकनगुनिया और ज़ीका वायरस की वैक्सीन बना ली है. बाक़ायदा बयान जारी किया, कृष्णा एला ने कहा कि उनकी कम्पनी भारत बायोटेक ने ज़ीका वायरस के खिलाफ़ दो वैक्सीन बना ली हैं.
भारत बायोटेक की लैब में नरेंद्र मोदीलेकिन इसी समय एक विवाद हुआ. ख़बरों के मुताबिक़, केंद्र सरकार ने भारत बायोटेक समेत कई सारे प्राइवेट कम्पनियों को लताड़ दिया. डायरेक्टर जनरल ऑफ़ हेल्थ सर्विसेज़ (DGHS) डॉक्टर जगदीश प्रसाद ने कहा कि कंपनियां ज़ीका वायरस जैसी विपत्ति का फ़ायदा नहीं उठा सकती हैं, केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय रिसर्च के लिए सक्षम है.
स्वास्थ्य मंत्रालय ने भारत बायोटेक को नोटिस भी भेजा था कि जब दुनिया में कहीं भी ज़ीका वायरस की वैक्सीन नहीं है, ऐसे में भारत बायोटेक ने कैसे वैक्सीन बना ली. मंत्रालय ने कहा कि वो इस दावे की सत्यता की जांच करना चाहते हैं. और ये जानना चाहते हैं कि सरकार से बात किए बिना उन्होंने वैक्सीन का ऐलान कैसे कर दिया.
सवाल ये भी उठे कि जिस समय देश में ज़ीका का एक भी केस नहीं था, उस समय भारत बायोटेक ने किससे परमिशन लेकर ज़ीका वायरस को देश में लाकर उसके वैक्सीन का काम शुरू किया. न तो ये बहस किसी अंत तक पहुंच सकी और न ही ज़ीका और चिकनगुनिया की वैक्सीन भारत बायोटेक की वेबसाइट तक. हां. अगर आप भारत बायोटेक की वेबसाइट पर जाते हैं तो उनके द्वारा बनाई गई वैक्सीन में ज़ीका वायरस की वैक्सीन का ज़िक्र नहीं मिलता है और न ही चिकनगुनिया का.
लेकिन कोरोना की वैक्सीन का ज़िक्र मिलता है, जिसके तीसरे फ़ेज़ का ट्रायल अभी हो ही रहा है. आरोप लग रहे हैं कि तीसरे फेज़ के नतीजों के बिना ही इस वैक्सीन को परमिशन मिल गई है.
भारत बायोटेक का सर्वेसर्वा होने के अलावा कृष्णा एला केंद्रीय कैबिनेट की वैज्ञानिक सलाहकार समिति के सदस्य हैं. काउन्सिल ऑफ़ साइंटिफ़िक एंड इंडस्ट्रियल रिसर्च (CSIR) और सेंटर फ़ॉर सेल्युलर एंड मॉलिक्युलर बायोलॉजी (CCMB) जैसे अग्रणी संस्थानों की गवर्निंग काउन्सिल के सदस्य भी हैं. भारत बायोटेक में उनके अलावा डॉक्टर सुमति के, उनके बेटे डॉक्टर रचेस एला महत्वपूर्ण पदों पर हैं. और उनके अलावा करीब 1500 कर्मचारी भारत बायोटेक में काम करते हैं.
























