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कोरोना की उत्पत्ति को लेकर अमेरिका में नया दावा, चीन गुस्सा क्यों हुआ?

चीन ने खुलासे के बाद गुस्सा क्यों दिखाया?

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चीन ने खुलासे के बाद गुस्सा क्यों दिखाया?

21वीं सदी का सबसे बड़ा रहस्य क्या है? गौर करिए तो ज़ेहन में बस एक सवाल याद आता है. कोरोना वायरस कहां से आया? क्या वो जानवरों से इंसानों तक पहुंचा या उसे लैब में बनाया गया था? क्या उसे जान-बूझकर लीक किया गया था या ये एक प्राकृतिक आपदा मात्र थी? भले ही दुनिया कोरोना महामारी बहुत पीछे छोड़ चुकी है, मगर उसकी उत्पत्ति को लेकर पैदा हुई जिज्ञासा अपनी जगह पर कायम है. दुनियाभर में कई एजेंसियां और लैब्स इस वायरस के असली सोर्स का पता लगाने में जुटे हैं. जो कुछ भी नया पता चल रहा है, वो नए सवाल पैदा करता है. और, हमें आशंकाओं से घेर देता है.

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मसलन, 26 फ़रवरी को अमेरिकी अख़बार वॉल स्ट्रीट जर्नल ने एक रिपोर्ट पब्लिश की. यूएस डिपार्टमेंट ऑफ़ एनर्जी के हवाले से. इसमें दावा किया गया कि लैब लीक वाली थ्योरी ज़्यादा पुष्ट है. क्या है पूरा मामला?

आज से तकरीबन 38 महीने पहले चीन के वुहान से एक क़यामत की शुरुआत हुई थी. जिसने पहले चीन और फिर पूरी दुनिया को महीनों तक सन्नाटे में रखा. अब तक 68 लाख लोगों की जान ले चुका कोरोना वायरस किसी न किसी रूप में अभी भी ज़िंदा है. कहीं एक कम-प्रभावी वायरस की शक्ल में, कहीं लॉकडाउन की वजह के तौर पर, कहीं किसी स्वास्थ्य समस्या के रूप में, तो कहीं अनंतकाल तक जीवित एक सवाल के आकार में. सवाल ये कि कोरोना वायरस आया कहां से?
शुरुआती दौर में वायरस की उत्पत्ति को लेकर दो थ्योरीज़ दी गईं.

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> पहली, ये वायरस वुहान के वेट मार्केट में जानवरों से होकर इंसानों तक पहुंचा.
> दूसरी थ्योरी के मुताबिक, ये वायरस वुहान की लैब से लीक हुआ या इसे जान-बूझकर लीक किया गया.

वुहान वेट मार्केट थ्योरी क्या थी?

वुहान, चीन के हुबेई प्रांत की राजधानी है. आबादी, लगभग एक करोड़ 11 लाख. इस शहर के केंद्र में हुनान सीफ़ूड मार्केट था. इस जगह पर मांस के लिए जानवरों की बिक्री होती थी. इस मार्केट में छिप-छिपाकर जंगली जानवरों को भी बेचा जाता था. इनमें कई ऐसे जानवर भी थे, जिन्हें आमतौर पर खाने के इस्तेमाल में नहीं लिया जाता है. कई जंगली और संरक्षित प्रजाति के भी जीवों की बिक्री होती थी. वुहान का ये मार्केट जून 2002 में शुरू हुआ था. नवंबर और दिसंबर 2019 के बीच में वुहान के मीट मार्केट से जुड़े लोग अचानक बीमार पड़ने लगे. सबमें एक जैसे लक्षण दिख रहे थे. सर्दी, खांसी और बुखार. जो कोई उनके संपर्क में आता, वे भी उसी बीमारी के शिकार हो जाते. जब चीन सरकार इसको काबू करने में डगमगाने लगी, तब उसने WHO को इसकी जानकारी दी. जब तक इसका दायरा समझ में आता, तब तक बहुत देर हो चुकी थी. यही वजह रही कि दुनिया समझ पाई, उस समय तक कोरोना वायरस अपने पैर पसार चुका था. इसके चलते चीन पर तीन बड़े आरोप लगे.

चीन में कोरोना की जांच करवाता एक व्यक्ति 

- पहला, चीन ने वायरस के बारे में जानकारी देने में देर की. इस आरोप में दम था, क्योंकि बाद में जो रिपोर्ट्स आईं, उनमें ये सामने आया कि, कोरोना के लक्षण वाले केस नवंबर 2019 से ही मौजूद थे. जबकि WHO को इसकी जानकारी दिसंबर 2019 के आख़िर में दी गई थी.

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- दूसरा आरोप ये लगा कि, चीन सच छिपा रहा है. उसने वायरस के बारे में आगाह करने वाले एक डॉक्टर ली वेनलियांग को क़ैद किया. बाद में ली की वायरस से मौत हो गई. इसके अलावा, चीन ने लगातार अपने सोशल मीडिया प्लेटफ़ॉर्म्स को सेंसर किया.

- नंबर तीन. कहा गया कि चीन सरकार को वुहान के वेट मार्केट में फैली अराजकता के बारे में पहले से पता था. मीडिया रपटों में इसके बारे में पहले भी आगाह किया गया था. लेकिन स्थानीय अधिकारियों ने उस तरफ़ कोई ध्यान नहीं दिया.

चीन का पूरा ज़ोर वेट मार्केट वाली थ्योरी पर ही रहा. उसने दावा किया कि शुरुआती केसेज़ का लिंक इसी वेट मार्केट से है. दरअसल, 2002 में सार्स नाम की एक बीमारी फैली थी. ये बीटा-कोरोना वायरस फैमिली से जुड़ा एक संक्रमण है. ये वायरस चमगादड़ों में पाए जाते हैं. पता चला कि चमगादड़ों से जंप करके ये वायरस सीविट नाम के एक जीव में पहुंचा. सीविट जंगली जीव है. इसे पकड़कर बिक्री के लिए लाया गया एक वेट मार्केट. वेट मार्केट, यानी ऐसा बाज़ार जहां उपभोग की मंशा से ज़िंदा जीव ग्राहक के सामने काटे जाते हों. 

यहां वायरस इंसानों के संपर्क में आया और महामारी फैल गई. जब संक्रमण फैलाने वाले वायरस की जांच हुई, तो ये भी बीटा-कोराना फैमिली के विषाणु निकले. ऐसे में सबसे तगड़ी आशंका यही बनी कि ये महामारी भी वाइल्डलाइफ़ से जंप करके इंसानों तक पहुंची है. हालांकि वेट मार्केट से शुरुआत होने की थिअरी में एक तगड़ा शुबहा भी था. क्या? बाद के दिनों में हुई जांच से पता चला कि कोविड के बिल्कुल शुरुआती केसेज़ में से कई का इस वेट मार्केट से कोई संबंध नहीं था.

पश्चिमी देशों, विशेष तौर पर अमेरिका ने इस थ्योरी को खारिज कर दिया. डोनाल्ड ट्रंप उस समय अमेरिका के राष्ट्रपति हुआ करते थे. उन्होंने कोरोना वायरस को ‘चाइनीज वायरस’ का नाम दिया था. ट्रंप इस बात पर अड़े रहे कि ये वायरस चीन की लैब से लीक हुआ. इस आरोप पर चीन ने ट्रंप की आलोचना भी की. कहा कि वैज्ञानिक मसले को राजनैतिक रंग दिया जा रहा है. ये किसी के लिए भी ठीक नहीं है.

चीन भले ही लैब लीक थ्योरी से टालमटोल कर रहा था. लेकिन बार-बार शक की सुई उसकी तरफ़ मुड़ जाती थी. पूरे विवाद में एक लैब का ज़िक्र बार-बार आ रहा था. वुहान इंस्टीट्यूट ऑफ़ वायरोलॉजी. ये बायो रिसर्च करने वाली एक प्रयोगशाला है. बायोसेफ्टी में सबसे टॉप मानक है- BSL 4. वुहान चीन की पहली BSL 4 प्रयोगशाला है. इसके भीतर ख़तरनाक संक्रमणों से जुड़े शोध होते हैं. रिसर्च के मकसद से यहां विषाणुओं को स्टोर करके भी रखा जाता है. एक दिलचस्प तथ्य और था. इंस्टीट्यूट और वेट मार्केट, दोनों एक-दूसरे के आसपास ही हैं.

कोरोनाकाल में ज़रूरत का सामान लेते कुछ लोग 

दिसंबर 2019 में जब कोरोना की शुरुआत हुई, उसके दो महीने बाद इंस्टीट्यूट की एक रिसर्चर शी हंगली ने नेचर पत्रिका में एक लेख लिखा. इसमें उन्होंने बताया कि ये नया वायरस 2013 में खदान से जमा किए गए वायरस सैंपल से बहुत मिलता है. 2013 में जमा किए गए वायरस का नाम था, RATG13. वुहान लैब ने इसकी जेनेटिक सिक्वेंसिंग की थी. इसका जेनेटिक स्ट्रक्चर कोविड-19 वायरस से बहुत मिलता है. कई एक्सपर्ट मानते हैं कि RATG13 कोविड-19 वायरस का पूर्वज हो सकता है. मई 2021 में ये जानकारी बाहर आने के बाद ख़ूब हंगामा हुआ. कहा गया कि लैब से वायरस के लीक होने का दावा मज़बूत हुआ है.

इससे पहले WHO की एक टीम जनवरी 2021 में वुहान के दौरे पर पहुंची थी. उन्हें वुहान इंस्टीट्यूट की लैब का दौरा करना था. वे लैब लीक थ्योरी की जांच करने आए थे. चीन ने पहले उन्हें दो हफ़्तों तक क़्वारंटीन में रखा. उसके बाद अपने लोगों की निगरानी में लैब का टूर कराया. फिर WHO ने जो रिपोर्ट दी, उसमें लैब लीक वाली थ्योरी को नकार दिया गया. WHO ने कहा कि लैब से वायरस लीक होने की आशंका में दम नहीं है. WHO की टीम में शामिल एक प्रफ़ेसर डोमिनिक ड्वायर ने मई 2021 में कहा कि लैब की भूमिका को पूरी तरह खारिज नहीं किया जा सकता. बोले कि ऐक्सिडेंटल लीकेज़ की बात सच हो सकती है.

फिर 27 मई 2021 को अमेरिका राष्ट्रपति जो बाइडन ने एक टारगेट सेट किया. उन्होंने खुफिया एजेंसियों को 90 दिनों के अंदर कोरोना का सोर्स पता करने का आदेश दिया. तीन महीने बाद जब रिपोर्ट पब्लिक की गई. इसमें कोई भी पुख्ता दावा नहीं किया जा सका. हालांकि, ये ज़रूर कहा गया कि लैब लीक थ्योरी को सिरे से खारिज नहीं किया जा सकता.
ये क्रम आने वाले कई महीनों तक चलता रहा. फिर जुलाई 2022 में दो रिसर्च पब्लिश हुईं. साइंस मैगज़ीन में. वैज्ञानिकों ने ढाई बरस की रिसर्च के बाद तीन बड़ी चीजें बताईं.

- नंबर एक. नोवेल कोरोना वायरस के दो वेरिएंट्स नवंबर 2019 से हुनान के वेट मार्केट में बेचे जाने वाले जानवरों में मौजूद थे. यहीं से ये इंसानों तक पहुंचा.

- नंबर दो. शुरुआती कई केसेज का लिंक सीधे तौर पर वेट मार्केट से नहीं था. सवाल उठा कि मार्केट वाली थ्योरी में झोल है. वैज्ञानिकों ने इसका जवाब भी दिया. उनका कहना था कि शुरुआती दौर में लोगों को वायरस के ख़तरे के बारे में पता नहीं था. इसी वजह से ये दूर तक फैला.

- नंबर तीन. वैज्ञानिकों ने वेट मार्केट में नालों और दूसरी चीजों का सैंपल लिया. जिस तरफ़ सबसे ज़्यादा पॉजिटिव केस मिले, उस तरफ़ जंगली रकून्स बेचे जाते थे. रकून एक मांसाहारी जानवर है. कोरोना संक्रमण की शुरुआत में इस जानवर का भी नाम आया था.

रिसर्च पब्लिश होने के बाद वैज्ञानिकों ने कहा कि अब लैब वाली थ्योरी को बंद कर देना चाहिए. हमने सारी संभावनाओं की स्टडी की है. लैब से कोरोना वायरस निकलने का दावा ग़लत है.

अब फिर से लैब लीक थ्योरी चर्चा में क्यों है?

दरअसल, वॉल स्ट्रीट जर्नल ने एक रिपोर्ट पब्लिश की है. यूएस एनर्जी डिपार्टमेंट की एक खुफिया रिपोर्ट के हवाले से. इसमें दावा किया गया है कि, नेचुरल ओरिजिन की तुलना में लैब लीक थ्योरी में ज़्यादा दम है. हालांकि, रिपोर्ट में ये भी लिखा है कि इसे फ़ुल एंड फ़ाइनल नहीं माना जाना चाहिए.

लैब लीक थ्योरी पर इतना ज़ोर क्यों दिया जाता है?

इसकी दो बड़ी वजहें हैं.

- पहली, पुराना इतिहास. जैसा कि हमने पहले भी बताया, वुहान इंस्टीट्यूट में संदिग्ध वायरसों पर रिसर्च बरसों पहले से चल रही थी. आशंका ये है कि इसी दौरान किसी रिसर्चर से ग़लती से वायरस बाहर पहुंच गया.

- दूसरी वजह चीन की कार्रवाई से जुड़ी थी. वायरस का पता चलते ही चीन ने वेट मार्केट को पूरी तरह बंद कर दिया. वहां रखे गए सभी जानवरों को मार दिया गया. और, पूरे मार्केट को सेनेटाइज कर दिया गया था. इसके कारण मौके पर मौजूद सभी सबूत नष्ट हो गए.

हालिया रिपोर्ट पर अमेरिका ने क्या कहा?

अमेरिका के राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार जैक सलिवन ने कहा कि हमें अभी पूरी जानकारी नहीं मिली है. इसलिए, दावे से कुछ कहना जल्दबाजी होगी.
सलिवन ने CNN को दिए इंटरव्यू में कहा कि राष्ट्रपति बाइडन ने फ़ाइनल रिपोर्ट मंगवाई है. अमेरिका में एनर्जी डिपार्टमेंट के अलावा FBI ही वो एजेंसी है, जो लैब लीक थ्योरी में भरोसा करती है. चार अमेरिकी एजेंसियों ने नेचुरल ओरिजिन वाली थ्योरी पर भरोसा जताया है.

इस मसले पर चीन ने क्या कहा?

चीन के विदेश मंत्रालय की प्रवक्ता माओ निंग ने कहा कि इसे ज़बरदस्ती राजनैतिक रंग दिया जा रहा है. बोली, 2021 की WHO की रिपोर्ट सबसे वैज्ञानिक और प्रभावी है.

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