आमिर खान अपने वक्त के राजकपूर हैं. उनकी फिल्म जब रिलीज़ होती है - क्या क्रिटिक और क्या ऑडियंस - सब लाइन में लग कर टिकिट लेते हैं. खेला सबको पसंद आता है. आमिर के शुरुआती दिनों से उनकी तस्वीरें लेते रहे लेखक और फोटोग्राफर प्रदीप चंद्रा ने उन पर एक किताब लिखी है - 'आमिर खानः एक्टर एक्टिविस्ट अचीवर.' इसका हिंदी अनुवाद प्रभात प्रकाशन ने 'आमिर खान' नाम से छापा है. प्रकाशकों की इजाज़त से हम किताब का अंश आपको पढ़वा रहे हैं.
* टेक टू : सार्थक सिनेमा और निर्देशन की शुरुआत *
‘‘फिल्मों की अपनी जिंदगी होती है.
वह बेलगाम घोड़े जैसी है.
अगर आप इसे काबू नहीं कर सके
तो यह अपने सवार को काबू कर लेती है.’’
‘‘जब मैं रीना से अलग हुआ तो मुझे महसूस हुआ कि मैं मानसिक व भावनात्मक तौर पर काम करने की स्थिति में नहीं हूं. इसलिए मैंने काम करना बंद कर दिया.''
वर्ष 2001 में आमिर ने अच्छे व बुरे दोनों तरह के दिन देखे. उनकी पहली प्रोडक्शन ‘लगान’ को शानदार सफलता मिली तो उसी वर्ष वह अपनी पहली पत्नी रीना से अलग हो गए. जहां ‘लगान’ और ‘दिल चाहता है’ की सफलता ने उन्हें अत्यधिक संबल देते हुए उनके खुद में विश्वास को पुनर्जीवित किया, वहीं उनके तलाक ने उन्हें तोड़कर रख दिया. वर्ष 2001 से 2005 के बीच आमिर ने एक भी फिल्म साइन नहीं की; यहां तक कि उन्होंने पटकथा सुनने से भी इनकार कर दिया था. वह उनके जीवन का सबसे दुःखद समय था.‘एम’ पत्रिका को दिए एक साक्षात्कार में उन्होंने बताया,

फोटोः प्रभात प्रकाशन
उन्हें इस बात का संतोष था कि उन्होंने पहले से कोई ऐसी फिल्म साइन नहीं कर रखी थी, जिसका शूट पूरा करने की बाध्यता हो. एक बार में एक ही प्रोजेक्ट पर ध्यान केंद्रित करने का संकल्प उनके हित में रहा. उन्हें इस बात की कोई परवाह नहीं थी कि लोग उन्हें याद रखते हैं या नहीं. जीवन के उस भाग में उनके सामने सिर्फ एक बात स्पष्ट थी कि फिलहाल वह काम करने की स्थिति में नहीं हैं. उस समय उनकी एकमात्र चिंता उनके बच्चे थे. उपर्युक्त साक्षात्कार में उन्होंने खुलासा किया,
‘‘मैं अपना पूरा समय उनके साथ गुजारना चाहता था...मैं सिर्फ उनका साथ चाहता था, उन्हें संभालना चाहता था, उन्हें आश्वस्त करना चाहता था. इसलिए मैं उनसे अलग नहीं हुआ; मैं पूरा समय घर पर ही रहा.’’
तो आखिर वह कौन सी वजह थी, जिसने आमिर को अपनी आरामगाह छोड़ फिल्मों में लौटने के लिए विवश कर दिया? फिल्म चुनने में निर्देशकों को पहली प्राथमिकता देने वाले आमिर से जब वर्ष 2003 में केतन मेहता ने एक बार फिर संपर्क किया तो वह मना नहीं कर सके. इस अभिनेता की फिल्में चुनने की दूसरी कसौटी - अच्छी पटकथा के पैमाने पर - आमिर को केतन की सुनाई कहानी पसंद आई. यह एक पीरियड फिल्म थी और जो फिल्म उन्होंने आमिर को उनके किशोर वय में ऑफर की थी, यह फिल्म उससे बहुत अलग थी. आमिर ने एक साक्षात्कार में बताया,
‘‘किसी कंपनी द्वारा एक देश पर शासन करने की धारणा मुझे बहुत आकर्षक लगी. ये घटनाएं भले ही वर्ष 1857 में घटी हों, लेकिन ये मुद्दे आज भी उतने ही प्रासंगिक हैं.’’
केतन मेहता (फोटोःविकिमीडिया कॉमन्स) स्वतंत्रता की अवधारणा के हवाले से किसी एक समाज का दूसरे समाज पर हावी हो उस पर कब्जा करने के अधिकार पर प्रश्न उठाना इस फिल्म का मूल विचार था. उनके केतन मेहता की फिल्म ‘मंगल पांडेः द राइजिंग’ को चुनने का चाहे जो भी कारण रहा हो, यह बात साफ थी कि यह अभिनेता अब अपनी मर्ज़ी का मालिक था. अब वह अपनी शर्तों पर अपनी इच्छा के मुताबिक चुनाव करने की स्थिति में थे.
फिल्म साइन करने के बाद उन्होंने खुद को पूरी तरह से भारत के पहले स्वतंत्रता सेनानी मंगल पांडे के चरित्र में ढाल लिया. यद्यपि मंगल पांडे के बारे में कोई रिकॉर्ड मौजूद नहीं था, इसलिए उस दौर के बारे में जितनी जानकारी मिल सकी, उसे एकत्रित किया गया, जिससे आमिर को कहानी के कालक्रम के बारे में समझने में मदद मिली. आमिर याद करते हुए कहते हैं,
‘‘इसमें बहुत कुछ नहीं था; लेकिन इससे मुझे उस कालखंड के बारे में प्रारंभिक जानकारी मिल गई. इस फिल्म में मंगल पांडे को स्वतंत्रता के प्रतीक के रूप में दरशाया गया, जो भारतीय समाज के उस तबके का प्रतिनिधित्व करता है, जिसने प्रश्न उठाए और गुलामी के खिलाफ खड़ा हुआ.’’
'मंगल पांडे' में आमिर खान का लुक (यूट्यूब स्क्रीनग्रैब) चूंकि आमिर ने बहुत लंबे समय के बाद कोई फिल्म साइन की थी, इसलिए इसकी घोषणा होते ही ट्रेड क्षेत्र में तहलका मच गया. इस फिल्म के बनने के दौरान आमिर ने एक सिपाही की जीवन-शैली अपना ली. उनके लंबे बाल, मूंछ व पगड़ी कैमरे के इतर भी उनके जीवन का हिस्सा बन गईं. प्रोजेक्ट मुश्किल होने के बावजूद आमिर इसके प्रति पूरे तीन वर्षों तक समर्पित रहे. उन दिनों उन्होंने उसी रूप में टाइटन घडि़यों के लिए एक विज्ञापन भी किया. जब तक फिल्म का अंतिम दृश्य नहीं फिल्मा लिया गया, वह उसी रूप में बने रहे. आमिर कहते हैं,
‘‘इस फिल्म से जुड़ना बहुत कठिन कार्य था. यह फिल्म आपसे बहुत कुछ चाहती थी; लेकिन अंततः यह बहुत संतोषप्रद अनुभव रहा.’’
इस फिल्म की घोषणा के साथ ही दर्शक इसके रिलीज की प्रतीक्षा करने लगे. उनके प्रशंसक यह जानने को उत्सुक थे कि उनका पसंदीदा एंटरटेनर उनके लिए इस बार क्या लाया है! पिछले वर्ष इसी समय पर शाहरुख खान की फिल्म ‘वीर ज़ारा’ रिलीज हुई थी. यश राज फिल्म्स इन दोनों ही फिल्मों के वितरक थे. इस बात का खुलासा काफी बाद में किया गया कि भले ही ‘मंगल पांडे’ सफल फिल्मों की श्रेणी में नहीं आती, लेकिन फिर भी इसका शुरुआती बॉक्स ऑफिस कलेक्शन ‘वीर जारा’ से अधिक रहा. बावजूद इसके, आमिर इस वित्तीय व्यवहार से अप्रभावित रहे और उन्हें आज भी इस फिल्म पर गर्व है.
'मंगल पांडे' में आमिर की फांसी का दृश्य (यूट्यूब स्क्रीनग्रैब) कुछ वर्ष बाद एक टेलीविजन शो ‘आपकी अदालत’ में आमिर ने यह खुलासा किया कि ‘मंगल पांडे’ ने उनकी कई अन्य सफल फिल्मों से दो या तीन गुना अधिक कमाई की थी. इसी शो में आमिर ने इस फिल्म के असफल होने के कारणों पर भी बात की. उनके अनुसार, इन कारणों में एक इस फिल्म का दर्शकों के साथ भावनात्मक संबंध बनाने में असफल रहना था. आवेशी देशभक्त भारतीय इस फिल्म में उन्हें वर्षों तक दबाए रखनेवाली ब्रिटिश सत्ता का सर्वनाश देखना चाहते थे. लेकिन ऐतिहासिक पक्ष को ध्यान में रखते हुए आमिर इस फिल्म के अंत को बदल नहीं सकते थे, इसलिए उनके किरदार को फांसी हुई और दर्शकों ने शायद इस बात को पसंद नहीं किया.
प्रदीप चंद्र को जानिएःप्रदीप चंद्र फोटोग्राफर होने के साथ ही लेखक और चित्रकार भी हैं. ये बतौर फोटो पत्रकार ‘दि इलस्ट्रेटेड वीकली ऑफ इंडिया’, ‘दि इंडियन एक्सप्रेस’, ‘दि वीक’ और ‘द संडे ऑब्जर्वर’ जैसे कई समाचार-पत्रों से जुड़े रहे. इनके कुछ उल्लेखनीय कार्यों में कश्मीरी शरणार्थियों की दुर्दशा पर वृत्तचित्र ‘दि एलियन इनसाइडर्स’; राजस्थान की हवेलियों पर ‘हवेली ड्रीम्स’; ताजमहल होटल को श्रद्धांजलि तथा कमाठीपुरा के बच्चों पर एक प्रदर्शनी शामिल हैं. इन्होंने भारत व विदेश में आयोजित कई आर्ट कैंप व ग्रुप शो में भी हिस्सा लिया है. इससे पहले प्रदीप चंद्र ने एम.एफ. हुसैन व अमिताभ बच्चन पर कॉफी-टेबल पुस्तकें लिखी हैं. ये मुंबई में रहते हैं और फिलहाल इस शहर पर एक पुस्तक लिख रहे हैं.
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