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'बादशाहो' की असल कहानीः ख़जाने के लिए इंदिरा गांधी ने गायत्री देवी का किला खुदवा दिया था!

क्या इसके लिए सेना भेजी गई थी और क्या 60 ट्रक सोने के गांधी परिवार ने स्विट्जरलैंड भेजे थे?

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महारानी गायत्री देवी और प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी; और फिल्म बादशाहो में सोने का वो ट्रक जिसे अजय देवगन एंड पार्टी लूटती हैं.
" साल 1975 आपातकाल 96 घंटे 600 किलोमीटर 1 सैन्य ट्रक करोड़ों का सोना और 6 खुराफात. "
डायरेक्टर मिलन लुथरिया ने इससे पहले 'द डर्टी पिक्चर' और 'वंस अपॉन अ टाइम इन मुंबई' बनाई हैं लेकिन ऊपर जो विवरण उन्होंने अपनी अगली फिल्म 'बादशाहो' का दिया है वो बहुत ललचाने वाला है. कहानी में बहुत गुंजाइश है क्योंकि ये सच्ची घटना से प्रेरित है. हालांकि मेकर्स कभी नहीं कहेंगे कि सच्ची घटना से इस कहानी को लिया है क्योंकि कोर्ट के चक्कर काटने पड़ेंगे. फिक्शन कह देने से आदमी असल घटना के ड्रामा और पोलिटिकल एंगल्स को उठाने की मेहनत से बच जाता है.
तो 1 सितंबर को रिलीज होने जा रही इसी फिल्म का पहला ट्रेलर आ चुका है. उस पर बात करेंगे.
ये भी जानेंगे कि जिस राजघराने के महल में गुप्त खजाना खोदने के लिए "इंदिरा गांधी सरकार ने फौज भेजी थी" उसकी नकली और असली कहानियां क्या-क्या हैं.
'बादशाहो' में विद्युत जमवाल, इलियाना डिक्रूज, अजय देवगन, इमरान हाशमी, ईशा गुप्ता और संजय मिश्रा.
'बादशाहो' में विद्युत जमवाल, इलियाना डिक्रूज, अजय देवगन, इमरान हाशमी, ईशा गुप्ता और संजय मिश्रा.

टीज़र में जो दो चीजें चुभती हैं.
चुभन #1. फिल्म का नाम है 'बादशाहो'. कहानी जयपुर की. मान लो फिल्म में कहानी वहां न भी स्थित रखी गई हो, लेकिन मेन लोकेशन तो बीकानेर और जोधपुर ही दिख रही हैं. ऐसे में ये टाइटल कहानी के स्थान को represent नहीं करता. 'बादशाहो' शब्द राजस्थान में बोला नहीं जाता, वहां इसका कोई अर्थ भी नहीं बनता. पंजाबी में जरूर हमने ये सुना है. फिल्म में ये तभी जस्टिफाई हो सकता है, जब या तो अजय देगवन के कैरेक्टर का नाम 'बादशाहो' हो या फिर किसी मिशन का.
चुभन #2. कहानी मारवाड़ की लेकिन लीड एक्टर अजय देवगन और इमरान हाशमी हरियाणवी जैसी कोई भाषा बोलते हैं. उनका उच्चारण बॉलीवुड में राजस्थानी/हरियाणवी भाषा के उसी stereotyped रूप को कायम रखता है जो हमेशा रहा है. कोई नया शब्द नहीं. कोई स्थानीय शब्द नहीं. अभिनेताओं ने अपने उच्चारण को लेकर रिसर्च करने में ज़रा भी पैशन रखा होगा, दिखता नहीं. अजय "मौक्का था" ऐसे उच्चारते हैं जैसे 'दंगल' में हरियाणवी पहलवान महावीर सिंह फोगाट बोलता है "मेन्नत से." यहां वे "मौको हो" भी कर देते तो बहुत था. इमरान हाशमी बोलते हैं, "सरम और मैं एक सेंटेंस में नी आते मेड़म." वे इसे "सरम और म्हे एक सेंटेंस में कोनी आवां मेडम" कर देते तो बहुत था.

फिल्म में कहानी कुछ यूं है

सरकार ने 1975 में देश में आपातकाल घोषित कर दिया है. इसी दौरान दिल्ली के आदेश पर राजस्थान की एक रियासत में सेना भेजी जाती है. उनका काम है महल में और दूसरी रॉयल प्रॉपर्टीज़ की पड़ताल करके छुपाकर रखे गए सोने को खोजा जाए. वो ढूंढ़ निकालते हैं. लेकिन रियासत की महारानी गीतांजलि अपने एक परिचित/प्रेमी भवानी (अजय देवगन) को कहती है कि सोने का ट्रक दिल्ली नहीं पहुंचना चाहिए और वो वादा करता है कि ऐसा ही होगा. वो कुछ दूसरे तिकड़मी साथी डलिया, संजना और टिकला (इमरान हाशमी, ईशा गुप्ता, संजय मिश्रा?) ढूंढ़ता है और लौटते हुए ट्रक लूटने की योजना बनाता है. लेकिन इसमें उसकी रुकावट है एक आदमी सेहर (विदयुत जमवाल).

लेकिन असल में हुआ क्या था?
किंवदंती #1. प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने जयपुर के पास आमेर में रिसायत में फौज भेजी. उन्हें आदेश था कि सोने के सिक्के, चांदी का माल और हीरे-जवाहरात जो रॉयल फैमिली ने छुपाकर रखे हुए हैं उनको खोदकर वापस लाना है. तब जयपुर की महारानी गायत्री देवी को जेल में डाल दिया गया था. तीन महीने में उनकी कई प्रॉपर्टी खोद दी गईं. लेकिन वहां उनको कुछ नहीं मिला. तीन महीने बाद इंदिरा गांधी ने इस मिशन की स्वीकारोक्ति की और कहा कि कोई खजाना नहीं मिला. हालांकि जयपुर के कुछ गाइड सैलानियों को ये कथा सुनाते हैं कि कई ट्रक सोना मिला था.
आमेर का किला. (फोटोः पिंटरेस्ट)
आमेर का किला. (फोटोः पिंटरेस्ट)

किंवदंती #2. ये माना जाता रहा कि अकबर के दरबार में ताकतवर सेनापति और रक्षामंत्री रहे राजा मानसिंह बादशाह के आदेश पर अफगानिस्तान गए थे. वहां उन्हें जोरदार जीत मिली. लेकिन साथ ही बड़ा खजाना भी हाथ लगा जो पूरा उन्होंने अकबर को लौटाया नहीं था और उसे जयगढ़ के किले में कहीं गाड़कर रखा गया था. बाद में जयपुर राजघराने की पीढ़ियां आगे बढ़ती गई और खजाना वहीं रहा. ब्रिटिश काल में भी इसकी चर्चा थी लेकिन कभी इसे ढूंढ़ने की कोशिश नहीं हुई. लेकिन फिर इंदिरा गांधी के राज में जब महारानी गायत्री देवी उनकी आंख की किरकिरी बन गईं तब इंदिरा ने सेना भेजकर खुदाई करवाई. सेना अपने भारी-भरकम ट्रक और असला लेकर पहुंची थी. इतना कि तीन दिन तक जयपुर-दिल्ली हाइवे को बंद कर दिया गया. बाद में जब वो ट्रक लौटे तो किसी को नहीं पता था कि वे खाली थे या भरे हुए और आज भी राज़ कायम है.
किंवदंती #3. इंदिरा के बेटे संजय गांधी ने जयपुर के पास आमेर में सात दिन का कर्फ्यू लगा दिया था. आदेश था कि कोई भी सड़कों पर दिखा तो उसे गोली मार दी जाए. तब कोई हिंदु-मुस्लिम दंगे भी नहीं हो रहे थे लेकिन केंद्र सरकार ने पूर्वाग्रह के नाते ऐसा किया. किसी ने संजय को कहा कि आमेर में राजा मान सिंह का विशाल खजाना गड़ा है तो उसने इमरजेंसी की आड़ में सेना भेजी. खुदाई में 60 ट्रक सोना, चांदी और जवाहरात मिले. सबकी नजरों से बचाकर इसे जयपुर से दिल्ली ले जाया गया. वहां नई दिल्ली के इंटरनेशनल एयरपोर्ट पर इंदिरा गांधी ने दो विशाल प्लेन तैयार रखे हुए थे. वहां से संजय और इंदिरा ने उस खजाने को स्विट्जरलैंड भिजवा दिया.
इमरजेंसी के दौरान इंदिरा गांधी, अंबिका सोनी और संजय गांधी. (फोटोः फेसबुक)
इमरजेंसी के दौरान इंदिरा गांधी, अंबिका सोनी और संजय गांधी. (फोटोः फेसबुक)

किंवदंती #4. अकबर के शीर्ष सेनापतियों में एक आमेर के राजा मान सिंह एक बार बंगाल (अब बांग्लादेश) के शहर गौड़ गए. तब वहां के काली माता के प्रसिद्ध मंदिर जेसौर में दर्शन करने पहुंचे. वहां जेसौरेश्वरी काली माता की मूर्ति देखकर बहुत प्रभावित हुए और जाते हुए अपने साथ माता की मूर्ति को भी ले गए और आमेर में अपने पैलेस में मंदिर में स्थापित करवा दिया. मंदिर के पुजारी को भी वे अपने साथ ले गए जिसके पुरखे आज भी आमेर मंदिर में पूजा करते हैं. वहीं आमेर के किले के प्रांगण में, तहखाने में, जमीन में और दीवारों में बहुत विशाल मात्रा में सोना, चांदी और हीरे-जवाहरात छुपाकर रखे गए थे ताकि आपात परिस्थिति में जनता के काम आ सकें. इस खजाने को अभिशप्त किया हुआ था कि अगर किसी और कारण से इसका इस्तेमाल हुआ तो इसे रखने वाले का खानदान खत्म हो जाएगा. जब संजय गांधी ने आपातकाल के बहाने सारा खजाना ट्रकों में भरकर वहां से निकालकर अपने कब्जे में ले लिया तो उन्हें नहीं पता था कि उसमें उन्हीं काली माता के गहने भी थे. इसी के साथ गांधी परिवार की बर्बादी शुरू हो गई. पहले संजय प्लेन क्रैश में मारे गए, फिर इंदिरा गांधी की हत्या हुई और उसके बाद राजीव गांधी की.

ख़ज़ाना ढूंढ़ने की असली पोलिटिकल कहानी ये थी

महारानी गायत्री देवी 1919-2009
महारानी गायत्री देवी 1919-2009

# खुद महारानी गायत्री देवी ने सच बताया चक्रवर्ती राजगोपालाचारी की स्वतंत्र पार्टी से जयपुर की पूर्व-महारानी गायत्री देवी ने 1962 में लोकसभा का चुनाव लड़ा और कॉन्ग्रेस के कैंडिडेट को हरा दिया. इसे तब दुनिया में सबसे अधिक मतों के अंतर से जीता गया मुकाबला माना गया. इसके बाद 1967 और 1971 में भी गायत्री देवी चुनाव जीतती गईं. वे हमेशा से इंदिरा गांधी की मुखर आलोचक थीं. इसी वजह से वे उनकी नजरों में भी चढ़ी हुई थीं. इंदिरा ने फिर उनके साथ जो किया वो आपातकाल से जरा पहले और लागू होने के बाद देखने को मिला. गायत्री देवी की प्रॉपर्टीज पर जो छापेमारी हुई और बाद में उन्हें जेल में डाला गया. इसकी शुरुआत उनके मुताबिक बांग्लादेश युद्ध (1971-72) के बाद से हो गई थी.
प्रस्तावना ये थी इस मिशन की गायत्री देवी ने बताया था, "बांग्लादेश युद्ध इंदिरा गांधी के लिए सबसे चमकीली घड़ी थी लेकिन भारत में उनकी ये खुशी जल्द ही फीकी पड़ गई. युद्ध की जो कीमत देनी पड़ी थी वो महसूस की जाने लगी. मानसून फेल हो गए थे. बैंक, बीमा, कोयले की खदानों और गेहूं के कारोबार का राष्ट्रीयकरण कर दिया गया. खाने के सामान की कीमतें आसमान छू रही थीं. लोगों के बीच असंतोष भी आसमान छू रहा था. फिर 1974 में जयप्रकाश नारायण ने बिहार में बड़ा आंदोलन शुरू कर दिया था. सांसद और रेलवे वर्कर्स यूनियन के नेता रह चुके जॉर्ज फर्नांडिस ने तीन हफ्ते तक रेल की हड़ताल कर दी थी."
जॉर्ज फर्नांडिस और जयप्रकाश नारायण. (फोटोः इंडिया टुडे/सोशल मीडिया)
जॉर्ज फर्नांडिस और जयप्रकाश नारायण. (फोटोः इंडिया टुडे/सोशल मीडिया)

"देश का भरोसा इंदिरा के नेतृत्व पर खत्म हो चुका था. जितने जनआंदोलन हो रहे थे, इंदिरा उनको नहीं देख पाईं और उन्होंने सोचा लोग बोल रहे हैं 'इंदिरा लाओ.' तो उन्होंने जनआंदोलनों से लोगों का ध्यान भटकाने के लिए कारोबारी घरानों और विपक्ष के नेताओं के खिलाफ छापेमारी शुरू करवा दी. लेकिन इसका परिणाम उल्टा ही हुआ और उनके खिलाफ लोगों का गुस्सा और बढ़ा. वामपंथियों को छोड़कर सारा विपक्ष एकजुट हो गया. इन छापेमारियों में ग्वालियर और जयपुर के पूर्व-राजघरानों के प्रति विशेष दुराग्रह रखा गया क्योंकि ग्वालियर की राजमाता और मैं संसद में विपक्ष के सदस्य थे."
वो न भूलने वाला दिन कैसा था अजय देवगन स्टारर 'बादशाहो' की कहानी का रेफरेंस आपातकाल के बाद शुरू होता है. बाकी किंवदंतियों में भी ऐसा ही है. लेकिन असल में ये कहानी आपातकाल से पहले ही शुरू हो गई थी और शायद उससे पहले खत्म भी. ये 11 फरवरी 1975 का दिन था, इमरजेंसी से चार महीने पहले. वो दिन जिसे गायत्री देवी ताउम्र नहीं भूलीं. उन्होंने इसे याद करते हुए लिखा था, "फरवरी राजस्थान में एक ब्यूटीफुल महीना होता है. आसमान नीला होता है, फूल खिलना शुरू होते हैं, पंछी गाते हैं और दिन ठंडे व एकदम साफ होते हैं. इस खास दिन मैं बहुत खुश महसूस कर रही थी जितना जय (महाराजा सवाई मान सिंह द्वितीय) को खोने के बाद मैंने पहले नहीं किया था. दिन व्यस्तताओं भरा होने वाला था और मैं प्लानिंग कर रही थी. टैरेस पर योग करने के बाद मैं ब्रेकफास्ट करने गई. नाश्ता कर रही थी कि मेड ने आकर बताया कुछ अजनबी मुझसे मिलना चाहते हैं. मैंने उनको अंदर बुलाने के लिए कहा. वे आए और बोले, 'हम इनकम टैक्स ऑफिसर हैं. हम आपके प्रांगण की छानबीन करने आए है.' मैंने कहा, 'करो फिर. लेकिन मेरे अपॉयंटमेंट्स हैं और मुझे अभी निकलना है.' तो उन्होंने कहा कि कोई भी यहां से बाहर नहीं जा सकता."
इंदिरा गांधी इमरजेंसी के दौरान. (फोटोः इंडिया टुडे)
इंदिरा गांधी इमरजेंसी के दौरान. (फोटोः इंडिया टुडे)

जयगढ़ फोर्ट में हफ्तों चली ये खोज मोती डूंगरी में उनकी प्रॉपर्टी पर छानबीन शुरू हो गई. उसी समय उनके हरेक घर, हर ऑफिस, सिटी पैलेस, म्यूजियम, रामबाग़ पैलेस होटल, उनके बच्चों के घरों और दिल्ली में सांसद आवास पर भी छापे मारे गए थे. दो दिन बाद जयपुर में जयगढ़ फोर्ट पर भी छापा मारा गया. जब इनकम टैक्स अधिकारी फोर्ट के दरवाजे पर पहुंचे तो उसके प्रहरी मीना ट्राइबल के लोग थे. उन्होंने इनकम टैक्स अधिकारियों से कहा कि वे किले में उनकी लाश पर से गुजर कर ही घुस सकते हैं. गायत्री देवी ने याद किया कि जब से महाराजा जय सिंह ने इस किले के बनाया था तब से महाराजाओं और उनके अधिकारियों के अलावा कोई भी उसमें प्रवेश नहीं कर पाया था. लेकिन उन्हें प्रवेश दिया गया. ये छानबीन कई हफ्तों तक चलती रही. टीवी, रेडियो और अखबारों में रोज़ खबरें आ रही थीं.
जब अधिकारियों की आंखें फटी रह गईं जयपुर में राजपरिवार के आवास सिटी पैलेस में कपाटद्वार राजकोष बना था जिसकी छत की मरम्मत की जरूरत थी. इससे कई साल पहले महाराज सवाई मान सिंह द्वितीय ने इसमें मौजूद सब कीमती चीजों को जयपुर में ही मोती डूंगरी के खास बनाए स्ट्रॉन्ग रूप में रखवा दिया. गायत्री देवी के मुताबिक वे इन चीजों को अलग-अलग केसेज़ में रखकर सिटी पैलेस में प्रदर्शन के लिए रखवाना चाहते थे ताकि वहां आने वाले सैलानी और लोग इस खजाने को देख सकें. जब इनकम टैक्स अधिकारियों ने इस खज़ाने को देखा तो उनकी आंखें चौंधिया गईं.
मोती डूंगरी फोर्ट और उसमें दिखता मंदिर.
मोती डूंगरी फोर्ट और उसमें दिखता मंदिर.

 फिर मिला सोने के सिक्कों का विशाल भंडार

मोती डूंगरी के प्रांगण में एक दुपहरी जब गायत्री देवी सो रही थीं तो इनकम टैक्स अधिकारी नीचे बने पत्थर के आंगन से साथ मशक्कत कर रहे थे. गायत्री देवी ने इसे लेकर बताया था, "छापेमारी दल का जो इनचार्ज अधिकारी था वो उत्साह से भर गया जब उसे विशाल मात्रा में सोने के सिक्के मिले. इन सिक्कों को जय (मान सिंह द्वितीय) ही नाहरगढ़ के किले से मोती डूंगरी लाए थे जो भारतीय संघ में जयपुर रियासत के मिलने से पहले नाहरगढ़ किले के खजाने में रखे हुए थे. सौभाग्य की बात थी कि इस सोने का जिक्र जयपुर रियासत के आखिरी बजट में किया हुआ था तो एक-एक सिक्के का हिसाब था. लेकिन इसके बाद भी ये उत्पीड़न जारी रहा."
ज़ाहिर है ये सिक्के ट्रकों में भरकर कहीं नहीं ले जाए गए थे और पूर्व-रियासत के पास इनका हिसाब था. इसके कुछ महीने बाद जून 1975 में प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने इमरजेंसी घोषित करवा दी तो उसके बाद अपने विरोधियों को जेल भेजना शुरू किया. पूर्व-महारानी गायत्री देवी को भी तिहाड़ जेल डाल दिया गया. वहां पांच महीने उन्हें रहना पड़ा. उनके सबसे बड़े बेटे ब्रिगेडियर भवानी सिंह (सौतेले) को भी उनके साथ जेल कर दी गई.
इसके बाद अगस्त 1975 में रूस के वीकली न्यूजपेपर सेंट पीटर्सबर्ग टाइम्स ने जब गायत्री देवी को जेल करने की खबर पब्लिश की तो उसमें खजाने की खुदाई और उसमें मिले सामान की जानकारी भी दी गई थी. इसके मुताबिक, "बीती फरवरी सरकार ने कहा कि उसके जांचकर्ताओं को 1.70 करोड़ डॉलर कीमत की करंसी, डायमंड, एमेरल्ड और कीमती धातुएं मिलीं जो महारानी और उनके परिवार की थीं. इनमें सोने के सिक्कों और बुलियन का ज़ख़ीरा भी मिला जो एक पैलेस की जमीन के नीचे एक गुप्त तहखाने में छुपाया हुआ था जिसकी कीमत करीब 50 लाख डॉलर है."
सेंट पीटर्सबर्ग टाइम्स की वो रिपोर्ट जिसमें ये सब है.
सेंट पीटर्सबर्ग टाइम्स की वो रिपोर्ट जिसमें ये सब है.

'बादशाहो' का ट्रेलर ः

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