पहला सवाल
क्या तुम बता सकते हो कि तुम राष्ट्रपति क्यों बनना चाहते हो? कैंडिडेट का जवाब: मेरा मेरे मकान मालिक से झगड़ा चल रहा है. मैं इससे तंग आ गया हूं. अब मैं राष्ट्रपति भवन में रहना चाहता हूं. ये जवाब सुन बोर्ड के सदस्यों के चेहरों पर हंसी तैर गई. एक वरिष्ठ सदस्य आगे की तरफ झुके और फिर बोले, हम चाहते हैं कि नया राष्ट्रपति दुनिया की समस्याओं के प्रति जागरूक हो. क्या आप बता सकते हैं कि इस वक्त देश के सामने सबसे बड़ा खतरा क्या है. कैंडिडेट बोला: हां हां क्यों नहीं. इस वक्त भारत के सामने मुख्य खतरा जयचंद और मीर जाफर सरीखे लोगों का है. बोर्ड के सदस्यों ने सहमति में सर झुकाया. फिर एक मेंबर ने पूछा आप किस तरह की किताबें पढ़ना पसंद करते हैं? एप्लिकेंट का जवाब: मैं तो केवल अपने लिए लिखी गई स्पीच पढ़ता हूं. ये जवाब सुन एक दूसरा मेंबर बोल पड़ा, क्या आपने भारत का संविधान पढ़ा है? कैंडिडेट ने लगभग चिल्लाकर जवाब दिया. कभी नहीं ये जवाब सुन बोर्ड के चेयरमैन बहुत खुश हुए. अनायास उनके मुंह से गुड का रिमार्क निकल गया. फिर उन्होंने सवाल पूछा. लिखने की आदत का क्या. क्या आप कभी खत लिखते हैं. प्रत्याशी का जवाब था: कभी नहीं. मैं तो बस लिखने के नाम पर अपने दस्तखत करता हूं. ये सुन एक युवा बोर्ड मेंबर ने राहत की सांस ली. मगर वो कैंडिडेट को यूं ही छोड़ने के मूड में नहीं थे. फौरन पूछ बैठे. तुम दस्तखत करने में कितने कुशल हो. एप्लिकेंट बोला: बहुत ज्यादा कुशल. आप ट्राई कर लीजिए. मैं आंखों पर पट्टी बांधकर भी दस्तखत कर सकता हूं. चेयरमैन ने पूछा, पोस्टल बिल के बारे में आपकी क्या राय है? अब कैंडिडेट सकुचाने लगा. फिर बोला: वैसे तो मैं इस तरह के सवालों की परवाह नहीं करता. मगर सच कहूं तो मैं इससे संतुष्ट नहीं हूं. ये जवाब सुन कमोबेश सभी की त्योरियां चढ़ गईं, कई के मुंह से एक साथ निकला क्यों नहीं? जवाब आया: बिल में सिर्फ खत क्यों फोन भी शामिल करना चाहिए था निगरानी के वास्ते. मैं चाहता हूं कि सरकार किसी का भी फोन टेप कर सके. किसी के भी घर की जासूसी कर सके. बोर्ड के सदस्य अचरज से भर गए. चेयरमैन ने तारीफ के स्वर में कहा. ये तो बहुत अच्छा सुझाव है. उन्होंने इंटरव्यू को खत्म करने की दिशा में बढ़ते हुए यूं ही एक सवाल उछाल दिया. अच्छा बताओ, तुम्हारा सबसे प्रिय शहर कौन सा है विदेश में? एप्लिकेंट ने भी उतनी ही लापरवाही से जवाब दिया, मैं पेरिस घूमना चाहूंगा. आहा, चेयरमैन चिहुंक उठे. तो तुम्हें घूमना पसंद है. एक बार तो लगा कि तुमने हमें मूर्ख बना ही दिया था. हमें लग रहा था कि तुम राष्ट्रपति के लिए सबसे सही उम्मीदवार हो. एप्लिकेंट अब नर्वस था. अपनी गलती मानते हुए बोला, ये आखिरी जवाब बहुत ज्यादा गलत हो गया न. वो अपनी कुर्सी से उठा चलने को. फिर थकान भरे स्वर में उसने भी बोर्ड से एक सवाल पूछ लिया. आपको राष्ट्रपति की जरूरत ही क्यों है? चेयरमैन ने गुस्से में जवाब दिया. स्वाभाविक सी बात है. हम देश के संविधान का सम्मान करते हैं. और क्या.15 जून, 1987 के इंडिया टुडे के अंक में छपा राजेंदर पुरी का व्यंग्य.





















