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धर्म के हिसाब से आबादी का डेटा क्यों मांग रही मोदी सरकार? रिकॉर्ड जुटाने में राज्यों के छूट रहे पसीने

केंद्र की High Level Committee on Demographic Changes ने राज्यों से पिछले 15 साल का धर्मवार डेटा मांगा है. जानिए किन-किन क्षेत्रों से जानकारी मांगी गई है, राज्यों के पास डेटा क्यों नहीं है और इस पूरी कवायद की राजनीतिक पृष्ठभूमि क्या है.

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केंद्र ने राज्यों को भेजी 35 सवालों की लिस्ट

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  • केंद्र सरकार ने डेमोग्राफिक बदलावों का अध्ययन करने के लिए हाई लेवल कमेटी (HLCDC) बनाई है, जिसने राज्यों से 35 सवालों वाला विस्तृत धर्मवार डेटा मांगा है जिसमें पिछले 15 साल के आंकड़े शामिल हैं।
  • कमेटी द्वारा मांगे गए धर्मवार डेटा में पिछले 15 वर्षों के जनसंख्या, वाहन रजिस्ट्रेशन, राशन कार्ड, वोटर आईडी, धार्मिक स्थलों की GIS मैपिंग जैसे विभिन्न विभागों के रिकॉर्ड शामिल हैं, जिन्हें सभी विभागों में दर्ज रखना आवश्यक नहीं है।
  • कमेटी का एक साल में रिपोर्ट देना है जिसमें अवैध इमिग्रेशन और डेमोग्राफिक परिवर्तन के आधार पर नीति, प्रशासनिक और कानूनी सुझाव शामिल होंगे, जिसके लिए अब राज्यों से विस्तृत डेटा संग्रह किया जा रहा है।

केंद्र सरकार ने देश में बदलते डेमोग्राफिक पैटर्न को समझने के लिए जो हाई लेवल कमेटी बनाई है, अब उसकी कवायद एक बड़े डेटा विवाद में बदलती दिख रही है. सवाल सिर्फ आबादी के बदलते अनुपात का नहीं है, बल्कि ये भी है कि सरकार राज्यों से आखिर किन-किन चीजों का धर्मवार हिसाब मांग रही है और राज्यों के पास उसमें से कितना डेटा पहले से मौजूद है.

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35 सवालों वाला पूरा मामला क्या है?

28 सितंबर को द हिंदू ने अधिकारियों के हवाले से बताया कि High Level Committee on Demographic Changes यानी HLCDC ने राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों से 35 सवालों वाला विस्तृत प्रश्नावली भेजी है. इसमें पिछले 15 साल का धर्मवार डेटा मांगा गया है. जन्म पंजीकरण, स्कूलों में दाखिला, वाहन रजिस्ट्रेशन, प्रॉपर्टी ट्रांजैक्शन, राशन कार्ड, वोटर आईडी और आधार में असामान्य बढ़ोतरी जैसे आंकड़े इसमें शामिल हैं. धार्मिक स्थलों की जिला स्तर पर जानकारी और उनकी GIS मैपिंग से जुड़ी जानकारी भी मांगी गई है.

कमेटी ने हिंदू, मुस्लिम, सिख, ईसाई, बौद्ध और पारसी समुदायों के हिसाब से डेटा मांगा है. इसके अलावा अनुसूचित जनजातियों में धार्मिक बदलाव, कथित अवैध प्रवासियों की पहचान, हिरासत और डिपोर्टेशन, फर्जी दस्तावेजों तथा मानव तस्करी, संगठित अपराध और नारकोटिक्स से जुड़े मामलों की जानकारी भी प्रश्नावली का हिस्सा है.

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राज्यों के सामने सबसे बड़ी दिक्कत क्या है?

मामला यहीं पेचीदा हो जाता है. अधिकारियों के मुताबिक जन्म पंजीकरण और पकड़े या डिपोर्ट किए गए undocumented migrants जैसे कुछ मामलों को छोड़ दें, तो ज्यादातर विभाग धर्म के हिसाब से रिकॉर्ड रखते ही नहीं हैं. ऐसे में 15 साल पुराना धर्मवार डेटा तैयार करना आसान नहीं है.

यहां संविधान का हवाला भी दिया जा रहा है, लेकिन तस्वीर थोड़ी ज्यादा जटिल है. अनुच्छेद 15 राज्य को धर्म के आधार पर भेदभाव करने से रोकता है, जबकि भारत की जनगणना में धर्मवार आबादी का आधिकारिक डेटा प्रकाशित होता रहा है. इसलिए असली सवाल डेटा रखने की संवैधानिक मनाही से ज्यादा ये है कि अलग-अलग सरकारी विभागों में ऐसा डेटा किस आधार पर और किस उद्देश्य से दर्ज किया जाता है.

कमेटी आखिर करना क्या चाहती है?

HLCDC का गठन 26 मई 2026 को गृह मंत्रालय ने किया था. इसकी अध्यक्षता रिटायर्ड सुप्रीम कोर्ट जज जस्टिस प्रकाश प्रभाकर नवलेकर कर रहे हैं. कमेटी को अवैध इमिग्रेशन और दूसरे असामान्य कारणों से होने वाले डेमोग्राफिक बदलावों का अध्ययन करके नीति, प्रशासनिक और कानूनी उपाय सुझाने हैं. उसे एक साल में रिपोर्ट देनी है.

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1 जुलाई को कमेटी ने गृह मंत्री अमित शाह को बताया था कि राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों से जानकारी जुटाने के लिए प्रश्नावली तैयार कर ली गई है और ग्राउंड लेवल अध्ययन के लिए दौरे किए जाएंगे. सितंबर के आखिर तक कमेटी जम्मू क्षेत्र का दौरा कर चुकी थी और महाराष्ट्र जाने की तैयारी में थी.

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BJP और धर्मवार डेटा की पुरानी बहस

इस मुद्दे की राजनीतिक पृष्ठभूमि भी दिलचस्प है. 2006 में BJP ने सच्चर कमेटी के काम और खासकर मुस्लिम समुदाय से जुड़े कुछ आंकड़े जुटाने के तरीके का विरोध किया था. उस समय पार्टी ने आशंका जताई थी कि ऐसी कवायद आगे चलकर धार्मिक आधार पर आरक्षण की मांग को बढ़ावा दे सकती है.

आज केंद्र की अपनी कमेटी धर्मवार डेटा मांग रही है. फर्क ये है कि मौजूदा HLCDC का घोषित दायरा मुस्लिम समुदाय की सामाजिक-आर्थिक स्थिति तक सीमित नहीं है, बल्कि पूरे देश में डेमोग्राफिक बदलाव, अवैध इमिग्रेशन, सीमा प्रबंधन और अलग-अलग धार्मिक एवं सामाजिक समूहों में आबादी के बदलाव का अध्ययन करना है.

यानी असली कहानी सिर्फ धर्मवार डेटा मांगने की नहीं है. असली सवाल ये है कि सरकार इस डेटा से किन बदलावों को असामान्य मानेगी, उनके कारण कैसे तय करेगी और आगे उससे कौन से प्रशासनिक या कानूनी कदम निकलेंगे.

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