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नाबालिग चाचा ने 4 साल की भतीजी का रेप किया था, कोर्ट ने नहीं बख्शा, एडल्ट वाली सजा सुना दी

Varanasi Minor rape case: जुवेनाइल जस्टिस बोर्ड ने शुरुआती जांच में पाया कि नाबालिग में कथित अपराध के नतीजों को समझने की मानसिक और बौद्धिक क्षमता थी. यानी उसे पता था कि वह क्या कर रहा है. इसके बाद बोर्ड ने आदेश दिया कि उस पर चिल्ड्रन कोर्ट/POCSO कोर्ट में एक बालिग की तरह मुकदमा चलाया जाए.

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वारदात के समय आरोपी 16 साल का था. (फोटो-इंडिया टुडे)

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  • वाराणसी के स्पेशल पॉक्सो कोर्ट ने चार साल की बच्ची के रेप मामले में उसके चाचा को 20 साल की सजा और 40 हजार रुपये का जुर्माना सुनाया है।
  • घटना 26 मार्च 2021 की है, जिसमें आरोपी ने टॉफी देने के बहाने बच्ची को एक सुनसान जगह पर ले जाकर वारदात अंजाम दी थी और नाबालिग होने के बावजूद उसकी मानसिक क्षमताओं के आधार पर उसे एडल्ट की तरह मुकदमा चलाया गया।
  • सजा सुनाने के बाद कोर्ट ने जुर्माना भुगतान की जिम्मेदारी नाबालिग के अभिभावकों को दी है, जिसमें पीड़िता को मुआवजे के तौर पर जुर्माने की आधी रकम दी जाएगी और जुर्माना न देने पर अतिरिक्त कारावास हो सकता है।

चार साल की बच्ची के रेप के मामले में उसके चाचा को 20 साल की सजा सुनाई गई है. वाराणसी के एक स्पेशल पॉक्सो कोर्ट ने यह फैसला सुनाया है. साथ ही दोषी पर 40 हजार रुपये का जुर्माना भी लगाया है. वारदात के समय दोषी 16 साल का था. मगर मामले की गंभीरता को देखते हुए उसका एडल्ट की तरह ट्रायल चलाया गया.

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स्पेशल कोर्ट ने नाबालिग अपराधी को भारतीय दंड संहिता (IPC) की धारा 376AB और पॉक्सो एक्ट की धारा 5(m)/6 के तहत दोषी ठहराया है. मामले की सुनवाई स्पेशल जज (पॉक्सो एक्ट) और एडिशनल डिस्ट्रिक्ट एंड सेशंस जज नितिन पांडे कर रहे थे.

टॉफी देने के बहाने वारदात को अंजाम

टाइम्स ऑफ इंडिया की रिपोर्ट के मुताबिक, घटना 26 मार्च 2021 की है. बच्ची को टॉफी देने के बहाने दोषी उसे एक सुनसान जगह पर ले गया. वहां वारदात को अंजाम दिया. बाद में बच्ची रोते हुए घर आई और उसने दर्द की शिकायत की.

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कुछ देर बाद पीड़िता की मां ने देखा कि उसके निजी अंग से खून निकल रहा है. उसके पिता ने लालपुर/पांडेयपुर पुलिस स्टेशन में शिकायत दर्ज कराई. घटना के तीन दिन बाद पुलिस ने आरोपी को गिरफ्तार कर लिया.

जुवेनाइल जस्टिस बोर्ड ने शुरुआती जांच में पाया कि नाबालिग में कथित अपराध के नतीजों को समझने की मानसिक और बौद्धिक क्षमता थी. यानी उसे पता था कि वह क्या कर रहा है. इसके बाद बोर्ड ने आदेश दिया कि उस पर चिल्ड्रन कोर्ट/POCSO कोर्ट में एक बालिग की तरह मुकदमा चलाया जाए.

मेडिकल सबूतों से अपराध साबित 

मुकदमे के दौरान छह गवाहों से पूछताछ की गई. इनमें लड़की के माता-पिता, मेडिकल ऑफिसर, जांच अधिकारी और FIR लिखने वाला अधिकारी शामिल थे. अदालत ने माना कि गवाहों के बयानों और मेडिकल सबूतों से अपराध बिना किसी शक के साबित हो गया.

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अदालत ने सजा सुनाते समय जुवेनाइल जस्टिस एक्ट, 2015 की धारा 21 का जिक्र किया. यह धारा कहती है कि जो व्यक्ति अपराध के समय नाबालिग था, उसे ऐसी सजा नहीं दी जा सकती, जिसमें रिहाई की संभावना ना हो. हालांकि, कोर्ट ने माना कि अपराध की गंभीरता को देखते हुए ज्यादा से ज्यादा सजा देने जरूरी था.

इसके बाद जज ने नाबालिग अपराधी को 20 साल की सख्त कैद की सजा सुनाते हुए 40 हजार रुपये का जुर्माना लगाया. कोर्ट ने निर्देश दिया कि जुर्माना भरने की मुख्य जिम्मेदारी नाबालिग के अभिभावकों की होगी. जुर्माने की आधी रकम पीड़िता को मुआवजे के तौर पर दी जाएगी. जुर्माना नहीं देने पर एक वर्ष का अतिरिक्त कारावास भुगतना होगा.

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