अमेरिका के मिडटर्म चुनावों में राष्ट्रपति डॉनल्ड ट्रंप की रिपब्लिकन पार्टी को बड़ा झटका लगता दिख रहा है. शुरुआती नतीजों में डेमोक्रेटिक पार्टी ने कई अहम सीटें जीत ली हैं. हाउस ऑफ रिप्रेजेंटेटिव में डेमोक्रेट्स बहुमत हासिल करने की तरफ बढ़ रहे हैं. वहीं, सीनेट में भी उन्होंने दो अहम सीटें रिपब्लिकन पार्टी से छीन ली हैं.
अमेरिका में मिडटर्म इलेक्शन ने हिला दी ट्रंप की कुर्सी, रुझानों में डेमोक्रैट ने मारी बाजी
US Midterm election: अमेरिका के मिडटर्म चुनाव के रुझान आने शुरू हो गए हैं. राष्ट्रपति डॉनल्ड ट्रंप की रिपब्लिकन पार्टी को बड़ा झटका लगा है. डेमोक्रैटिक पार्टी ने कई अहम सीटें जीत ली हैं. दोनों सदनों में डेमोक्रैट को बहुमत मिलता दिख रहा है.

इन नतीजों को ट्रंप के दूसरे कार्यकाल पर जनता के रिपोर्ट कार्ड की तरह देखा जा रहा है. चुनाव में महंगाई, ईरान के साथ युद्ध और ट्रंप की नीतियां बड़े मुद्दे रहे.
अब सवाल है कि अगर डेमोक्रेट्स अमेरिकी संसद में बहुमत हासिल कर लेते हैं, तो ट्रंप की ताकत कितनी कम होगी? क्या इससे ईरान के साथ चल रहे संघर्ष, रूस-यूक्रेन युद्ध और इजरायल के साथ अमेरिका के रिश्तों पर असर पड़ेगा? और भारत के लिए इन नतीजों के क्या मायने हैं? एक-एक कर समझते हैं.
अमेरिका की संसद को कांग्रेस कहते हैं. इसके दो सदन हैं. पहला हाउस ऑफ रिप्रेजेंटेटिव और दूसरा सीनेट. हाउस ऑफ रिप्रेजेंटेटिव में कुल 435 सीटें हैं. बहुमत के लिए 218 सीटें चाहिए. चुनाव से पहले इस सदन में रिपब्लिकन पार्टी का दबदबा था. लेकिन शुरुआती नतीजों में डेमोक्रेट्स ने कई रिपब्लिकन सांसदों को हराया है. न्यूज एजेंसी AP के मुताबिक, डेमोक्रेट्स बहुमत की तरफ बढ़ रहे हैं.
वहीं, सीनेट में कुल 100 सीटें हैं. बहुमत के लिए 51 सीटें चाहिए. यहां डेमोक्रेट्स ने साउथ कैरोलिना, टेक्सास, ओहियो, जॉर्जिया और नॉर्थ कैरोलिना में रिपब्लिकन पार्टी से सीटें छीन ली हैं. साउथ कैरोलिना में 20 साल से ज्यादा समय बाद किसी डेमोक्रेट ने सीनेट का चुनाव जीता है. सीनेट में भी डेमोक्रैट बहुमत की तरफ बढ़ रहे हैं.
अब सवाल है कि इससे ट्रंप की ताकत कैसे कम होगी? तो मिडटर्म चुनाव राष्ट्रपति के चार साल के कार्यकाल के बीच में होते हैं. इनमें जनता कांग्रेस के सदस्यों को चुनती है. राष्ट्रपति की पार्टी को बहुमत मिलता है या नहीं, इससे अगले दो साल के लिए सरकार की नीतियां तय करने की ताकत प्रभावित होती है.

अगर डेमोक्रेट्स हाउस ऑफ रिप्रेजेंटेटिव पर मेजॉरिटी हासिल कर लेते हैं, तो वे कई मामलों में ट्रंप प्रशासन को चुनौती दे सकेंगे. मसलन, वे सरकार की नीतियों की जांच के लिए कमेटियां बना सकते हैं. इसके अलावा, सेना के ऑपरेशन, दूसरे देशों को दी जाने वाली आर्थिक मदद और सरकारी योजनाओं के बजट पर सांसद सवाल उठा सकते हैं.
लेकिन इसका मतलब ये नहीं है कि ट्रंप की सारी ताकत खत्म हो जाएगी. राष्ट्रपति के पास विदेश नीति से जुड़े फैसले लेने, सेना की कमान संभालने और एग्जीक्यूटिव ऑर्डर जारी करने जैसे अधिकार रहेंगे. वे किसी बिल पर वीटो भी लगा सकते हैं. उनके वीटो को पलटने के लिए कांग्रेस के दोनों सदनों में दो-तिहाई बहुमत चाहिए.
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अमेरिका-ईरान युद्ध पर भी हो सकता है असरअगर डेमोक्रेट्स को कांग्रेस में बहुमत मिलता है, तो वे यूक्रेन को सैन्य और आर्थिक मदद देने की मांग तेज कर सकते हैं. इसके लिए नए फंडिंग प्रस्ताव ला सकते हैं. कांग्रेस की कमेटियां ये जांच भी कर सकती हैं कि यूक्रेन को मिलने वाली मदद और खुफिया जानकारी से जुड़े फैसले कैसे लिए गए.
अमेरिका में ईरान के खिलाफ सैन्य कार्रवाई को लेकर अमेरिकी कांग्रेस में भी विरोध हुआ. 15 सितंबर को अमेरिकी प्रतिनिधि सभा ने 220-204 वोटों से एक प्रस्ताव पारित किया. इसमें राष्ट्रपति से ईरान के खिलाफ सैन्य कार्रवाई में अमेरिकी सेना को हटाने की मांग की गई थी. अब डेमोक्रेट्स इस मुद्दे पर और दबाव बना सकते हैं.
इसके इतर, इजरायल को दी जाने वाली सैन्य मदद, हथियारों की सप्लाई और वेस्ट एशिया में अमेरिकी सैन्य खर्च भी जांच के दायरे में आ जाएंगे.
भारत पर क्या असर पड़ेगा?ट्रंप के दूसरे कार्यकाल में भारत और अमेरिका के रिश्तों में कई मुद्दों पर खींचतान रही है. इनमें व्यापार, टैरिफ, H-1B वीजा और रूस से भारत के ऑयल इम्पोर्ट का मुद्दा शामिल है. अगर डेमोक्रैट्स कांग्रेस में मजबूत होते हैं, तो ट्रंप की टैरिफ नीति पर सवाल बढ़ सकते हैं. लेकिन टैरिफ अपने आप खत्म नहीं हो जाएंगे. भारतीय कंपनियों और एक्सपोट्र्स को इससे जुड़े फैसलों पर कुछ राहत मिल सकती है.
H-1B वीजा का मामला भी अहम है. अमेरिका में बड़ी संख्या में इंडियन प्रोफेशनल इस वीजा के जरिए काम करते हैं. डेमोक्रेट्स वीजा नियमों और विदेशी कर्मचारियों पर लगाई जा रही पाबंदियों को लेकर सुनवाई और जांच की मांग कर सकते हैं.
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