‘चिन्गारी कोई भड़के तो सावन उसे बुझाए. सावन जो अगन लगाए. उसे कौन बुझाए?’ 4 महीने में 22 लोगों को फांसी की सजा देने वाले जज रवि कुमार दिवाकर की पीड़ा सुनेंगे तो यही गाना याद आएगा. बीते दिनों उनके कोर्ट में चल रहे 97 ऐसे केसों को दूसरी अदालत में ट्रांसफर कर दिया गया, जिनकी सुनवाई चल रही थी. जाहिर है ये बात जज को नागवार गुजरी है. उन्होंने इसे ‘एक जज के साथ हुआ अन्याय’ बताया और सवाल पूछा कि ‘न्याय देने वाले जज के साथ अन्याय हो तो वह कहां जाएगा?’
ताबड़तोड़ फांसी की सजा देने वाले जज का दर्द छलका, कहा- 'अन्याय हो तो कहां जाएं'
मुजफ्फरनगर के जज रवि कुमार दिवाकर की अदालत से सुनवाई के दौरान 97 केस दूसरी अदालत में ट्रांसफर कर दिए गए. अपने एक फैसले में उन्होंने इस पर सवाल उठाते हुए न्यायपालिका में पारदर्शिता, जवाबदेही और प्रशासनिक आदेशों के आधार की बात कही.

जज रवि दिवाकर उत्तर प्रदेश के मुजफ्फरनगर जिले में एडिशनल जिला और सेशन्स जज हैं. हाल ही में वो तब चर्चा में आए थे, जब 4 महीनों के अंदर 10 अलग-अलग केसों में उन्होंने 22 लोगों को मौत की सजा सुना दी. इसके बाद बिना कारण बताए उनकी अदालत के 97 केसों को दूसरी अदालत में ट्रांसफर कर दिया गया.
लाइव लॉ की रिपोर्ट के मुताबिक, गुरुवार, 17 सितंबर को जज रवि कुमार दिवाकर ने एक मामले की सुनवाई के दौरान 35 पन्नों में अपना फैसला लिखा. इसके आधे भाग में उन्होंने अपने साथ हुए कथित ‘अन्याय’ के बारे में टिप्पणी की. जज ने बताया कि जो मामले उनसे वापस लिए गए, उनमें हत्या के गंभीर आरोपों वाले ऐसे केस थे जिनकी सुनवाई आधी हो चुकी थी. बिना कोई कारण बताए और जिला जज के रिटायर होने से सिर्फ 13 दिन पहले उन्हें वापस ले लिया गया.
जज रवि कुमार दिवाकर ने अपने फैसले में कहा कि सेशन्स जज किसी एडिशनल सेशन्स जज को सौंपे गए केस तभी वापस ले सकते हैं, जब उसका ट्रायल शुरू न हुआ हो. एक बार केस की सुनवाई शुरू हो जाने के बाद केस वापस नहीं लिए जा सकते. उन्होंने ये भी कहा कि सीआरपीसी की धारा 412 के तहत केस वापस लिए जाने का कारण बताना जरूरी होता है. किसी भी मामले को ट्रांसफर करने के लिए उचित आधार होना चाहिए. जैसे- न्याय न मिल पाने या न्याय प्रक्रिया में गड़बड़ी की आशंका हो, तभी ऐसा किया जा सकता है. जज ने कहा,
सवाल यह उठता है कि जज का काम न्याय करना है और अगर उसी जज के साथ अन्याय हो तो वह कहां जाएगा?
उन्होंने ये भी सवाल किया कि अगर कोई सेशन जज या जिला जज ऐसा प्रशासनिक आदेश देता है जो उसके अधिकार क्षेत्र से बाहर है तो क्या संबंधित न्यायिक अधिकारी कानूनी रूप से उसका पालन करने के लिए बाध्य है?
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शासन-प्रशासन पर टिप्पणीअपने फैसले में जज दिवाकर ने ‘शासन-प्रशासन’, ‘पारदर्शिता’ और ‘जवाबदेही’ को लेकर भी कई ऐसी बातें कहीं, जो सरकारी कर्मचारियों से लेकर राजनीतिक सत्ता से जुड़े लोगों को भी अपने दायरे में लेती हैं. उन्होंने कहा कि एक सरकारी कर्मचारी को सही को सही और गलत को गलत कहने के काबिल होना चाहिए. भारत कानून के शासन का पालन करता है. कानून के ऊपर कोई भी नहीं है. देश का शासन किसी सरकारी कर्मचारी के मनमाने व्यवहार के हिसाब से नहीं चलता.
जज ने कहा कि कोई भी सरकारी कर्मचारी राजाओं की तरह बर्ताव नहीं कर सकता. उसे अपने हर आदेश का कारण बताना होगा. वजह स्पष्ट करनी होगी. सिस्टम में पारदर्शिता होनी चाहिए. पीड़ित और शिकायतकर्ता को यह पता होना चाहिए कि उसकी फाइलें एक कोर्ट से दूसरी कोर्ट में क्यों ट्रांसफर की गईं.
एक ब्रिटिश विचारक और लेखक लॉर्ड एक्टन को कोट करते हुए जज ने कहा कि सत्ता (Power) इंसान को भ्रष्ट बनाती है और पूर्ण सत्ता (Absolute Power) इंसान को पूरी तरह भ्रष्ट बना देती है. थ्योरी समझाते हुए जज रवि कुमार ने कहा कि जब सत्ता पर कोई रोक-टोक नहीं रहती तो इंसान खुद को नैतिकता और कानून से ऊपर समझने लगता है. बेलगाम सत्ता का सबसे बड़ा खतरा ये नहीं है कि वो दूसरों को कंट्रोल करती है, बल्कि ये है कि वह खुद को जवाबदेही से मुक्त समझने लगती है.
उन्होंने कहा कि जिस पल किसी को यह लगता है कि उसके फैसले पर सवाल नहीं उठाया जा सकता, उसी वक्त न्याय की जगह अहंकार ले लेता है. सवाल की गुंजाइश खत्म हो जाती है. अहंकार फैसले लेता है और न्याय धीरे-धीरे खामोश हो जाता है.
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