The Lallantop

'GDP ग्रोथ ठीक, लेकिन 2047 तक विकसित भारत संभव नहीं', अर्थशास्त्रियों ने ऐसा क्यों कहा?

भारत के जीडीपी ग्रोथ रेट पर मचे घमासान के बीच योजना आयोग के डिप्टी चेयरमैन मोंटेक सिंह अहलूवालिया और अर्थशास्त्री सुरजीत भल्ला ने सरकार का समर्थन किया है. लेकिन साथ ही उन्होंने कहा है कि मौजूदा ग्रोथ रेट साल 2047 तक सरकार के विकसित भारत के सपने को पूरा करने के लिए पर्याप्त नहीं है.

Advertisement
post-main-image
सुरजीत भल्ला (बाएं) और मोंटेक सिंह अहलूवालिया (दाएं) ने जीडीपी ग्रोथ रेट पर बात की है. (इंडिया टुडे)

Quick AI HighlightsClick here to view more

  • वित्त वर्ष 2026-27 की पहली तिमाही में भारत की जीडीपी ग्रोथ रेट 7.8 प्रतिशत दर्ज की गई, जिसे विशेषज्ञों ने विभिन्न दृष्टिकोण से देखा है लेकिन यह आंकड़ा सरकार ने जारी किया है।
  • यह वृद्धि वेस्ट एशिया में टकराव और अन्य वैश्विक चुनौतियों के बीच आई है, जिससे कुछ विशेषज्ञों ने डेटा की विश्वसनीयता पर सवाल उठाए हैं और सरकार पर आंकड़ों में हेरफेर के आरोप लगे हैं।
  • अर्थशास्त्रियों ने कहा है कि 7.8% की ग्रोथ के बावजूद 2047 तक विकसित भारत बनने के लिए और तेज़ आर्थिक विकास और ठोस सुधारों की आवश्यकता होगी, जिसमें ज्यादा व्यापक आर्थिक समृद्धि शामिल है।

वित्त वर्ष 2026-27 की पहली तिमाही में भारत की जीडीपी ग्रोथ रेट 7.8 प्रतिशत रही है. वेस्ट एशिया में चल रहे टकराव समेत दूसरी वैश्विक चुनौतियों के बीच इस आंकड़े को उम्मीद से बेहतर बताया जा रहा, लेकिन इस GDP आंकड़े को लेकर सवाल भी उठे हैं. हालांकि कई विशेषज्ञ इन आंकड़ों से सहमत भी दिखे हैं. इस विवाद के बीच देश में आर्थिक मामलों के दो बड़े जानकारों ने साल 2047 तक विकसित भारत बनने के सरकारी दावे पर संदेह जताया है. उनका कहना है कि इसके लिए और तेज आर्थिक विकास की जरूरत होगी.

Advertisement
सुभाष गर्ग ने उठया था सवाल

पूर्व वित्त सचिव सुभाष गर्ग ने जीडीपी के आंकड़ों और पिछली अवधि के संशोधन पर सवाल उठाए, जबकि कांग्रेस ने भी सरकार पर आंकड़ों में हेरफेर करने का आरोप लगाया. सुभाष गर्ग ने तो यहां तक दावा किया कि भारतीय अर्थव्यवस्था की रियल ग्रोथ रेट 7.8 % की जगह सिर्फ 2.6% है. हालांकि एक इंटरव्यू में उन्होंने खुद ही 2.6 जीडीपी ग्रोथ रेट के दावों से पलटते हुए इसे 5% बताया.

सुरजीत भल्ला, मोंटेक अहलूवालिया आंकड़ों से सहमत

दूसरी तरफ दो प्रमुख अर्थशास्त्रियों - सुरजीत भल्ला और मोंटेक सिंह अहलूवालिया ने जीडीपी ग्रोथ के आंकड़ों में हेरफेर के आरोपों को खारिज किया है. लेकिन दोनों ने बताया कि 7.8 % की ग्रोथ के बाद भी 2047 तक भारत को विकसित बनाने का ख्वाब मुकम्मल नहीं होगा. इसके लिए भारत को और तेज आर्थिक विकास की जरूरत होगी. जीडीपी के आंकड़ों पर हुए विवाद में सरकार का समर्थन करने वाले मोंटेक सिंह अहलूवालिया कांग्रेस के नेतृत्व वाली UPA सरकार के दौरान योजना आयोग के डिप्टी चेयरमैन रह चुके हैं. 

Advertisement

वह 2004 से 2014 के बीच देश की आर्थिक नीति और सुधारों से जुड़े बड़े फैसलों का हिस्सा रहे हैं.

मोटेंक सिंह अहलूवालिया ने कहा कि 7.8 % के आंकड़े को राजनीतिक तरीके से बढ़ा-चढ़ाकर दिखाने के आरोपों के पक्ष में कोई ठोस सबूत नहीं है. वहीं सुरजीत भल्ला ने कहा कि अगर सरकार GDP को बढ़ाकर दिखाना चाहती तो खपत के आंकड़ों को भी बढ़ाकर दिखाया जा सकता था. लेकिन नई सीरीज में खपत को उल्टे नीचे रिवाइज किया गया है. उनके हिसाब से अब तक ऐसा कोई सबूत नहीं है, जिससे ये कहा जा सके कि जीडीपी के आंकड़ों के साथ छेड़छाड़ हुई है.

2047 तक विकसित भारत का लक्ष्य मुश्किल

जीडीपी विवाद से हटकर दोनों अर्थशास्त्रियों ने 'विकसित भारत 2047' के टारगेट को लेकर अपनी राय दी है. उनका मानना है सिर्फ एक-दो तिमाही की तेज ग्रोथ से यह तय नहीं किया जा सकता कि भारत 2047 तक विकसित अर्थव्यवस्था बन जाएगा. सुरजीत भल्ला का कहना है कि भारत को इस टारगेट तक पहुंचने के लिए लंबे समय तक डबल डिजिट में ग्रोथ बनाए रखनी होगी. उन्होंने कहा कि डॉलर के लिहाज से प्रति व्यक्ति आय बढ़ाने के लिए अभी काफी तेज ग्रोथ की जरूरत है. मोंटेक सिंह अहलूवालिया ने भी कहा,

Advertisement

 भारत की अर्थव्यवस्था पहले के अनुमानों के मुकाबले ज्यादा मजबूत दिख रही है. लेकिन मौजूदा रफ्तार विकसित भारत 2047 के लक्ष्य के लिए पर्याप्त नहीं है. उनका मानना है कि भारत को ज्यादा हाई और लगातार बनी रहने वाली ग्रोथ रेट चाहिए.

सिर्फ जीडीपी बढ़ने से काम नहीं बनेगा

आर्थिक विशेषज्ञों का मानना है कि सिर्फ जीडीपी बढ़ने से भारत का काम नहीं बनेगा. प्रति व्यक्ति आय, रोजगार, प्रोडक्शन और विकास का फायदा समाज के व्यापक हिस्से तक पहुंचना भी मौजूं है. अर्थशास्त्री रोहित लांबा ने भारत के डेवलपमेंट मॉडल को चीन और साउथ कोरिया से अलग बताया है. उनके मुताबिक, 

भारत कृषि आधारित अर्थव्यवस्था से सीधे हाई स्किल सर्विस सेक्टर की ओर तेजी से बढ़ गया, जबकि बड़े पैमाने पर रोजगार देने वाले मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर को उतनी मजबूती नहीं मिल सकी. वर्ल्ड बैंक के आंकड़ों के मुताबिक, साल 2024 में भारत की प्रति व्यक्ति जीडीपी करीब 2,695 डॉलर थी. इसके मुकाबले चीन की प्रति व्यक्ति जीडीपी करीब 13,303 डॉलर, ब्रिटेन की करीब 52,246 डॉलर और अमेरिका की करीब 84,534 डॉलर थी.

रोजगार और K-Shaped ग्रोथ की चुनौती

भारत के लिए बड़ी चुनौती ऐसी ग्रोथ मेंटेन करना है, जिससे ज्यादा प्रोडक्टिव और क्वालिटी जॉब पैदा हों. तेज जीडीपी ग्रोथ के बाजवूद इसका फायदा अलग-अलग इनकम ग्रुप तक बराबर नहीं पहुंचता, तो विकास का मॉडल  K-Shaped हो सकता है. K-Shaped  इकोनॉमी ऐसी आर्थिक स्थिति है जिसमें समाज के अलग-अलग हिस्से या इंडस्ट्री एक ही समय में उल्टी दिशाओं में आगे बढ़ते हैं. मोंटेक सिंह अहलूवालिया का भी मानना है कि आर्थिक विकास के साथ रोजगार और व्यापक स्तर पर समृद्धि सुनिश्चित करना जरूरी है. सिर्फ जीडीपी ग्रोथ को देखकर यह नहीं माना जा सकता कि अर्थव्यवस्था की सारी समस्याएं खत्म हो चुकी हैं.

ये भी पढ़ें - 'विकसित भारत के लिए 8-9% की ग्रोथ चाहिए... ', रघुराम राजन जापान को 'पछाड़ने' पर भी बोले हैं

ज्यादा ठोस सुधारों की मांग 

मोटेंक सिंह अहलूवालिया और सुरजीत भल्ला ने विकसित भारत का लक्ष्य हासिल करने के लिए ज्यादा ठोस आर्थिक सुधारों की जरूरत बताई है. उनका मानना है कि भारत को वैश्विक व्यापार के मोर्चे पर ज्यादा मजबूती से जुड़ने, टैरिफ कम करने और इंडस्ट्रीज के लिए इम्पोर्टेड इनपुट सस्ते करने पर जोर देना होगा. 

अहलूवालिया ने ब्रिटेन और यूरोपीय यूनियन के साथ हुए व्यापार समझौता का फायदा उठाने और ग्लोबल मार्केट के लिए भारतीय कंपनियों को ज्यादा कंपटिटिव बनाने पर जोर दिया है. उनका कहना है कि भारत को अपनी क्षमता पर भरोसा रखते हुए दुनिया के लिए खुला होना चाहिए. अहलूवालिया ने ये भी कहा कि अब सिर्फ रिफॉर्म की जरूरत है ये कहने से काम नहीं बनेगा. सरकार को ये तय करना होगा कि असल में कौन कौन से सुधार किए जाने हैं और उनको लागू करने के तरीके क्या होंगे.

वीडियो: भारत की जीडीपी विकास दर में बीते 18 महीनों की सबसे बड़ी गिरावट: दूसरी तिमाही में 5.4% पर पहुंची

Advertisement